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Thursday, October 8, 2009

इस्मत आपा, कितनी कुशल बुनकर हैं आप !

http://mohallalive.com/2009/10/07/nehru-centre-theatre-festival-third-day/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=८७

नेहरू सेंटर थिएटर फेस्टिवल के तीसरे दिन नसीरुद्दीन शाह के थिएटर ग्रुप “मोटली” ने “इस्मत आपा के नाम – II” प्रस्तुत किया। नाटक प्रस्तुत करने से पहले नसीरुद्दीन शाह अपने ग्रुप और नाटक का तआर्रुफ करने के लिए आये। उन्होंने बहुत अच्छी बात कही कि ऐसा नहीं है कि इनकी रचनाएं या ये खुद किसी परिचय की मोहताज़ हैं। मगर उनको इस रूप में याद करना उनके प्रति हमारी श्रद्धांजलि है। दूसरी महत्व की बात कही कि हमारी आज की पीढी अपने लेखकों के बारे में कम जानती है और हमारी कोशिश है कि ऐसे महान लेखकों की कृतियों को हम दर्शकों तक ले कर आएं।
स्क्रिप्ट दमदार हो तो वह सुनने में भी देखने जैसा लुत्फ देती है। इस्मता चुग़ताई उर्दू या यों कह लें कि हिंदुस्तानी ज़बान की ऐसी अदीबा रही हैं कि उनकी लेखनी से लफ्ज़ जैसे अपने आप बन कर, संवर कर, लरज लरज कर बाहर आते हैं। तरक्कीपसंद इस्मत आपा ने बहुत कुछ लिखा। कहानियां, फिल्में, उपन्यास। फिल्मों में काम भी किया। अपने समय की वे बेहद तरक्कीपसंद अदीबा थीं, जिनसे मर्द लेखक भी ख़ौफ खाते थे। उनकी अपनी तरक़्क़ीपसंदगी का आलम यह था कि अपनी आखिरी ख्वाहिश मे उन्होंने कहा था कि उनके मरने के बाद उन्हें दफनाने के बदले उन्हें जला दिया जाए और उनकी ख़ाक़ को गंगा के सुपुर्द कर दिया जाए। यह एक ऐसा क़दम था, जिसने मुंबई के बड़े से बडे तरक़्क़ीपसंद साहित्यकारों और लोगों को हिला कर रख दिया था। नेहरू और गांधी के प्रति तो वे श्रद्धा भाव से कूट कूट कर भरी हुई थीं। यह हमारे अदब की बदक़िस्मती है कि जब भी उस पर कोई नये तरीक़े से सोचता है तो उस पर लानत-मलामत की जाती है। इस्मत आपा भी गुलेरी जी की तरह एक ही कहानी “लिहाफ” से जानी जाने लगीं और यह कहानी उनके अदब के साथ-साथ उनके जीवन का भी एक अजीबोगरीब पन्ना बनकर रह गयी। उन पर इल्ज़ाम लगे कि वे फाहश लेखन करती हैं। मंटो की तरह उन पर इसके लिए मुकदमा तक चला।
यह सब लिखने के पीछे मक़सद महज़ इतना था कि आप तनिक इस्मत आपा की खुसूसियतों से वाक़िफ हो लें। यह हिंदुस्तान का भी दुर्भाग्य रहा है कि यहां अपने ही नामचीन लेखकों की क़द्र नहीं, क्योंकि इन नामचीन लेखकों ने अपनी-अपनी मादरी ज़बान में लिखना ज़्यादा मुनासिब समझा और अंग्रेजों के मारे हम अभी तक अपने को अंग्रेज कहलाने और अंग्रेजी पढ़ने, लिखने, बोलने में बड़े गुमान में भर जाते हैं।
कहानी का मंचन हिंदी थिएटर के लिए कोई नयी बात नहीं है। देवेंद्रराज अंकुर को तो कहानी मंचन का विशेषज्ञ ही माना जाता है। प्रसिद्ध कथाकारों की कृतियों पर काम करने में एक आश्वस्ति स्क्रिप्ट की रहती है। क़िस्सागोई तो वैसे भी हमें बचपन से विरासत में मिल जाती है। इसलिए गये कुछ अरसे से थिएटरदानों ने हिंदी, उर्दू आदि के लेखकों की कहानियों की थिएट्रिकल प्रस्तुति करनी शुरू की है। ‘मोटली’ भी इनमें से एक है। मोटली की “इस्मत मंटो हाज़िर हों” और “इस्मत आपा के नाम” में सादत हसन मंटो और इस्मत चुग़ताई के अफ़सानों की रंगमंचीय प्रस्तुति है।
“इस्मत आपा के नाम – II” में इस्मत आपा के 3 अफसानों “अमरबेल” “नन्हीं की नानी” और “दो हाथ” की नाटकीय प्रस्तुति की गयी, जिन्हें क्रमश: मनोज पाहवा, लवलीन मिश्रा और सीमा पाहवा ने प्रस्तुत किया। अफ़सानागोई करते हुए पात्र में बदल जाना और फिर पात्र से अफ़सानागो बन जाने की इस अंतर्यात्रा को इन तीनों कलाकारों ने बडी कुशलता से पेश किया। सभी अफसाने इतने दमदार थे और उनमें समाज और उसकी रवायतों के प्रति इतना तंज भरा हुआ था कि सभी कहानियां व्यंग्य की शक्‍ल लेते हुए कभी टीस तो कभी हास्य पैदा कर रहे थे। सभी कलाकार अपनी बयानबाज़ी और अभिनय में सहज थे। लवलीन और सीमा तो आज भी दूरदर्शन के पहले सोप ‘हमलोग” की बड़की और छुटकी के रूप में ही जाने जाते हैं। तब सीमा पाहवा सीमा भार्गव के नाम से जानी जाती थीं। इसका उदाहरण मंच पर उनके प्रवेश के साथ ही मिल गया, जब दर्शकों ने उन्हें छुटकी और बड़की कहना शुरू किया।
“इस्मत आपा के नाम – II” के अफ़सानों का परिवेश मुख्य रूप से मुस्लिम है, इसलिए मंच पर भी वह परिवेश देने की कोशिश की गयी थी। सादी, सीधी और सरल उर्दू सभी को समझ में आयी और सभी ने इसका पुरअसर लुत्फ उठाया। प्रकाश व्यवस्था भी बहुत तेज़ और आंखों को चुभनेवाली नहीं थी। बीच-बीच में एकाध ठुमरी के चंद बोलों ने नाटक में एक अलग ही रस घोल दिया।
नसीरुद्दीन शाह ने कला फिल्मों से काम आरंभ करके व्यावसायिक फिल्मों में आ कर भी नाम कमाया। वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के चंद गिने चुने लोगों में से हैं, जो प्रसिद्धि के इतने ऊंचे मुकाम पर पहुंचने के बाद फिर से नाटक की ओर लौटे हैं और नाटक के प्रति गंभीर हैं। यह गंभीरता उनकी शख्सियत के साथ-साथ उनके नाट्य निर्देशन में भी दिखती है। कभी मौका मिले तो आप ये प्रस्तुतियां ज़रूर देखें और हां, इनलोगों को पढ़ें भी।
(पुन : “इस्मत आपा के नाम – II” नाटक को देखने के बाद एक दर्शक ने बहुत लंबी सांस छोडी। दूसरे ने इसकी वजह पूछी। उसने बताया, कल के ‘लैला मजनूं’ के बाद मुझे लगा था कि उर्दू इतनी ही भारी-भारी लैंग्वेज होती होगी। दूसरे दर्शक ने बताया कि कल के भारी भारी सेट, कॉस्ट्यूम, ज़बान, मौसीक़ी से अलहदा आज का नाटक कितना हल्का और दिल तक पहुंचनेवाला लग रहा है। बिचारे मुंबईकर, जीवन की आपाधापी में इस क़ाबिल नहीं रह गये कि कोई भारी सा कुछ भी अपने ऊपर ले सकें!)

Wednesday, October 7, 2009

मेरे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत ना मांग

http://janatantra.com/2009/10/07/nehru-centre-theatre-festival-layla-majnun/

http://www.artnewsweekly.com/

जीव जब तक धरती पर हैं, तबतक प्रेम भी है। इंसान की दुनिया में प्रेम पर जब तब रोक टोक लगती रहती है, मगर प्रेम का कभी खात्मा नहीं होता. आज भी प्रेम की गाथाएं राधा कृष्ण से ले कर रोमियो जूलियट, शीरीं फरहाद, लैला मजनू के किस्सों के रूप में जन मानस में जीवित है. आज भी जब कोई प्रेम के पागलपन में पडता है, उसके लिए तत्काल कह दिया जाता है, “लैला मजनू बन गये हैं.” क़िस्सागोई भी हमारे जीवन में रक्त की तरह समाई हुई है. गाथा आल्हा ऊदल की हो या लैला मजनू की, जिसमें भी रस तत्व होता है, लोग उसे गाथा बना देते हैं और फिर उसकी आवृत्ति और पुनरावृत्ति होती रहती है. प्रेम पर लोगों की नाक भौं चाहे जितनी सिकुडे, मगर लेखन, नाटक, फिल्म, टीवी में इसी की भरमार है.

कई बार ऐसा होता है कि रामायण, महाभारत की तरह ही हम कथानक को जानते हुए भी उसकी प्रस्तुति पुनर्प्रस्तुति को देखते पढते हैं ताकि नया क्या है, यह देखा जा सके. लैला मजनू की दास्तान भी कोई नई बात नहीं है, मगर इसके मूल में छिपे इश्क़ को उजागर करने की चाहत बार बार लोगों को इस विषय पर ले आती है. इश्क़ की इसी दास्तानगोई को प्रो. राम गोपाल बजाज ने नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में ‘शब्दाकार’ द्वारा प्रस्तुत नाटक ‘लैला मजनू’ के माध्यम से एक बार फिर उजागर करने की कोशिश की. इस्माइल चूनारा के मूल अंग्रेजी नाटक का उर्दू तर्ज़ुमा साबिर इरशद उस्मानी ने किया है.
उर्दू ज़बान की साफगोई और रवानगी इस नाटक में है, जिसके साथ कलाकारों ने भी लगभग न्याय किया, वरना आज के कलाकारों के मुंह से उर्दू सुनकर रोना आने लगता है. प्रो. राम गोपाल बजाज रंगमंच जगत में न भूलनेवाला नाम है. ये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक भी रह चुके हैं और 2003 में पद्मश्री से सम्मनित भी किए जा चुके हैं. अपने लोगों के बीच ये “बज्जू भाई” के रूप में ज्यादा जाने पहचाने जाते हैं.
डॉ. राम गोपाल बजाज के फॉर्म से जो परिचित होंगे, वे जानते होंगे कि वे अपने कथ्य, मंच सज्जा, पात्रों, परिवेश, गीत, संगीत, वेश विन्यास, मेकअप आदि को काफी विस्तार देते हैं. इससे नाटक में एक फैलाव आता है और दर्शक इस प्रसार को महसूस कर पाते हैं. सम्वाद पर भी वे काम करते हैं.
इस नाटक में भी खालिस उर्दू के बड़े बड़े, लम्बे लम्बे सम्वाद निरंतरता में पात्रों से बुलवाए गए हैं. सम्वाद में कहीं तीव्रता है तो कहीं ठहराव. कहीं ऊंचाई है तो कहीं गहराई. पूरे नाटक में एक प्रवाह दिखता है. मध्यान्तर के पहले तक नाटक इसी प्रवाह में बहता दिखता है. ग्रीक संस्कृत शैली के माध्यम से इश्क़े मजाज़ी से इश्क़े हक़ीक़ी तक का सफर एक शायराना अंदाज़ में होता जाता है. इसमें प्रेम के शारीरिक स्तर से उतर कर उसके आध्यात्मिक रूप तक पहुंच जाना कि जब लैला अपने क़ैस से मिलती है तो वह उस हाड मांस की बनी लैला को पहचानने से इंकार कर देता है. औरत एक मज़बूर शब्द है और इसे भी लैला की मां के सम्वाद के साथ बताए जाने की कोशिश की गई है. नाटक की खूबियां ही कभी कभी इसकी सीमाएं भी बन जाती हैं.
मध्यांतर के बाद सबकुछ छूटता बिखरता, थकाऊ, उबाऊ सा लगने लगता है. लम्बे लम्बे सम्वाद और मुंबई के आज के माहौल में ऐसी उर्दू से लोग बावस्ता नहीं हो पाते. अगर अकादमिक प्रस्तुति हो तो इसके माध्यम से छात्रों और सीखनेवालों को रंगमंच की सभी बारीकियां समझाई जा सकती हैं, मगर आज के समय में, जब देश और लोग बाग तरह तरह की विषमताओं से जूझ रहे हैं, इश्क़ की यह क़िस्सागोई फैज़ की याद दिला देता है कि “मेरे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत ना मांग”। पांच कथावाचिकाएं पारम्परिक शैली में कथा बांचती रहती हैं. कथा की अतिशय गम्भीरता को तोडने के लिए दो क़िस्सागो भी है, जो मनोरंजन तो करते हैं, मगर नाटक को बेवज़ह लम्बा खींचते हैं.
इश्क़ के नाम पर इतना तड़पने के बावज़ूद उस तड़प का अहसास बदक़िस्मती से नहीं हो पाता. सभी पात्रों ने अपना अपना किरदार निभाया सिवाय मजनू के. उसके पूरे हाव भाव में अपने को मंच पर प्रस्तुत करने का भाव था, जो नाटक को एकदम से कमज़ोर कर देता था. लम्बे लम्बे सम्वाद भाव की गहराई को खा जा रहे थे.
एक समय था, जब पारसी थिएटर में बडी नाटकीय शैली में सम्वाद बोले जाते थे, मगर आज भाव के भूखे लोगों को इशारे में समझना अधिक अच्छा लगता है. उसमें भी महाराष्ट्र में, जहां नाटक का मतलब होता है, कम से कम शब्दों का खर्च. वरना मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार भालचंद्र झा के शब्दों में कहें कि तब स्टेज नाटक और रेडियो नाटक में फर्क़ ही क्या रह जाएगा? फिर भी, फेस्टिवल का नाटक है. मान कर चलिये कि फेस्टिवल में सब अच्छा अच्छा ही होता है. आगे भी होगा. बस, आते रहिए.
(पुन: मेरा एक दोस्त आधे में ही नाटक छोड कर चला गया. मेरे सामने एक सज्जन सोते रहे. मध्यांतर के बाद दिखे ही नहीं. एक अन्य दोस्त कहते रहे, मैं तो मराठी थिएटर से बावस्ता रखता हूं ना. इतने सारे सम्वाद? शायद हिंदी में ऐसा ही होता हो. एक दिन पहले ही मराठी नाटक अकादमी ने मराठी के मूल भाव गीत संगीत को ले कर गिरीश कर्नाड के नाटक ‘फ्लावर्स’ पर आधारित अपनी प्रस्तुति ‘मदन भूल’ की थी. सामन्यत: देर तक चलनेवाले संगीत प्रधान मराठी नाटक में नए प्रयोग तो किए ही, उसे महज डेढ घंटे में भी सहेज दिया. मेरा दुर्भाग्य कि किसी वज़ह से इसे देख नहीं सकी.)

Monday, October 5, 2009

क़ैदियों की ज़िंदगी में “निर्मल धारा सेतु”

http://janatantra.com/2009/10/05/avitako-programme-for-prisoners/

अक्सर यह होता है कि जेल के लिए कोई भी कार्यक्रम करते समय वक्ता, अभिनेता, कलाकार, कविगण इस बात के लिए आशंकित रहते हैं कि जेल के लोग यानी कि क़ैदी उनकी बातें समझेंगे या नहीं. पिछले 6 सालों से जेल में काम कर रही छम्मक्छल्लो के लिए अनुभव एकदम अलग है. उसकी नज़र में सबसे पहले तो जेल में बन्द सभी इंसान हैं. छम्मक्छल्लो को नहीं मालूम कि वे अपराधी हैं भी या नहीं. कोर्ट सबूतों के आधार पर फैसला सुनाती है. छम्मक्छल्लो को यह भी नहीं मालूम कि इन फैसलों के कारण सजा काट रहे लोग वास्तव में अपराधी हैं या नहीं. उन्होंने अपराध खुद से किया या किसी के उकसाने पर किया, या वे उस खेल के नामालूम से मोहरे रहे, जिनके कन्धे पर बन्दूक चला कर सभी अपनी-अपनी गोलियां दागते रहे. दुर्भाग्य से छम्मक्छल्लो को यह कुछ भी नहीं पता. उसे पता है तो सिर्फ़ यह कि जेल में बन्द लोग भी इंसान है, उनके भीतर भी दिल धड़कता है, वे भी अपने किये के लिए पछताते हैं, वे भी वहां से निकल कर सम्मान की ज़िन्दगी बसर करना चाहते हैं. मतभेद हो सकते हैं, मगर ग्लास आधा खाली देखने के बजाय ग्लास आधा भरा हुआ देखे जाने की ज़रूरत है.
छम्मक्छल्लो यही करने का प्रयास करती है. इसी क्रम में ‘अवितोको’ द्वारा गान्धी और शास्त्री जयंती यानी 2 अक्तूबर के ठीक एक दिन बाद यानी, 3 अक्तूबर, 2009 को ठाणे सेंट्रल जेल में भारतीय पीनल कोड की भिन्न भिन्न धाराओं के तहत बन्द 35 बन्दियों के लिए ‘निर्मल आनन्द सेतु’ पर एक दिवसीय कार्यशाला रखी गई. इसका मूल उद्देश्य व्यक्ति के अपने ‘स्व’ का विकास करना था. जेल जैसी विषम जगह में रहकर भी अगर कोई अपने विकास की बात सोचता और समझता है तो यह उसके जीवन की कभी ना भूलनेवाली घटना हो जाती है. रविदत्त गौड़ ने इस कार्यशाला का संचालन किया. रवि भारतीय मिथकों के सहारे आज के जीवन की परतों को तह दर तह खोलने में माहिर हैं. जीवन की जटिलता उनकी प्रवाहमयी भाषा और विचारों के प्रभाव में आ कर अपने आप अपने गिरह खोलने लगती है.
कार्यशाला के सहभागी व्याख्यान के विन्दुओं को अपने जीवन से जोड़ कर देखने का प्रयास कर रहे थे और वे उसमें सफल भी हुए. सहभागियों को एक अभ्यास कराया गया. कागज से उन्हें एक सेतु बनाने को कहा गया, जिसके नीचे से एक जहाज को गुजरना था और जिसके ऊपर सामान को भी टिकाए रखना था. तीन ग्रुपों में यह अभ्यास कराया गया. सभी ग्रुपों को अपने ग्रुप का नाम रखने और अपनी टीम का नेता यानी लीडर चुनने के लिए कहा गया. ग्रुप ने अपने अपने ग्रुप का नाम रखा- ए-1, क्रिएटिव और ईगल. ईगल ग्रुप ने बडा सा सेतु बनाया, मगर उसके नीचे से ना तो जहाज गया और ऊपर ना ही सामान टिक सका. क्रिएटिव ग्रुप के सेतु के साथ भी यही बात हुई. ए-1 ग्रुप के सेतु के नीचे से जहाज तो नहीं गया, मगर उसके ऊपर सामान आ गया. जीवन वही एक सेतु है, जिसके नीचे से हमारे अपने अन्दर के लोगों की भी समाई हो और जिसे अपने ऊपर से बड़े से बड़ा असला भी रख सकने की कूव्वत हो. सहभागियों ने जीवन के इस तत्व को इतनी आसानी से समझा कि वे इस कथन के मर्म तक तुरंत पहुंच गए.
सहभागियों ने इस कार्यशाला के लिए नमित होने से लेकर कार्यशाला स्थल तक आने और यहां आकर उन्हें कैसा लगा और उन्होंने इससे क्या हासिल किया, पर अपने विचार दिए. ये विचार फिर कभी आपको अलग से दिए जाएंगे. ‘अवितोको’ सहभागियों को अपनी भाषा में बात करने देने के लिए स्वतंत्र रखता है. यहां भी सहभागियों ने हिन्दी, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी में अपनी बातें रखीं. सहभागियों का बारम्बार यही अनुरोध रहा कि आप यहां जल्दी जल्दी आएं, ताकि इस कार्यशाला की बातों को और गहराई से सीखा जा सके. और आगे सकारात्मक तरीके से सोचा, समझा और किया जा सके.
आप भी ‘अवितोको’ के इस अभियान से कला, थिएटर, साहित्य य अन्य किसी भी क्रिएटिव और सकारात्मक तरीके से जुडना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप हमें avitoko@rediffmail.com या gonujha.jha@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं

Saturday, October 3, 2009

गैलिलियो - नेहरु सेंटर, मुंबई के सराहनीय प्रयास की ढीली प्रस्तुति के बावज़ूद

खगोलशास्त्र वर्ष के उपलक्ष्य पर नेहरु सेंटर, मुंबई ने 30 सितम्बर, 2009 को बर्टोल्ड ब्रेख्त लिखित "गैलिलियो" नाटक की प्रस्तुति की. गैलिलियो इतालवी भौतिकशास्त्री और खगोलशास्त्री थे, जिन्होंने उस समय की मान्यता के खिलाफ अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किए थे कि चांद चिकना नहीं, बल्कि रुखडा है और कोपरनिकस की मान्यता को सही ठहराया कि सूर्य स्थिर है और पृथवी और अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं. यह उस समय के कैथोलिक चर्च धार्मिक संगठनों की मान्यता के खिलाफ था. गैलिलियो का बहुत कडा विरोध हुआ. उन पर इतना दवाब बनाया गया कि अंत में उन्हें अपने शब्द वापस लेने पडे. उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई. गैलिलियो की मृत्यु के लगभग सौ साल बाद यही सिद्धांत मान्य हुआ और इस तरह से गैलिलियो ने खगोल जगत को सर्वथा एक नई खोज का उपहार दिया.
मुंबई का नेहरु सेंटर पं. जवाहरलाल नेहरु के "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" के साथ साथ अपनी आर्ट गैलरी व तारांगण के लिए मशहूर है. सैलानियों के लिए यह एक आकर्षण का केन्द्र है. साथ ही इसके अपने ऑडीटोरियम हैं, जहां विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इस लिहाज़ से गैलिलियो पर नाटक करवा कर नेहरु सेंटर ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है.
इस नाटक को शिवदास घोडगे ने निर्देशित किया है. शिवदास घोडगे भारतीय नाट्य विद्यालय के बहुत वरिष्ठ पास आउट हैं. नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में वे एक जाना- पहचाना नाम हैं. मगर इस नाटक में कसे निर्देशन की कमी बेहद खली. मराठी नाटक आज भी लम्बी अवधि के खेले जाते हैं, मगर हिन्दी में अब लम्बी अवधि के नाटक बहुत ही खास स्थिति में ही खेले जाते हैं. कसे निर्देशन के अभाव में नाटक की अवधि ने दर्शकों को जम्हाइयां लेने पर मज़बूर कर दिया. कई दर्शकों को तो मध्यांतर में ही नाटक खत्म सा लगा.
इस नाटक को मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडेमी ऑफ थिएटर के छात्रों से करवाया गया था. हॉल में उपस्थित छात्रों की संख्या भी इसका प्रमाण थी. गैलिलियो की मुख्य भूमिका में अशोक लोखंडे थे. अशोक लोखंडे मंजे हुए कलाकार हैं और वहां उपस्थित कमलाकर सोनटक्के ने बहुत सही कहा कि एक केन्द्रीय भूमिका में बहुत दिनों के बाद अशोक लोखंडे को देखना एक सुखद अनुभव रहा. लेकिन, अफसोस यह रहा कि अशोक लोखंडे नाटक के अंतिम चरण के 20-25 मिनट को छोड कर सारे समय अशोक लोखंडे ही बने रहे. कलाकार का यह रूप किसी भी प्रस्तुति को कमज़ोर करने के लिए काफी होता है.
बर्टोल्ड ब्रेख्त लिखित "गैलिलियो" नाटक का हिन्दी अनुवाद वी के शर्मा (पास पर नाम व्ही के शर्मा) का था. भाषा आज की हिन्दी से मेल नहीं खाती, जिसे आज की हिन्दी के अनुरूप करने का निर्देशकीय समाधान होना चाहिये था. विदेशी पृष्ठभूमि, पात्र विदेशी, चरित्राँकन विदेशी, विषय गम्भीर- ऐसे में भाषा का रूखापन और स्क्रिप्ट का ढीलापन इसे और नीरस बनाता गया. उस पर से कलाकारों के उच्चारण. फिल्मों की तरह ही नाटकों में भी भाषा पर काम नहीं किया जाता. लगभग सभी कलाकार गैर हिन्दी भाषी थे, इसलिए उनकी अपनी मातृभाषा का इतना गहरा असर सम्वाद अदायगी पर था कि कई बार कोफ्त होने लगती थी. ऐसे में उर्दू के तलफ्फुज़ की तो बात ही छोड दीजिए. स्क्रिप्ट और सम्वाद अदायगी नाटक ही क्या, किसी भी फिल्म, टीवी आदि के लिए भी उतना ही ज़रूरी है. कसी स्क्रिप्ट पढने या सुनने में भी पूरे नाट्क का आनन्द दे देती है.
सबसे बडी दिक़्क़त यह रही कि यह नाटक सम्वेदना के स्तर तक पहुंच नहीं पाया, जबकि वही उसके मूल में था. आखिर ऐसी क्या स्थितियां पैदा की गईं कि गैलिलियो को अपना वक्तव्य् बदलना पडा? आखिर पोप, पादरी, धर्म संस्थानो, चर्चों का किस तरह का वर्चस्व था, जो एक वैज्ञानिक को झुकने पर बाध्य कर देता है. यह दोनो दो ध्रुव थे, जिनकी दो अलग-अलग धाराएं थीं. नाटक में इन दोनों ध्रुवों का खिंचाव इतना सतही था कि दृश्य देखते समय कहीं कोई बेचैनी नहीं हुई. मतलब, नाटक का उतार-चढाव सतह पर ही चलता रहा.
कलकार सभी या तो छात्र थे या अकादमी से बस पास हो कर निकले थे. तो बिचारे बच्चे अपनी भूमिका में लगे हुए थे. अपनी वेशभूषा में कई असहज दीखे. पीरियड ड्रामा के कॉस्ट्यूम पहन कर काम करने के लिए उसका अभ्यास भी ज़रूरी है, जिसकी कमी दीखी. गनीमत थी कि मंच पर भारी भारी प्रॉप्स नहीं थे. सह निर्देशन में स्मिता ठाकूर और सुलेखा दोशी के नाम रहे. इन्हें नाटक की टाइमिंग का भी अन्दाज़ा नहीं रहा और पर्दा गिरने से पहले ही वे स्टेज पर आ खडी हुईं. और उनकी उद्घोषणा ने तो नाटक का रहा- सहा स्वाद भी बिगाड दिया. अकादमी के छात्रों को इस पर तो ध्यान देना ही चाहिये, शिक्षकों को भी इस पर सोचने की ज़रूरत है.
संगीत अमोद भट्ट का था और वे अपना प्रभाव छोड सके. गायक वृन्द की आवाज़ में पता नहीं क्यों अपेक्षित उमंग का अभाव दीखा. प्रकाश व्यवस्था अच्छी थी. खास कर सूरज का गोला सूरज, छंद, धरती, ब्रह्मांड सब कुछ बनकर प्रभावित तो करता था ही, दर्शकों तक वह अपनी तरंग भी छोड जाता था. बावज़ूद इन सबके, यह नाटक अति महत्वपूर्ण है. इसलिए इसे तनिक और सरल और कस-मांज कर दिखाया जाना चाहिये- हर वर्ग और हर उम्र के लोगों तक, क्योंकि थिएटर केवल मनोरंजन का नहीं, शिक्षा और विकास का सबसे बडा माध्यम है.

Friday, October 2, 2009

बापू के नाम की यह चिट्ठी

बरसों पहले एक फिल्म आई थी- "बालक." उस फिल्म के लिए यह गीत सम्भवत: पं. प्रदीप ने लिखा था. लोग कहते हैं, सब कुछ बदल गया है, बहुत कुछ बदल गया है. गीता में जो कहा गया, आज तक नहीं बदला, कबीर ने जो कहा, आज तक वही हालात हैं. शहीद भगत सिंह जो बयान कर गये, देश के सामाजिक हाल अब भी वहीं के वहीं हैं. बापू भी जो कह गये, क्या उस पर हमारा ध्यान है? बापू के नाम यह पत्र आज भी हमारे हालात के बयान क ज़िन्दा दस्तावेज़ है.
सुन ले बापू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम,
लिखता तुझको राम
काला धन, काला व्योपार, रिश्वत का है गरम बाज़ार
सत्य अहिंसा करे पुकार, टूट गया चरखे का तार
तेरे अनशन सत्याग्रह के बदल गये असली बर्ताव
एक नई विद्या उपजी है, जिसको कहते हैं घेराव
तेरी कठिन तपस्या का ये निकला है कैसा अंजाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
प्रांत प्रांत से टकराता है, भाषा से भाषा की लात
मैं पंजाबी, तू बंगाली, कौन करे भारत की बात
तेरी हिन्दी के पैरों में अंग्रेजी ने बान्धी डोर,
तेरी लकडी ठगों ने ठग ली, तेरी बकरी ले गये चोर,
साबरमती सिसकती तेरी, तडप रहा है सेवाग्राम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
राम-राज्य की तेरी कल्पना, उडी हवा में बन के कपूर
बच्चों ने पढ-लिखना छोडा, तोड-फोड में हैं मगरूर
नेता हो गये दल-बदलू, देश की पगडी रहे उछाल,
तेरे पूत बिगड गए बापू, दारुबन्दी हुई हलाल
तेरे राजघाट पर फिर भी, फूल चढाते सुबहो-शाम
चिट्ठी में सबसे पहले, लिखता तुझको राम- राम
हां, आज हमारे भूतपूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्म दिन है, जिन्होंने देश के कठिन समय में देशवासियों से अपील की थी कि आप सब सप्ताह में एक शाम का भोजन ना करें, इससे देश में अनाज की जो बचत होगी, उससे अनाज के आयात का संकट टाला जा स्कता है. और मुझे याद है, क्योंकि मैने भी तब एक शाम नहीं खाया था, लोगों ने स्वेच्छा से सप्ताह में एक शाम का खाना छोडा था. स्कूलों तक में इसका प्रचार लिया गय था. टीकरों ने बच्चों को समझाया था. मुझे भी टीचर के मार्फत ही यह सन्देश मिला था. शास्त्री जी की सादगी और देश के प्रति निष्ठा लोगों के दिलों तक पहुंची थी. मुझे अभी भी याद है कि उनकी मृत्यु पर हमारे घर काम करनेवाली चनिया दाई भी फूट-फूट कर रो पडी थी. दर असल उसी ने सुबह-सुबह काम पर आते समय मोहल्ले के चौक पर बज रहे रेडियो और उस पर आये समाचार से खलबली मच गये मोहल्ले की भी जानकारी दी थी. शहर में जैसे मातम छा गया था. लोगों ने उस दिन खाना नहीं खाया था और ताशकन्द शब्द लोगों के दिल-दिमाग में खुभ गए थे. स्कूलों- कॉलेजों के अलावा गृहणियों ने भी उनकी पत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री को सम्वेदना भरे पत्र लिखे थे और उन सबके लिए बहुत बडा सुकून और संतोष का बायस बना ललिता जी की तरफ से आय आभार-पत्र. "जय जवान, जय किसान" का नारा लोग अंग्रेजो, भारत छोडो जैसे नारे की तर्ह उचारते थे. अच्छा है कि छुटपन में ही सही, इनलोगों के समय में हम थे और इनसे जुडे चन्द लम्हे अपने जीवन की भी थाती हैं.

व्यक्ति को कोसिए, संस्था को नहीं

http://mohallalive.com/2009/10/02/vibha-rani-react-on-royalty-statements-controversy/


जी, आज छम्मक्छल्लो नहीं, विभा रानी कह रही है, क्योंकि बात पर बात जब निकलेगी तब विभा रानी के लेखन पर भी आएगी। हिंदी का साहित्य जगत शायद अभी तक छम्मक्छल्लो से वाक़िफ नहीं हुआ है। भारतीय ज्ञानपीठ में भी विभा रानी की किताबें हैं और “नया ज्ञानोदय” में रचनाएं।
मगर पहले तो यह तय कर लें कि बात रॉयल्टी और स्टेटमेंट की की जा रही है या संस्थान की। संस्थान को कभी भी उसे आज के चलानेवाले के साथ बराये मेहरबानी जोड़ कर न देखें। भारतीय ज्ञानपीठ आज भी बहुत प्रतिष्ठित संस्थान है। सिर्फ यह हो गया है कि उसे चलानेवाले संस्थान के नाम पर अपनी दुकान, अपनी लिप्सा, अपनी चाहत चला रहे हैं, अपनी राजनीति और चापलूसी की जुगलबंदी बजा रहे हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ से दो मैथिली उपन्यास (अनुवादक : विभा रानी) के अनुवाद छपे हैं : प्रभास कुमार चौधरी का “राजा पोखरे में कितनी मछलियां” और लिली रे का “पटाक्षेप”। ये दोनों ही लेखक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हैं। आज तक यहीं से पूरा स्टेटमेंट व रॉयल्टी मिलती रही है। यह वह सगर्व सभी को बताती रही है। हां, अभी के स्टेटमेंट पर ध्यान नहीं दिया है।
बात संस्थान की नहीं है। बात हमेशा उसे चलानेवाले की होती है। संस्थान की स्थापना हमेशा अच्छे उद्देश्यों को ले कर की जाती है। जब तक उस पर अच्छे लोग बैठे रहते हैं, संस्थान अच्छे कलेवर में रहता है। लेकिन जब उस पर बैठकर अपने सपनों की नैया अपने चहेतों को ले कर खेने जाने की इच्छा बलवती होती है, तो संस्थान का नाम खराब होता है। यह किसी भी संस्थान पर लागू होता है। जो संस्थान जितना अधिक प्रतिष्ठित होता है, उस पर ऐसी आंच उतनी ही अधिक तेज आती है।
दूसरे, बात केवल रॉयल्टी की ही न करें। जिसने भी मोहल्ला पर बेनामी पोस्ट डाला है और जिसके लिए लोग हाय तौबा कर रहे हैं कि अगर वह ख़ुद इतना बड़ा ईमानदार है तो नाम बताये, तो भैया, ऐसे मामलों में नाम छुपाना लेखक के लिए ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि बाक़ी समय भले प्रकाशक एक दूसरे पर छींटाकशी करते रहें, मगर हैं सभी एक ही थैले के चट्टे-बट्टे। और पैसों के मामले में सभी दूध शक्कर हो जाते हैं। मुंहामुंही बात फैलती है कि अमुक लेखक पैसे के लिए बहुत किच-किच करता है और सभी प्रकाशक लामबंद हो जाते हैं और एक अघोषित नीति के तहत उस लेखक को छापना बंद कर देते हैं। अब हर लेखक प्रकाशक तो नहीं हो सकता। जैसे किसी को चीनी की ज़रूरत होने पर वह चीनी की ही दुकान खोल कर बैठ जाए, यह संभव नहीं।
अभी अभी एक नये से प्रकाशक से अपनी पांडुलिपि की बात करने पर उसने मुझसे कहा कि अब अगर उसे कहीं से एकमुश्त ऑर्डर मिल जाते हैं, तो वह किताब तुरंत छाप देगा। यानी कि प्रकाशक तो पहले से ही व्यवसायी हैं, अब वे आज के ढर्रे की पूरी की पूरी मार्केटिंग पर उतर आये हैं। नौकरी चाहिए तो बिजिनेस लाइए की तर्ज पर किताब छपानी है तो ऑर्डर लाइए! एक प्रकाशक ने कहा कि वह यह देखता है कि फलां लेखक बिकाऊ है, तभी वह उसकी किताब छापता है। उस लेखक/प्रकाशक को मेरी मैथिली की कहानियां पसंद आती हैं। उन्हें वे छापते भी हैं। मैथिली साहित्य में मेरा स्थान निर्धारण भी करते हैं, मगर हिंदी कहानियों या कथा संग्रह के नाम पर कहते हैं कि मेरा नाम तथाकथित रूप से बिकाऊ नहीं है तो भारतीय ज्ञानपीठ ने तो तब मेरी किताबों को छापा, जब मेरा नाम सचमुच उतना परिचित नहीं था। या यह भी हो सकता है कि आज भी यह ख़ामख्याली में मैं जी रही हूं कि लोग मुझे और मेरे नाम को जानते हैं।
लेकिन जैसा कि कहा कि संस्थान के साथ जब अलग क़िस्म के लोग जुड़ जाते हैं, तब संस्थान का नाम खराब होता है। भारतीय ज्ञानपीठ ने जब “नया ज्ञानोदय” प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादकत्व में निकालना शुरू किया, तब मैं भी इससे जुड़ी। श्रोत्रिय जी ने बड़े-बड़े प्रयोग भी किये। मसलन, जेल के कैदियों की कविताएं छापीं। मुझसे कहकर जेल के बच्चों पर स्टोरी करवायी। चूंकि मैं जेलों में काम करती हूं, इसलिए उनकी अगली योजना जेल की महिला क़ैदियों पर स्टोरी करवाने की थी। लेकिन उनके जाने के कारण यह योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी।
श्रोत्रिय जी के ही समय में मैंने एक कहानी “होठों की बिजली” भेजी थी। संयोग कि कुछ समय के बाद वे वहां से चले गये। कालिया जी के आने के बाद मैंने उनसे उस कहानी की स्थिति के बारे में जानना चाहा, मगर उनकी ओर से केवल आश्वासन मिला। श्रोत्रिय जी के समय में ही मैंने मैथिली की सुप्रसिद्ध लेखक लिली रे की कहानी “चक्र” भेजी थी, जिसे कालिया जी के संपादकत्व में “नया ज्ञानोदय” के सितंबर, 2007 के अंक में छापा गया, मगर उसका शीर्षक कर दिया गया, “बारिश और पावरोटी”। हो सकता है, कथा की ओर ध्यान खींचने के लिए उसका शीर्षक ज़रा ग्लैमरस कर दिया गया हो, मगर लिली जी के लेखन व उनके स्वभाव को देखते हुए यह शीर्षक उनकी कथा के उपयुक्त नहीं था। इस ओर और अपनी कहानी “होठों की बिजली” की स्थिति के बारे में जानने तथा अपनी कहानियों तथा नाटक की पांडुलिपि भेजने के बारे में मैंने रवींद्र कालिया जी को 10/10/2007 को एक पत्र लिखा था। मगर अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज तक इस पत्र का जवाब देना गवारा तक नहीं किया गया।
मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि प्रकाशक और संपादक को यह पूरा का पूरा अधिकार है कि वह अमुक किताब या रचना छापे या न छापे। मगर यह लेखक के भी उतने ही अधिकार में है कि उसके पत्र पर कार्रवाई हो और उसे तदनुसार सूचित किया जाए। मैं अपनी रचना की बाबत जवाब न आने तलक उसे किसी और को नहीं भेजती। मगर पहली बार मैंने भारतीय ज्ञानपीठ से बग़ैर कोई सूचना के “होठों की बिजली” जनमत को भेजी। पाठकों का बड़प्पन कि इसके छपते ही छम्मक्छल्लो के पास बधाइयों के फोन पर फोन आने लगे। मगर आज तक कालिया जी की तरफ से 10/10/2007 के पत्र का कोई जवाब नहीं आया।
आप लामबंद होना चाह रहे हैं तो होइए, मगर व्यक्ति के खिलाफ उठिए, संस्थान के खिलाफ नहीं। क्योंकि कल को कोई बेहतर संचालन करनेवाला आ गया तो आप ही फिर इस संस्था के गुनगान करने लग जाएंगे। इसलिए भारतीय ज्ञानपीठ को मत कोसिए। बाकी के लिए इशारा ही काफी है। आखिर को आप सभी समझदार हैं, बहुत अधिक

Thursday, October 1, 2009

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल

http://janatantra.com/2009/10/01/nehru-centre-theatre-festival/

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल 3 से 14 अक्तूबर, 2009 तक आयोजित हो रहा है। 12 दिनों तक चलने वाले इस फेस्टिवल में मलयालम, उर्दू और बांग्ला के कुछ पुरस्कार विजेता नाटकों की भी प्रस्तुति होगी। 3 अक्तूबर, 2009 को फेस्टिवल की शुरुआत मराठी संगीत नाटक के “मदन भूल” से की जाएगी। “मदन भूल” गिरीश कर्नाड के मशहूर नाटक “फूल”या ‘फ्लावर्स’ से अभिप्रेरित है। इसे नेहरु सेंटर, मुंबई प्रस्तुत कर रहा है। इसके अलावा इस फेस्टिवल में अलग अलग भाषाओं के 14 नाटक प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह फेस्टिवल नेहरु सेंटर की ओर से मुंबईकरों के लिए एक उपहार है। इसलिए इसके पास पर “निमंत्रण” शब्द छपा है, जो दर्शकों को एक भावात्मक संतुष्टि देता है। विस्तार से जानने के लिए आप इस लिंक का उपयोग कर सकते हैं।
थियेटर फेस्टिवल का ब्योरा
पास न होने पर भी निराश होने की अधिक आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा देखा गया है कि लोग बाग अपने अपने बंधु बांधवों के लिए पास ले कर रख लेते हैं, मगर जब वे लोग नहीं पहुंच पाते, तब वे बिना पास के आए लोगों को अपने पास दे देते हैं। नेहरु सेंटर का ऑडिटोरियम भी काफी बडा और नाटक के अनुकूल है। इसलिए एक बार सभी पास धारियों के अंदर चले जाने के बाद अगर सीट बची रहती है तो वे दूसरों को भी अंदर ले लेते हैं। कई कई बार तो लोगों ने खडे होकर भी नाटक देखे हैं। नेहरु सेंटर ऐसे थिएटर प्रेमियों को सामान्यत: निराश नहीं करता।