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Saturday, September 8, 2007

शिक्षक दिवस पर शिक्षा

अभी अभी हम सभी ने ५ सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया है.छाम्मक्छाल्लो को याद है कि अपने बचपन में उसके स्कूल में यह दिवस बडे आदर और सम्मान के साथ मनाया जाता था.तब एक टिकट २५ पैसे का जारी होता था.सभी बच्चों के लिए उसे खरीदना अनिवार्य होता.एक से अधिक भी टिकट खरीदे जा सकते थे.टिकट से मिले पैसों से आर्थिक रूप से कमजोर शिक्षा या उनके परिवार की मदद की जाती थी। छाम्मक्छाल्लो खुद शिक्षक परिवार से है, इसलिए उसे पता है कि तब के शिक्षक आर्थिक रूप से कितने कमजोर होते थे। मगर उनकी इज़्ज़त बहुत थी।
छाम्मक्छाल्लो को याद है कि भारत पाकिस्तान के युद्ध के समय उस समय के प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आवाहन किया था कि लोग हर सोमवार को एक शाम अनाज न खाएं.उस बचत से देश क जवानों की मदद हो सकती है, देश के आर्थिक विकास में मदद मिल सकती है.स्कूलों को यह काम दिया गया था।छाम्मक्छाल्लोapanii माँ से कहिस कि ऐसा होगा क्या? माँ ने कहा कि शास्त्री जी ने कहा है, तो ज़रूर होगा.स्कूल की सभी शिख्सिकाएं इस काम में जुटीं और छाम्मक्छाल्लो ने देखा कि उसके शहर के सभी बच्चे तक भी सोमवार की शाम उपवास पर रह गए.बच्चे तो शिक्षक की बात पर ही भूखे रह गए।
देश तो आज भी न जाने कितने संकटों से गुज़र रहा हां.क्या कोई शिक्साह इस तरह से आवाहन कर सकता है और बच्चे उनके आवाहन पर ध्यान देंगे और बच्चों के माता-पिटा भी बच्चों को इसके लिए प्रोत्साहित करेंगे?देश के दूसरे राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन के जनमदिन पर मनाया जानेवाला शिक्षक दिवस कितने लोगों को अपने शिक्षक के बारे में सोचने पर मज़बूर करता है। कबीर ने भी गुरू के स्थान को ईश्वर से भी महान बताते हुए कहा है-
गुरू गोविन्द दोनों खडे, काको लागे पानी
बलिहारी गुरो आपने जिन गोविन्द दिए बताय।
गुरू की महिमा अपरम्पार है और हर व्यक्ति किसी न किसी से कुछ न कुछ सीखता है। न सीखने की कोई तय उम्र होती है, न सिखानेवाले की।छाम्मक्छाल्लो कहिस कि ऐसा मान लें तो गुरू का ज्ञान व घ्यान की विनम्रता अपने आप लोगों के पास आ जाती है.छाम्मक्छाल्लो ने अपनी माँ को ऐसा ही देखा और पाया.
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