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Friday, March 24, 2017

आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है-“अनारकली ऑफ आरा”।

       मैं यहाँ अविनाश दास निर्देशित और स्वरा भास्कर सहित सभी नए-पुराने कलाकारों द्वारा पर्दे पर अभिनीत और पर्दे के पीछे से अभिनीत फिल्म “अनारकली ऑफ आरा” पर अपनी बात रखने जा रही हूँ। इसे फिल्म की समीक्षा के रूप में न लिया जाए, क्योंकि मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। लेकिन, फिल्म हमारे जीवन में नस की तरह काम करती है। फिल्में हमें जीवन का नया राग, रंग और संचेतना देती है। मैं फिल्मों की इसतरह मुरीद हूँ कि हर फिल्म में अपने लायक के कलाकार को अपने में गढ़ लेती हूँ और उसकी कहानी के साथ अपने आपको देखने-खोजने और बुनने लगती हूँ। 
      बचपन में दुर्गा पूजा के अवसर पर हमारे शहर में रात भर खेले जानेवाले नाटकों में मुजफ्फरपुर, बनारस और कभी-कभी कोलकाता से बाई जी मंगाई जाती थीं- नाटक के दृश्यों के बीच में नाचने के लिए। यह दृश्यों के लिए आवश्यक नहीं होता था, दर्शकों को नाच के लोभ की शहद में लपेटे रखने के उद्देश्य से इसे रखा जाता था। पूरे समय यह चर्चा का विषय रहता था कि इस साल कहाँ से बाई आनेवाली हैं? कौन उनसे साटे का लेनदेन करता था, कौन उन्हें लेने जाता था, कौन उनकी इन तीनों दिन देखरेख करता था, हमें नहीं पता। लड़कियों को यह सब जानने-समझने का अधिकार कहाँ? हमें तो सातवीं-आठवीं कक्षा के बाद दर्शक दीर्घा में बैठने का भी मौका नहीं मिला। दरअसल, दर्शक दीर्घा में महिलाओं के बैठने के लिए जगह बनाई तो जाती थी, मगर उसमें केवल दूर-दराज से आई गाँव की बूढ़ी महिलाएं ही बैठती थीं। बुड्ढों से हम सुरक्षित रहें या नहीं, लेकिन ये बूढ़ियाँ तब सुरक्षित मानी जाती थीं। उनके साथ की आई बहू-बेटियाँ हमारे साथ नाटक देखती थीं- घरों की छटों से। शहरी बहुएँ और बेटियाँ तो उधर पाँव रखने की सोच भी नहीं सकती थीं। और अपने घर की बेटियाँ हमेशा रक्षणीया होती हैं। सो, हम सबके लिए, पंडाल के आसपास बने घरों की छतें ही नसीब थीं, जिसपर खड़े होकर रात भर या अपनी खड़े होने की शक्ति के मुताबिक नाटक देखा जाता था। शायद ही कोई स्त्री रात भर नाटक देख पाती थीं। भोर होते ही नाटक देखकर लौटे थके-मांदे घर के महान पुरुषों के लिए उन्हें चाय-नाश्ता बनाना होता था, अष्टमी, नवमी की पूजा की तैयारी करनी होती थी और घर-द्वार, बाल-बच्चों की सँभाल तो रूटीन के मुताबिक करनी ही करनी होती थी।
      मैंने देखा था, वे बाइयाँ नाचते हुए अश्लील इशारे भी करती थीं। जो जितने ज्यादा इशारे करतीं, वे उतनी ही पोपुलर होतीं। सभी उन्हें देखने के लिए बेताब रहते। मुझे याद है, एक बाई जी ने नाचने से पहले सबको प्रणाम किया और तनिक शास्त्रीय पद्धति से नाचना चाहा कि लोगों की फब्तियाँ शुरू हो गईं- “आप यहाँ से चली जाइए, हाथ जोड़ते हैं।“
      “अनारकली ऑफ आरा” फिल्म देखने से पहले मैं इन यादों को ताज़ा करती रही। जाने कितने यूट्यूब वीडियो देखे। पॉर्न भी। और मैं हैरान कि इनकी दर्शक संख्या लाखों में है। कमबख्त हम अपने वीडियोज़ डालते हैं तो हजार पर भी संख्या नहीं पहुँचती। महेश भट्ट ने सही कहा था, “जबतक आप जख्म नहीं देखेंगे, हमें मर्डर बनाने पर मजबूर होते रहना पड़ेगा।“ ऐसा भी नहीं है कि इन वीडियोज़ की क्वालिटी बहुत अच्छी हो। लेकिन, इन लड़कियों को देखने और छूने की लालसा इतनी बलवती है कि सभी अपना मान-सम्मान भी भूल जाते हैं।
      सवाल यह है कि आप अपना मान-सम्मान भूल जाएँ तो क्या ये लड़कियां भी भूल जाएँ? मान लिया जाए कि इन लड़कियों की कोई इज्ज़त नहीं? वे चूंकि सभी के सामने उत्तेजक नाच नाचती हैं तो वे सभी के लिए सहज उपलब्ध हैं? जिस देह और देह की आजादी का प्रेत हमारे तथाकथित सभ्य समाज की स्त्रियॉं को सताता रहता है, उसकी दीवार इन लड़कियों के सामने ढही होने के बाद भी ऐसा क्या है जो उन्हें उद्वेलित करता है? ....वह है, उनका अपना मान-सम्मान, जिसके लिए मैं अक्सर कहा करती हूँ कि इज्ज़त तो एक भिखारी और वेश्या की भी होती है।
      आप मानें या न मानें, लेकिन यह सच है कि स्त्रियाँ कभी भी केवल देह के वशीभूत होकर कहीं नहीं जाती। अनारकली भी रंगीला से एक भाव के साथ ही बंधी है। स्त्री अपनी देह का सौदा करते हुए भी उसमें भाव खोजती रहती है और लोलुप आँखों और लार छुलाती देह हर तबके और वर्ग की स्त्री के मन में लिजलिजापन भरता रहा है। ऐसे में अनारकली क्या सिर्फ इस बिना पर समझौता कर ले कि वह रसीले, रँगीले गाने गाती और उनपर कामुक नृत्य करती है?
      यहाँ सही कहा जा सकता है कि स्त्री मन को कोई नहीं समझ पाता। उसके लिए स्त्री का मन बनकर उसमें घुसना पड़ता है, प्याज के छिलके की तरह उसे परत दर परत खोलना पड़ता है, तब शायद एकाध प्याजी ललछौंह आपको मिले।
      बाकी इस फिल्म को आप ठेठ बिहारी माहौल, गंध, गीत, रस, रास, साज, आवाज के लिए भी पसंद करेंगे। बिहारी बोल और तों, बिहारी मुहावरे और संदर्भ आपको गुदगुदाएंगे और आपको बिहार को समझने का मौका देंगे। आरा के लिए मशहूर उक्ति है, जो इस फिल्म में भी है कि- “आरा जिला घर बा, कौना बात के डर बा?” और उसी तरह यह उक्ति भी बिहार के लिए बड़ी जबर्दस्त है-“एक बिहारी, सब पर भारी।“
और यह फिल्म तो बिहारियों का गढ़ है। यहाँ तक कि ठेठ राजस्थानी लेखक और कलाकार रामकुमार सिंह को भी इसने बिहारी बना दिया, इसके गीत लिखवाकर और इसमें अभिनय करवाकर।
      रूपा चौरसिया का कॉस्ट्यूम कौतुक भरता है और पूरी फिल्म को सम्मोहन की गिरफ्त में ले लेता है। कास्टिंग कमाल की है, यहाँ तक कि घर की मालकिन और अनवर का बाप भी ऐसे मुफीद हैं कि आप उसमें बंधे रह जाते हैं। अलबता मकान-मालकिन की भूमिका में मैं खुद को खोजती और देखती रही एक कलाकार होने के नाते और अंतिम अभियान गीत की गायिका के रूप में भी- एक लोक प्रस्तोता होने के नाते।  
      यहाँ मैं फिल्म की नायिका स्वरा भास्कर के लिए कुछ नहीं लिखने जा रही, क्योंकि मुझे पता है, हर कोई उनके उम्दातं काम की तारीफ करेगा। मैं तो बस उन्हे इस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता के रूप में देख रही हूँ। मेरे यह कामना पूरी हो।
      आइये, अन्य चरित्रों पर तनिक बात करें। हीरामन का चरित्र सही में तीसरी कसम के हीरामन की याद दिला देता है- भोला और अपनी अनारककली के प्रति आदर और श्रद्धा से भरा हुआ। उसका शुभचिंतक। रंगीला और अनारकली के रूप में पंकज त्रिपाठी और स्वरा भास्कर की केमिस्ट्री तो गज़ब ढा ही रही है, बुलबुल पांडे और वीसी साब के रूप में विजय कुमार और पंकज मिश्रा भी एक-दूसरे को कॉम्प्लिमेंट करते नजर आते हैं। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह भी होती है कि वह अपने सभी कलाकारों को कितना स्पेस देती है और इस फिल्म ने सभी कलाकारों को अपने हिस्से का करने का पूरा स्पेस दिया है। सभी चरित्र अपना ध्यान खींचते हैं। वे आपके चेहरे पर मुस्कान भी लाते हैं, आपको रुलाते भी हैं और आपमें वह भाव भरते हैं कि बस, हो गई जुल्म की इंतहाँ कि “हर ज़ोर जुल्म के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है!”
      स्त्रियॉं का देह के प्रति का यह संघर्ष मिथकीय काल से चला आ रहा है और चलता रहेगा अनंत अनंत काल तक, क्योंकि जबतक स्त्रियॉं के प्रति हम अपना रवैया नहीं बदलेंगे, तबतक स्त्रियॉं की देह से परे जाकर कुछ भी सोचा नहीं जा सकता। घुटन के इसी गैस चेम्बर में से हर उस अनारकली की चीख एक ब्रह्म नाद की तरह निकलेगी, जो अपनी देह को भोग की वस्तु माने जाने से इंकार करती है और अपने अस्तित्व के लिए सचेत है।
      यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए। 18 की उम्र से लेकर हर आयु-वर्ग के लड़के- लड़कियों, स्त्री-पुरुषों को। केवल देखनी ही नहीं चाहिए, देखकर समझनी भी चाहिए और उसपर अमल भी करना चाहिए। “अनारकली ऑफ आरा” की पूरी टीम शत प्रतिशत बधाई की पात्र है। इस फिल्म के साथ तो ऐसा है कि अगर कोई मुझे दस बार भी कहे तो मैं देखने के लिए तैयार हूँ और यह भी आश्वस्त हूँ कि जितनी बार इसे देखूँगी, उतनी बार इसकी नई- नई परतें मुझे मिलेंगी। वैसे दो बार तो देख ही चुकी हूँ। आप सब भी देखकर आइये। और आगे जितनी बार भी मन करे, देखिये, कि कैसे एक फिल्म किसी मोनोटोनी को तोड़कर अपना एक नया इतिहास रचती है। “अनारकली ऑफ आरा” आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है।  एक बात और, सफलता जब आती है तो सबसे पहले पर्दे के पीछे की औरत को ही बहाकर ले जाती है, जो जाने कितने कष्टों को सहकर सबका साथ देती रहती है। अविनाश की सफलता के पीछे खामोश भाव से लगी उनकी पत्नी स्वर्णकान्ता (मुक्ता) के योगदान को भी कतई नहीं भूला जाना चाहिए। #### 

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