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Friday, April 17, 2009

पुलिस और जनता का साथ

पुलिस के लोग अब ख़ुद ही अपनी छवि को लेकर चिंतित हैं और उसे संवारने की हर सम्भव कोशिश में लगे हुए हैं। इसका ताज़ा उदाहरण है, मुम्बई के अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर श्री सुरेश खोबदे का मोहला अभियान। श्री खोबदे ने पिछले शनिवार को मुबई उत्तर के साहित्यकारों से मिलाने का कार्यक्रम ररखा था। छाम्माकछाल्लो को भी इसमें आने का निमंत्रण मिला। छाम्माक्छाल्लो को इस बात का एहसास था की वहां मराठी साहित्यकार की प्रधानता होगी। उसने आमंत्रण करनेवाले से पूछा भी की इसमें कौन कौन से लोग बुलाए गए हैं। छाम्माक्छाल्लो को बताया गया की हिन्दी, मराठी, उर्दू के साहित्यकार बुलाए गए हैं और विषय आतंकवाद से कैसे निपटें पर है।

अपनी उत्सुकता में छाम्माक्छाल्लो वहा पहुँची। मराठी के साहित्यकारों के अलावे हिन्दी के वहा मात्र एक और व्यक्ति थे। खैर। बातचीत में श्री खोबदे ने अपनी बात रखी। १९८४ में वे भिवंडी में तैनात थे। भिवाडी महाराष्ट्र का दंगा प्रधान इलाका। है। वहा दंगे अनारदाने की तरह फूटते रहते हैं। श्री खोबदे ने वहाँ के निवासियों और पुलिस की मदद से मोहला कमिटी बनाई, जिसका उअद्देशय था की और वे कुछ कर सकें या नहीं, कम से कम वे अपने मोहल्ले को बचाने की कोशिश करेंगे, अगर दंगे होते हैं, तब। और वे इसमें सफल भी हुए। उनकी सफलता इसी बात से आंकी जा सकती है, की जब १९९२ में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद पूरी मुम्बई दनेगे की आग में झुलस रही थी, भिवंडी में कोई दंगा नहीं हुआ।

अब यही तत्व वे मुबई के उत्तरी इलाके में आजमाना चाहते हैंअपने ११७ स्लाइड्स के पार प्वायंट प्रेजेंटेशन में उनहोंने यह बताने की कोशिश की की दंगे और आतंकवाद अब किस तरह से मुबई को खा रहे हैं और मोहला कमिटी के माध्यम से इस पर काबू किया जा सकता हैं। ओपन फॉरम में कई साहित्यकारों ने भी इस पर प्रश्न् उठाया की दंगा और आतंकवाद निहायत ही दो अलग-अलग बातें हैं। सभी के जेहन में २६ नवम्बर, २००८ के आतान्क्वादी हमले की याद ताज़ा ही थी।

श्री खोबदे ने अपने प्रेजेंटेशन में यह भी सामने रखने की कोशिश की की हमारा इतिहास, जिसमें घटनाए हो चुकी हैं, गया हैं, उसे बदला नहीं जा सकता। कोर्स की किताबें भी वे नहींं बदल सकते। वे लोगों की सोच को भी नहीं बदल सकते। बस मानसिकता जरूर बदल सकते हैं।

छाम्माक्छाल्लो ने अपने सवाल में यह कहा की इतिहास को नहीं बदला जा सकता, यह सच हैं, मगर कोर्स मों जो भ्रामक बातें रखी गई हैं और जिनके कारण बच्चे बचपन से ही भारत के दो मुख्य सम्प्रदायों के प्रति नफ़रत उअगालाने लगते हैं, उसे पुलिस या साहित्यकार या समाज के अन्य रसूखवाले गन मान्यों के हस्तक्षेप से बदला जा सकता हैं। दूसरी बात उसने कही की दंगा और दहशतवाद अब दो छीजे हो गई हैं। तीसरी बात की अभी दहस्घत्वाद को एक अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दे दिया गया गई। हमारे अपने देश के भीअत्र दहशत के कई तत्व सामने हैं। लेकिन हैरानी हैं की इस दहशतवाद को दहशतवाद नहीं माना जाता हैं। एक सम्प्रदाय के ख़िलाफ़ काफी कुछ बोला तो जाता हैं, मगर किसी एक राजनीतिक पार्टी-विशेष के प्रति हम बोलने से डरते हैं। एक कोई पार्टी किसी भी बात के लिए एक नोटिस लगा देती हैं और सारा शहर उसे मानने के लिए बाध्य हो जता हैं, वरना अंजाम कौन भुगते? जैसेराज्यों से आए बच्चों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता हैं। क़ानून व्यवस्था को लोग अपने हाथों में ले कर निरपराधों को सताते हैं। ऐसे में पुलिस की भुमिका महत्वपूर्ण होती हैं। आश्चर्य की छाम्माक्छाल्लो के इन सवालों को चुप्पी से ताल दिया गया ।

श्रीका यह प्रयास बेहद सही हैं की वे साहित्यकारों व् समाज के अन्य बुद्धिजीवियों और गणमान्यों के साथ पुलिस के दोस्ताना व्यवहार की बात करते हईं, ताकि पुलिस के लोग इन व्यक्तियों के प्रभाव से अपने -अआप्काओ और भी बेहतर बना सकें और अपनी छवि सुधार सकें। सही भी हैं- सांगत काअसर व्यक्ति पर बहुत पङता हैं। कहा भी गया हैं, सांगत से गुन आत हैं, सांगत से गुन जात। सारे समय बदमाशों और असामाजिक तत्वों से डील करनेवाले पुलिसकर्मी सचमुच चाह कर भी नहीं बने रह पाते होंगे जिसका खामियाजा शरीफ लोगों को भुगतना पड़ जाता हैं। समाज के सज्जनों की सांगत उनमें निश्चित रूप से गुणात्मक परिवर्तन लाएगी। श्री खोबदे की यह स्वीकारोक्ति भी अपने आप में परिवर्तन की चाह रखने वाले एक पुलिस कर्मी की चाह हैं, और उनकी इस चाह का सम्मान किया जाना चाहिए। आख़िर अच्छे लोग तो हर जगह होते हैं। इसी पुलिस को छाम्माक्छाल्लो ने कई मौकों पर लोगों की मदद करते हुए भी देखा हैं। ये कुछ और ज़्यादा जनता के दोस्त बन जाएँ, उनके सरोकारी बनें, यह बहुत ही स्वागत योग्य कदम हैं।
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