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Friday, July 1, 2011

काला- काला, कितना प्याला.


छम्मकछल्लो को देश की प्रगतिशीलता पर नाज है. देश आगे बढ गया है. वह रूढियों से मुक्त हो रहा है. वह कालेपन के दुखदाई असर से आगे बढ रहा है.
कहते थे कभी लोग कि काला रंग अशुभ होता है. इसलिए, शुभ काम में काले से लोग खुद को दूर रखते थे. ब्याह हो कि छठी-मुंडन, काले रंग के कपडे या सामान देने- पहनने की मनाही थी. भला हो अपने फिल्लमवालों का, जिन्होंने इस भूत का खात्मा किया. उससे भी बडा भला हुआ अपने उन लोगों का, जिनके बल पर लोगों के मन से काले के प्रेत का डर निकला. यह काला नहीं रहता तो बाबा लोग साधारण से महान बनकर भगवान की अवस्था तक नहीं पहुंचते.
बडे बन गए लोगों से काले की चर्चा नहीं की जाती. उनसे काले की महिमा का हिसाब नहीं पूछा जाता. उनसे भी काले का हिसाब नहीं पूछा जाता जो अपने 5 साल के शैशवकाल में ही 5 सौ वर्ष की सुखदा पा लेते हैं- जाने किस भगवान के आशीष से. आम जनता 5 साल पहले भी भूखी-प्यासी मरती रहती है और 5 साल बाद भी.
काले की महिमा से लोग योग से भोग तक पहुंचने लगे हैं. योग से लोगों की देह दुरुस्त करनेवाले अब कालेपन का काजल आंखों में आंजने लगे हैं. लोग कारागार को कारी कोठरी कहते थे. उस कारी कोठरी में छुपी काली लछमी मैया महिमामयी है. कोई दूसरा देवी का रूप बिगादता है तो हमारे हिंदू हृदय आहत हो जाता है. मगर अपनी इसी देवी को काले वस्त्र पहनाते हम उजले होते चले जाते हैं. यह काले की महिमा है भैया! समझा करो. उजला तभी उजला दिखता है, जब उसके सामने उसका विपरीत रंग हो. सो उसके सफेद दिखते रहने के इंतज़ाम में लगा बिचारा काला रंग! यह दिखता नहीं, मगर उजले तन और वस्त्र के भीतर से अपने  होने का अहसास दिन दूना रात चौगुना कराता रहता है. लोग इसे देखने की चाह में  कभी जन्तर-मंतर में भटकते हैं तो कभी रामलीला के मैदान में सैकडों लीलाएं करते हैं. कभी किसी पराई धरती के कोश में बंद हो जाते हैं तो कभी पलक झपकते मिट्टी से सोने का खेल देखने लगते हैं. सोना संज्ञा भी है और क्रिया भी. संज्ञा के बाद ही क्रिया आती है सो संज्ञा के बाद वे क्रियामय-प्रक्रियामय हो जाते हैं. लोग कभी मिल की मील दर मील जमीन बिकते देखते हैं तो कभी एकड दर एकड में शिक्षण संस्थानों के चमत्कारी खुल जा सिम सिम जादू.  काले कपडे से भले हम काले शनि महाराज की तरह भय खाते रहें, उजली काया और वस्त्र के भीतर का काला रंग बडा लुभावना होता है, बडा चमत्कारी होता है, चिरकालिक नहीं, आत्मा की तरह अजर और अमर होता है. इस अमरत्व पर कौन ना वारी-वारी जाए! छम्मकछल्लो की भला क्या बिसात! वह वारी वारी जाने के लिए बिसात की तरह बिछने को तैयार है.     
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