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Tuesday, January 15, 2008

'तिल गुर घ्या, गोड़ गोड़ बोला',

छाम्माक्छाल्लो फिर से काफी दिन बाद आपसे मुखातिब है। आज मकर संक्रान्ति है। यों तो यह १४ जनवरी को आता है, मगर इस बार १५ को। चलता है। अपन को तो खाने पीने से मतलब है। हमारे बुजुर्ग कितने अच्छे थे, इन्ही पर्व त्यौहार के बहाने नई नई चीजें खाने पीने के मौक़े देते लेते रहते थे। भारत यो भी कृषि प्रधान देश है। इसलिए यहाँ के हर पर्व त्यौहार के मूल में खेती है। अब इस मकर संक्रान्ति को ही लीजिए। यह धान और नए अनाज, तिलहन आदि का त्यौहार है। छाम्माक्छाल्लो को मिथिला में अपने बिताए बचपन की याद आती है। भर मोहल्ले में सप्ताह भर पहले से ही इस त्यौहार की धूम मची रहती। हम बच्चो को यह इसलिए और भी अच्छा लगता कि यही एक ऐसा पर्व था, जिसमें खाने पीने की पाबंदी नही थी। अन्य में तो पूजा के पहले कभी कुछ खाने को मिलता ही नहीं था। चिरवा और मुरमुरे के लड्डू, जिन्हें लाई कहा जाता है, और तिल के लड्डू, इन्हें तिलबा कहा जाता है, बनाने में, माँ, दीदी, चाची आदि हफ्ते भर पहले से जुट जातीं और हम बच्चे खाने में।
आज भी छाम्माक्छाल्लो घर में लाई, तिलबा बनाती है। सभी यादें ताज़ा हो उठाती हैं। इसीलिए सभी विषम परिस्थिति के बाद भी इन्हें बनाना और पर्व मानना उसे अच्छा लगता है। आप सभी को भी सारे पर्व अच्छे लगते ही होंगे, ऐसा छाम्माक्छाल्लो का विश्वास है।
महाराष्ट्र में भी मकर संक्रान्ति की बड़ी धूम है। 'तिल गुर घ्या, गोड़ गोड़ बोला', यानी तिल गुड खइए और मीठा मीठा बोलिए। पूरे मास यहाँ स्त्रियाँ सभी सुहागानों को हल्दी कुमकुम का टीका लगाती हैं और तिल के लड्डू और अन्य भेंट देती हैं। छाम्माक्छाल्लो को अच्छा लगता है, ''तिल गुर घ्या, गोड़ गोड़ बोला', बोलने में।छाम्माक्छाल्लो के साथ आप सब भी बोले, आप सबको भी अच्छा लगेगा। और अच्छा लगाने पर बताना ना भूलें।
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