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Monday, December 10, 2007

सोच का जलवा

छाम्मक्छाल्लो आजकल जिस थिएटर ग्रुप में है, वहाँ एक लड़का है, जो शादी करना चाहता है। छाम्माक्छाल्लो ने उससे शादी की अपनी शर्तें आदि पूछीं। उसकी नज़र में एक लड़की का तसव्वर आया था, मगर लडके की बात सुनकर वह पीछे हट गई। लडके ने कहा कि उसे हाउस वाइफ चाहिए। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था, मगर उसके आगे जो उसने कहा, उससे छाम्माक्छाल्लो दहल गई। उसने कहा कि भले ही उसे भूखी रहना पड़े, एक रोटी खानी पड़े, वह काम नहीं करेगी।
छाम्माक्छाल्लो ने अपने जीवन में बडे संघर्ष देखे हैं . आज वह अपने जीवन में अपनी माँ का योगदान इस रूप में देखती है कि अगर उसकी माँ पढी- लिखी नहीं होती, काम नहीं कर रही होती, तो आज छाम्माक्छाल्लो भी यहाँ नहीं होती। लडके ने कहा कि इस मामले में उसका अनुभव अच्छा नहीं है। हो सकता है। मगर, अच्छे-बुरे लोग हर समय में होते हैं। कंस दुष्ट था, तो क्या दुनिया के सारे मामा दुष्ट हो जाएंगे और अपनी बहनों की संतान की जान के पीछे पड़ जायेंगे?
आज क्या, यह हर समय का तकाजा है कि महिलाएं स्वावलम्बी बनें, आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बनें, ताकि किसी भी आपातकाल के समय वह अपने बाल बच्चों का साया बनकर खडी हो सके। स्वावलम्बी बनने से उनमें अपना भी एक आत्म विश्वास बढ़ता है, जिसका असर उनकी आनेवाली पीढी पर पड़ता है।
लड़का थिएटर में है। छाम्मक्छाल्लो थिएटर को जीवन की सबसे बड़ी पाठशाला मानती है। मगर इस सोच के साथ औए ऎसी सोच के साथ कला के क्षेत्र में काम करनेवालों के मन में स्त्रियों के प्रति क्या भाव आते होंगे, यह सोच कर छाम्मक्छाल्लो फिर से सोच में पड़ जाती है। इस पूरे हिन्दुस्तान में एक अच्छी खासी आबादी इस बात पर टिकी होती हैं कि स्त्रियों के बाहर जाकर काम करने से वे बिगड़ जाती हैं, उनका चरित्र गिर जाता है। छाम्मक्छाल्लो सोचती है कि बाहर काम करने जानेवाली महिलायें अनायास ही इस सोच की शिकार हो कर अनजाने में ही चरित्रहीन कहलाने को अभिशप्त हैं।
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