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Monday, July 18, 2016

Dip Dip Dipped-It’s the Chemo Bed - Poem from CAN under Celebrating Cancer


Dip Dip Dipped
It’s the Chemo Bed
Intoxication Fed
Spins in my head

Evening I am home
Coconut water ‘n’ drums
Lick your cake say yum
Girls, one by one,
Kanishka, Gudiya and
Mandaki-niki-yum,
Dance to rhythm.

Music going crazy
With Toshy and Koshy
Camera, Ajay and Ali
Dance – after centuries.
Ever since it raised its hood
Give up party, give up laughter
Give up all your favorite food
But no more
Alive once more
I am living, I am pumping
I have an iron core
I am drunk on my life
I want it all the more
And, hope wins over the death!
###
English Translation- Swapnil Dixit

Friday, April 3, 2015

कैंसर के घर में गृहस्थी


कैंसर के घर में गृहस्थी

औरतें-
बसा लेती हैं अपनी गृहस्थी कहीं भी
मकान में, दूकान में,
खेत में, खलिहान में
यहाँ तक कि सड़क और अस्पताल में भी।
उन्हें कोई फर्क़ नहीं पडता,
क्या सोचता है अगल-बगल
वे सांस लेती हैं निश्चिंतता की
और सो जाती हैं केमो के बेड पर गहरी नीन्द
दवा काम कर रही है,
मन भी कर चुका काम
समझाकर सभी को घर के सारे सरंजाम!
कहीं भी हों औरतें,
छूटती नहीं उनसे घर की रीत


अपनों पर प्रीत!

Saturday, May 24, 2014

सेलेब्रटिंग कैंसर!

हर शनिवार मेरे लिए केमों लेकर आता था। आज पहला शनिवार है, जब इससे मुक्त हुई हूँ। मुक्त और अच्छा महसूस कर रही हूँ।  इस बीच एक आलेख 'बिंदिया' के अप्रैल, 2014 के अंक में आया था, जिसे तुरंत शब्दांकन वेब पत्रिका ने लिया। आज वही आलेख आपके साथ साझा कर रही हूँ।

सेलेब्रटिंग कैंसर!


      ‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’
      ‘मुझे नहीं लगता।‘
      ‘फिर क्यों आई मेरे पास?’
      ‘भेजा गया है।‘
      ‘किसने भेजा?’
      ‘आपकी गायकोनोलिज्स्ट ने।‘
      और छ्ह साल पुरानी केस-हिस्ट्री- ‘बाएँ ब्रेस्ट के ऊपरी हिस्से में चने के दाल के आकार की एक गांठ। अब भीगे छोले के आकार की। ....कोई दर्द नहीं, ग्रोथ भी बहुत स्लो। मुंबई-चेन्नै में दिखाया- आपके हॉस्पिटल में भी। लेडी डॉक्टर से भी। ब्रेस्ट-यूटेरेस की बात आने पर सबसे पहले गायनोकॉलॉजिस्ट ही ध्यान में आती हैं।‘
      यह है हम आमजन का सामान्य मेडिकल ज्ञान- फिजीशियन, सर्जन, गायनोकॉलॉजिस्ट में अटके-भटके। छह साल मैं भी इस- उसको दिखाती रही। सखी-सहेलियों के संग गायनोकॉलॉजिस्ट भी बोलीं- ‘उम्र के साथ दो-चार ग्लैंड्स हो ही जाते हैं। डोंट वरी।‘ और मैं निश्चिंत अपनी नौकरी, लेखन, थिएटर में लगी रही।
      धन्यवाद की पात्र रहीं गायनोकॉलॉजी विभाग की नर्स- ‘मैडम! आप सीधा ओंकोलोजी विभाग में जाइए। ये भी आपको वहीं भेजेंगी। आपका समय बचेगा’
      ‘मुझे फायब्रोइड लगता है। डजंट मैटर। आप जिंदगी भर इसके साथ रह सकती हैं। फिर भी, गो फॉर मैमोग्राफी, मैमो-सोनोग्राफी, बायप्सी एंड कम विथ रिपोर्ट।‘
      हर क्षेत्र अनुभव का नया जखीरा। लुत्फ के लिए मैं हमेशा तैयार! मेरे शैड्यूल में एक महीने, यानि दीवाली तक समय नहीं। आज भी संयोग से कोई मीटिंग, रिहर्सल नहीं- सो काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब’।
        मैमोग्राफी विभाग ने कहा, ‘बिना एप्पोइंटमेंटवाले पेशेंट को वेट करना होता है। मैं तैयार- अकेली, अजीब घबडाहट लिए। अपने किसी काम के लिए किसी को साथ ले जाना मुझे उस व्यक्ति के समय की बरबादी लगती। बायप्सी की तकलीफ का अंदाजा नहीं था। गाड़ी लेकर गई नहीं थी। ऑटोवाले रुक नहीं रहे थे। एक रुका, मना किया। मैंने कहा, ‘भैया, चक्कर आ रहा है, ले चलो।‘ उसने एक पल देखा, बेमन से बिठाया, घर छोड़ा और जबतक मैं लिफ्ट में चली नहीं गई, रुका रहा। छोटे छोटे मानवीय संवेदना के पल मन को छूते हैं।
      चेक-अप करवाकर मैं भोपाल चली गई- ऑफिस के काम से और भूल गई सब। चार दिन बाद अचानक याद आने पर अजय (मेरे पति) से पूछा। बोले- ‘रिपोर्ट पोजिटिव है, तुम आ जाओ, फिर देखते हैं।‘
      आज तक मेरी सभी रिपोर्ट्स ठीक-ठाक आती थीं। मन बोला- ‘कुछ तो निकला।‘ लग रहा था, गलत होगी रिपोर्ट! लेकिन, फ़ैमिली डॉक्टर ने भी कन्फ़र्म कर दिया। मतलब, वेलकम टु द वर्ल्ड ऑफ कैंसर!
      डॉक्टर रिपोर्ट देख चकरा गया- ‘कभी-कभी गट फीलिंग्स भी धोखा दे देती है।‘ डॉक्टर ने बड़े साफ शब्दों में बीमारी, इलाज और इलाज के पहले की जांच- प्रक्रिया बता दी। कैंसर के सेल बड़ी तेजी से बदन में फैलते हैं, इसलिए, शुभस्य शीघ्रम.....! इस बीच मुझे ऑफिस के महत्वपूर्ण काम निपटाने थे, एक दिन के लिए दिल्ली जाना था, मीटिंग करनी थी। डॉक्टर ने 30 अक्तूबर की डेट दी। इस दिन कैसे करा सकती हूँ! चेन्नै-प्रवास के कारण तीन साल से अजय के जन्म दिन पर नहीं रह पा रही थी। इसबार तो रह लूँ। 1 नवंबर तय हुआ।
      अभीतक केवल ऑफिसवालों को बताया था। रिशतेदारों की घबडाहट का अंदाजा हमें था। वर्षों पहले कैंसर से मामा जी को खोने के बाद दो साल पहले ही अपने बड़े भाई और बड़ी जिठानी को कैंसर से खो चुकी थी। घाव ताजा थे, दोनों ही पक्षों से। इसलिए दोनों ही ओर के लोगों को संभालना और उनके सवालों के जवाब देना...बड़ी कठिन स्थिति थी। हमने निर्णय लिया कि इलाज का प्रोटोकॉल तय होने के बाद ही सबको बताया जाए।
      आशंका के अनुरूप छोटी जिठानी और दीदियों के हाल-बेहाल! मैं हंस रही थी, वे रो रही थीं। मैंने ही कहा- ‘मुझे हिम्मत देने के बजाय तुमलोग ही हिम्मत हार बैठोगी तो मेरा क्या होगा?” मैंने तय किया था, बीमारी की तकलीफ से भले आँसू आएँ, बीमारी के कारण नही रोऊंगी। जब भी विचलित होती, सोचती, मुझसे भी खराब स्थिति में लोग हैं। मन को ताकत मिलती। यहाँ भी सोचा, ब्रेस्ट कैंसर से भी खतरनाक और आगे की स्टेज के रोगी हैं। वे भी तो जीते हैं। उनका भी तो इलाज होता है। पहली बार मैंने अपने बाबत सोचा- मुझे मजबूत बने रहना है। अपने लिए, पति के लिए, बेटियों के लिए।
      ‘शहर में जब चर्चा चली तो किस्से-आम होने लगे।‘ हम कैंसर या किसी भी बीमारी पर बात करते डरते- कतराते हैं। इससे दूसरों को जानकारी नहीं मिल पाती। मुझे लगता है, हमें अपनी बीमारी पर जरूर बातचीत करनी चाहिए, ताकि हमारे अनुभवों से लोग सीख-समझ सकें और बीमारी से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें। याद रखिए, धन तो आप कहीं से भी जुटा लेंगे, लेकिन मन की ताकत आप सिर्फ अपने से ही जुटा सकते हैं। आपके हालात पर जेनुइनली रोनेवाले भी बहुत मिलेंगे, लेकिन आपको उन्हें बताना है कि ऐसे समय में आपको उनके आँसू नहीं, मजबूत मन चाहिए।
      निस्संदेह कैंसर भयावह रोग है। यह इंसान को तन-मन-धन तीनों से तोड़ता है और अंत में एक खालीपन छोड़ जाता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी बड़ा सच है कि हम मेडिकल या अन्य क्षेत्रों के प्रति जागरूक नही। जबतक बात अपने पर नहीं आती, अपने काम के अलावा किसी भी विषय पर सोचते नहीं। इससे भ्रांतियाँ अधिक पैदा होती हैं। कैंसर के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं। इसलिए इसके पता चलते ही रोगी सहित घर के लोग नर्वस हो जाते हैं। हम भी नर्वस थे। मेरा एक मन कर रहा था, हम सभी एक-दूसरे के गले लगकर खूब रोएँ। लेकिन हम सभी- मैं, अजय, मेरी दोनों बेटियाँ- तोषी और कोशी – अपने-अपने स्तर पर मजबूत बने हुए थे।
      मेरा कैंसर भी डॉक्टर से शायद आँख-मिचौनी खेल रहा था। ऑपरेशन के समय डॉक्टर ने मुझे केमो पोर्ट नहीं लगाया- ‘आपका केस बहुत फेयर है। सैंपल रिपोर्ट आने के बाद हो सकता है, आपको केमो की जरूरत ही न पड़े। केवल रेडिएशन देकर छुट्टी। किसी भी मरीज के लिए इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है! 
        ऑपरेशन के बाद अलग- अलग कोंप्लीकशंस के बाद आईसीयू की यात्रा करती यूरिन इन्फेक्शन से जूझने के अलावा हालत बहुत सुधर चुकी थी। मेरे मित्र रवि शेखर म्यूजिक बॉक्स छोड़ गए। सुबह से शाम तक धीमे स्वर में वह मुझे अपने से जोड़े रखता। नर्स ने एक्सरसाइज़ बता दिए। दस दिन बाद घर पहुंची, एक पूर्णकालिक मरीज बनकर। अजय और बच्चे मेरे कमरे, खाने, दवाई के प्रबंध में जुट गए। मुझे सख्त ताकीद, कोई काम न करने की, खासकर प्रत्यक्ष हीट से बचने के लिए किचन में न जाने की। पूरे जीवन जितना नहीं खाया-पिया, आराम नहीं किया, अब मैं कर रही थी। शायद आपकी अपने ऊपर की ज्यादती प्रकृति भी नहीं सहती। उससे उबरने के इंतज़ाम वह कर देती है। तो मेरा कैंसर प्रकृति का दिया इलाज है?
      सैंपल रिपोर्ट आ गई- पहला स्टेज, ग्रेड 3! डॉक्टर ने समझाया- चोरी होने पर पुलिस को बुलाते हैं, आतंकवादी के मामले में कमांडोज़। ग्रेड 3 यही आतंकवादी हैं, जो आपके ब्रेस्ट और आर्मपिट नोड्स में आ चुके हैं। इसलिए केमो अनिवार्य!
      केमो स्पेशलिस्ट ने एक संभावित तारीख और निर्देश दे दिए- 23 नवम्बर- ‘सर्जरी के तीन से चार सप्ताह के भीतर केमो शुरू हो जाना चाहिए। चूंकि, केमो कैंसर सेल के साथ-साथ शरीर के स्वस्थ सेल को भी मारता है, इसलिए इसके साइड इफ़ेक्ट्स हैं- भूख न लगना, कमजोरी, चक्कर आना, बाल गिरना आदि।‘
      तीसरा सप्ताह चढ़ा कि नहाने के समय हाथ में मुट्ठी-मुट्ठी बाल आने लगे। केमो की तैयारी के लिए पहले ही मैंने बाल एकदम छोटे करा लिए थे। लंबे बालों के गिरने से बेहतर है छोटे बालों का गिरना। फिर भी बालों के प्रति एक अजीब से भावात्मक लगाव के कारण और बाल गिरेंगे, यह जानते हुए भी मैं अपने-आपको रोक ना सकी और फूट-फूटकर रोने लगी। अजय और कोशी भागे-भागे आए। कारण जानकर दिलासे देने लगे। कोशी ने अवांछित बाल हटाकर खोपड़ी को समरूप-सा कर दिया। आईना देख खुद को ही नहीं सह पाई। झट सर पर दुपट्टा लपेट लिया। रात में तोषी के आने पर मैंने कहा कि मेरा चेहरा बहुत भयावना लग रहा है। उसने कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है, तुम अभी भी वैसी ही प्यारी लग रही हो।‘ एक-दो दिन बाद स्थिर होकर देखा- नाटक ‘मि. जिन्ना’ करते समय अक्सर गांधीवाली भूमिका की सोचती। तब हिम्मत नहीं थी। अब मुझे अपनी टकली खोपड़ी से प्यार हो गया। उसे ढंकती नहीं हूँ, न घर में न बाहर में। यह अपना आत्म-विश्वास है। मुझे देखतेवाले कहते हैं- ‘यह ‘कट’ आप पर बहुत सूट कर रहा है।‘
      केमो पोर्ट न लगाने के कारण इंट्रावेनस केमो दिया गया। लेकिन तीसरे केमो तक आते-आते सारी नसें फायर कर गईं। दर्द रहने लगा। डॉक्टर बोले- ‘आपकी नसें काफी सेंसिटिव हैं। आमतौर पर ऐसा छह महीने बाद होता है, आपके साथ डेढ़ महीने में ही हो गया। अभी 13 केमो बाकी हैं, सो केमो पोर्ट लगाना होगा। इसके लिए और मार्जिन टेस्ट के लिए फिर से ऑपरेशन! मेडिकल और शिक्षा- दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ आप डॉक्टर और शिक्षालयों के गुलाम हो जाते हैं।  मार्जिन टेस्ट में ऑपरेशनवाली जगह से ही वहाँ का सैंपल लेकर टेस्ट के लिए भेजा गया, ताकि कैंसर –सेल्स की स्थिति पता चल सके। रिपोर्ट आ गई। डॉक्टर ने बताया कि आप अब खतरे से बाहर हैं। लेकिन केमो, रेडिएशन, खाना-पीना, आराम शिड्यूल के मुताबिक!
      अभी इसी शिड्यूल में हूँ। कुछ दिन लगते हैं, अपने-आपसे लड़ने में, खुद को तैयार करने में। लेकिन, अपना मानसिक संबल और घरवालों का समर्थन कैंसर क्या, किसी भी दुश्वारियों से निजात की संजीवनी है। यह आपको कई रास्ते देता है- आत्म मंथन, आत्म-चिंतन, आराम, खाने-पीने और सबकी सहानुभूति भी बटोरने का (हाहाहा)। यह ना सोचें कि आप डिसफिगर हो रही हैं। यह सोचें कि आपको जीवन जीने का एक और मौका मिला है, जो शत-प्रतिशत आपका है। इसे जिएँ- भरपूर ऊर्जा और आत्म-विश्वास से और बता दीजिये कैंसर को कि आपमें उससे लड़ने का माद्दा है। सो, कम एंड लेट सेलेब्रेट कैंसर! ###                                 

Thursday, May 1, 2014

5 कविताएं- "लमही" से

"लमही" के अप्रैल, 2014 के अंक में प्रकाशित 5 कविताएं. आपके विचार आमंत्रित हैं.

1 मन पिऊ- मन पिऊ!   
आज मैंने चाहा था कि...
तुमसे बात करूं!
पूछूं, कि क्‍या सचमुच तुम थाम लोगे
मेरी गिरती बांहों, उठती सांसों
और चढ़ती आंखों को
बांध दोगे इन्‍हें राग के अनछुए घेरों में
और छू लोगे मेरा माथा अपने होठों से
’पुच्‍च’ की तरंगित ध्‍वनि के साथ!

आज मैंने चाहा था कि
तुम्‍हारे कन्‍धे पर अपना सिर टिकाकर
थाम लूं तुम्‍हारी हथेली!
एक-एक उंगली की एक-एक पोर को
सहलाते हुए
पूछूं – धड़कन बढ़ी क्‍या?
सांसें चढ़ी क्‍या?
तन जिया क्‍या?

मन पिऊ पिऊ बोला क्या?###

2 मेरा शहर 
 यह मेरा शहर है छोटा सा
गांव से कटा, कस्‍बे से सटा
बड़े शहर से फटा- हटा
गुड्डी बकाट्टा सा मेरा शहर!

बड़े शहर की धूल से लुटता मेरा यह छोटा सा शहर
गांव-कस्‍बे की धूल से पगलाता मेरा यह छोटा सा शहर
धुर्र बादल के घने नाते-रिश्‍ते
अरे लो! धंस गई घर की दीवाल
सूखे, दरके खेतों के भीतर- नींव बनकर नई इमारत की!
बनेगी, तो देखअना, कैसे चमकेगी, कैसे दमकेगी!
भूल जाओगे,
यहां कभी था तुम्हारा खेत या छोटी सी दुकान!
बड़ा शहर आता है बुलडोजर बनकर
पाटकर दरकी दीवाल और खेत
बना देता है समतल
बो देता है उनमें
नया टीवी, नए मोबाइल, नया सोफा, नया आईना!
और इन्‍टरनेट का एकांझ बीज।
बड़ा शहर खोलता है मुंह- हंसने के लिए
समा जाते हैं उसमें गांव-कस्‍बे
जाने कब और कैसे!
दूध-लस्‍सी की सिट्ठी तले बहकर चाय-कोला
मेरा यह छोटा सा शहर
जब कभी जगता भी है ऊंनींदा सा,
रुंआसा सा तो
उसे दे दी जाती है
पान की दुकान में फंसी दारू की पाउच-
पुचकार कर- पुच्च पुच्च!
निमंत्रित करता है दिन-
आओ, आओ! गराड़ा करो, पान खाओ,
और भूल जाओ
कि भोला सा यह देश हमारा है,
यह छोटा सा शहर हमारा है
यह खोया सा सपना हमारा है।
मेरे इस छोटे से शहर में
हर साल आती है विकास की आंधी
रोप जाती है कुछ बड़े-बड़े उत्‍पादों
के पोस्‍टरों विशालकाय पेड़
बन जाते हैं विकास की आंधी तले
बिजली, पानी, अस्‍पताल, स्‍कूल – इतिहास के पन्‍ने।
बजट में विकास है,
विकास में निकास है,
निकास के पैरों तले, भरे गले रूंध जाता है
मेरा यह छोटा सा शहर,
न गांव बचा पाता है उसे
न कस्‍बा!
दरअसल वो खुद ही हो जाते हैं
प्रागैतिहासिक काल की गाथा
मेरा यह छोटा सा शहर तो अभी भी  
इतिहास में ही दफन है। ###

3 मैं - भूरी माटी सी!
यह मैं ही हूं
अपनी मादक गन्‍ध
और सुरभित हवा के संग
अपनी बातों के खटमिठ रस
और तरंगित देह-लय के संग
यह मैं ही हूं
फैले आसमान की चौड़ी बांहों की तरह
यह मैं ही हूं
कभी हरी तो कभी दरकी धरती की
भूरी माटी की तरह।

समय ने छेड़ी है एक नई तान
देह मे दिये हैं अनगिन विरहा गान
मन की सीप में बंद हैं
कई बून्‍द- स्वाति के!
सबको समेटने और सहेजने को आतुर,
व्‍याकुल, उत्‍सुक
यह मैं ही हूं ना!
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4 लड़की! 
मत निकलो हद से बाहर।
देवियों की पूजा वाला है यह देश!
बनती है बड़ी-बड़ी मूर्तियां, देवी की!
सुंदर मुंह, बड़े-बड़े वक्ष और
मटर के दाने जैसे उनके निप्‍पल
भरे-भरे नितंब और  
जांघों के मध्‍य सुडौल चिकनाई
उसके बाद ओढ़ा देते हैं
लाल-पीली साड़ी
गाते हैं भजन-सिर हिला के, देह झुमा के.
लड़की!
तुम भी बड़ी होती हो
इन्‍हीं आकारों-प्रकारों के बीच,
दिल्‍ली हो कि बे- दिल
तुम हो एक मूर्ति महज
गढ़ते हुए देखेंगे तुम्‍हारी एक-एक रेघ
फिर नोचेंगे, खाएंगे
रोओगी तो तुम्‍ही दागी जाओगी –
क्‍यों निकली घर से बाहर?
क्‍यों पहले तंग कपड़े?
क्‍यों रखा मोबाइल?
लड़की!
बनी रही देवी की मूर्ति भर
मूर्ति कभी आवाज नहीं करती
बस गढती रहती है- वक्ष, निप्पल, ज़ंघाएं!
होती रहती है दग्‍ध-विदग्‍ध, चलता रहता है भोग-विलास
जगराता, अन्धियाता!
नहीं कह पाती कि आ रही है उसे शर्म
हो रही है वह असहज
अपने वक्ष और नितंब पर
उनकी उंगलियां फिरते-पाते
किसी का कोई भी धर्म यहां नहीं होता आहत।
कि हताहत
सुघड़ता के नाम पर
यह कैसा बलात्‍कार? ####


5. उगते रहे कनेर! 
तुम्‍हारी आंखों की पुतली
में उगते रहे पीले कनेर
लाल अड़हुल, चंपई हरसिंगार!
आंखों के कोनो से आती रही
मॉलश्री की भीनी-भीनी खुशबू,
जब
इन आंखों को ओढ़ लिया मैंने
अपने होठों पर
तो
इन्‍हीं आंखों की पुतली
चमक उठी मेरे माथे पर
बनकर बिंदिया –
बड़ी-बड़ी,
लाल-लाल
गोल-गोल।
(-----)