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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Tuesday, May 27, 2014

तुझे सबकुछ पता है न माँ!

      माँ सभी को भगवान की तरह मुसीबत में याद आती है या दिखावे के समय। जैसे शादी या रिजल्ट के समय। दोनों ही बखत लोग साथ मे होते हैं। अब उन्हें गाना तो पड़ता है कि       
“उसको नहीं देखा हमने कभी, पर इसकी ज़रूरत क्या होगी,
            ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी?
      बाकी समय वह बोझ है, खर्चे का कारण है, बुढ़ापे की झिक झिक है, चिढ़ का बायस है। जिस बच्चे की हर बात का बिना चिढ़े माँ मुस्कुराकर जवाब देती और पुलकित होती रहती है, वही संतान उसकी बात पर या तो कुढ़ती है या मुंह फेरकर अपने काम में लग जाती है। मुनव्वर राना ने लिखने को लिख दिया:
            “किसी के हिस्से मकान आया, किसी के हिस्से दुकान आई
            मैं सबसे छोटा था, मेरे हिस्से मे माँ आई।“
      बाद में लोगों ने कहा- “मियां, बुढ़ापे का बोझ अपने माथे लेकर कविताई करते हो? नादान हो कि अहमक़?” लोग न नादान बनना चाहते हैं न अहमक़। फिर भी, माँ से जताते हैं मुहब्बत!    
      नरेंद्र चंचल गा-गाकर थक गए:
            “चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है।“    
      हम अपनी माँ के पास जाने के बदले पहाड़ पर बैठी माँ के पास चले जाते हैं और वहाँ से गाते हैं-
            “प्रेम से बोलो, जय माता की।“
      क्या चंचल ने केवल पहाड़ पर बसती और शेर पर सवार माता के लिए ही गाया होगा? नौ महीने तो उन्हें भी उनकी अपनी ही माँ ने अपने पेट में रखा होगा- पहाड़ पर बसती और शेर पर सवारी करती माता ने तो नही।
      फिलमवाले पहले अच्छे थे। माँ, बहन, भाई, होली, दीवाली, राखी, लोरी सभी पर गीत लिखते थे। होली में मद और मादकता है, इसलिए आज भी यदा-कदा होली गीत फिल्माए जाते हैं। माँ पर तो मुझे लगता है, सबसे ज़्यादा गीत लिखे गए।
            “जिनकी माँ होती है, खुशकिस्मत होते हैं,
            जिनकी माँ नही होती, जीवन भर रोते हैं।“
      छममकछल्लो इन गीतों से ही आज की बात पूरी करेगी। जो गीत भूल या छूट जाए, उसे माँ की बाकी जगत सन्तानें पूरा करेगी। देख भी लें। हो जाए आज फिर से एक और परीक्षा!  
      छममकछल्लो जैसी संतान माँ को मस्का मारती है और बड़े आराम से अंटी ढीली कर जाती है। माँ अपने भूले-बिसरे गर्व में कहती रहती है- “अरे मेरे पास तो सात-सात बेटे हैं। एक –एक कौर भी एक –एक बेटा देगा तो पेट भर जाएगा।“ किसी भी बेटे के पास कौर का एक टुकड़ा भी नहीं होता, भले माँ दूसरों के बेटों से एक कौर भात या एक रोटी मांगे। और क्यों ना मांगे! आखिर को वह उसकी जगत माता है और वह उसकी जगत संतान! केवल गाने से काम थोड़े न बनता है! लेकिन, संतान गाती है-
            “कौन सी वो चीज है जो यहाँ नहीं मिलती,
            सबकुछ मिल जाता है, लेकिन हाँ, माँ नहीं मिलती।“
      खुश माँ डगरे का बैगन बन जाती है, जिसे जो चाहे, जिधर से डुला ले। दिक्कत यह है कि माँ को पत्नी की तरह एक पतिव्रत नहीं बनाया गया। एक बच्चा ही जनती तो शायद एक संतान की माँ का खिताब मिल भी जाता। लेकिन इसमें भी उसकी मर्ज़ी कहाँ रही? जितनी मर्ज़ी घरवालों की, बच्चे जने और अपने बच्चों की माँ के साथ साथ जगज्जननी बने। माँ मुसकुराती है और प्यार से जगत संतान के लिए पूरी-छोले बनाती है। कर्जा चढ़ा तो क्या हुआ! बच्चे तो खुश! बच्चे पूरी-छोले खाने से पहले गाते हैं-
            माँ मुझे अपने आँचल में छुपा ले, गले से लगा ले,
            कि और मेरा कोई नहीं।
और खाने के बाद-
            “माँ तुझे सलाम, अम्मा तुझे सलाम” गाते अपनी राह निकल जाते हैं।
      हमारी महान भारतीय संस्कृति कहती है कि हम पेड़-पौधे, पशु पक्षी, नदी- तालाब, पत्थर- माटी, धरती सभी को माँ कहकर पूजते हैं। इतनी माँओं को पूजने के क्रम में अपनी माँ छूट जाती है तो कोई अपराध तो नहीं हो जाता! कितनी माँ को याद रखे कोई! अपनी संस्कृति में सीता, दुर्गा, काली, शक्ति, पार्वती, संतोषी- सभी माँ हैं। पता नहीं, राधा, रुक्मिणी, सत्यभामा माताएँ क्यों नहीं कहलाईं? गहन शोध का विषय है ये। लेकिन छममकछल्लो नहीं करेगी यह शोध। उसकी जगत सन्तानें ले ये जिम्मा! केवल:
            “बीबी, बेटी, बहन, पड़ोसी, सबमें थोड़ी-थोड़ी सी,
            दिन भर एक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी माँ”
कहकर उसे महानता के “हर-हर गंगे, पाप तरंगे” कहकर झाड पर चढ़ा देंगे और अगली ही लाइन में उतार कर गर्त में भी फेंक देंगे- “पुण्य हमारे घर, पाप तुम्हारे घर!” लो जी, और खिलाओ पूरी-छोले!
      अपने पूतों को जनमते ही धार में बहानेवाली जगत पूतों पर वरदान की लहरें बहाती माँ गंगा तो और भी रहस्यमई हैं। गंगोत्री से निकलकर परम पावन आर्यावर्त के शहर दर शहर होते हुए, वहाँ की भूमि और वाशिंदों को पुण्यवान करती, उनके धंधे- पानी का सारा इंतज़ाम करती गंदी होती चली जाती है- “राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप ढोते-ढोते!”
      वह कहती है- “मेरे बेटो! मेरी आरती मत उतारो, मुझे ज़रा साफ कर दो, ताकि मैं अपनी साफ लहरों के साथ बहकर तुमलोगों को भी साफ रख सकूँ।“ मगर बच्चे बड़े हो गए है- कद्दावर! राष्ट्र के पहरुए! वे कहते हैं- “चुप बुढ़िया! बैठी रह एक कोने में! हम जवान गबरू लोग! जो चाहेंगे, करेंगे, जैसे इस देश की अन्य लड़कियों, औरतों के साथ करते हैं।“ और आरती के बाद का सारा जमा कचरा उसी गंगा में बहा देते हैं, जिसकी अभी-अभी माँ कहते हुए आरती उतारी है! गंगा तो माँ है ना, सो चुप लगाना ही उसका धर्म है। आखिर बड़े बड़े लोग उसे माँ कहते हैं, धर्म और संस्कृति के नाम पर उसकी रक्षा के लिए तैयार हैं। रक्षक मुसकाते और गाते हैं-
            “तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है, प्यारी-प्यारी है,
            ओ माँ, ओ माँ!”
      बड़े-बड़े लोग अपनी सगी माँ से भी आशीष लेने जाते हैं, जैसे माँ को देखे और उनके चरण छूए बिना उनकी भोर ही नहीं होती। पद और पद का ताज पहनते वक़्त उसे टीवी के सामने बैठा देते हैं। साहेब जी, आपकी माँ के लिए क्या आपके दरबार में इतनी जगह नहीं कि वह आपका राज्याभिषेक अपनी आँखों से देखे, दूर की दृष्टि से नहीं! दरबार तो ऐसे ही बूढ़े लोगों से भरा पड़ा है। माँ के लिए जगह नहीं थी या कोई प्रोटोकॉल था? दूसरी माँ तो होती हैं अपनाए अपने लाडले-लाडलियों के संग।
      जैसा कि छममकछल्लो ने ऊपर कहा कि माँ तो माँ है। वह हर हाल में खुश रहती है और संतान के भले के लिए ही सोचती है। लेकिन हम उसकी संतान! जब दिखावे का समय हो, नजरें और हाथ माँ के पैरों पर। माँ भोली है, प्यारी है, इसलिए निश्छल भाव से सर पर हाथ फेरती आशीष देती है। इस देने के क्रम में हम देखते हैं कि बच्चे का सर थोड़ा गंजा हो जाता है, चेहरे पर थकान झलकती है, बाल, दाढ़ी, मूंछ के संग-संग भौंहों के बाल भी सफ़ेद हो जाते हैं। लेकिन, माँ के लिए तो हर उम्र का बच्चा उसकी गोद के बच्चे सा ही होता है- मासूम, प्यारा। हालांकि वह सब समझती है और मन ही मन कहती है-
            “ अम्मा देख, हाँ देख, तेरा मुंडा बिगड़ा जाए!”

लेकिन बिगड़े छोरे को संभालने के लिए उसके हाथ अब बेहद कमजोर हो चले हैं। उस हिलते हाथ से केवल सर ही फेरा जा सकता है। उसे अपनी उम्र का भी तो अंदाजा है। दम अटकते देर ही कितनी लगती है! तब महान भारतीय संस्कृति के मुताबिक मुखाग्नि के लिए तो इसी बिगड़े छोरे से ही आस रहेगी ना! ####  

Saturday, May 24, 2014

सेलेब्रटिंग कैंसर!

हर शनिवार मेरे लिए केमों लेकर आता था। आज पहला शनिवार है, जब इससे मुक्त हुई हूँ। मुक्त और अच्छा महसूस कर रही हूँ।  इस बीच एक आलेख 'बिंदिया' के अप्रैल, 2014 के अंक में आया था, जिसे तुरंत शब्दांकन वेब पत्रिका ने लिया। आज वही आलेख आपके साथ साझा कर रही हूँ।

सेलेब्रटिंग कैंसर!


      ‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’
      ‘मुझे नहीं लगता।‘
      ‘फिर क्यों आई मेरे पास?’
      ‘भेजा गया है।‘
      ‘किसने भेजा?’
      ‘आपकी गायकोनोलिज्स्ट ने।‘
      और छ्ह साल पुरानी केस-हिस्ट्री- ‘बाएँ ब्रेस्ट के ऊपरी हिस्से में चने के दाल के आकार की एक गांठ। अब भीगे छोले के आकार की। ....कोई दर्द नहीं, ग्रोथ भी बहुत स्लो। मुंबई-चेन्नै में दिखाया- आपके हॉस्पिटल में भी। लेडी डॉक्टर से भी। ब्रेस्ट-यूटेरेस की बात आने पर सबसे पहले गायनोकॉलॉजिस्ट ही ध्यान में आती हैं।‘
      यह है हम आमजन का सामान्य मेडिकल ज्ञान- फिजीशियन, सर्जन, गायनोकॉलॉजिस्ट में अटके-भटके। छह साल मैं भी इस- उसको दिखाती रही। सखी-सहेलियों के संग गायनोकॉलॉजिस्ट भी बोलीं- ‘उम्र के साथ दो-चार ग्लैंड्स हो ही जाते हैं। डोंट वरी।‘ और मैं निश्चिंत अपनी नौकरी, लेखन, थिएटर में लगी रही।
      धन्यवाद की पात्र रहीं गायनोकॉलॉजी विभाग की नर्स- ‘मैडम! आप सीधा ओंकोलोजी विभाग में जाइए। ये भी आपको वहीं भेजेंगी। आपका समय बचेगा’
      ‘मुझे फायब्रोइड लगता है। डजंट मैटर। आप जिंदगी भर इसके साथ रह सकती हैं। फिर भी, गो फॉर मैमोग्राफी, मैमो-सोनोग्राफी, बायप्सी एंड कम विथ रिपोर्ट।‘
      हर क्षेत्र अनुभव का नया जखीरा। लुत्फ के लिए मैं हमेशा तैयार! मेरे शैड्यूल में एक महीने, यानि दीवाली तक समय नहीं। आज भी संयोग से कोई मीटिंग, रिहर्सल नहीं- सो काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब’।
        मैमोग्राफी विभाग ने कहा, ‘बिना एप्पोइंटमेंटवाले पेशेंट को वेट करना होता है। मैं तैयार- अकेली, अजीब घबडाहट लिए। अपने किसी काम के लिए किसी को साथ ले जाना मुझे उस व्यक्ति के समय की बरबादी लगती। बायप्सी की तकलीफ का अंदाजा नहीं था। गाड़ी लेकर गई नहीं थी। ऑटोवाले रुक नहीं रहे थे। एक रुका, मना किया। मैंने कहा, ‘भैया, चक्कर आ रहा है, ले चलो।‘ उसने एक पल देखा, बेमन से बिठाया, घर छोड़ा और जबतक मैं लिफ्ट में चली नहीं गई, रुका रहा। छोटे छोटे मानवीय संवेदना के पल मन को छूते हैं।
      चेक-अप करवाकर मैं भोपाल चली गई- ऑफिस के काम से और भूल गई सब। चार दिन बाद अचानक याद आने पर अजय (मेरे पति) से पूछा। बोले- ‘रिपोर्ट पोजिटिव है, तुम आ जाओ, फिर देखते हैं।‘
      आज तक मेरी सभी रिपोर्ट्स ठीक-ठाक आती थीं। मन बोला- ‘कुछ तो निकला।‘ लग रहा था, गलत होगी रिपोर्ट! लेकिन, फ़ैमिली डॉक्टर ने भी कन्फ़र्म कर दिया। मतलब, वेलकम टु द वर्ल्ड ऑफ कैंसर!
      डॉक्टर रिपोर्ट देख चकरा गया- ‘कभी-कभी गट फीलिंग्स भी धोखा दे देती है।‘ डॉक्टर ने बड़े साफ शब्दों में बीमारी, इलाज और इलाज के पहले की जांच- प्रक्रिया बता दी। कैंसर के सेल बड़ी तेजी से बदन में फैलते हैं, इसलिए, शुभस्य शीघ्रम.....! इस बीच मुझे ऑफिस के महत्वपूर्ण काम निपटाने थे, एक दिन के लिए दिल्ली जाना था, मीटिंग करनी थी। डॉक्टर ने 30 अक्तूबर की डेट दी। इस दिन कैसे करा सकती हूँ! चेन्नै-प्रवास के कारण तीन साल से अजय के जन्म दिन पर नहीं रह पा रही थी। इसबार तो रह लूँ। 1 नवंबर तय हुआ।
      अभीतक केवल ऑफिसवालों को बताया था। रिशतेदारों की घबडाहट का अंदाजा हमें था। वर्षों पहले कैंसर से मामा जी को खोने के बाद दो साल पहले ही अपने बड़े भाई और बड़ी जिठानी को कैंसर से खो चुकी थी। घाव ताजा थे, दोनों ही पक्षों से। इसलिए दोनों ही ओर के लोगों को संभालना और उनके सवालों के जवाब देना...बड़ी कठिन स्थिति थी। हमने निर्णय लिया कि इलाज का प्रोटोकॉल तय होने के बाद ही सबको बताया जाए।
      आशंका के अनुरूप छोटी जिठानी और दीदियों के हाल-बेहाल! मैं हंस रही थी, वे रो रही थीं। मैंने ही कहा- ‘मुझे हिम्मत देने के बजाय तुमलोग ही हिम्मत हार बैठोगी तो मेरा क्या होगा?” मैंने तय किया था, बीमारी की तकलीफ से भले आँसू आएँ, बीमारी के कारण नही रोऊंगी। जब भी विचलित होती, सोचती, मुझसे भी खराब स्थिति में लोग हैं। मन को ताकत मिलती। यहाँ भी सोचा, ब्रेस्ट कैंसर से भी खतरनाक और आगे की स्टेज के रोगी हैं। वे भी तो जीते हैं। उनका भी तो इलाज होता है। पहली बार मैंने अपने बाबत सोचा- मुझे मजबूत बने रहना है। अपने लिए, पति के लिए, बेटियों के लिए।
      ‘शहर में जब चर्चा चली तो किस्से-आम होने लगे।‘ हम कैंसर या किसी भी बीमारी पर बात करते डरते- कतराते हैं। इससे दूसरों को जानकारी नहीं मिल पाती। मुझे लगता है, हमें अपनी बीमारी पर जरूर बातचीत करनी चाहिए, ताकि हमारे अनुभवों से लोग सीख-समझ सकें और बीमारी से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें। याद रखिए, धन तो आप कहीं से भी जुटा लेंगे, लेकिन मन की ताकत आप सिर्फ अपने से ही जुटा सकते हैं। आपके हालात पर जेनुइनली रोनेवाले भी बहुत मिलेंगे, लेकिन आपको उन्हें बताना है कि ऐसे समय में आपको उनके आँसू नहीं, मजबूत मन चाहिए।
      निस्संदेह कैंसर भयावह रोग है। यह इंसान को तन-मन-धन तीनों से तोड़ता है और अंत में एक खालीपन छोड़ जाता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी बड़ा सच है कि हम मेडिकल या अन्य क्षेत्रों के प्रति जागरूक नही। जबतक बात अपने पर नहीं आती, अपने काम के अलावा किसी भी विषय पर सोचते नहीं। इससे भ्रांतियाँ अधिक पैदा होती हैं। कैंसर के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं। इसलिए इसके पता चलते ही रोगी सहित घर के लोग नर्वस हो जाते हैं। हम भी नर्वस थे। मेरा एक मन कर रहा था, हम सभी एक-दूसरे के गले लगकर खूब रोएँ। लेकिन हम सभी- मैं, अजय, मेरी दोनों बेटियाँ- तोषी और कोशी – अपने-अपने स्तर पर मजबूत बने हुए थे।
      मेरा कैंसर भी डॉक्टर से शायद आँख-मिचौनी खेल रहा था। ऑपरेशन के समय डॉक्टर ने मुझे केमो पोर्ट नहीं लगाया- ‘आपका केस बहुत फेयर है। सैंपल रिपोर्ट आने के बाद हो सकता है, आपको केमो की जरूरत ही न पड़े। केवल रेडिएशन देकर छुट्टी। किसी भी मरीज के लिए इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है! 
        ऑपरेशन के बाद अलग- अलग कोंप्लीकशंस के बाद आईसीयू की यात्रा करती यूरिन इन्फेक्शन से जूझने के अलावा हालत बहुत सुधर चुकी थी। मेरे मित्र रवि शेखर म्यूजिक बॉक्स छोड़ गए। सुबह से शाम तक धीमे स्वर में वह मुझे अपने से जोड़े रखता। नर्स ने एक्सरसाइज़ बता दिए। दस दिन बाद घर पहुंची, एक पूर्णकालिक मरीज बनकर। अजय और बच्चे मेरे कमरे, खाने, दवाई के प्रबंध में जुट गए। मुझे सख्त ताकीद, कोई काम न करने की, खासकर प्रत्यक्ष हीट से बचने के लिए किचन में न जाने की। पूरे जीवन जितना नहीं खाया-पिया, आराम नहीं किया, अब मैं कर रही थी। शायद आपकी अपने ऊपर की ज्यादती प्रकृति भी नहीं सहती। उससे उबरने के इंतज़ाम वह कर देती है। तो मेरा कैंसर प्रकृति का दिया इलाज है?
      सैंपल रिपोर्ट आ गई- पहला स्टेज, ग्रेड 3! डॉक्टर ने समझाया- चोरी होने पर पुलिस को बुलाते हैं, आतंकवादी के मामले में कमांडोज़। ग्रेड 3 यही आतंकवादी हैं, जो आपके ब्रेस्ट और आर्मपिट नोड्स में आ चुके हैं। इसलिए केमो अनिवार्य!
      केमो स्पेशलिस्ट ने एक संभावित तारीख और निर्देश दे दिए- 23 नवम्बर- ‘सर्जरी के तीन से चार सप्ताह के भीतर केमो शुरू हो जाना चाहिए। चूंकि, केमो कैंसर सेल के साथ-साथ शरीर के स्वस्थ सेल को भी मारता है, इसलिए इसके साइड इफ़ेक्ट्स हैं- भूख न लगना, कमजोरी, चक्कर आना, बाल गिरना आदि।‘
      तीसरा सप्ताह चढ़ा कि नहाने के समय हाथ में मुट्ठी-मुट्ठी बाल आने लगे। केमो की तैयारी के लिए पहले ही मैंने बाल एकदम छोटे करा लिए थे। लंबे बालों के गिरने से बेहतर है छोटे बालों का गिरना। फिर भी बालों के प्रति एक अजीब से भावात्मक लगाव के कारण और बाल गिरेंगे, यह जानते हुए भी मैं अपने-आपको रोक ना सकी और फूट-फूटकर रोने लगी। अजय और कोशी भागे-भागे आए। कारण जानकर दिलासे देने लगे। कोशी ने अवांछित बाल हटाकर खोपड़ी को समरूप-सा कर दिया। आईना देख खुद को ही नहीं सह पाई। झट सर पर दुपट्टा लपेट लिया। रात में तोषी के आने पर मैंने कहा कि मेरा चेहरा बहुत भयावना लग रहा है। उसने कहा, ‘ऐसा कुछ नहीं है, तुम अभी भी वैसी ही प्यारी लग रही हो।‘ एक-दो दिन बाद स्थिर होकर देखा- नाटक ‘मि. जिन्ना’ करते समय अक्सर गांधीवाली भूमिका की सोचती। तब हिम्मत नहीं थी। अब मुझे अपनी टकली खोपड़ी से प्यार हो गया। उसे ढंकती नहीं हूँ, न घर में न बाहर में। यह अपना आत्म-विश्वास है। मुझे देखतेवाले कहते हैं- ‘यह ‘कट’ आप पर बहुत सूट कर रहा है।‘
      केमो पोर्ट न लगाने के कारण इंट्रावेनस केमो दिया गया। लेकिन तीसरे केमो तक आते-आते सारी नसें फायर कर गईं। दर्द रहने लगा। डॉक्टर बोले- ‘आपकी नसें काफी सेंसिटिव हैं। आमतौर पर ऐसा छह महीने बाद होता है, आपके साथ डेढ़ महीने में ही हो गया। अभी 13 केमो बाकी हैं, सो केमो पोर्ट लगाना होगा। इसके लिए और मार्जिन टेस्ट के लिए फिर से ऑपरेशन! मेडिकल और शिक्षा- दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ आप डॉक्टर और शिक्षालयों के गुलाम हो जाते हैं।  मार्जिन टेस्ट में ऑपरेशनवाली जगह से ही वहाँ का सैंपल लेकर टेस्ट के लिए भेजा गया, ताकि कैंसर –सेल्स की स्थिति पता चल सके। रिपोर्ट आ गई। डॉक्टर ने बताया कि आप अब खतरे से बाहर हैं। लेकिन केमो, रेडिएशन, खाना-पीना, आराम शिड्यूल के मुताबिक!
      अभी इसी शिड्यूल में हूँ। कुछ दिन लगते हैं, अपने-आपसे लड़ने में, खुद को तैयार करने में। लेकिन, अपना मानसिक संबल और घरवालों का समर्थन कैंसर क्या, किसी भी दुश्वारियों से निजात की संजीवनी है। यह आपको कई रास्ते देता है- आत्म मंथन, आत्म-चिंतन, आराम, खाने-पीने और सबकी सहानुभूति भी बटोरने का (हाहाहा)। यह ना सोचें कि आप डिसफिगर हो रही हैं। यह सोचें कि आपको जीवन जीने का एक और मौका मिला है, जो शत-प्रतिशत आपका है। इसे जिएँ- भरपूर ऊर्जा और आत्म-विश्वास से और बता दीजिये कैंसर को कि आपमें उससे लड़ने का माद्दा है। सो, कम एंड लेट सेलेब्रेट कैंसर! ###                                 

Thursday, May 15, 2014

सीता का श्रीलंका दौरा


त्रेता युग से सीता हमारे साथ हैं। न बेटी, न बहन, न बीवी, न भाभी, न मां! केवल जगजन्‍नी!
छम्‍मकछल्‍लो को सीता के इस रूप पर बड़ी दया आती है। वह भी सीता की भूमि मिथिला से है ना! मिथिला पर नजर डालने पर वह पाती है कि उसकी मिथिला में सारी लड़कियां ‘माल’ या ‘मादा’ हैं – माता और बहन तो हर्गिज नहीं। लड़की बड़ी हुई नहीं कि उनपर दीठ गड़ी नहीं। मणिकांचन योग की तरह लड़कियों के मन में भी अपने तन के प्रति चेतना जगती है। जय सौन्दर्य प्रसाधन और फैशन फिएस्टा की!


तब अप्सराएँ सजती थीं, देवियाँ भी सजती थीं। छम्‍मकछल्‍लो के मन में आता है कि क्या तब सीता का मन नहीं किया होगा अपनी भरी-पूरी उम्र में अपने शोख बदन को देखने का, देखकर इतराने का, इतराकर बल खाने का, बल खाकर लहराने का, लहराकर मचलने का? जरूर किया होगा। लेकिन, भाई साब! इन सब अदाओं की उम्‍मीद किसी माता से कैसे की जा सकती है? वे कोई आज की गहरे मेक-अप, लाल लिपस्टिक, लंबी टीका, डिजाइनर ड्रेसवाली युवा माता थोड़े ना हैं, जिन्हें देखकर मन में माता का भाव तो हम औरतों में भी नहीं आता।
सीता के दो-दो मायके हैं। चौंकिए मत! कहा जाता है कि जनक पुत्री जानकी, मिथिला ललना मैथिली, विदेह आत्‍मजा वैदेही के पहले सीता रावण और मंदोदरी की बेटी थी। वैसे भी सभी जानते हैं कि जनक को सीता खेत में हल चलाते वक्त मिली थी। इससे यह तो तय है ही ना कि जनक सीता के अपने पिता नहीं थे। तो फिर सीता किसी न किसी माता-पिता की जैविक पुत्री तो रही ही होगी ना! आकाशवाणी का प्रचलन कब शुरू हुआ, पता नहीं। मगर हमने जाना कि रावण के लिए भी कंस की तरह आकाशवाणी हुई कि उसकी यह संतान उसकी मृत्‍यु का कारण बनेगी। अब जी, कौन ऐसा महान इंसान होगा, जो मृत्‍यु से न डरे। और कौन ऐसी मां होगी, जो संतान को यूं ही मरता छोड़ देना चाहेगी।
सो पहुंचा दी गई सीता – रावण-राज्‍य की सीमा के बाहर। शास्‍त्रों ने कहा है, ‘पति से छल करनेवाली स्‍त्री अगले जन्‍म में मुर्गी बनती है।‘ पत्‍नी से छल करनेवाले पति? सीता को छल से जब राम ने वनवास भेजा तब राम अगले जन्‍म में क्‍या मुर्गा बने होंगे?
सीता सुंदरी थी, सुकुमार थी। जरूर जीरो साइज रही होंगी। फिर भी उसने शिव-धनुष उठा लिया। मैग्‍नेटिक टेक्‍नोलॉजी! लेकिन बुद्धिधाम जनक ने इसी बहाने कर ली राजा-महाराजाओं की बाहुबली परीक्षा! कहने को स्‍वयंवर, लेकिन आमंत्रित कौन? राजे-महाराजे! शर्त किसकी? पिता की! द्वापर में भी स्‍वयंवर किसका? द्रौपदी का? आमंत्रित कौन? राजे-महाराजे! ये कौन सा स्‍वयंवर हुआ यार! स्‍वयंवर मेरा, मर्जी बाप की! बुला लिए बड़े-बड़े राजा-राजकुमार और थमा दिया हाथ ऋषि- कुमार के! द्रौपदी को भी क्‍या मिला? निर्धन ब्राह्मण कुमार! वह तो बाद में इन कन्‍याओं को पता चला कि उनके पति तो जी, राजकुमार हैं। लड़कियों के लिए हर बात में ‘बाउजी जानेंगे’ की परम्‍परा शायद यहीं से शुरू हुई होगी।
कहते हैं न कि अपना खून जोर मारता है। सीता को भी जीवन के एक मोड पर पता चल गया होगा कि वह राजा जनक की बेटी नही हैं। उसका भी मन अपने माता-पिता के बारे में जानने को छटपटाया होगा। श्री राम के साथ वनवास जाने के पीछे ज़रूर उसकी मंशा रही होगी, इसी बहाने अपना मायका तलाशने की। ससुराल तो वैसे ही उत्तर-प्रदेश या बिहार की ललनाओं के लिए एक बंद घर होता है। सीता तो राजकुमारी और अब राज घराने की बहूरानी थी।
मायका खोजने का यह काम त्रेता में हो न सका। मिथिला की परम्‍परा को देखते हुए छम्‍मकछल्‍लो नोटराइज्ड कराए स्टैम्प पेपर पर साइन करते हुए कह सकती है कि वहां तो वह असूर्यम्‍पश्या ही रही होगी। ससुराल पहुंची तो और भी हर-हर गंगे! पता नहीं, तब मेंहदी थी या नहीं, लेकिन मुहावरे में कहें तो हथेली की मेंहदी छूटी भी न थी कि पति चले वनवास। अब ‘भला है, बुरा है, मेरा पति मेरा देवता है’ भी सीता की ही तो देन नहीं!
वन को निकली सीता। आजू-बाजूवालियों ने कहा, “तीन-तीन सास के त्रिकोण में कौन फंसे! बढि़या है बनवास! पति का साथ तो मिलेगा।“ भारतेन्‍दु ने भी जरूर यहीं से प्रेरित होकर लिखा होगा –
टूट टाट घर टपकत, खटियो टूट
पिय के बांह उसीसवां, सुख कै लूट!
      वही पति छल से सीता को त्‍याग देता है तो उसी छल से रावण उसे हर भी लेता है। कहते हैं, राजा-जनक ने सीता को शस्‍त्र-शास्‍त्र और माता सुनयना ने घर-गृहस्थी की सभी शिक्षा दी थी। फिर भी सीता कैसे मात खा गई? असल में, पर्सनैलिटी ग्रूमिंग नहीं हुई न! पहले मायके, फिर ससुराल, फिर पति और अब देवर की घेरी रेखा में केवल जगज्जननी सीता ही नहीं, आज की सीताएँ भी तब से आजतक बंद ही हैं।  
      पहले के साधु-सन्‍यासी शायद सच्‍चे होते थे। इसलिए रावण के घर से लौटी सीता पर धोबी ने ताने मार दिए। गनीमत है, वाल्‍मीकि या सीता पर किसी ने कुछ नहीं कहा। आज के बाबा लोग होते तो कह देते – ‘हनीमून मना रहे थे।‘ क्या पता, यह भी कह देते कि लव-कुश तो राम की संतान ही नहीं!
      सीता को मिला ही क्‍या ससुराल से? गहने सासुओं के लॉकर में! बनारसी साड़ियाँ ट्रंक में। हो सकता है, उन्हीं गहनों से यज्ञ के समय स्‍वर्ण मूर्ति गढ़ ली गई होगी – लो जी लो! सीता भी मेरी, सोना भी मेरा!
      सीता ने जरूर सोचा होगा कि रावण केवल धमकाता भर क्‍यों रहा? जबर्दस्ती क्यों नहीं की? जरूर सीता के बदन पर कोई निशान रहा होगा, जन्म का, जिसे रावण पहचान गया होगा और उसे पहचान मंदोदरी भी खूब रोई होगी। सीता को भी अपने मायके की असलियत पता चल गई होगी। लेकिन, माँ और पति का ख्‍याल कर वह चुप लगा गई होगी!
      पर, मन में तमन्‍ना तो रही होगी अपनी मातृभूमि के जर्रे-जर्रे को देखने की, वहां की धूल माटी में घूमने-फुदकने की। बिचारी सीता! लंका पहुंचकर भी अपने मन की यह मुराद पूरी न कर पाई होगी। कैसे करती! बंदी जो थी। धरती में समाने के बाद भी उसकी यह इच्‍छा उसके मन में ज़रूर समाई रही होगी।  इस इच्छा –पूर्ति के लिए उसे त्रेता से कलियुग की इक्‍कीसवीं सदी तक का लंबा इन्‍तजार करना पड़ा, जब उसने छम्‍मकछल्‍लो के रूप में अवतार लिया और श्रीलंका गई।
      पर अब समय बदल गया था। अब वहां हिन्दू धर्म का कोई नाम लिवैया नहीं। बौद्ध धर्म इतने प्रबल तरीके से स्‍थापित हो चुका है कि वहां किसी और धर्म का कोई राष्‍ट्रपति नहीं बन सकता। बहुमत मिला तो उसे बौद्ध धर्म स्वीकारना होगा। छममकछल्लो की देह में बसी सीता पूरी लंका घूम आई। पर, उसे लगा नहीं कि वह अपने देश या अपने मायके आई है। बहुत खोजने पर उसे एक हनुमान मंदिर मिला। लेकिन जिसकी ओर वह आकर्षित हुई, वह थी वहाँ की साफ-सफाई! सीता ने मान लिया कि स्वच्छता में ही देवी-देवता वास करते हैं। आम आदमी, आम विक्रेता उसे विदेशी मानकर उससे दो पैसे ज़्यादा खींच लेने के चक्कर में थे। उसे अपनी मिथिला याद आ गई तो उसे लंका और मिथिला का अंतर खतम होता नज़र आया। इस अंतर में वह श्री राम की तरह ही लंका को श्रीलंका कहने लगी। पीछे श्री लगाती- माताश्री, पिताश्री की तरह लंकाश्री, तो लगता कि वह देश नहीं, देश के स्वामी को पुकार रही है।  

            सीता रूपी छम्‍मकछल्‍लो को संतोष था कि वह तय कर पाई श्रीराम से श्रीलंका तक का सफर! राजकुमारी के खोल से निकलकर एक मेहनतकश स्‍त्री के कवच में आकर! अपनी कमाई और अपने रसूख से अपने मायके जाकर। किसी ने उसे नहीं पहचाना, किसी ने उसे नहीं जाना! वैसे भी आज के समय में सब बदल गया है। सीता का विश्‍वरूप इतना बढ़ गया है कि लोग उसके असली रूप को ही भूल गए हैं। श्रीलंका में उसने किसी को दूध की तरह गोरा या कोमल-सुकुमार नहीं देखा। परंतु, यहाँ जगज्जननी का प्रश्न था। जगज्जननी कोई भी बने, उसे सुंदर, सुकुमार, गोरा होना ही है। शास्त्र के साथ-साथ आज के भारतवासी तो उसे, उसकी जन्‍मस्‍थली, उसकी भाषा मैथिली – सभी को भूल गए। छम्‍मकछल्‍लो को बताना पड़ता है कि मैथिली माने, जगज्जननी सीता की भाषा! लोग ‘वाऊ’ करते हैं और कहीं और खो जाते हैं। खो गया जाने कहाँ सीता का बाल मन, उसकी शोख युवावस्था, उसका घर, उसका मायका। शायद वस्‍तुओं और व्‍यक्तियों के भूमंडलीकरण में स्‍थानीयता ऐसे ही विलुप्‍त हो जाती है, जैसे सीता का लंकाइन या मिथिलाइन स्वरूप! बस याद रह गया उसका जगज्जननी स्वरूप! ####