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Monday, July 18, 2016

Dip Dip Dipped-It’s the Chemo Bed - Poem from CAN under Celebrating Cancer


Dip Dip Dipped
It’s the Chemo Bed
Intoxication Fed
Spins in my head

Evening I am home
Coconut water ‘n’ drums
Lick your cake say yum
Girls, one by one,
Kanishka, Gudiya and
Mandaki-niki-yum,
Dance to rhythm.

Music going crazy
With Toshy and Koshy
Camera, Ajay and Ali
Dance – after centuries.
Ever since it raised its hood
Give up party, give up laughter
Give up all your favorite food
But no more
Alive once more
I am living, I am pumping
I have an iron core
I am drunk on my life
I want it all the more
And, hope wins over the death!
###
English Translation- Swapnil Dixit

Sunday, July 17, 2016

Popcorn Breasts- from CAN-समरथ

CAN-समरथ- कविता संग्रह अपने अंतिम चरण में है। छम्मकछल्लो खुश है। जीवन के एक उद्देश्य को उसका रूप मिल रहा है। आप भी इसमें शामिल होइए। तबतक पढ़िये एक कविता- इस संग्रह से। ईसका हिन्दी रूप भी मिलेगा। फिलहाल अँग्रेजी में और इसका youtube लिंक है-  https://www.youtube.com/watch?v=p7yJgnyNbR8

Breast cancer is spreading
Like springy popcorn,
Here, there, everywhere,
Unmitigated, uninterrupted.
Beloved, loved ones,
Relatives, friends,
Mother, sister,
Sister-in-law, wife, even one's neighbour.
Sister, grandmother, none spared,
None untouched,
By a malady untouchable.
Once it arrives, we look for reasons!
Was it the lifestyle? Stress?
Late marriage? Delayed pregnancy?
Having just one or may be two kids?
Did you get regular breast exams?
Doctors and specialists are stumped!
Can't determine causes, and
Answers don't come that easy.
Each one with their unique symptoms.
They ask, how did it happen?
If only we knew the answer,
Wouldn't we have tied a bundle,
Carried it to some mountain peak,
Or to the bottom of some abyss,
And dumped it there?

Our popcorn beads of cancer??



Thursday, March 26, 2015

कैंसर और जीवन! A series of poems under the title of "CAN: Cancer and Nightingale"


"CAN: Cancer and Nightingale" इस शीर्षक से कविताओं की शृंखला शुरू कर रही हूँ। उद्देश्य- कैंसर के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना और इसके प्रति अतिरिक्त डर को समाप्त करना है। कैंसर से निजात पाया जा सकता है, अगर आप पहले से सचेत रहें, अपने शरीर पर ध्यान देते रहें, शरीर में आई किसी भी असामान्यता पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। कैंसर अगर हो ही गया है तो घबड़ाइए नहीं, वैसे ही डटकर उसका मुक़ाबला कीजिए, जितना सीमा पर मौजूद हमारे जवान दुश्मनों का करते हैं। और सबसे ऊपर है आपकी सकारात्मक सोच। आप ही खुद को अपनी सोच से ठीक कर सकते हैं और अपने घर व आसपास के माहौल को ज़िंदादिल बनाए रख सकते हैं- कैंसर के बावजूद। तो आइये, कहें कि Yes! I can. and lets celebrate Cancer. 
You will get these poems in Hindi and English both. Your views, experiences and opinions are welcome!   
क्या फर्क पड़ता है!
सीना  सपाट हो या उभरा
चेहरा सलोना हो या बिगड़ा
सर घनबाल हो या गंजा!
ज़िन्दगी से सुंदर, गुदाज़
और यौवनमय
नहीं है कुछ भी।
आओ, मनाओ, जश्न इस यौवन का
 जश्न इस जीवन का! 

Thursday, May 1, 2014

5 कविताएं- "लमही" से

"लमही" के अप्रैल, 2014 के अंक में प्रकाशित 5 कविताएं. आपके विचार आमंत्रित हैं.

1 मन पिऊ- मन पिऊ!   
आज मैंने चाहा था कि...
तुमसे बात करूं!
पूछूं, कि क्‍या सचमुच तुम थाम लोगे
मेरी गिरती बांहों, उठती सांसों
और चढ़ती आंखों को
बांध दोगे इन्‍हें राग के अनछुए घेरों में
और छू लोगे मेरा माथा अपने होठों से
’पुच्‍च’ की तरंगित ध्‍वनि के साथ!

आज मैंने चाहा था कि
तुम्‍हारे कन्‍धे पर अपना सिर टिकाकर
थाम लूं तुम्‍हारी हथेली!
एक-एक उंगली की एक-एक पोर को
सहलाते हुए
पूछूं – धड़कन बढ़ी क्‍या?
सांसें चढ़ी क्‍या?
तन जिया क्‍या?

मन पिऊ पिऊ बोला क्या?###

2 मेरा शहर 
 यह मेरा शहर है छोटा सा
गांव से कटा, कस्‍बे से सटा
बड़े शहर से फटा- हटा
गुड्डी बकाट्टा सा मेरा शहर!

बड़े शहर की धूल से लुटता मेरा यह छोटा सा शहर
गांव-कस्‍बे की धूल से पगलाता मेरा यह छोटा सा शहर
धुर्र बादल के घने नाते-रिश्‍ते
अरे लो! धंस गई घर की दीवाल
सूखे, दरके खेतों के भीतर- नींव बनकर नई इमारत की!
बनेगी, तो देखअना, कैसे चमकेगी, कैसे दमकेगी!
भूल जाओगे,
यहां कभी था तुम्हारा खेत या छोटी सी दुकान!
बड़ा शहर आता है बुलडोजर बनकर
पाटकर दरकी दीवाल और खेत
बना देता है समतल
बो देता है उनमें
नया टीवी, नए मोबाइल, नया सोफा, नया आईना!
और इन्‍टरनेट का एकांझ बीज।
बड़ा शहर खोलता है मुंह- हंसने के लिए
समा जाते हैं उसमें गांव-कस्‍बे
जाने कब और कैसे!
दूध-लस्‍सी की सिट्ठी तले बहकर चाय-कोला
मेरा यह छोटा सा शहर
जब कभी जगता भी है ऊंनींदा सा,
रुंआसा सा तो
उसे दे दी जाती है
पान की दुकान में फंसी दारू की पाउच-
पुचकार कर- पुच्च पुच्च!
निमंत्रित करता है दिन-
आओ, आओ! गराड़ा करो, पान खाओ,
और भूल जाओ
कि भोला सा यह देश हमारा है,
यह छोटा सा शहर हमारा है
यह खोया सा सपना हमारा है।
मेरे इस छोटे से शहर में
हर साल आती है विकास की आंधी
रोप जाती है कुछ बड़े-बड़े उत्‍पादों
के पोस्‍टरों विशालकाय पेड़
बन जाते हैं विकास की आंधी तले
बिजली, पानी, अस्‍पताल, स्‍कूल – इतिहास के पन्‍ने।
बजट में विकास है,
विकास में निकास है,
निकास के पैरों तले, भरे गले रूंध जाता है
मेरा यह छोटा सा शहर,
न गांव बचा पाता है उसे
न कस्‍बा!
दरअसल वो खुद ही हो जाते हैं
प्रागैतिहासिक काल की गाथा
मेरा यह छोटा सा शहर तो अभी भी  
इतिहास में ही दफन है। ###

3 मैं - भूरी माटी सी!
यह मैं ही हूं
अपनी मादक गन्‍ध
और सुरभित हवा के संग
अपनी बातों के खटमिठ रस
और तरंगित देह-लय के संग
यह मैं ही हूं
फैले आसमान की चौड़ी बांहों की तरह
यह मैं ही हूं
कभी हरी तो कभी दरकी धरती की
भूरी माटी की तरह।

समय ने छेड़ी है एक नई तान
देह मे दिये हैं अनगिन विरहा गान
मन की सीप में बंद हैं
कई बून्‍द- स्वाति के!
सबको समेटने और सहेजने को आतुर,
व्‍याकुल, उत्‍सुक
यह मैं ही हूं ना!
----

4 लड़की! 
मत निकलो हद से बाहर।
देवियों की पूजा वाला है यह देश!
बनती है बड़ी-बड़ी मूर्तियां, देवी की!
सुंदर मुंह, बड़े-बड़े वक्ष और
मटर के दाने जैसे उनके निप्‍पल
भरे-भरे नितंब और  
जांघों के मध्‍य सुडौल चिकनाई
उसके बाद ओढ़ा देते हैं
लाल-पीली साड़ी
गाते हैं भजन-सिर हिला के, देह झुमा के.
लड़की!
तुम भी बड़ी होती हो
इन्‍हीं आकारों-प्रकारों के बीच,
दिल्‍ली हो कि बे- दिल
तुम हो एक मूर्ति महज
गढ़ते हुए देखेंगे तुम्‍हारी एक-एक रेघ
फिर नोचेंगे, खाएंगे
रोओगी तो तुम्‍ही दागी जाओगी –
क्‍यों निकली घर से बाहर?
क्‍यों पहले तंग कपड़े?
क्‍यों रखा मोबाइल?
लड़की!
बनी रही देवी की मूर्ति भर
मूर्ति कभी आवाज नहीं करती
बस गढती रहती है- वक्ष, निप्पल, ज़ंघाएं!
होती रहती है दग्‍ध-विदग्‍ध, चलता रहता है भोग-विलास
जगराता, अन्धियाता!
नहीं कह पाती कि आ रही है उसे शर्म
हो रही है वह असहज
अपने वक्ष और नितंब पर
उनकी उंगलियां फिरते-पाते
किसी का कोई भी धर्म यहां नहीं होता आहत।
कि हताहत
सुघड़ता के नाम पर
यह कैसा बलात्‍कार? ####


5. उगते रहे कनेर! 
तुम्‍हारी आंखों की पुतली
में उगते रहे पीले कनेर
लाल अड़हुल, चंपई हरसिंगार!
आंखों के कोनो से आती रही
मॉलश्री की भीनी-भीनी खुशबू,
जब
इन आंखों को ओढ़ लिया मैंने
अपने होठों पर
तो
इन्‍हीं आंखों की पुतली
चमक उठी मेरे माथे पर
बनकर बिंदिया –
बड़ी-बड़ी,
लाल-लाल
गोल-गोल।
(-----)