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Sunday, April 12, 2020

पुरानी कहानी नया पाठ- फणीश्वरनाथ रेणु



तो ये रही फणीश्वरनाथ रेणु की कथा "पुरानी कहानी नया पाठ"- 'बोले विभा' के तहत #यूट्यूबलाइव पर। आपकी राय, टिप्पणियों की प्रतीक्षा है। कल 11 अप्रैल था- #फणीश्वरनाथरेणु जी की #पुण्यतिथि। उनको स्मरण करते हुए आज यह कहानी।

आप सब जानते हैं, यह रेणु जन्मशती वर्ष है। फेसबुक पर कवि, पत्रकार विमल कुमार ने एक पेज बनाया है- मैला आँचल। सभी के लिए ओपें है। इसमें आप रेणु जी से संबन्धित बातें, लेख, कथा, कहानी आदि शेयर भी कर सकते हैं।

यह कहानी हमारे समय का फिर-फिर पुनरपाठ है। बाढ़, सूखा, आंधी, तूफान, भूकंप- ये सब प्राकृतिक आपदाओं से हम हमेशा घिरे रहते हैं। होता क्या है! जानकी वल्लभ शास्त्री के शब्दों में कहें तो

ऊपर ऊपर ही पीते हैं जो पीनेवाले होते हैं,
कहते ऐसे ही जीते हैं, जो जीनेवाले होते हैं।

कथा का थेयट्रीकल आनंद लेने के लिए इस वीडियो को पूरा देखिए। आपकी राय, टिप्पणी बहत मायनेपरक है हमारे लिए।

Friday, November 1, 2019

कहानी- पकिया भूत

पकिया भूत। यह कहानी जनज्वार में छपी थी। आप सबकी नजर। इस कहनीं पर सुप्रसिद्ध कवि व पत्रकार विमल कुमार की टिप्पणी बहुत खास है, जो यहां है-

"बहुमुखी प्रतिभा की धनी विभा रानी केवल कहानियां ही नही लिखती वह अच्छी कविताएँ भी लिखती है तथा नाट्य लेखन में भी सक्रिय है।इसके अलावा वह एक रंगकर्मी भी है।हिन्दी और मैथिली में समान रूप से सृजनरत है और गत दो दशकों में राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अपनी पहचान भी बनाई हैं।पिछले दिनों भोपाल में उनके कहानी पाठ ने मेरा ध्यान खींचा ।आज उनकी एक कहानी पकिया भूत यहाँ पेश की जा रही है जो एक भूत की सामान्य कथा न होकर यौन शोषण की कहानी है।यह एक me too अनुभव है जिसे बहुत ही कलात्मक तरीके से संकेतों में उन्होंने प्रस्तुत किया है।भूत की कथा कहते हुए वह समाज की भयावह सच्चाई की कहानी कहती हैं जहां हर जगह भेजिये बैठे है और वे आसपास ही हैं।इस कहानी में स्त्री का विरोध उतना मुखकर भले न हो पर उसका प्रतीकात्मक प्रतिवाद को करती है शिक्षिका के घर से सुबह निकल कर ।आइए पढ़ते है विभा की कहानी ।"

जनज्वार का लिंक भी यहां है-
विभा रानी की कहानी ‘पकिया भूत’ - http://janjwar.com/post/famous-theatre-artist-vibha-rani-kahani-pakiya-bhoot-for-janjwar

और अब रही यह कहानी। आपकी राय बहुत महत्वपूर्ण है-


पकिया भूत

  • विभा रानी 

उसने कभी भूत को नहीं देखा था लेकिन भूतों के बारे में सुना जरूर था। उसने कई भुतहा कहानियां पढ़ी भी थी और भुतहा हिन्दी फिल्में भी देखी थी। इन फिल्मों से उसका जेनरल नॉलेज काफी बढ़ा था। उसे पता चला था कि लड़कियां अगर भूत होती हैं तो वह सफेद कपड़े में रहती हैं और भूत होकर भी काफी कमनीय और खूबसूरत होती हैं, जबकि आदमी अगर भूत होते हैं तो वे काले लिबास में रहते हैं और भयानक, काले और खूंखार होते हैं। भूतों के इन तथ्यों के साथ-साथ उसके आस पड़ोस में भी भूत प्रेत चढ़ने और उसे झाड़ने - उतारने के ढेर सारे किस्से थे, जिनमें से कुछ उसने खुद भी देखे थे।

उसके घर के बगल में एक नई बहुरिया आई थी। कहते हैं कि उसका आदमी उसे बहुत प्यार करता था। लेकिन, वह अपने बाप के साथ ट्रक पर महीने में 28 दिन रहता था और एक-दो दिन के लिए बाप के साथ ही घर लौटता था। घर एक ही कमरे का था, जिसमें उसका बाप एक दिन खुद सोता और दूसरे दिन कमरा बेटे को दे देता। तब बाप मोहल्ले में किसी के दालान की चौकी पर सो जाता और उसकी मां कमरे के सामने के ओसारे पर। लेकिन तब वह रात भर जागती बडबडाती रहती । भगवान जाने, इस बडबडाने की वजह से या किसी और वजह से, कमरे में अलबत्त शांति पसरी पड़ी रहती।

कुछ दिनों बाद पता चला कि उस बहुरिया पर भूत आया है और बार-बार आता रहता है। झाड़-फूंक के लिए ओझा- गुनी को बुलाया गया। नीम के पत्तों की झाड़ू बनाकर उससे बहुरिया को झाड़ा गया और उस पर मुट्ठी- मुट्ठी करके कई मुट्ठी मिर्च झोंकी गई । खुले बाल और इधर उधर अटकते भटकते कपड़ों के साथ झूमती बहुरिया को मिर्ची लगती या नहीं मालूम नहीं, लेकिन हैरानी की बात होती कि वह मिर्च किसी को भी नहीं लगती। ओझा विजय भाव से सभी को देखता और कहता, “देखो कैसी जबरिया भूतनी है। मिर्च की झाँस को भी खा कर पचा जाती है। किसी को सूंघने तक नहीं देती।”   

संसार का कोई भी विषय हो, उसकी तमाम जानकारी का स्रोत उसकी मां हुआ करती थी और उससे भी अगर मन नहीं भरता तो वह दादी के पास चली जाया करती । भूतों के बारे में उसने मां से पूछा कि क्या सचमुच में भूत होते हैं? पढ़ी-लिखी मां ने कहा कि भूत मन का वहम है। असल में, अपने ही मन में भूत होते हैं । दादी ने कहा कि किसी की आत्मा जब मोक्ष नहीं पाती है तो वह प्रेत और भूत में बदल जाती है । दादी ने यह भी कहा कि भूत भी अच्छे और बुरे होते हैं । प्रमाण में दादी ने बताया कि उनके अपने ही ऊपर उनके खेत में काम करनेवाले जीतन भगत का भूत आता रहता था । जीतन भगत जब भी खेत में कुछ गड़बड़ी होते देखता तो वह उनपर आ जाता और बताता कि फलाने- फलाने लोग फलाने-फलाने गड़बड़ करनेवाले हैं। घर के लोग सजग हो जाते, साथ ही उनके खेत में काम करनेवाले भी। बल्कि, कईयों ने वहां काम करना इसलिए बंद कर दिया कि भूत ने उन्हें चोर और बेईमान ठहरा दिया। 

वह शहर में थी और अपनी पढ़ाई कर रही थी। उसे भूतों की कहानियां दिलचस्प और रोमांचक लगतीं, लेकिन इसके बावजूद उसका मन नहीं मानता कि कोई भूत प्रेत होता भी है। एकबार बचपन में उसे लगा था कि कोई एक भूत उसके पास आया है और अपने लम्बे साए से उसे सर से पाँव तक ढंककर चला गया है । वह बेहद डर गयी, मगर उसने भूत के इस साए के बारे में जानने के लिए माँ या दादी से नहीं पूछा । फिर उसे लगने लगा कि उसके आसपास ढेर सारे भूत हैं। अब वह सपनों में भी भूतों को देखती और डर के मारे पसीने-पसीने हो जाती। 

उसे वे सब भूत हकीकत में नजर आते । वह देखती कि उनमें से एक भूत उसके आंगन में आता है और बेहयाई से उसको मुसकुराकर देखते हुए उससे भर लोटा, भर ग्लास पानी मांगकर पीता है । उसको जबतक वह देखती, समझती, तबतक देखती कि एक दूसरा भूत आता है, उससे चाय की फरमाइश करता है । जबतक वह उसके लिए चाय लेकर जाती है, तबतक वह देखती कि कोई तीसरा भूत उसके बाबूजी के पास बैठता है और चाय और पान के साथ-साथ चूरा का भुजा और प्याज के पकोड़े का नाश्ता छककर करता है और बाउजी से बोलता है, "अब ई बड़ी हो गई है। बियाह कहिया कीजिएगा?" ऐसा बोलते हुए वह बोल तो बाउजी से रहा होता, लेकिन कनडेरिए आँख से वह उसी की ओर देख रहा होता। फ़ाइल में उलझे बाउजी सरल भाव से कह देते कि "अभी तो वह पढ़ाई कर रही है।" 

उसका मन करता कि वह मां से पूछे कि भूत क्या जमीन पर असली आदमी के रूप में रहते हैं ? लेकिन वह डर जाती। उसे लगता, उसकी इस बात पर कहीं मां नाराज ना हो जाए, बाबूजी उसे थप्पड़ न मार बैठे और पास पड़ोस के लोग कहीं उसे चिढ़ाने ना लगे। दादी अब रही नहीं थीं, जिनकी कमी वह शिद्दत से महसूस करती. 

अब वह डरने लगी। डर से सिकुड़ने लगी। इतना कि उम्र के साथ-साथ उसकी देह तो लंबी  होने लगी, लेकिन उसपर उम्र चढ़ने के लक्षण कहीं से भी नजर नहीं आते। वह सूखे डंडे या लंबे बांस की तरह दिखती, जिसपर लगता, कपड़े का एक खोल चढ़ा दिया गया है। 

उसने दादी के मुंह से सुना था कि भूतों को भगाने के लिए हर शनिवार को काले कपड़े पहनकर सरसों के तेल और काले तिल से शनि की पूजा करनी चाहिए । इससे शनि महाराज भी प्रसन्न रहते हैं और भूत प्रेत का साया भी दूर रहता है । उसके घर में काले और सफेद कपड़े पहनने की सख्त मनाही थी। सफेद में केवल बाबूजी और भैया सफेद गंजी पहनते थे और मां सफेद ब्रा। पेटीकोट भी एक आध उनके पास सफेद थे और रंगीन पेटीकोट पर ख़ुद हाथ से बुनी क्रोशिए से बनी हुई सफेद लेस। इसके अलावा उस घर में कोई भी सफेद चीज नहीं पहनी जाती। हां बाबूजी की धोती अलबत्ता सफेद होती। काले कपड़े तो शनि के आगमन की तरह अशुभ और गुनहगार सरीखे थे।

उसने बड़ी जिद करके एक काले रंग की सलवार कमीज सिलवाई, जिसे वह सबसे छुपकर अहले सुबह शनिवार के दिन पहनती और शनि महाराज के नाम पर बगल में खड़े पीपल के पेड़ के पास काला तिल और सरसों का तेल चढ़ाकर झट से आ जाती और अपने सामान्य कपड़े पहन लेती। लेकिन इन सबके बाद भी भूतों से उसका पीछा नहीं छूटा। वह जहां जाती, भूत उसके पीछे लगे रहते। वह अपनी सहेलियों से पूछती कि भूत क्या सचमुच में आम आदमी, लड़कों की तरह दिखते हैं ? सहेलियां उसकी बेवकूफी पर हंसते हंसते लोटपोट हो जाती। वे सब कहती कि भूत जिंदा नहीं, केवल मरा हुआ होता है । मरे हुए लोग ही भूत बन जाते हैं। वह उन मरे हुए लोगों के भूतों को देखने की इच्छा प्रकट करती। सहेलियां फिर से हंस हंस कर लोटपोट हो जाती । उसकी समझ में नहीं आता कि इसमें ऐसे लोटपोट होकर हंसने की क्या बात है। 

एक दिन एक सहेली ने उससे अपने रहस्य का खुलासा किया कि उसने कल भूत देखा। सहेली ने बताया कि वह हॉस्टल में रहती है और हॉस्टल में एक रात जब वह फारिग होने के लिए बाहर निकली तो उसने देखा कि सामने एक कोई सफेद सी आकृति खड़ी है। डर के मारे पहले तो उसके पैर वहीं के वहीं जम गए। फिर उसने हिम्मत करके आवाज़ लगाई- "कौन है?" उसके बोलने पर  वह आकृति गायब हो गई । सहेली डर के मारे बगैर फारिग हुए ही अपने कमरे में लौट आई और चादर के नीचे खुद को छुपा लिया। वह लगातार सोने की कोशिश करने लगी । नींद आई कि नहीं आई, उसे भी नहीं पता चला। 

उसके मन में अब भूत को देखने की इच्छा बलवती होने लगी। ऐसा भूत, जो परछाई सा आता- जाता और हिलता -डोलता है, लेकिन बोलने या टोकने पर गायब हो जाता है। उसकी सहेली दूसरी बार फिर हॉस्टल से आई और उसने फिर से बताया कि उसने इस बार भी भूत को देखा । उसके हॉस्टल के कॉमन बाथरूम उसके कमरे से काफी दूर हैं, इसलिए वह वहां न जाकर छत पर चली जाती है फारिग होने के लिए। इसबार भी जब वह छत पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ने लगी और सीढ़ियां चढ़कर छत पर पहुंची तो उसे छत की मुंडेर पर सफेद कपड़े में बैठी हुई एक पुरुष आकृति दिखी। उसकी पीठ सहेली की तरफ थी और पैर छत की मुंडेर की दूसरी तरफ लटके हुए थे। सहेली टॉर्च लेकर गई थी। सचमुच में कोई आकृति है या उसके मन का वहम, इसकी पुष्टि के लिए उसने टॉर्च की रोशनी उस आकृति पर फेंकी । सहेली ने बताया कि टॉर्च की रोशनी जिस तरफ जाती, आकृति उसके दूसरी ओर खिसक जाती और इस तरीके से उसके टॉर्च के उल्टा दाएं-बाएं होने लगती। सहेली फिर डर गई और बगैर फारिग हुए अपने कमरे में आकर चादर में घुसकर पैर समेटकर सो गई। 

स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई करते हुए आगे की पढ़ाई के लिए इसबार उसे हॉस्टल जाना पड़ा । हालांकि घरवाले तैयार नहीं थे. काफी जद्दोजहद के बाद उसे दूसरे शहर में पढ़ने के लिए भेज दिया गया. वहां के हॉस्टल में भी उसे जगह मिल गई. हर हॉस्टल के आम नियम की तरह एक लोकल गार्जियन होना चाहिए. उसके लिए भी एक लोकल गार्जियन तलाश दिया गया. वह लोकल गार्जियन उसके अपने शहर में पढ़ानेवाली टीचर थी- खूबसूरत, उदार और मिलनसार. टीचर के काम करने से अब उनका घर डबल इनकम ग्रुपवाला हो गया था. वे अब किराए के मकान से निकलकर अपने नए बनाए मकान में आ गई थी. शहर पुराना था, इसलिए पुराने शहर में बननेवाले मकानों के ढर्रे का ही यह मकान भी था, जिसमें अटैच्ड बाथरूम जैसी कोई अवधारणा नहीं थी. वह अपनी लोकल गार्डियन के यहां दिन में कभी-कभी चली जाती, जहां उसे परवल का भरवा और कटहल की खूब तेल-मसालेवाली सब्जी खाने को मिलती. हॉस्टल के खाने से ऊबा हुआ मन ऐसे समृद्ध खाने से तृप्त हो जाता और वहां जल्दी-जल्दी जाने को करता. शिक्षिका बहुत उदार थी और उसे बहुत प्यार करती थी. शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उनकी नौकरी लगवाने में उसकी अपनी शिक्षिका मां की थोड़ी बहुत भूमिका थी.

एक दिन शिक्षिका ने उससे कहा कि आद्रा नक्षत्र चढ़ा हुआ है. वह शाम में वह दाल भरी पूरी, खीर और आलू परवल का दम बनाएगी और साथ में मालदा आम. इसलिए वह शाम में ही आ जाए. उसने कहा कि हॉस्टल लड़कियों के लिए शाम 7:00 बजे के बाद बंद हो जाता है. शिक्षिका ने कहा, कोई बात नहीं. वह रात में उसके घर ठहर जाए और दूसरे दिन सुबह खा पीकर दोपहर या शाम तक हॉस्टल लौट जाए. शिक्षिका की सुंदर शक्ल और बढ़िया खाना उसे अच्छा लगता था और इस लालच में वह उस दिन शनिवार की शाम आद्रा नक्षत्र मनाने और दाल पूरी, आलू परवल का दम, खीर और मालदा आम का भोग लगाने चली गई. शिक्षिका के साथ उसने उस दिन खूब हंसी मजाक किया. उसके दो छोटे बच्चे भी थे, जो उसे दीदी कहते थे. उनके साथ उसने लूडो खेला, गप्पें मारीं. रात हुई और शिक्षिका ने उसे उसका कमरा दिखा दिया. उसके बाद वह बच्चों को लेकर अपने कमरे में सोने चली गई.

नई जगह होने के कारण या पेट से ज्यादा खीर-पूरी खा लेने के कारण उसे काफी देर तक नींद नहीं आई. उसे  आद्रा नक्षत्र में माँ के हाथों की बनाई गई दाल भरी पूरी, खीर, सब्जी आदि के स्वाद याद आने लगे. अपने घर  की तंगी उसे पता थी. वह देखती कि उसके यहां दाल भरी पूरी में दाल कम मात्रा में भरी जाती और तवे पर नाम मात्र के तेल में सेंकी जाती. खीर में भी आधा पानी आधा दूध रहता. आलू -परवल के दम में तेल काफी कम तो रहता ही, आलू की मात्रा ज्यादा रहती.  इसलिए शिक्षिका के घर के तेल में तैरते रहनेवाली सब्जी और तेल में छानी गई पूरियों और पूरे दूध में बनाई गई खीर से उसका मन तृप्त हो गया था. धीरे-धीरे उसकी आंखें मुंदने लगी और वह आद्रा नक्षत्र की दाल भरी पूरी के स्वाद में खो गई. 

आद्रा नक्षत्र से निकलकर वह धीरे-धीरे किसी सपने में डूबती गई. उस सपने में उसे दूध की नदी दिखी, तेल का तालाब दिखा, पूरियों का पहाड़ दिखा और आम का मचान दिखा. वह उन सबके बीच तैरती, कूदती मन को हिलरानेवाला कोई गीत गाती जा रही थी. वह आम के बगीचे में बने मचान पर चढ़कर ‘आज मैं ऊपर, आसमाँ नीचे' जैसा कोई गीत गाने लगी. वहां से उसने ‘नदियों की ताल पर झूम रही ज़िंदगी, मांझी रे…’ गाते हुए दूध की नदी में छलांग लगाई फिर वह पूरी के पहाड़ से पूरियां निकालकर खाने लगी. तेल के तालाब से चंद बूंदे तेल लेकर सिर में मालिश करने लगी. उसने कहीं पढ़ा था कि रात में सोते समय ढीले कपडे पहनने चाहिए. उस दिन के बाद से सोते समय वह केवल नाइटी पहनती. सर की मालिश करते हुए कुछ बूंदे उसने और निकाली और नाइटी तनिक ऊपर उठाकर अपने दोनों पैरों में लगाकर पैरों की मालिश करने लगी कि अचानक वह सकते में आ गई. 

पूरी के पहाड़, तेल का तालाब, दूध की नदी और आम का अचार- सब गायब हो गए. उसके सामने कोई एक भूत खड़ा था, जो उसके पैरों की मालिश कर रहे उसके दोनों हाथों को हटाकर दोनों पैरों के बीच के हिस्से को अपनी मुट्ठी में भींचे जा रहा था. वह हड़बड़ाकर जगी. कमरे में अंधेरा था. लेकिन इस हड़बड़ाहट में उसने मसहरी में घुसे हुए और अपनी नाइटी के बीच में फंसे हुए हाथ को देख लिया था. उसके जगते ही वह हाथ तेजी से मसहरी के बाहर निकला और गायब हो गया. वह थरथरा उठी. उसकी नींद खुल गई. वह डर से कांपने लगी. अपनी धड़कन पर थोड़ा सा काबू पाकर उसने तकिए के पास रखे टॉर्च को टटोला. शहर छोटा था और लाइट गुल हुआ करती थी, इसलिए सभी अपने सिरहाने एक टॉर्च लेकर सोते थे. हिम्मत करके वह उठी और उस टॉर्च से उसने मसहरी के भीतर देखा. कहीं कुछ नहीं था- मच्छर और खटमल तक नहीं. वह मसहरी से बाहर आई. कमरे में टॉर्च जलाकर देखा. सारा दिन घर में दौड़ लगानेवाले चूहे भी अपने बिल में कहीं सोए पड़े थे. उसने थोड़ी और हिम्मत की और बाथरूम में भी टॉर्च जलाकर देखा. वहां उसे एकाध छिअप्किली और तेलाचात्ती नजर आए. चारो और भांय-भांय सन्नाटा शोर मचा रहा था. टीचर का कमरा बंद था और अन्दर से कोई भी आवाज नहीं आ रही थी. 

उसे समझ में नहीं आया कि यह सपना था या हकीकत. लेकिन उसे इस बात का एहसास हो गया कि यह हकीकत ही होगा, क्योंकि उसके जांघों के बीच बहुत तेज दर्द और नोचने की तकलीफ भरी हुई थी. उसे बाथरूम जाने की जरूरत थी, लेकिन हिम्मत नहीं कर सकी और वापस मसहरी में घुस गई. दादी ने उसे सिखाया था कि संकट पड़े तो हनुमान चालीसा पढ़ना. वह मन-ही-मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगी. इस बीच कब सुबह हो गयी, इसका पता उसे कौवे की कांव-कांव से चला. 

वह उठी और हॉस्टल जाने के लिए तैयार होने लगी. शिक्षिका के कमरे का दरवाजा खुला. वह अपने नए गाउन का बटन बंद करती हुई बाहर निकली और अलसाए स्वर में बोली- “आज तो इतवार है ना! इतनी जल्दी क्या है जाने की! अभी तो नाश्ता-पानी और दिन का खाना भी बाकी है. रहो. पुरी-जिलेबी मंगवाती हूँ नाश्ते के लिए. पुलाव बनाउंगी दिन में. शाम में प्याज के पकौड़े बनाउंगी. खा-पीकर फिर जाना. ये बड़ी रात लौटे. इनको खिलाते-पिलाते देर हो गई. अभी ये सोए हुए हैं. तुम्हारा इनसे परिचय नहीं हुआ है. जान पहचान करवा दूंगी तो जब कभी मैं नहीं भी रहूंगी तो तुम यहां आकर रह सकती हो, अंकल से बोल- बतिया सकती हो ।“

उसकी आंखों का भ्रम टूट गया था. वह समझ गई थी कि रात उसने सपना तो देखा था, लेकिन साथ में कुछ कुछ हक़ीकत भी देखा था. सुबह के नाश्ते, दिन के खाने और शाम के चाय-पकौड़े की योजना पर उसका ध्यान गया. एक झटके में उसने उनके यहाँ के तर मालवाले नाश्ते, खाने का लोभ त्यागा. शिक्षिका से उसने कुछ भी नहीं कहा. सिर्फ एक शब्द बोली- ‘भूत’ और  अपना बैग उठाकर निकल गई।

उसने तय किया कि अब वह अपनी सहेली को बताएगी कि उसने भी भूत देख लिया है-पकिया भूत! ###



Thursday, January 10, 2019

परिकथा पत्रिका के जनवरी-फरवरी, 2019 के अंक में प्रकाशित कहानी "चेन पुलर "

परिकथा पत्रिका के जनवरी-फरवरी, 2019 के अंक में प्रकाशित कहानी "चेन पुलर "। आप सबके लिए।
आपकी राय जाकर अच्छा लगेगा।


चेन पुलर
-विभा रानी

      "ऐ बापी! की कोरचिस? चोलो। शाम हो गिया है। काका राग कोरेंगे।"
      बापी की तन्द्रा टूटी। ट्रेन यार्ड में चली गयी थी। शाम का अन्धेरा घर-घर में दिया-बाती बनकर टिमटिमाने लगा था। इस टिमटिमाहट में माँ के प्यार की मूढ़ी-लाई और भूंजा पेट में चूहे की तरह और मुंह में लेमनचूस की तरह कुट-कुट करते रहते। मगर बाबा के हजार वाटवाले गुस्से के आगे वह रसोईघर में लगे धुएं से काले पड गए मरियल जीरो पावर का बल्ब होता चला जाता। थोड़ी ललछौंही शाम तक तो फुटबॉल खेलने का बहाना बनाया जा सकता था- फुटबॉल को बाबा की सबसे कमजोर नस को जान-पकड़कर। मोहनबागान बाबा की आन, बान, शान और जान है। कितने लोगों से उनकी मार पीट हो चुकी है मोहनबागान के पीछे। गालागाली तो आलू की तरह आम है।
      एकदम भोद्रो बंगाली परिवार है बापी का। माँ विशुद्ध बंगाली। तांत की साड़ी, शाखा पोला, भुवन मोहिनी सिन्दूर और उसी का बड़ा सा लाल टीका। यह उनके पूरे व्यक्तित्व को दुर्गा पूजा में पंडाल पर दुर्गा और लक्ष्मी के साथ-साथ बिठाई गई सरस्वती जैसा भव्य बनाता। एकदम शांत स्वर में मेही- मेही बोलना। नियम से सारे व्रत- त्यौहार करना। साल में एक बार गंगा सागर नहाने जाना। रोज दिन बाबा की फरमाइश के मुताबिक़ आज चिंगड़ी, कल रोहू, परसो भेटकी माछ पकाना। चीतल जिस दिन मिल गया, उस दिन माँ का भी चेहरा चमक जाता। गीली लकड़ी के धुंए के बीच भी माँ रोबिन्द्रो संगीत गाती माछ तलती रहती।
      बापी गोल-मटोल गब्दु बालक थे। माँ जैसे ही शांत और माँ जैसा ही उनके मन में न दिखनेवाला कुछ खौलता रहता। उसी के भीतर बापी के मन में छोटी छोटी इच्छाओं के कमल खिलते रहते- शुभ्रो कमल, रक्तो कमल। वह इच्छाओं के तालाब में छोटी-छोटी छोटी डुबकी लगाते रहते-  उभूक-चुभूक- डुप्प....! 
      माँ आवाज देती- "ऐ बापी। हिलिश माछ रान्ना कोरे छी तोमार जन्नो।"
      बापी हाथ-मुंह से माछ खाते रहते और दिमाग में उनके रेल चलती रहती। रेल की छुक- छुक हर साल गर्मी में उन्हें मिलती- गर्मी छुट्टी में मामा गाम जाने के समय। पूरे माल असबाब के साथ माँ और बापी मामा गाँव जाते। गांव के पोखरे में बापी चुभुक् चुभुक् नहाते। बंसी से मछली फंसाते।  आम, कटहल, लीची के भोग लगाते। बाबा के कड़े अनुशासन के बीच गर्मी छुट्टी की यह आज़ादी बापी को कड़ी धूप के बाद आषाढ़ के बादल और फ़ूनही की तरह लगती।
      इन सबके बीच बापी एक काम और करते- नियम से, रोजाना। बापी रोज स्टेशन जाते। जो ट्रेन वहां से चलनेवाली होती, उसमे बैठ जाते । ट्रेन को एक छोर से दूसरे छोर तक निहारते। डब्बे के कई कई चक्कर काटते। फिर एक जगह अपनी नज़र गड़ा देते।  
      वह जगह थी - ट्रेन की जंजीर। जंजीर का लाल हत्था और उसमे फंसी चेन और उसके नीचे लगे निर्देश- ये सब पीसी सरकार की जादू की तरह बापी को किसी सम्मोहक लोक में ले जाते। 
      गर्मी की गरम, लपलपाती लू की तरह बापी की दिल में ख्वाहिश की गरम हवा दहकती रहती और बापी उसमें बुखार तपे मरीज की मानिंद जलते रहते। ख्वाहिश की यह लौ थी - चेन पुल करने की। जब वह मामा गाँव जाते और लौटते, उन्हें अचानक कभी कभी ट्रेन रुकती दिखती। ट्रेन रुकती। लोग बाग़ नीचे उतरते। एक दूसरे से ट्रेन के रुकने की वजह पूछते और ट्रेन में फिर यह खबर महिलाओं- बच्चों, बूढ़ों, बीमारों तक पहुँच जाती- “चेन पुल कर दिया है कौनो। ....कोई जंजीर खींच दिया है।“ लोग खीझते- "अब घुस गए हैं न बिहार में। अब जगह-जगह चेन खिंचाता रहेगा। लोग तो अपना घर जेन्ने देखते हैं, वहीं पर खींच देते हैं । बस चलता तो घर के आगे तक ले जाते ट्रेन! इस्टेसन तक जाने का सबर कौन करे।"
      "माँ! चेन कैसे खींचते हैं?" बापी साध की असीमित तार में हिचक और भय की अनेकानेक गांठ लगाए माँ से पूछता रहता। 
      "आरे! ऊ लाल हैंडल लागा है ना! उसी को खींचते हैं। उसका नाता इंजिन से लागा रहता है। हर डिब्बे का सिग्नल ड्राईवर के पास रहता है। इससे उसको पता चल जाता है कि किस बॉगी से चेन पुल हुआ है।"
      "ड्राईवर को यह भी पता चल जाता है कि चेन किसने खींचा?"
      "नहीं रे। ई उसको कैसे पाता चलेगा? तू भी ना। एकदोम बोका तुमि तो...!" माँ स्नेह से उसका माथा चूम लेती।
      बापी सोचते रहते " तो ड्राईवर को पता नहीं चलेगा। वह आधी रात में चेन खींचेगा। सभी सोये रहेंगे। चेन खींचकर वह भी झट से चादर ओढ़ कर सो जाएगा। ड्राईवर आएगा। इधर-उधर देखेगा। पूछ-ताछ करेगा। वह तो सोया रहेगा। वैसे भी वह तो अभी बच्चा हैं। उनपर किसी को कोई संदेह भी नहीं होगा। वे चेन पुल करने की अपानी साध भी पूरी कर लेंगे और किसी को पता भी नहीं चलेगा।" 
      ट्रेन छुकछुकाती, सीटी बजाती भागती रहती। दिन भर के भागते खेत, जानवर, आम- इमली के पेड़, पुल आदि पार होते-होते रात के अंधेरे में गुम हो जाते। अब जहां कहीं बस्ती होती, वहाँ जल रहे बल्ब या दिया, लालटेन की टिम-टिम दिखती और फिर सबकुछ अंधेरे में डूब जाता। सोने के उपक्रम से पहले पेट-पूजा का उपक्रम होता। यात्रीगण ट्रेन में एक परिवार हो जाते। अपने-अपने घर का पूरी-पराठा निकालते। खाते, खिलाते। तब ऐसा अविश्वास नहीं जगा था। फिर सब अपनी-अपनी चादर बिछाते- ओढ़ते सो जाते। ट्रेन चलती रहती, यात्री झूलते हुए सोते रहते। धीरे धीरे डब्बे में खामोशी छा जाती। किसी किसी यात्री की नाक उस खामोशी को तोड़ती रहती। मगर बापी पूरी रात जागते रहते ।
      जब उन्हें लगता कि अब तो साँप भी रेंगकर नहीं आएगा, तब बापी सांप की तरह रेंगते हुए चेन तक पहुंचते। अरे! अभी तो उसके हाथ बहुत ही छोटे हैं। चेन का हैंडल तो बहुत ऊपर है।
      बापी को ख्याल आया, अभी तो वे दूसरी ही कक्षा में गए हैं। माने 6 या 7 साल के हुए। माँ भी उन्हें गोदी में बिठाकर चूमती रहती है। दादा को नहीं चूमती माँ अब। कहती है- "वह अब बड़ा हो गिया है।"
      भोद्रो बांगाली समाज का दवाब माँ और बाबा दोनों पर था। बच्चे कितना पढ़ेंगे, क्या पढ़ेंगे,यह सब बाबा तय करते, बल्कि समाज तय करता।
      लेकिन ट्रेन रोकने का? चेन पुल करने का? 
      बापी के सपने में ट्रेन हरहराती हुई निकल जाती। ट्रेन का काला इंजन और उससे छूटता क्विंटल क्विंटल धुआँ! बापी ज़िद करके खिड़कीवाली सीट पर बैठते। इंजन का धुंआ और कोयले की किर्च से उसका गोरा धप धप चेहरा करिया जाता। चेहरे पर हाथ फिराते तो हाथ में चलती ट्रेन से उड़ते कोयले की किरच भर जाती। हथेली काली हो जाती। गोद में कोयले के कण भर जाते। माँ डाँटती- "बापी! ऐई दिके बोशो। एकदम नुंगड़ा हो गिया है।" 
      बापी को माँ की हर बात सुनाई देती। लेकिन यह नहीं। बड़ा भाई तब छोटा था। मगर था तो बच्चा ही। वह भी खिड़कीवाली सीट पर बैठने को ठुनकता रहता। लेकिन बापी खिड़कीवाली सीट तभी छोड़ते, जब शाम गहरा जाती और आस पास कुछ भी दिखना बंद हो जाता।
      बाबा के डर से बापी कभी भी अपने यहाँ के स्टेशन पर नहीं जाते। मगर मामा गाँव के स्टेशन पर नियम से। बोस बाबू डॉक्टर का भांजा है वह। सभी उसे पहचनाते। प्लेटफॉर्म पर झाल मुड़ी से लेकर खीरा नारंगी बेचनेवाले सभी उसे प्यार करते। स्टेशन मास्टर भी उसे पहचान गए थे। ट्रेन के ड्राईवर और टीसी भी। 
      बापी का मन करता कि वे उन सबसे ही कहे कि वह चेन खींचना चाहता है। देखना चाहता है कि चेन खिंचने से गाडी कैसे रुकती है? ट्रेन रुकने के बाद क्या होता है? हालाँकि इसका अनुभव उसे मिला हुआ है, लेकिन उसे वह अपने से जीना चाहता है- खुद चेन खींचकर ट्रेन रोकना। 
      "तो खींच ना बापी। कौन तुमको रोकता है? एक तो तू ठहरा बच्चा। उसपर से बोस बाबू डॉक्टर का भांजा। खींच भी देगा तो भी कोई तुमको कुछ नहीं बोलेगा। या तो बच्चा कहकर टाल जायेंगे या बोस बाबू डॉक्टर के भांजे के नाते बच निकलोगे। ज्यादा से ज्यादा बोस बाबू अपनी बहन को बोलेंगे और बहन यानी बापी की माँ उसे डांटेगी। बाबा से बोलने की हिम्मत वो भी नहीं करेंगी, क्योंकि तब माँ का मामा घर जाना बंद हो जाएगा।"
      "चल बापी, चल। रोक ले। ...." मगर यह नहीं हो सका। बापी के हाथ उम्र के साथ-साथ बढ़ते गए और अब उन हाथों में संगीत के साज आ गए। ढोल, मृदंग, तबला, की-बोर्ड। अब वे रोज नई धुन बनाते। नए साज एक्सप्लोर करते। उनका अपना स्टूडियो हो गया है। उनका अपना ग्रुप बन गया है। बीस पचीस लोग उनकी टीम में काम करते हैं। 
      मगर ट्रेन अभी भी बापी के कानों में छुक छुक बजती है। उसकी सीटी से बापी अभी भी किसी जंगल की आग में खो जाते हैं। उनके मन में इच्छा की कामना अभी भी जल रही है- ट्रेन का चेन पुल करने की इच्छा। 
      बापी सपने में देखते हैं- नन्हे नन्हे उनके हाथ चेन की ओर बढ़ते हैं। वे हैंडल पकड़ते हैं। उसे खींचने की कोशिश करते हैं। 
      "माँ! चेन खींचने में बहुत मेहनत लगती है?"
      "हां। इत्ती बड़ी ट्रेन रोकने में मेहनत तो लगेगी ही।"
      "तो उसको बिजली से क्यों नहीं जोड़ देते? हैंडल ऑन, ट्रेन रुक गयी। ऑफ़ तो ट्रेन चल पडी।"
      "पागोल तुमि तो।" माँ दुलार से उसका माथा सहला देती।
      बापी के मन में चेन खींचने की इच्छा जोर मारती जा रही थी। वे कई बार यार्ड में भी चले  गए। सभी ट्रेन में घूम आए। सभी बॉगी में बैठ बैठ कर लौट आए। वे हर ट्रेन में बैठते। चेन को निहारते। अपने दोनों हाथ बढ़ाते। तय कर लेते कि अब तो वे चेन पुल कर ही देंगे। चेन तक उनके हाथ पहुंचते- नन्हें से बड़े होते हाथ! अब तो बालपनवाली बुद्धि भी नहीं है। बड़े, जिम्मेदार, समझदार और पता नहीं, क्या-क्या हो गए हैं। मगर चेन खींचने की हिरिस अभी तक नहीं गई है।
      .....आज तो बापी ने तय कर लिया है। मन को वे समझा भी रहे हैं- ट्रेन यार्ड में है। रुकी हुई ट्रेन है। चेन खींचने से किसी का नुकसान थोड़े न होगा। ...लेकिन, चेन तक हाथ जाते- जाते बापी पसीने से भीग जाते। हाथ थरथराने लगते। कलेजा धौंकनी की तरह धक् धक् करने लगता। गोरा चेहरा बुखार की तरह तपने लगता। आँखें लाल हो जातीं। गला सूख जाता। 
      माँ ने बताया था, बिना वजह चेन खींचना अपराध है। पुलिस आती है। खींचनेवाले को पकड़कर ले जाती है। उसे जुर्माना भरना होता है। जुर्माना और दंडनीय अपराध  की बात तो वह चेन के नीचे लिखे निर्देश में पढ़ चुके हैं। हर बार पढ़ते हैं। अब तो उन्हें सारे निर्देश कंठस्थ भी हो गए हैं।  
      लेकिन, यार्ड में या स्टेशन पर खड़ी ट्रेन की चेन खींचने से तो यह अपराध नहीं कहलाएगा न!"
बापी अपने मन को समझाते। दूसरे दिन वह पूरे जोर शोर से चेन खींचने की योजना बनाते- “आज! बस आज! आज तो मामला इस पार या उस पार! 
      "बापी! किसी ने देख लिया तो?" मामा जी की कितनी भद्द मचेगी। और बाबा तो अगले साल से तुमलोगों को आने ही नहीं देंगे।"
      "लेकिन इससे किसी का नुकसान थोड़े ही होनेवाला है?" 
      "होगा। तुम्हारे भद्र समाज का।"
      बापी के बढे हाथ पीछे हो जाते। उनका परिवार भद्र बंगाली परिवार माना जाता है। बंगाली समाज ही भद्र माना जाता रहा है- आम तौर पर। ऐसे में...उसके काम से उसके परिवार और समाज की मर्यादा भंग हो जाएगी। बाबा का गुस्सा किस आसमान पर जाकर कौन सी बिजली या बादल गिराएगा, यह बापी को पता तो नहीं था, मगर आशंका ज़रूर थी।
      लेकिन बापी क्या करे! चेन खींचने की अदम्य लालसा की डोरी अब मजबूत रस्सी बनकर उसके मन में गाँठ पर गाँठ बनाती जा रही थी। 
      मधुबनी, दरभंगा, पटना करते हुए बापी मुम्बई आ गए हैं। मगर बचपन की हिरिस अभी तक मन के जंगल में एक कोना बनाकर बैठी हुई है। मुम्बई का शहरी जंगल उन्हें जब-तब आतंकित करता है और वे उससे निजात पाने बार बार घर भाग जाते है- टिकट है या नहीं, इसकी परवाह किये बगैर! कई बार जनरल डिब्बे में बैठे हैं। पुलिसवालों का डंडा खाते- खाते बचे हैं। शायद चेहरे पर पसरी बंगाली भद्रता और पुलिस को देखते ही एक भय के चेहरे पर रेंग जाने के कारण । पुलिस चली जाती। उनके चेहरे जा भय दूर हो जाता। मगर भद्रता कायम रहती। इस भद्रता में उन्हें जगह भी मिल जाती और अन्य यात्रियों की गठरियों के पूरी- पराठे भी। घर पहुँचने पर माँ की गोद और हिलिस माछ रस्ते के उनके सारे कष्ट भुला देते। माँ का रोबीन्द्रो संगीत अब भी चलता रहता। पीसी का बाउल गान अब भी बापी के कंठ में जागता और कानों में मिष्टि दोई की तरह घुलता रहता। 
      मगर मन का यह कष्ट अभी तक बापी को मथे हुए था- चार से चौवालीस की उम्र की यात्रा पार कर आए और अभी तक एक छोटी सी इच्छा पूरी नहीं कर पाए हैं- ट्रेन की चेन खींचने की इच्छा। उन्हें विद्यापति की लाइन भी याद हो आती- “कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ...!"
      कम पैसे हों या ज्यादा दूर जाना हो, मुम्बई की लोकल से बेहतर और कोई सवारी नहीं। बापी मीटिंग के लिए चर्चगेट जाते। लौटते में ट्रेन में बैठते। बैठते ही नज़र चेन पर जाती और बचपन से मन में पोसाती साध सांप की तरह फन उठाने लगती। बापी समय देखते। अभी डेढ़ मिनट है ट्रेन खुलने में- "क्यों न एक बार चेन पुल कर ही दिया जाए!"
      लेकिन, घर जाने को बेताब लोकल के दरवाजे के बाहर तक झूलते- लटकते यात्रीगण! उसे खा नही जाएंगे? बापी! जान की सलामती चाहता है कि नहीं?"
      "अंधेरीवाले में। अंधेरी लोकल तो यहीं टर्मिनेट होती है।" 
      लेकिन, ट्रेन रुकते ही सारे यात्री बंधे हुए सुअरबाड़े में से निकलते हैं और फिर प्लेटफॉर्म पर पसर जाते हैं। अगली यात्रा के लिए तैयार यात्री किसी शिकारी की तरह लपकते हैं सीट पाने के लिए। बापी इस धक्का-मुक्की से बचते हुए दरवाजे की दीवार से एकदम सटकर खड़े हो जाते हैं- पूरी देह सिकोड़ कर और पेट पिचकाकर, ताकि यात्रियों का रेला दूध के धार की तरह अजस्र बहे और अपनी-अपनी जगह जाकर स्थिर हो जाए।  
      ऐसे में बापी अगर ट्रेन में ही बैठे रहे तो लोगों को शक नहीं होगा?  पुलिस तो ऐसे ही सूँघती रहती है। अब पहलेवाला ज़माना थोड़े न रहा है। आतंकवादी अब आतंकवादी है या नहीं, यह तो किसी को नहीं पता, मगर हर कोई आतंकवादी है, अगर तनिक भी ऐसी-वैसी हरकत हुई तो! पुलिसवालों की आँखें तो कहते हैं, समंदर की सात परत तक बेध लेती है। ऐसे में उनके मन की भाँपकर अगर उसने कुछ पूछ ही दिया। चलो, बैठे हुए में नहीं पूछे। पुलिस को देखते ही वह आँखे मूँद ले। पुलिस को लगेगा कि वह सो रहा है। ट्रेन रुक गयी और उसे अभी तक पता ही नहीं चला। पुलिस उसे उठाकर चली जाएगी। 
      पुलिस के जाते ही वे फिर से आँखें खोलेंगे। चौकन्नी नजरों से एकाध बार इधर उधर देखेंगे  और तपाक से चेन पकड़ कर खींच देंगे। अब वह बच्चा तो है नहीं कि उनके हाथों में ताकत नहीं। पूरे  मर्द हैं मर्द। ताकतवर मर्द। अब तो उनकी हथेली का भी जोरदार थप्पड़ किसी को पड़ सकता है। मजबूत कलाई के मालिक हैं वे।  
      लेकिन अगर पुलिस इसी समय लौट आई तो? तनिक दयालु हो गया तो? सोचा हो कि यह पैसेंजर कहीं ट्रेन के साथ यार्ड या वापस चर्चगेट या सीएसटी न पहुँच जाए। ...या वह चेन पुल कर रहा होगा और पुलिस अपनी भलमनसाहत में उधर आ जाए और उसे चेन खींचते देख ले!..... या पुलिस को कोई शक ही हो जाए और उसी शक में वह आधे गश्त से ही लौटकर आए और उसे चेन खींचते देख ले! क्या वह उसकी बचपन की इस इच्छा और उसकी पूर्ति की इस कथा पर विश्वास करेगी? फिर तो पुलिस की गाली, उसकी सवालिया और शक भरी नज़र? ऐसे में किसी परिचित ने देख लिया तो? 
      बापी फिर से पसीने पसीने हो उठे। कलेजा धौंकनी की तरह धक् धक् करने लगा। चेहरा डर और शर्म के मिले जुले भाव से लाल हो उठा। 
      उफ्फ्फ! माँ- बाप की शिक्षा कभी कभी कैसे रस्ते में रोड़े अटकाती है! उनका भद्र मानुस होना! उनका भद्र समाज का होना! इस भद्रपन की दुनिया में उनकी ऐसी छोटी- छोटी इच्छाओं की दुनिया क्यों नहीं है! कोई ऐसा अपराध तो नहीं करने जा रहे वे? किसी रुकी हुई ट्रेन का चेन ही तो खींचना चाह रहे हैं। चेन की हैंडल की मोटाई महसूस करना चाह रहे हैं। चेन खींचने में कितना बल लगता है, यह समझना चाह रहे हैं। लेकिन वे और उनके समाज का यह आरोपित भद्रपन। 
      आज बारिश हो रही है। लगातार। मुम्बई की बारिश। झमाझम बारिश। यातायात ठप्प सा।  जाम से सड़क का बुरा हाल! देर रात तक मीटिंग चली है आज बापी की। अब ट्रेन मिली है तो अंधेरी तक तो पहुँच ही जाएंगे। बापी चर्चगेट पहुंचे। 1.20 की लास्ट लोकल छूटने ही जा रही थी। बापी भागे। लोकल ट्रेन तो दूसरे पहिये से ही स्पीड पकड़ लेती है। यह ट्रेन छूटी तो....!
      बापी दौड़े और चढ़ गए। भीगा बदन और दौड़ने से चढी सांस! जब थोड़े खुद में आए तो अपना आसपास देखा और देखकर सन्न रह गए। वे तो  "24 तास फ़क्त स्त्रियां साठी" यानी 24 घंटे केवल महिलाओं के लिए आरक्षित डब्बे में चढ़ गए थे। बारिश की मारी कुछ महिलाएं उस डिब्बे में थीं और बापी को देख पहले सब सहमी और अब चीख पुकार मचा रही थीं। चर्चगेट पार हो चुका था और अब ट्रेन मरीन लाइन्स छोड़ने जा रही थी। बापी ने सोचा, बस, ट्रेन के रुकते ही झट से इस डब्बे से उतरकर वे बगल के पुरुषवाले डब्बे में चढ़ जाएंगे, ताकि इनकी कांय कांय से बाज आएं। ... तनिक भी नहीं समझतीं ये औरतें!
      “मैं कोई टपोरी हूँ या आवारा? एक भद्र बंगाली पुरुष हूँ। इसीलिए, वरना अभी तक तो...” और बापी के सामने फिर से ट्रेन का चेन और हैंडल घूम गए। 
      इसके साथ ही घूम गया बापी का माथा। डब्बा औरतों की चीख से भर गया था। ट्रेन के ऐन छूटने से पहले एक औरत भागती- भागती ट्रेन में सवार हुई। वह तो चढ़ गई। उसके साथ एक और थी- उसकी ही हम-उम्र! वह चढ़ नहीं सकी। एक पैर उसने ट्रेन में रखा था। ट्रेन चल पडी। वह समझ नहीं पा रही थी कि ट्रेन में चढ़े कैसे या ट्रेन में रखा पैर उतारे कैसे? उसके साथवाली औरत चिल्लाने लगी। उसकी देखादेखी बाकी औरतें भी। बापी का ध्यान उधर गया। उन्होने फुर्ती से औरत को ऊपर खींच लिया। मारे घबड़ाहट के वह औरत रोने लगी। बापी को और कुछ भी समझ में नहीं आया। उन्होने आव देखा न ताव, झट से चेन का हैंडल पकड़ लिया और पूरी ताकत से उस पर झूल गए। स्पीड पकड़ती ट्रेन धीरे धीरे रुक गई। इसके पहले कि मोटरमैन आता या ये औरतें कुछ बयान करतीं, बापी महिला डिब्बे से उतरकर जनरल डब्बे में समा चुके थे। ####