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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Tuesday, May 27, 2014

तुझे सबकुछ पता है न माँ!

      माँ सभी को भगवान की तरह मुसीबत में याद आती है या दिखावे के समय। जैसे शादी या रिजल्ट के समय। दोनों ही बखत लोग साथ मे होते हैं। अब उन्हें गाना तो पड़ता है कि       
“उसको नहीं देखा हमने कभी, पर इसकी ज़रूरत क्या होगी,
            ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी?
      बाकी समय वह बोझ है, खर्चे का कारण है, बुढ़ापे की झिक झिक है, चिढ़ का बायस है। जिस बच्चे की हर बात का बिना चिढ़े माँ मुस्कुराकर जवाब देती और पुलकित होती रहती है, वही संतान उसकी बात पर या तो कुढ़ती है या मुंह फेरकर अपने काम में लग जाती है। मुनव्वर राना ने लिखने को लिख दिया:
            “किसी के हिस्से मकान आया, किसी के हिस्से दुकान आई
            मैं सबसे छोटा था, मेरे हिस्से मे माँ आई।“
      बाद में लोगों ने कहा- “मियां, बुढ़ापे का बोझ अपने माथे लेकर कविताई करते हो? नादान हो कि अहमक़?” लोग न नादान बनना चाहते हैं न अहमक़। फिर भी, माँ से जताते हैं मुहब्बत!    
      नरेंद्र चंचल गा-गाकर थक गए:
            “चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है।“    
      हम अपनी माँ के पास जाने के बदले पहाड़ पर बैठी माँ के पास चले जाते हैं और वहाँ से गाते हैं-
            “प्रेम से बोलो, जय माता की।“
      क्या चंचल ने केवल पहाड़ पर बसती और शेर पर सवार माता के लिए ही गाया होगा? नौ महीने तो उन्हें भी उनकी अपनी ही माँ ने अपने पेट में रखा होगा- पहाड़ पर बसती और शेर पर सवारी करती माता ने तो नही।
      फिलमवाले पहले अच्छे थे। माँ, बहन, भाई, होली, दीवाली, राखी, लोरी सभी पर गीत लिखते थे। होली में मद और मादकता है, इसलिए आज भी यदा-कदा होली गीत फिल्माए जाते हैं। माँ पर तो मुझे लगता है, सबसे ज़्यादा गीत लिखे गए।
            “जिनकी माँ होती है, खुशकिस्मत होते हैं,
            जिनकी माँ नही होती, जीवन भर रोते हैं।“
      छममकछल्लो इन गीतों से ही आज की बात पूरी करेगी। जो गीत भूल या छूट जाए, उसे माँ की बाकी जगत सन्तानें पूरा करेगी। देख भी लें। हो जाए आज फिर से एक और परीक्षा!  
      छममकछल्लो जैसी संतान माँ को मस्का मारती है और बड़े आराम से अंटी ढीली कर जाती है। माँ अपने भूले-बिसरे गर्व में कहती रहती है- “अरे मेरे पास तो सात-सात बेटे हैं। एक –एक कौर भी एक –एक बेटा देगा तो पेट भर जाएगा।“ किसी भी बेटे के पास कौर का एक टुकड़ा भी नहीं होता, भले माँ दूसरों के बेटों से एक कौर भात या एक रोटी मांगे। और क्यों ना मांगे! आखिर को वह उसकी जगत माता है और वह उसकी जगत संतान! केवल गाने से काम थोड़े न बनता है! लेकिन, संतान गाती है-
            “कौन सी वो चीज है जो यहाँ नहीं मिलती,
            सबकुछ मिल जाता है, लेकिन हाँ, माँ नहीं मिलती।“
      खुश माँ डगरे का बैगन बन जाती है, जिसे जो चाहे, जिधर से डुला ले। दिक्कत यह है कि माँ को पत्नी की तरह एक पतिव्रत नहीं बनाया गया। एक बच्चा ही जनती तो शायद एक संतान की माँ का खिताब मिल भी जाता। लेकिन इसमें भी उसकी मर्ज़ी कहाँ रही? जितनी मर्ज़ी घरवालों की, बच्चे जने और अपने बच्चों की माँ के साथ साथ जगज्जननी बने। माँ मुसकुराती है और प्यार से जगत संतान के लिए पूरी-छोले बनाती है। कर्जा चढ़ा तो क्या हुआ! बच्चे तो खुश! बच्चे पूरी-छोले खाने से पहले गाते हैं-
            माँ मुझे अपने आँचल में छुपा ले, गले से लगा ले,
            कि और मेरा कोई नहीं।
और खाने के बाद-
            “माँ तुझे सलाम, अम्मा तुझे सलाम” गाते अपनी राह निकल जाते हैं।
      हमारी महान भारतीय संस्कृति कहती है कि हम पेड़-पौधे, पशु पक्षी, नदी- तालाब, पत्थर- माटी, धरती सभी को माँ कहकर पूजते हैं। इतनी माँओं को पूजने के क्रम में अपनी माँ छूट जाती है तो कोई अपराध तो नहीं हो जाता! कितनी माँ को याद रखे कोई! अपनी संस्कृति में सीता, दुर्गा, काली, शक्ति, पार्वती, संतोषी- सभी माँ हैं। पता नहीं, राधा, रुक्मिणी, सत्यभामा माताएँ क्यों नहीं कहलाईं? गहन शोध का विषय है ये। लेकिन छममकछल्लो नहीं करेगी यह शोध। उसकी जगत सन्तानें ले ये जिम्मा! केवल:
            “बीबी, बेटी, बहन, पड़ोसी, सबमें थोड़ी-थोड़ी सी,
            दिन भर एक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी माँ”
कहकर उसे महानता के “हर-हर गंगे, पाप तरंगे” कहकर झाड पर चढ़ा देंगे और अगली ही लाइन में उतार कर गर्त में भी फेंक देंगे- “पुण्य हमारे घर, पाप तुम्हारे घर!” लो जी, और खिलाओ पूरी-छोले!
      अपने पूतों को जनमते ही धार में बहानेवाली जगत पूतों पर वरदान की लहरें बहाती माँ गंगा तो और भी रहस्यमई हैं। गंगोत्री से निकलकर परम पावन आर्यावर्त के शहर दर शहर होते हुए, वहाँ की भूमि और वाशिंदों को पुण्यवान करती, उनके धंधे- पानी का सारा इंतज़ाम करती गंदी होती चली जाती है- “राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप ढोते-ढोते!”
      वह कहती है- “मेरे बेटो! मेरी आरती मत उतारो, मुझे ज़रा साफ कर दो, ताकि मैं अपनी साफ लहरों के साथ बहकर तुमलोगों को भी साफ रख सकूँ।“ मगर बच्चे बड़े हो गए है- कद्दावर! राष्ट्र के पहरुए! वे कहते हैं- “चुप बुढ़िया! बैठी रह एक कोने में! हम जवान गबरू लोग! जो चाहेंगे, करेंगे, जैसे इस देश की अन्य लड़कियों, औरतों के साथ करते हैं।“ और आरती के बाद का सारा जमा कचरा उसी गंगा में बहा देते हैं, जिसकी अभी-अभी माँ कहते हुए आरती उतारी है! गंगा तो माँ है ना, सो चुप लगाना ही उसका धर्म है। आखिर बड़े बड़े लोग उसे माँ कहते हैं, धर्म और संस्कृति के नाम पर उसकी रक्षा के लिए तैयार हैं। रक्षक मुसकाते और गाते हैं-
            “तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है, प्यारी-प्यारी है,
            ओ माँ, ओ माँ!”
      बड़े-बड़े लोग अपनी सगी माँ से भी आशीष लेने जाते हैं, जैसे माँ को देखे और उनके चरण छूए बिना उनकी भोर ही नहीं होती। पद और पद का ताज पहनते वक़्त उसे टीवी के सामने बैठा देते हैं। साहेब जी, आपकी माँ के लिए क्या आपके दरबार में इतनी जगह नहीं कि वह आपका राज्याभिषेक अपनी आँखों से देखे, दूर की दृष्टि से नहीं! दरबार तो ऐसे ही बूढ़े लोगों से भरा पड़ा है। माँ के लिए जगह नहीं थी या कोई प्रोटोकॉल था? दूसरी माँ तो होती हैं अपनाए अपने लाडले-लाडलियों के संग।
      जैसा कि छममकछल्लो ने ऊपर कहा कि माँ तो माँ है। वह हर हाल में खुश रहती है और संतान के भले के लिए ही सोचती है। लेकिन हम उसकी संतान! जब दिखावे का समय हो, नजरें और हाथ माँ के पैरों पर। माँ भोली है, प्यारी है, इसलिए निश्छल भाव से सर पर हाथ फेरती आशीष देती है। इस देने के क्रम में हम देखते हैं कि बच्चे का सर थोड़ा गंजा हो जाता है, चेहरे पर थकान झलकती है, बाल, दाढ़ी, मूंछ के संग-संग भौंहों के बाल भी सफ़ेद हो जाते हैं। लेकिन, माँ के लिए तो हर उम्र का बच्चा उसकी गोद के बच्चे सा ही होता है- मासूम, प्यारा। हालांकि वह सब समझती है और मन ही मन कहती है-
            “ अम्मा देख, हाँ देख, तेरा मुंडा बिगड़ा जाए!”

लेकिन बिगड़े छोरे को संभालने के लिए उसके हाथ अब बेहद कमजोर हो चले हैं। उस हिलते हाथ से केवल सर ही फेरा जा सकता है। उसे अपनी उम्र का भी तो अंदाजा है। दम अटकते देर ही कितनी लगती है! तब महान भारतीय संस्कृति के मुताबिक मुखाग्नि के लिए तो इसी बिगड़े छोरे से ही आस रहेगी ना! ####  

Saturday, May 24, 2014

सेलेब्रटिंग कैंसर!

हर शनिवार मेरे लिए केमों लेकर आता था। आज पहला शनिवार है, जब इससे मुक्त हुई हूँ। मुक्त और अच्छा महसूस कर रही हूँ।  इस बीच एक आलेख 'बिंदिया' के अप्रैल, 2014 के अंक में आया था, जिसे तुरंत शब्दांकन वेब पत्रिका ने लिया। आज वही आलेख आपके साथ साझा कर रही हूँ।

सेलेब्रटिंग कैंसर!


      ‘आपको क्यों लगता है कि आपको कैंसर है?’
      ‘मुझे नहीं लगता।
      ‘फिर क्यों आई मेरे पास?’
      ‘भेजा गया है।
      ‘किसने भेजा?’
      ‘आपकी गायकोनोलिज्स्ट ने।
      और छ्ह साल पुरानी केस-हिस्ट्री- बाएँ ब्रेस्ट के ऊपरी हिस्से में चने के दाल के आकार की एक गांठ। अब भीगे छोले के आकार की। ....कोई दर्द नहीं, ग्रोथ भी बहुत स्लो। मुंबई-चेन्नै में दिखाया- आपके हॉस्पिटल में भी। लेडी डॉक्टर से भी। ब्रेस्ट-यूटेरेस की बात आने पर सबसे पहले गायनोकॉलॉजिस्ट ही ध्यान में आती हैं।
      यह है हम आमजन का सामान्य मेडिकल ज्ञान- फिजीशियन, सर्जन, गायनोकॉलॉजिस्ट में अटके-भटके। छह साल मैं भी इस- उसको दिखाती रही। सखी-सहेलियों के संग गायनोकॉलॉजिस्ट भी बोलीं- उम्र के साथ दो-चार ग्लैंड्स हो ही जाते हैं। डोंट वरी। और मैं निश्चिंत अपनी नौकरी, लेखन, थिएटर में लगी रही।
      धन्यवाद की पात्र रहीं गायनोकॉलॉजी विभाग की नर्स- मैडम! आप सीधा ओंकोलोजी विभाग में जाइए। ये भी आपको वहीं भेजेंगी। आपका समय बचेगा
      ‘मुझे फायब्रोइड लगता है। डजंट मैटर। आप जिंदगी भर इसके साथ रह सकती हैं। फिर भी, गो फॉर मैमोग्राफी, मैमो-सोनोग्राफी, बायप्सी एंड कम विथ रिपोर्ट।
      हर क्षेत्र अनुभव का नया जखीरा। लुत्फ के लिए मैं हमेशा तैयार! मेरे शैड्यूल में एक महीने, यानि दीवाली तक समय नहीं। आज भी संयोग से कोई मीटिंग, रिहर्सल नहीं- सो काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब
        मैमोग्राफी विभाग ने कहा, बिना एप्पोइंटमेंटवाले पेशेंट को वेट करना होता है। मैं तैयार- अकेली, अजीब घबडाहट लिए। अपने किसी काम के लिए किसी को साथ ले जाना मुझे उस व्यक्ति के समय की बरबादी लगती। बायप्सी की तकलीफ का अंदाजा नहीं था। गाड़ी लेकर गई नहीं थी। ऑटोवाले रुक नहीं रहे थे। एक रुका, मना किया। मैंने कहा, भैया, चक्कर आ रहा है, ले चलो। उसने एक पल देखा, बेमन से बिठाया, घर छोड़ा और जबतक मैं लिफ्ट में चली नहीं गई, रुका रहा। छोटे छोटे मानवीय संवेदना के पल मन को छूते हैं।
      चेक-अप करवाकर मैं भोपाल चली गई- ऑफिस के काम से और भूल गई सब। चार दिन बाद अचानक याद आने पर अजय (मेरे पति) से पूछा। बोले- रिपोर्ट पोजिटिव है, तुम आ जाओ, फिर देखते हैं।
      आज तक मेरी सभी रिपोर्ट्स ठीक-ठाक आती थीं। मन बोला- कुछ तो निकला। लग रहा था, गलत होगी रिपोर्ट! लेकिन, फ़ैमिली डॉक्टर ने भी कन्फ़र्म कर दिया। मतलब, वेलकम टु द वर्ल्ड ऑफ कैंसर!
      डॉक्टर रिपोर्ट देख चकरा गया- कभी-कभी गट फीलिंग्स भी धोखा दे देती है। डॉक्टर ने बड़े साफ शब्दों में बीमारी, इलाज और इलाज के पहले की जांच- प्रक्रिया बता दी। कैंसर के सेल बड़ी तेजी से बदन में फैलते हैं, इसलिए, शुभस्य शीघ्रम.....! इस बीच मुझे ऑफिस के महत्वपूर्ण काम निपटाने थे, एक दिन के लिए दिल्ली जाना था, मीटिंग करनी थी। डॉक्टर ने 30 अक्तूबर की डेट दी। इस दिन कैसे करा सकती हूँ! चेन्नै-प्रवास के कारण तीन साल से अजय के जन्म दिन पर नहीं रह पा रही थी। इसबार तो रह लूँ। 1 नवंबर तय हुआ।
      अभीतक केवल ऑफिसवालों को बताया था। रिशतेदारों की घबडाहट का अंदाजा हमें था। वर्षों पहले कैंसर से मामा जी को खोने के बाद दो साल पहले ही अपने बड़े भाई और बड़ी जिठानी को कैंसर से खो चुकी थी। घाव ताजा थे, दोनों ही पक्षों से। इसलिए दोनों ही ओर के लोगों को संभालना और उनके सवालों के जवाब देना...बड़ी कठिन स्थिति थी। हमने निर्णय लिया कि इलाज का प्रोटोकॉल तय होने के बाद ही सबको बताया जाए।
      आशंका के अनुरूप छोटी जिठानी और दीदियों के हाल-बेहाल! मैं हंस रही थी, वे रो रही थीं। मैंने ही कहा- मुझे हिम्मत देने के बजाय तुमलोग ही हिम्मत हार बैठोगी तो मेरा क्या होगा?” मैंने तय किया था, बीमारी की तकलीफ से भले आँसू आएँ, बीमारी के कारण नही रोऊंगी। जब भी विचलित होती, सोचती, मुझसे भी खराब स्थिति में लोग हैं। मन को ताकत मिलती। यहाँ भी सोचा, ब्रेस्ट कैंसर से भी खतरनाक और आगे की स्टेज के रोगी हैं। वे भी तो जीते हैं। उनका भी तो इलाज होता है। पहली बार मैंने अपने बाबत सोचा- मुझे मजबूत बने रहना है। अपने लिए, पति के लिए, बेटियों के लिए।
      शहर में जब चर्चा चली तो किस्से-आम होने लगे। हम कैंसर या किसी भी बीमारी पर बात करते डरते- कतराते हैं। इससे दूसरों को जानकारी नहीं मिल पाती। मुझे लगता है, हमें अपनी बीमारी पर जरूर बातचीत करनी चाहिए, ताकि हमारे अनुभवों से लोग सीख-समझ सकें और बीमारी से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें। याद रखिए, धन तो आप कहीं से भी जुटा लेंगे, लेकिन मन की ताकत आप सिर्फ अपने से ही जुटा सकते हैं। आपके हालात पर जेनुइनली रोनेवाले भी बहुत मिलेंगे, लेकिन आपको उन्हें बताना है कि ऐसे समय में आपको उनके आँसू नहीं, मजबूत मन चाहिए।
      निस्संदेह कैंसर भयावह रोग है। यह इंसान को तन-मन-धन तीनों से तोड़ता है और अंत में एक खालीपन छोड़ जाता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी बड़ा सच है कि हम मेडिकल या अन्य क्षेत्रों के प्रति जागरूक नही। जबतक बात अपने पर नहीं आती, अपने काम के अलावा किसी भी विषय पर सोचते नहीं। इससे भ्रांतियाँ अधिक पैदा होती हैं। कैंसर के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं। इसलिए इसके पता चलते ही रोगी सहित घर के लोग नर्वस हो जाते हैं। हम भी नर्वस थे। मेरा एक मन कर रहा था, हम सभी एक-दूसरे के गले लगकर खूब रोएँ। लेकिन हम सभी- मैं, अजय, मेरी दोनों बेटियाँ- तोषी और कोशी अपने-अपने स्तर पर मजबूत बने हुए थे।
      मेरा कैंसर भी डॉक्टर से शायद आँख-मिचौनी खेल रहा था। ऑपरेशन के समय डॉक्टर ने मुझे केमो पोर्ट नहीं लगाया- आपका केस बहुत फेयर है। सैंपल रिपोर्ट आने के बाद हो सकता है, आपको केमो की जरूरत ही न पड़े। केवल रेडिएशन देकर छुट्टी। किसी भी मरीज के लिए इससे अच्छी खबर और क्या हो सकती है! 
        ऑपरेशन के बाद अलग- अलग कोंप्लीकशंस के बाद आईसीयू की यात्रा करती यूरिन इन्फेक्शन से जूझने के अलावा हालत बहुत सुधर चुकी थी। मेरे मित्र रवि शेखर म्यूजिक बॉक्स छोड़ गए। सुबह से शाम तक धीमे स्वर में वह मुझे अपने से जोड़े रखता। नर्स ने एक्सरसाइज़ बता दिए। दस दिन बाद घर पहुंची, एक पूर्णकालिक मरीज बनकर। अजय और बच्चे मेरे कमरे, खाने, दवाई के प्रबंध में जुट गए। मुझे सख्त ताकीद, कोई काम न करने की, खासकर प्रत्यक्ष हीट से बचने के लिए किचन में न जाने की। पूरे जीवन जितना नहीं खाया-पिया, आराम नहीं किया, अब मैं कर रही थी। शायद आपकी अपने ऊपर की ज्यादती प्रकृति भी नहीं सहती। उससे उबरने के इंतज़ाम वह कर देती है। तो मेरा कैंसर प्रकृति का दिया इलाज है?
      सैंपल रिपोर्ट आ गई- पहला स्टेज, ग्रेड 3! डॉक्टर ने समझाया- चोरी होने पर पुलिस को बुलाते हैं, आतंकवादी के मामले में कमांडोज़। ग्रेड 3 यही आतंकवादी हैं, जो आपके ब्रेस्ट और आर्मपिट नोड्स में आ चुके हैं। इसलिए केमो अनिवार्य!
      केमो स्पेशलिस्ट ने एक संभावित तारीख और निर्देश दे दिए- 23 नवम्बर- सर्जरी के तीन से चार सप्ताह के भीतर केमो शुरू हो जाना चाहिए। चूंकि, केमो कैंसर सेल के साथ-साथ शरीर के स्वस्थ सेल को भी मारता है, इसलिए इसके साइड इफ़ेक्ट्स हैं- भूख न लगना, कमजोरी, चक्कर आना, बाल गिरना आदि।
      तीसरा सप्ताह चढ़ा कि नहाने के समय हाथ में मुट्ठी-मुट्ठी बाल आने लगे। केमो की तैयारी के लिए पहले ही मैंने बाल एकदम छोटे करा लिए थे। लंबे बालों के गिरने से बेहतर है छोटे बालों का गिरना। फिर भी बालों के प्रति एक अजीब से भावात्मक लगाव के कारण और बाल गिरेंगे, यह जानते हुए भी मैं अपने-आपको रोक ना सकी और फूट-फूटकर रोने लगी। अजय और कोशी भागे-भागे आए। कारण जानकर दिलासे देने लगे। कोशी ने अवांछित बाल हटाकर खोपड़ी को समरूप-सा कर दिया। आईना देख खुद को ही नहीं सह पाई। झट सर पर दुपट्टा लपेट लिया। रात में तोषी के आने पर मैंने कहा कि मेरा चेहरा बहुत भयावना लग रहा है। उसने कहा, ऐसा कुछ नहीं है, तुम अभी भी वैसी ही प्यारी लग रही हो। एक-दो दिन बाद स्थिर होकर देखा- नाटक मि. जिन्ना करते समय अक्सर गांधीवाली भूमिका की सोचती। तब हिम्मत नहीं थी। अब मुझे अपनी टकली खोपड़ी से प्यार हो गया। उसे ढंकती नहीं हूँ, न घर में न बाहर में। यह अपना आत्म-विश्वास है। मुझे देखतेवाले कहते हैं- यह कट आप पर बहुत सूट कर रहा है।
      केमो पोर्ट न लगाने के कारण इंट्रावेनस केमो दिया गया। लेकिन तीसरे केमो तक आते-आते सारी नसें फायर कर गईं। दर्द रहने लगा। डॉक्टर बोले- आपकी नसें काफी सेंसिटिव हैं। आमतौर पर ऐसा छह महीने बाद होता है, आपके साथ डेढ़ महीने में ही हो गया। अभी 13 केमो बाकी हैं, सो केमो पोर्ट लगाना होगा। इसके लिए और मार्जिन टेस्ट के लिए फिर से ऑपरेशन! मेडिकल और शिक्षा- दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ आप डॉक्टर और शिक्षालयों के गुलाम हो जाते हैं।  मार्जिन टेस्ट में ऑपरेशनवाली जगह से ही वहाँ का सैंपल लेकर टेस्ट के लिए भेजा गया, ताकि कैंसर सेल्स की स्थिति पता चल सके। रिपोर्ट आ गई। डॉक्टर ने बताया कि आप अब खतरे से बाहर हैं। लेकिन केमो, रेडिएशन, खाना-पीना, आराम शिड्यूल के मुताबिक!
      अभी इसी शिड्यूल में हूँ। कुछ दिन लगते हैं, अपने-आपसे लड़ने में, खुद को तैयार करने में। लेकिन, अपना मानसिक संबल और घरवालों का समर्थन कैंसर क्या, किसी भी दुश्वारियों से निजात की संजीवनी है। यह आपको कई रास्ते देता है- आत्म मंथन, आत्म-चिंतन, आराम, खाने-पीने और सबकी सहानुभूति भी बटोरने का (हाहाहा)। यह ना सोचें कि आप डिसफिगर हो रही हैं। यह सोचें कि आपको जीवन जीने का एक और मौका मिला है, जो शत-प्रतिशत आपका है। इसे जिएँ- भरपूर ऊर्जा और आत्म-विश्वास से और बता दीजिये कैंसर को कि आपमें उससे लड़ने का माद्दा है। सो, कम एंड लेट सेलेब्रेट कैंसर! ###                                 

Tuesday, May 20, 2014

मेरे पढ़ने-लिखने का लेखा-जोखा- (वाजिब है हमरे लिए दफा 302) मीनाक्षी धन्वन्तरी

मीनाक्षी धन्वन्तरी- छममकछल्लो के लिए आज तक यह नाम एक ब्लॉगर तक ही महदूद था। आज सुबह-सुबह फेसबुक पर "शुक्रवार" के 11-17 अप्रैल, 2014 के अंक में छपी कहानी "वाजिब है हमरे लिए दफा 302" पर इनकी भाव व अभिव्यक्ति से सराबोर सँदेसे आने लगे। छममकछल्लो पढ़ कर नि:शब्द! स्त्रियों की स्वभावजनित उत्तेजना के साथ साथ मीनाक्षी के पति विजय चुपचाप इस कहानी और इसकी पीड़ा के साथ- साथ यात्रा करते रहे। मीनाक्षी ने अपनी बातें अपने ब्लॉग "प्रेम ही सत्य है" पर पोस्ट किया है। एक पाठक किसी कहानी पर कैसे सोचता है, इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, मीनाक्षी की यह पोस्ट। धन्यवाद शब्द बेमानी है। कहानी भी छममकछल्लो कहीस पर है और मीनाक्षी की बातें उनके ब्लॉग http://meenakshi-meenu.blogspot.in/2014/05/2-302.html के साथ-साथ यहाँ भी। पढ़ें और अपनी राय से वाकिफ कराएं।

नमस्ते विभाजी...आपकी कहानी "वाजिब है हमरे लिए दफ़ा 302" पढ़ कर हम जड़ हो गए थे ... लगने लगा जैसे शब्दों ने शरीर धारण कर लिया हो और उनके भाव आत्मा बन कर हमारी आत्मा को झंझोड़ने लगे...खूबसूरत भावों से भरे शब्द रग़ों में बहने लगते हैं ... आपकी कहानी के कुछ अंश लेकर उनके बारे में कुछ चर्चा करने की कोशिश की है या कहिए कि अपने ही दिल को हल्का करने का बन्दोबस्त... "समाज से जुड़ी पोस्ट को लेकर अक्सर हम दोनों पति-पत्नी में बहस और कभी तल्खी हो जाती है, जिसके लिए समय चुनते हैं शाम की सैर का...पति जितनी शांति से बात करते हैं मुझे उतना ही गुस्सा आता है. जैसे कि विभाजी की पोस्ट को पढ़ने के बाद हुआ.. सुबह पोस्ट पढ़ने के बाद दोनों ही जड़ से हो गए थे.. विजय चुपचाप ऑफिस चले गए और मैं काम में लग कर उस कहानी को भुलाने की कोशिश करने लगी. जीवन से जुड़ी किसी घटना को कहानी का चोगा पहना दिया जाता है. किसी न किसी सच से उपजती है कहानी.. तभी दिल तड़प उठता है क्योंकि कहानी का सच हमें जीने नहीं देता. कहानी के पात्र हवाओं में घुल कर साँसों में उतरने लगते हैं और दम घुटने लगता है .. दोपहर फिर वापिस आई ... चाहकर भी अपने आप को रोक न पाई. दुबारा उस कहानी को पढ़ने लगी... अपनी गर्भवती बहन लल्ली का खून करने वाला बड़ा भाई और उसकी दलीलें नश्तर की तरह चुभने लगीं..जो इंसान ज़रा से ख़ून को देख कर चक्कर खाकर गिर जाए उसे समाज की ज़हर बुझी बातें कितना ताकतवर बना देती हैं कि वह कुछ भी कर गुज़रता है. इस देस में सबको एतना बोलने का आजादी काहे है जज साहेब? हम बड़ी डरपोक किसम के हैं। खून देख के हमको उल्‍टी-चक्‍कर आने लगता है। कहियो मेढक का डिसेक्‍शन नहीं कर सके। हमरा साथी सब मेढक को उल्‍टा करके उसका चारो टंगड़ी कील से ठोक देता। चारो पैर तना हुआ आ बीच में उसका फूला पेट, जिसके ऊपर से कैंची चलनेवाला था उसका पेट फाड़ने के लिए। जिंदा मेढक- छटपटाए नहीं, छटपटाकर भागे नहीं, इसके लिए कील में ठोका मेढक- माफ कीजिएगा जज साहेब, हमको जाने क्‍यों ईसा मसीह याद आ गए। हमको चक्‍कर आ गया। हम बेहोश हो गए। पैंट भी गीला हो गया। मोहल्‍ले की दादी-चाची-फुआ से उनके घरों की बाकी सभी औरतों और वहां से उनके मरद और मरद से बच्‍चों तक को हमरी ई बीमारी का पता लग गया। जनी-जात हमको देख पूछ बैठती -'बउआ, मन ठीक है न अब?' मर्द कहते -'काहे रे? एतना बड़ा हो गया, अखनी तक पैजामा में मूतता है!' और बच्‍चे तो हमको देखते ही ताली पीट-पीटकर चिल्‍लाने लगते -'मूतना, मूतना।' हमरा तो नामे जज साहेब मूतना पड़ गया। “बाकिर ई समाज जज साहेब! एकदमे चौपट निकला। चौपट से बेसी बदमाश, जिसको दूसरे के घर में आग लगाकर हाथ सेंकने में बहुते मजा आता है। पढ़ाई और नौकरी का ऊंच-नीच लल्‍ली बूझ गई, मगर जिनगी के ऊंच-नीच में तनिक गड़बड़ा गई। हालांकि हमरे हिसाब से ऊ कोनो गड़बड़ नहीं था जज साहेब। मगर ई समाज, जो ऊपरवाले की बनाई चीज पर भी अपनी जबान चलाने से बाज नहीं आता, ऊ इंसान के उस काम को कैसे सह लेता, जिसमें उसकी रज़ामन्दी ना हो? जो कोई जिधर टकरा जाता, एके सवाल पूछता -'रे मूतना, तेरी बहिन का कुछ पता चला?... अब तो ऊ पूरी चमइन हो गई होगी? राम-राम, मुर्दा खाती होगी। चमड़ा निकालती होगी।“ हमारा मन करता, सबको चीर कर रख दें. मगर हम तो एक ठो चींटी भी नहीं मार सकते थे, आदमी को क्या मारते? लोग-बाग हमको देखते और बोलने लगते -'रे मूतना, रे तुम्‍हारे जीजा का क्‍या हाल है? आदमी को चीर रहा है कि मरी गइया का खाल उतार रहा है? उसके साथ गाय खाया कि नहीं? चमड़ा उतारा कि नहीं?' एक दिन फिर हमको बुलउआ आया- मोहल्‍लावाला का। सामने एक ठो कुत्ता मरा पड़ा था। सब बोले -'रे मूतना, देखता क्‍या है?ई कुतवा को उठा ईहां से। मर्जी तो इसकी खाल खीच, चाहे तो इसका मांस पका। हमको भी बताना, कइसा लगता है इसका स्‍वाद! सुने हैं कुत्ते का मांस बड़ा गरम होता है। गरमी ज्‍यादा चढ़े तो मेहरारू पर उतार लेना।' हम, गणेश तिवारी, जिसकी पैंट चार कील पर उल्‍टे टांगे मेढ़क को देखकर गीली हो गई थी, वही गणेश तिवारी यानी मूतना अपने टोले-मोहल्‍ले की बात से इतना ताक‍तवर हो गया कि उसको लल्‍ली और जयचंद का खून देखकर न पसीना आया, न बेहोशी छाई, न उसकी पैंट गीली हुई। मन की व्‍यथा का सबूत कइसे दिखाया जाए? हाथ गोर काट-पीट अधमुआ कर दिया तो दफा 307 लगा दिया। शीलहरण किया तो 376 लगा दिया। मार दिया तो 302 लगा दिया. लेकिन हमरे मन के हाथ पैर को दिन-रात काटा जाता रहा, मन को बार-बार मारा जाता रहा, हमरे शील सुभाव को बीच चौराहे पर नंगा किया जाता रहा, उसके लिए कौन सा दफा लगेगा जज साहेब? शाम छह बजे ऑफिस से लौट कर विजय कपड़े बदलकर मुँह हाथ धोकर फौरन ही सैर के जूते कस लेते हैं , मैं पहले ही तैयार रहती हूँ.... सैर करते हुए फोन पर गज़लें सुनने की इच्छा हम दोनों की नहीं थी क्योंकि विजय के दिल और दिमाग में भी लल्ली जयचन्द और गणेस घूम रहे थे..."लल्ली और जयचंद कितने खुश थे , गणेश भी अपनी बहन बहनोई से मिलकर खुश था फिर उसने ऐसा क्यों किया.... " मैंने दुखी मन से बात शुरु की जिसके जवाब में ठंडी साँस लेते हुए पति बोले, "हम समाज में रहते हैं जहाँ कुछ भी लीक से हट कर हो तो ऐसा ही होता है' मुझे सुनकर इतना गुस्सा आया कि चिल्ला उठी कि समाज क्या है... उसका वजूद हमसे ही है...हम सबसे मिलकर बना है समाज फिर क्या मुश्किल है कि हम एक दूसरे की सोच को सहन नहीं कर पाते. मैं जाने क्या क्या बोले जा रही थी और विजय चुपचाप सुन रहे थे. उनके पास मेरे सवालों का एक ही जवाब था शिक्षा..लल्ली की सोच में बदलाव शिक्षा के कारण था.... खुद ब खुद समझ आने लगा कि किसी भी बदलाव के लिए कुछ भी सहने के लिए अगर हम तैयार नहीं हैं तो गणेश तिवारी जैसे कई पैदा होते रहेंगे. देश के कोने कोने में अगर ज्ञान की ज्योति जलने लगे तो घर परिवार में बेटा बेटी को बराबर का प्यार और मान-सम्मान मिलेगा. फिर किसी लल्ली को घर से भागना नहीं पड़ेगा... कोई गणेश तिवारी टोले मुहल्ले की बातें सुनकर कसाई नहीं बनेगा.....शिक्षा ही एक ऐसा मूलमंत्र है जो अमीरी ग़रीबी और ऊँच नीच के भेदभाव को भुलाकर सबको एक सूत्र में बाँधता है. हँसती खिलखिलाती लल्ली भूलती नहीं....जाने कितनी और हैं जिन्हें ऐसा अंजाम न मिले इस दुआ के साथ ।

Sunday, May 18, 2014

काफिर !

सलमान हैदर पाकिस्तान के “फातिमा जिन्ना महिला विश्वविद्यालय, रावलपिंडी के जेंडर स्टडीज़ विभाग में पढ़ाते हैं। उर्दू में इनका एक ब्लॉग है जो dawn.com में प्रकाशित होता है। कवि, व्यंग्यकार, नाट्य लेखक व रंगमंच अभिनेता हैं। “सियासत @ 8 pm” इनका लिखा राजनीतिक व्यंग्य नाटक है। “दगाबाज” और  “वेटिंग फॉर गोदो” में अभिनय किया है।
सलमान हैदर की कविताओं का तंज़ तिलमिला देने के लिए काफी है। बहरहाल, निदा फाजली की गजल का यह शेर, जिसे उन्होने इन दोनों देशों के हालात को देखकर लिखा है:
      “इंसान में हैवान, यहाँ भी हैं वहाँ भी
      अल्लाह मेहरबान, यहाँ भी हैं वहाँ भी।“
सलमान हैदर की एक कविता यहाँ है। इस पर आप लंबी बहस चला सकते हैं, राय दे सकते हैं।

काफिर !

मैं भी काफिर, तू भी काफिर  
फूलों की खुशबू भी काफिर
लफ्जों का जादू भी काफिर
ये भी काफिर, वो भी काफिर
फैज भी और मंटो भी काफिर
नूरजहाँ का गाना काफिर
मैक्डोनल्ड का खाना काफिर
बर्गर, कॉफी, कोक भी काफिर
हँसना बे-दाल-ऐन-ते काफिर
तबला काफिर, ढोल भी काफिर
प्यार भरे दो बोल भी काफिर
भांगड़ा, अतन, धमाल भी काफिर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफिर
काफी और खयाल भी काफिर
वारिस शाह की पीर भी काफिर
चाहत के ज़ंजीर भी काफिर
ज़िंदा- मुर्दा पीर भी काफिर
नज़र नयाज़ की खीर भी काफिर
बेटे का बस्ता भी काफिर
बेटी की गुड़िया भी काफिर
हँसना- रोना कुफ़र का सौदा
गम काफिर, खुशियाँ भी काफिर
जींस भी और गिटार भी काफिर
टखनों से नीचे लटके तो
अपनी ये शलवार भी काफिर
फन भी औ फनकार भी काफिर
जो मेरी धमकी ना छापे
वो सारे अखबार भी काफिर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफिर
डार्विन भाई का बंदर काफिर
फ्रायड पढ़ानेवाले काफिर
मार्क्स के सब मतवाले काफिर
मेले-ठेले कुफ़र का धंधा,
गाजे-बाजे सराय फंदा
मंदिर में तो बुत होता है
मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफिर
कुछ मस्जिद के अंदर काफिर
मुस्लिम मुल्क मे अक्सर काफिर
काफिर,  काफिर , मैं भी काफिर

काफिर, काफिर, तू भी काफिर ! ####