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Tuesday, April 21, 2020

माँ, तुम काम करो'


'माँ, तुम काम करो'

'माँ, तुम काम करो' एक आवाहन है हर स्त्री और लड़की के लिए कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो। यह आत्मनिर्भरता की ओर उठनेवाला कदम है, जिनसे वह खुद भी सक्षम होगी और परिवार, समाज, देश और विश्व भी सक्षम होगा।

व्यावहारिक बात भी है कि घर में दो व्यक्ति कमानेवाले हों तो गृहस्थी की गाड़ी खिंचनी थोड़ी आसान हो जाती है। इससे हालांकि स्त्री पर श्रम का अतिरिक्त दवाब पड़ता है, मगर उसकी अपनी आत्मनिर्भरता उसके लिए सबसे बड़ा संबल होता है। श्रम सर्वेक्षण यह बताता है कि हमारे देश में स्त्री श्रम शक्ति का पूरा उपयोग नहीं हो रहा। अगर यह होने लगे तो हमारे देश के विकास की दर भी बढ़ेगी।
सामाजिक और मानसिक रूप से हमें इसके लिए तयार होने की जरूरत है, क्योंकि अभी भी लोग यह कहते मिल जाएंगे कि "औरत की कमाई खाने से बेहतर मर जाना है।"
तो भाइयो, मरिए मत! देश और दुनिया वैसे भी कोरोना के इस महा संकट से जूझ रहा है
आप सबकी जान बहुत कीमती है- आपके खुद के लिए। आपके प्रियजनों के लिए। देश के लिए और विश्व के लिए भी। बस, अपने को थोड़ा बदलें और घर की स्त्रियॉं को आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बनाने में उनकी मदद  करें।
महिलाओं और लड़कियो! आप भी अपने घेरे से बाहर आओ। आपका अपने पैरों पर खड़े रहना आपके लिए, आपके घर के लिए और प्रकारांतर से देश और विश्व के आर्थिक मजबूती के लिए बहुत ज़रूरी है

इस बात को देखिये यूट्यूब पर #बोलेविभा35 के इस एपिसोड में। आपकी राय व टिप्पणी का इंतज़ार रहेगा।

Monday, June 16, 2014

पिता को याद करते हुए!

बाउजी का मेरी जिंदगी से उतना ही नाता है कि उनके अंश से मेरा जन्म हुआ। थोड़ा उससे आगे बढ़ें तो बचपन की चंद खट्टी-मीठी यादें। हमारे घर के बाहरी हिस्से में एक बहुत बड़ा कमरा था। हम सभी उसी में सोते। माँ समेत हम चारो भाई- बहन उस कमरे में बिछी चार चौकियों पर। दो बहनों की शादी हो गई थी। इसलिए वे अपनी ससुराल में थीं। बीच-बीच में आतीं-जातीं। बाउजी उससे सटे बरामदे में सोते। माँ अहले सुबह उठ जातीं। उन्हें घर-आँगन रोज दिन धोने की सनक थी। धोने-धाने के बाद वे आँगन के ओसारे पर रखी चौकी पर थोड़ी देर के लिए बैठतीं। हमलोग बारी-बारी से उठते। मैं घर में सबसे छोटी थी। मैं जान-बूझकर सोई रहती। बाउजी आते। मुझे हल्की सी गुदगुदी लगाते। मैं मुसकुराते हुए थोड़ा कुनमुनाती। बाउजी चौकी पर बैठ जाते। मैं उनकी पीठ पर चढ़ जाती। बाहर के कमरे से निकलकर आँगन जाने की गली को पार कराते वे ओसारे पर आते, जहां माँ चौकी पर बैठी रहतीं।

बाउजी की पीठ से उतरकर मैं माँ की गोद में चली जाती। माँ का ब्लाउज खोलती और दो चभक्के दूध के लगाकर उतरती। यह मेरी रोज की दिनचर्या थी। सर्दी के मौसम में जबतक हम मुंह-हाथ धोते, पूरब के ओसारे पर धूप उतर आती। माँ रसोई में लग जाती। दादी कडुआ तेल लेकर हमलोगों की मालिश करती। शुरू में उनके ठंढे हाथ हममें सिहरन भरते। लेकिन धीरे धीरे मालिश से उनके हाथों में गर्मी आती जाती और हमें भी उनके हाथों की गरमी मिलने लगती।

सर्दी में हर सुबह एक माखन-मिश्री बेचनेवाला आता। पूरी सर्दी उसका यही व्यवसाय था। केले के पत्ते को बेहद छोटे-छोटे टुकड़े में काटकर गीले कपड़े से ढककर रखता। मिश्री की छोटी-छोटी गोलियां और एक कटोरी में शक्कर। चार और आठ आने की गोलियां। लेते समय वह उन गोलियों की तश्तरी जैसा बनाता, उसपर शक्कर डालकर देता। बाउजी दो या तीन माखन-मिश्री खरीदते। एक वे खुद खाते, दो में हम चारो भाई-बहन। माँ और दादी का भी हिस्सा होगा, यह न हमें या बाउजी को कभी ख्याल आया या आने ही नही दिया गया।

बाउजी का हिस्सा हर चीज में निस्संदेह घर में सबसे ज्यादा था। उनकी रोटी में सबसे ज्यादा घी लगता। रोटी के बर्तन में उनकी रोटी अलग से मोड़कर रखी रहती। यह हमलोगों के लिए संकेत था कि ये बाउजी की रोटी है, इन्हें हाथ नहीं लगाना है। हमारी रोटियों में घी बहुत कम लगता। घी अगर कम हो जाता तो हमारी रोटियों में नही लगाया जाता। साफ साफ कह दिया जाता कि घी बस केवल उतना ही है कि बाउजी की रोटियों में लग सके। या लगता तो रोटी पर एक बूंद घी छुलाकर उसपर पानी फैला दिया जाता। दीदी कहती- “देखो, कितनी चप-चप रोटी है। हम भी उसे घी से चप-चप हुई रोटी समझकर बड़े स्वाद से खाते।

बाउजी का दुलार केवल पीठिया पर ले जाकर माँ की गोद में पहुंचाने तक ही सीमित था, जो उम्र के साथ अपने आप छूट गया। बाउजी ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि हम चारों भाई- बहन क्या खा-पहन रहे हैं, क्या पढ़-लिख रहे हैं, घर का खाना-खर्चा कैसे चल रहा है, दोनों बहनों की शादी के समय लिए गए कर्जे की भुगताई कैसे हो रही है? उनकी दोपहर किशोरी हलवाई के यहाँ के समोसे और गुलाबजामुन के लिए तय थी। दिन के खाने में मोहल्ले के मास्टर जी की माँ के द्वारा जमाया गया दही अनिवार्य था। शाम में जद्दू मूढ़ीवाली की मूढ़ी भी फिक्स थी। मूढ़ी अलबत्ता ज्यादा ली जाती और बांस के डगरे में सभी भाई-बहनों के हिस्से लग जाते। कभी-कभी बाउजी के शाम के नाश्ते के लिए खजूर-निमकी बनती जो बनाकर उनकी कोठारी में रख दी जाती। उस कोठरी से बाउजी होमियोपैथ की प्रैक्टिस करते थे। उसमें हमेशा ताला लगा रहता। उसकी चाबी उनके ही पास रहती। हमलोगों के लिए वह कोठारी एक जादू नगरी से कम नहीं थी। कभी-कभी बाउजी कुछ किताब या सामान लाने के लिए हमलोगों को चाबी देते। हमलोग उस कोठरी को खोलकर किसी रहस्य-लोक को पा लेने की अनुभूति से उसे देखते। बाउजी के होमियोपैथ प्रैक्टिस की दवाइया, शुगर ऑफ मिल्क, मीठी-मीठी गोलियां और उनकी मोटी-मोटी किताबें।

बाउजी की हिन्दी और अँग्रेजी दोनों की लिखाई बेहद खूबसूरत थी। हमलोगों की अँग्रेजी की पढ़ाई कक्षा छह से शुरू होती। हम सम्मोहित से बाउजी को अँग्रेजी लिखता देखते। उसके बाद बाउजी की नकल करते कागज पर कुछ भी घसीटते जाते और कहीं अनुस्वार और कहीं एक लकीर खींच देते। बाद में पता चला कि कर्सिव राइटिंग करते बाउजी के वे नुक्ते या डैश मूलत: आई और टी अक्षर होते थे। बाउजी को होमियोपैथ का बड़ा शौक था और उस पर उनकी पकड़ भी काफी थी। मगर जाने क्या बात थी कि लोग उनके पास न आकर शहर के दूसरे डॉक्टर के पास जाते। हमलोगों की भी कृतघ्नता की हद रही कि कभी उनकी प्रैक्टिस पर  भरोसा नहीं किया। बाउजी को इसका मलाल तो था, मगर कभी जाहिर नहीं किया। माँ उनसे चिढ़ी रहतीं। हमें समझ तो आती थी, लेकिन पूछने का साहस नहीं था। आज भी महिलाओं कि अपने पतियों से चिढ़ को देखकर माँ की याद आती है।  

बाउजी साइंस टीचर थे। फिजिक्स पढाते थे। उनकी इच्छा थी कि उनके बच्चे साइंस लेकर पढ़ें। मेरे दोनों भाइयों ने साइंस लिया। सभी चाहते थे कि बड़ा भाई डॉक्टर बने और छोटा इंजीनियर। मुझसे बड़ी बहन ने आर्ट्स लिया। मैंने सातवीं के बोर्ड के बाद बाउजी के स्कूल में ही साइंस में दाखिला लिया। लेकिन लाख रटने के बाद भी मैथेमेटिक्स और फिजिक्स दिमाग में नहीं घुसा। मज़बूरन, दसवीं कक्षा में हमने साइंस बदलकर आर्ट्स ले लिया। तब यह व्यवस्था थी कि आठवी –नौवी के बाद दसवीं में एक बार विद्यार्थी अपनी फ़ैकल्टी बदल सकते थे। बोर्ड की परीक्षा ग्यारहवी में होती थी जिसे मैट्रिकुलेशन कहा जाता था।  

बाउजी को भी माँ की तरह ही कभी पॉलिटिक्स करनी नहीं आई, जबकि राजनीति का अच्छा ज्ञान दोनों को था। नतीजन, उनके स्कूल ने उन्हें पदोन्नति नहीं दी। बाउजी मुकदमा लड़ते रहे। वे हमसे अपील लिखवाते। कभी-कभी हम चिढ़ जाते। लंबी लड़ाई लड़ी बाउजी ने। हाई कोर्ट से जीत भी गए। कोर्ट ने उन्हें पदोन्नति सहित उनके सारे ड्यूज देने का आदेश स्कूल को दिया। मगर स्कूल ने कोर्ट की पूरी अवमानना करते हुए न उन्हें पदोन्नति दी, न उनके ड्यूज।


सेवा निवृत्ति के समय स्कूल ने उन्हें विदाई तक नहीं दी। बस, 75/- रुपए का पेंशन ज़रूर दिया, जो बाउजी के लिए ही नाकाफी था। लेकिन, बाउजी कभी झुके नहीं। बाउजी की यही आदत और स्वभाव शायद छम्मकछल्लो को मिला। उसे माँ –बाउजी की तरह न तो पॉलिटिक्स करनी आई, न किसी के सामने झुकना आया। माँ –बाउजी अपने स्तर पर बरसों झेलते रहे, आज छम्मकछल्लो। लेकिन, यह एक ऐसा तत्व दोनों ने दिया, जिससे जीवन को एक तारतम्यता मिली, अपनी जिम्मेदारियों का अहसास मिला और मिला, एक स्वाभिमानी जीवन जीने की शक्ति और प्रकाश। बाउजी को याद करते हुए बस यही कहा जा सकता है। ###

Tuesday, May 27, 2014

तुझे सबकुछ पता है न माँ!

      माँ सभी को भगवान की तरह मुसीबत में याद आती है या दिखावे के समय। जैसे शादी या रिजल्ट के समय। दोनों ही बखत लोग साथ मे होते हैं। अब उन्हें गाना तो पड़ता है कि       
“उसको नहीं देखा हमने कभी, पर इसकी ज़रूरत क्या होगी,
            ऐ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी?
      बाकी समय वह बोझ है, खर्चे का कारण है, बुढ़ापे की झिक झिक है, चिढ़ का बायस है। जिस बच्चे की हर बात का बिना चिढ़े माँ मुस्कुराकर जवाब देती और पुलकित होती रहती है, वही संतान उसकी बात पर या तो कुढ़ती है या मुंह फेरकर अपने काम में लग जाती है। मुनव्वर राना ने लिखने को लिख दिया:
            “किसी के हिस्से मकान आया, किसी के हिस्से दुकान आई
            मैं सबसे छोटा था, मेरे हिस्से मे माँ आई।“
      बाद में लोगों ने कहा- “मियां, बुढ़ापे का बोझ अपने माथे लेकर कविताई करते हो? नादान हो कि अहमक़?” लोग न नादान बनना चाहते हैं न अहमक़। फिर भी, माँ से जताते हैं मुहब्बत!    
      नरेंद्र चंचल गा-गाकर थक गए:
            “चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है।“    
      हम अपनी माँ के पास जाने के बदले पहाड़ पर बैठी माँ के पास चले जाते हैं और वहाँ से गाते हैं-
            “प्रेम से बोलो, जय माता की।“
      क्या चंचल ने केवल पहाड़ पर बसती और शेर पर सवार माता के लिए ही गाया होगा? नौ महीने तो उन्हें भी उनकी अपनी ही माँ ने अपने पेट में रखा होगा- पहाड़ पर बसती और शेर पर सवारी करती माता ने तो नही।
      फिलमवाले पहले अच्छे थे। माँ, बहन, भाई, होली, दीवाली, राखी, लोरी सभी पर गीत लिखते थे। होली में मद और मादकता है, इसलिए आज भी यदा-कदा होली गीत फिल्माए जाते हैं। माँ पर तो मुझे लगता है, सबसे ज़्यादा गीत लिखे गए।
            “जिनकी माँ होती है, खुशकिस्मत होते हैं,
            जिनकी माँ नही होती, जीवन भर रोते हैं।“
      छममकछल्लो इन गीतों से ही आज की बात पूरी करेगी। जो गीत भूल या छूट जाए, उसे माँ की बाकी जगत सन्तानें पूरा करेगी। देख भी लें। हो जाए आज फिर से एक और परीक्षा!  
      छममकछल्लो जैसी संतान माँ को मस्का मारती है और बड़े आराम से अंटी ढीली कर जाती है। माँ अपने भूले-बिसरे गर्व में कहती रहती है- “अरे मेरे पास तो सात-सात बेटे हैं। एक –एक कौर भी एक –एक बेटा देगा तो पेट भर जाएगा।“ किसी भी बेटे के पास कौर का एक टुकड़ा भी नहीं होता, भले माँ दूसरों के बेटों से एक कौर भात या एक रोटी मांगे। और क्यों ना मांगे! आखिर को वह उसकी जगत माता है और वह उसकी जगत संतान! केवल गाने से काम थोड़े न बनता है! लेकिन, संतान गाती है-
            “कौन सी वो चीज है जो यहाँ नहीं मिलती,
            सबकुछ मिल जाता है, लेकिन हाँ, माँ नहीं मिलती।“
      खुश माँ डगरे का बैगन बन जाती है, जिसे जो चाहे, जिधर से डुला ले। दिक्कत यह है कि माँ को पत्नी की तरह एक पतिव्रत नहीं बनाया गया। एक बच्चा ही जनती तो शायद एक संतान की माँ का खिताब मिल भी जाता। लेकिन इसमें भी उसकी मर्ज़ी कहाँ रही? जितनी मर्ज़ी घरवालों की, बच्चे जने और अपने बच्चों की माँ के साथ साथ जगज्जननी बने। माँ मुसकुराती है और प्यार से जगत संतान के लिए पूरी-छोले बनाती है। कर्जा चढ़ा तो क्या हुआ! बच्चे तो खुश! बच्चे पूरी-छोले खाने से पहले गाते हैं-
            माँ मुझे अपने आँचल में छुपा ले, गले से लगा ले,
            कि और मेरा कोई नहीं।
और खाने के बाद-
            “माँ तुझे सलाम, अम्मा तुझे सलाम” गाते अपनी राह निकल जाते हैं।
      हमारी महान भारतीय संस्कृति कहती है कि हम पेड़-पौधे, पशु पक्षी, नदी- तालाब, पत्थर- माटी, धरती सभी को माँ कहकर पूजते हैं। इतनी माँओं को पूजने के क्रम में अपनी माँ छूट जाती है तो कोई अपराध तो नहीं हो जाता! कितनी माँ को याद रखे कोई! अपनी संस्कृति में सीता, दुर्गा, काली, शक्ति, पार्वती, संतोषी- सभी माँ हैं। पता नहीं, राधा, रुक्मिणी, सत्यभामा माताएँ क्यों नहीं कहलाईं? गहन शोध का विषय है ये। लेकिन छममकछल्लो नहीं करेगी यह शोध। उसकी जगत सन्तानें ले ये जिम्मा! केवल:
            “बीबी, बेटी, बहन, पड़ोसी, सबमें थोड़ी-थोड़ी सी,
            दिन भर एक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी माँ”
कहकर उसे महानता के “हर-हर गंगे, पाप तरंगे” कहकर झाड पर चढ़ा देंगे और अगली ही लाइन में उतार कर गर्त में भी फेंक देंगे- “पुण्य हमारे घर, पाप तुम्हारे घर!” लो जी, और खिलाओ पूरी-छोले!
      अपने पूतों को जनमते ही धार में बहानेवाली जगत पूतों पर वरदान की लहरें बहाती माँ गंगा तो और भी रहस्यमई हैं। गंगोत्री से निकलकर परम पावन आर्यावर्त के शहर दर शहर होते हुए, वहाँ की भूमि और वाशिंदों को पुण्यवान करती, उनके धंधे- पानी का सारा इंतज़ाम करती गंदी होती चली जाती है- “राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप ढोते-ढोते!”
      वह कहती है- “मेरे बेटो! मेरी आरती मत उतारो, मुझे ज़रा साफ कर दो, ताकि मैं अपनी साफ लहरों के साथ बहकर तुमलोगों को भी साफ रख सकूँ।“ मगर बच्चे बड़े हो गए है- कद्दावर! राष्ट्र के पहरुए! वे कहते हैं- “चुप बुढ़िया! बैठी रह एक कोने में! हम जवान गबरू लोग! जो चाहेंगे, करेंगे, जैसे इस देश की अन्य लड़कियों, औरतों के साथ करते हैं।“ और आरती के बाद का सारा जमा कचरा उसी गंगा में बहा देते हैं, जिसकी अभी-अभी माँ कहते हुए आरती उतारी है! गंगा तो माँ है ना, सो चुप लगाना ही उसका धर्म है। आखिर बड़े बड़े लोग उसे माँ कहते हैं, धर्म और संस्कृति के नाम पर उसकी रक्षा के लिए तैयार हैं। रक्षक मुसकाते और गाते हैं-
            “तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है, प्यारी-प्यारी है,
            ओ माँ, ओ माँ!”
      बड़े-बड़े लोग अपनी सगी माँ से भी आशीष लेने जाते हैं, जैसे माँ को देखे और उनके चरण छूए बिना उनकी भोर ही नहीं होती। पद और पद का ताज पहनते वक़्त उसे टीवी के सामने बैठा देते हैं। साहेब जी, आपकी माँ के लिए क्या आपके दरबार में इतनी जगह नहीं कि वह आपका राज्याभिषेक अपनी आँखों से देखे, दूर की दृष्टि से नहीं! दरबार तो ऐसे ही बूढ़े लोगों से भरा पड़ा है। माँ के लिए जगह नहीं थी या कोई प्रोटोकॉल था? दूसरी माँ तो होती हैं अपनाए अपने लाडले-लाडलियों के संग।
      जैसा कि छममकछल्लो ने ऊपर कहा कि माँ तो माँ है। वह हर हाल में खुश रहती है और संतान के भले के लिए ही सोचती है। लेकिन हम उसकी संतान! जब दिखावे का समय हो, नजरें और हाथ माँ के पैरों पर। माँ भोली है, प्यारी है, इसलिए निश्छल भाव से सर पर हाथ फेरती आशीष देती है। इस देने के क्रम में हम देखते हैं कि बच्चे का सर थोड़ा गंजा हो जाता है, चेहरे पर थकान झलकती है, बाल, दाढ़ी, मूंछ के संग-संग भौंहों के बाल भी सफ़ेद हो जाते हैं। लेकिन, माँ के लिए तो हर उम्र का बच्चा उसकी गोद के बच्चे सा ही होता है- मासूम, प्यारा। हालांकि वह सब समझती है और मन ही मन कहती है-
            “ अम्मा देख, हाँ देख, तेरा मुंडा बिगड़ा जाए!”

लेकिन बिगड़े छोरे को संभालने के लिए उसके हाथ अब बेहद कमजोर हो चले हैं। उस हिलते हाथ से केवल सर ही फेरा जा सकता है। उसे अपनी उम्र का भी तो अंदाजा है। दम अटकते देर ही कितनी लगती है! तब महान भारतीय संस्कृति के मुताबिक मुखाग्नि के लिए तो इसी बिगड़े छोरे से ही आस रहेगी ना! ####  

Tuesday, July 14, 2009

ओह, यह जकड़न

लोग और शास्त्र माँ को जाने क्या-क्या कहते है, किस-किस रूप में पूजते हैं. मगर वही माँ जब अपने बच्चे के प्रति निर्मम हो जाए तो उसे क्या कहेंगे. वह भी ऎसी-वैसी निर्ममता नहीं, उसके व्यक्तित्व, चत्रित्र व् शील के प्रति निर्ममता. अभी-अभी एक ऎसी माँ के बारे में पता चला जो अपने बेटे से अपनी यौन इच्छा की संतुष्टि चाहती है. बेटा दिग्भ्रमित है. यह वर्जित फल उसे आकर्षित भी कर रहा है और दारा भी रहा है. वह पूछ भी नही पा रहा है की यह उसका भ्रम है कावल, माँ के व्यवहार कोदेखा कर या वह खुद ही ऐसा-वैसा कुछ सोच बैठा है. बेटा राम भी जाना चाह रहा है. उम्र के इस मोड़ पर है की इस वर्जित फल का स्वाद भी चखना चाह रहा है. लेकिन आनेवाले परिणामों के प्रति सचेत भी नही होना चाह रहा है. माँ की अपनी बात है. पति परदेश में है. उसकी भी तो इच्छा है ही. अपनी इस इच्छा की पूर्ती वह कैसे करे, वह भी शायद तय नही कर पा रही. जभी तो वह भी कुछ खुल कर नही बता पा रही. समाज का दवाब दोनों पर है, कुछ नैतिक तकाजे से दोनों जकडे हुए हैं. आप से कोई राय नही मांगी जा रही है. बस यह एक स्थिति है, किसी के जीवन की, हो सकता है, बहुतों के जीवन की यह स्थिति हो. वैसों को शायद इससे कोई अपनी ज़बान मिल जाए. मन का कोई समाधान मिल जाए. या तो समाज की फ़िक्र करें, या आनेवाली किसी भी स्थिति से निपटने के लिए खुद को तैयार कर लें. मन की बात सच्ची होती है. मन की मानें और जो मन कहे, उसे करें. पर कराने से पहले एक बार ठंढे दिमाग से ज़रूर सोच लें. ऐसा ना हो की कानून और समाज का सामना ना कर सकें और फिर खुद को गाली देते रहें.