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Friday, October 2, 2009

व्यक्ति को कोसिए, संस्था को नहीं

http://mohallalive.com/2009/10/02/vibha-rani-react-on-royalty-statements-controversy/


जी, आज छम्मक्छल्लो नहीं, विभा रानी कह रही है, क्योंकि बात पर बात जब निकलेगी तब विभा रानी के लेखन पर भी आएगी। हिंदी का साहित्य जगत शायद अभी तक छम्मक्छल्लो से वाक़िफ नहीं हुआ है। भारतीय ज्ञानपीठ में भी विभा रानी की किताबें हैं और “नया ज्ञानोदय” में रचनाएं।
मगर पहले तो यह तय कर लें कि बात रॉयल्टी और स्टेटमेंट की की जा रही है या संस्थान की। संस्थान को कभी भी उसे आज के चलानेवाले के साथ बराये मेहरबानी जोड़ कर न देखें। भारतीय ज्ञानपीठ आज भी बहुत प्रतिष्ठित संस्थान है। सिर्फ यह हो गया है कि उसे चलानेवाले संस्थान के नाम पर अपनी दुकान, अपनी लिप्सा, अपनी चाहत चला रहे हैं, अपनी राजनीति और चापलूसी की जुगलबंदी बजा रहे हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ से दो मैथिली उपन्यास (अनुवादक : विभा रानी) के अनुवाद छपे हैं : प्रभास कुमार चौधरी का “राजा पोखरे में कितनी मछलियां” और लिली रे का “पटाक्षेप”। ये दोनों ही लेखक साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हैं। आज तक यहीं से पूरा स्टेटमेंट व रॉयल्टी मिलती रही है। यह वह सगर्व सभी को बताती रही है। हां, अभी के स्टेटमेंट पर ध्यान नहीं दिया है।
बात संस्थान की नहीं है। बात हमेशा उसे चलानेवाले की होती है। संस्थान की स्थापना हमेशा अच्छे उद्देश्यों को ले कर की जाती है। जब तक उस पर अच्छे लोग बैठे रहते हैं, संस्थान अच्छे कलेवर में रहता है। लेकिन जब उस पर बैठकर अपने सपनों की नैया अपने चहेतों को ले कर खेने जाने की इच्छा बलवती होती है, तो संस्थान का नाम खराब होता है। यह किसी भी संस्थान पर लागू होता है। जो संस्थान जितना अधिक प्रतिष्ठित होता है, उस पर ऐसी आंच उतनी ही अधिक तेज आती है।
दूसरे, बात केवल रॉयल्टी की ही न करें। जिसने भी मोहल्ला पर बेनामी पोस्ट डाला है और जिसके लिए लोग हाय तौबा कर रहे हैं कि अगर वह ख़ुद इतना बड़ा ईमानदार है तो नाम बताये, तो भैया, ऐसे मामलों में नाम छुपाना लेखक के लिए ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि बाक़ी समय भले प्रकाशक एक दूसरे पर छींटाकशी करते रहें, मगर हैं सभी एक ही थैले के चट्टे-बट्टे। और पैसों के मामले में सभी दूध शक्कर हो जाते हैं। मुंहामुंही बात फैलती है कि अमुक लेखक पैसे के लिए बहुत किच-किच करता है और सभी प्रकाशक लामबंद हो जाते हैं और एक अघोषित नीति के तहत उस लेखक को छापना बंद कर देते हैं। अब हर लेखक प्रकाशक तो नहीं हो सकता। जैसे किसी को चीनी की ज़रूरत होने पर वह चीनी की ही दुकान खोल कर बैठ जाए, यह संभव नहीं।
अभी अभी एक नये से प्रकाशक से अपनी पांडुलिपि की बात करने पर उसने मुझसे कहा कि अब अगर उसे कहीं से एकमुश्त ऑर्डर मिल जाते हैं, तो वह किताब तुरंत छाप देगा। यानी कि प्रकाशक तो पहले से ही व्यवसायी हैं, अब वे आज के ढर्रे की पूरी की पूरी मार्केटिंग पर उतर आये हैं। नौकरी चाहिए तो बिजिनेस लाइए की तर्ज पर किताब छपानी है तो ऑर्डर लाइए! एक प्रकाशक ने कहा कि वह यह देखता है कि फलां लेखक बिकाऊ है, तभी वह उसकी किताब छापता है। उस लेखक/प्रकाशक को मेरी मैथिली की कहानियां पसंद आती हैं। उन्हें वे छापते भी हैं। मैथिली साहित्य में मेरा स्थान निर्धारण भी करते हैं, मगर हिंदी कहानियों या कथा संग्रह के नाम पर कहते हैं कि मेरा नाम तथाकथित रूप से बिकाऊ नहीं है तो भारतीय ज्ञानपीठ ने तो तब मेरी किताबों को छापा, जब मेरा नाम सचमुच उतना परिचित नहीं था। या यह भी हो सकता है कि आज भी यह ख़ामख्याली में मैं जी रही हूं कि लोग मुझे और मेरे नाम को जानते हैं।
लेकिन जैसा कि कहा कि संस्थान के साथ जब अलग क़िस्म के लोग जुड़ जाते हैं, तब संस्थान का नाम खराब होता है। भारतीय ज्ञानपीठ ने जब “नया ज्ञानोदय” प्रभाकर श्रोत्रिय के संपादकत्व में निकालना शुरू किया, तब मैं भी इससे जुड़ी। श्रोत्रिय जी ने बड़े-बड़े प्रयोग भी किये। मसलन, जेल के कैदियों की कविताएं छापीं। मुझसे कहकर जेल के बच्चों पर स्टोरी करवायी। चूंकि मैं जेलों में काम करती हूं, इसलिए उनकी अगली योजना जेल की महिला क़ैदियों पर स्टोरी करवाने की थी। लेकिन उनके जाने के कारण यह योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी।
श्रोत्रिय जी के ही समय में मैंने एक कहानी “होठों की बिजली” भेजी थी। संयोग कि कुछ समय के बाद वे वहां से चले गये। कालिया जी के आने के बाद मैंने उनसे उस कहानी की स्थिति के बारे में जानना चाहा, मगर उनकी ओर से केवल आश्वासन मिला। श्रोत्रिय जी के समय में ही मैंने मैथिली की सुप्रसिद्ध लेखक लिली रे की कहानी “चक्र” भेजी थी, जिसे कालिया जी के संपादकत्व में “नया ज्ञानोदय” के सितंबर, 2007 के अंक में छापा गया, मगर उसका शीर्षक कर दिया गया, “बारिश और पावरोटी”। हो सकता है, कथा की ओर ध्यान खींचने के लिए उसका शीर्षक ज़रा ग्लैमरस कर दिया गया हो, मगर लिली जी के लेखन व उनके स्वभाव को देखते हुए यह शीर्षक उनकी कथा के उपयुक्त नहीं था। इस ओर और अपनी कहानी “होठों की बिजली” की स्थिति के बारे में जानने तथा अपनी कहानियों तथा नाटक की पांडुलिपि भेजने के बारे में मैंने रवींद्र कालिया जी को 10/10/2007 को एक पत्र लिखा था। मगर अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज तक इस पत्र का जवाब देना गवारा तक नहीं किया गया।
मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि प्रकाशक और संपादक को यह पूरा का पूरा अधिकार है कि वह अमुक किताब या रचना छापे या न छापे। मगर यह लेखक के भी उतने ही अधिकार में है कि उसके पत्र पर कार्रवाई हो और उसे तदनुसार सूचित किया जाए। मैं अपनी रचना की बाबत जवाब न आने तलक उसे किसी और को नहीं भेजती। मगर पहली बार मैंने भारतीय ज्ञानपीठ से बग़ैर कोई सूचना के “होठों की बिजली” जनमत को भेजी। पाठकों का बड़प्पन कि इसके छपते ही छम्मक्छल्लो के पास बधाइयों के फोन पर फोन आने लगे। मगर आज तक कालिया जी की तरफ से 10/10/2007 के पत्र का कोई जवाब नहीं आया।
आप लामबंद होना चाह रहे हैं तो होइए, मगर व्यक्ति के खिलाफ उठिए, संस्थान के खिलाफ नहीं। क्योंकि कल को कोई बेहतर संचालन करनेवाला आ गया तो आप ही फिर इस संस्था के गुनगान करने लग जाएंगे। इसलिए भारतीय ज्ञानपीठ को मत कोसिए। बाकी के लिए इशारा ही काफी है। आखिर को आप सभी समझदार हैं, बहुत अधिक

Thursday, October 1, 2009

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल

http://janatantra.com/2009/10/01/nehru-centre-theatre-festival/

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल 3 से 14 अक्तूबर, 2009 तक आयोजित हो रहा है। 12 दिनों तक चलने वाले इस फेस्टिवल में मलयालम, उर्दू और बांग्ला के कुछ पुरस्कार विजेता नाटकों की भी प्रस्तुति होगी। 3 अक्तूबर, 2009 को फेस्टिवल की शुरुआत मराठी संगीत नाटक के “मदन भूल” से की जाएगी। “मदन भूल” गिरीश कर्नाड के मशहूर नाटक “फूल”या ‘फ्लावर्स’ से अभिप्रेरित है। इसे नेहरु सेंटर, मुंबई प्रस्तुत कर रहा है। इसके अलावा इस फेस्टिवल में अलग अलग भाषाओं के 14 नाटक प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह फेस्टिवल नेहरु सेंटर की ओर से मुंबईकरों के लिए एक उपहार है। इसलिए इसके पास पर “निमंत्रण” शब्द छपा है, जो दर्शकों को एक भावात्मक संतुष्टि देता है। विस्तार से जानने के लिए आप इस लिंक का उपयोग कर सकते हैं।
थियेटर फेस्टिवल का ब्योरा
पास न होने पर भी निराश होने की अधिक आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा देखा गया है कि लोग बाग अपने अपने बंधु बांधवों के लिए पास ले कर रख लेते हैं, मगर जब वे लोग नहीं पहुंच पाते, तब वे बिना पास के आए लोगों को अपने पास दे देते हैं। नेहरु सेंटर का ऑडिटोरियम भी काफी बडा और नाटक के अनुकूल है। इसलिए एक बार सभी पास धारियों के अंदर चले जाने के बाद अगर सीट बची रहती है तो वे दूसरों को भी अंदर ले लेते हैं। कई कई बार तो लोगों ने खडे होकर भी नाटक देखे हैं। नेहरु सेंटर ऐसे थिएटर प्रेमियों को सामान्यत: निराश नहीं करता।

Monday, September 28, 2009

हां जी, हमसे अलग रहें, हम ‘कपडे’ से हैं!

छम्मक्छल्लो क्या करे! प्रकृति ने भी उसके साथ नाइंसाफी की है. वर्षों पहले आचार्य देवेंद्रेनाथ शर्मा का एक लेख उसने पढा था, जिसमें महिलाओं से ईर्ष्या जताते हुए लिखा गया था कि महिलाओं के कितने सुचिक्कन, कोमल गाल होते हैं, जबकि पुरुषों की इतनी बडी बडी दाढी. कहीं भी जाओ आओ, यह दाढी एक समस्या बन कर खडी हो जाती है. आचार्य देवेंद्रेनाथ शर्मा छम्मक्छल्लो के पसंदीदा लेखकों में से एक हैं, इसलिए उसे उनकी इस बात पर बडा मज़ा आया. वह सच में सोचने लगी कि सचमुच, प्रकृति ने पुरुषों के साथ क्या अन्याय कर दिया. उसके भी गाल स्त्रियों की तरह ही सुचिक्कन रहने देते.

तभी छम्मक्छल्लो का ध्यान अपनी सामाजिक रीति नीति पर पडा. तब वह बहुत छोटी थी, इतनी कि कभी भी कुछ भी पूछने पर उसे डांटकर भगा दिया जाता था. उसके मोहल्ले में एक परिवार रहता था. छम्मक्छल्लो को वहां हर महीने तीन चार दिनों के लिए खाना बनाने के लिए बुला लिया जाता था. पूछने पर वही डांट या जवाब कि "बडी हो कर सब समझ जाओगी." या फिर, "बडों के बीच में क्या आ जाती हो सुनने के लिए?" सचमुच बडी होने पर समझ में आया कि उसे वहां खाना बनाने के लिए क्यों बुलाया जाता था? इसलिए कि वहां की बहू हर महीने अपने स्वाभाविक ऋतु चक्र से गुजरती थी. यह चक्र एक वैज्ञानिक शारीरिक प्रक्रिया है, जिससे हर स्वस्थ लडकी और स्त्री को वैसे ही गुजरना होता है, जैसे हर लडके या पुरुष के चेहरे पर मूंछ दाढी का उगना. लेकिन मूंछ दाढी का उगना या उसका बढना अछूत की परम्परा में नहीं आता.

तो उस बहू को महीने के हर तीन चार दिन खाना तो बनाने नहीं ही दिया जाता था, उससे अछूतों से भी बदतर व्यवहार किया जाता था. उसके लिए अलग से ज़मीन पर एक चटाई दे दी जाती थी और एक फटी पुरानी सी चादर और एक तकिया. उसके लिए थाली अलग होती थी. वह घर के नल पर खुद से हाथ मुंह नहीं धो सकती थी. उसे खाना पानी सब कुछ एक हाथ ऊपर से दिया जाता था. तीन दिन के बाद नहाने के बाद अपने ही नहाए कपडे वह नहीं छू सकती थी. धोबी आ कर उन कपडों को ले जाता था. गर्मी उसे ताड के एक टूटे पंखे के सहारे बितानी होती थी और सर्दी में तो उसकी हालत और भी दयनीय हो जाती थी. उसे उसी चटाई अपने एक फटे पुराने कम्बल के सहारे गुजारनी होती थी. उसकी गोद में एक छोटी सी बच्ची थी. महीने के उन तीन दिनों में उस बच्ची के लिए भी वही व्यवस्था होती थी. उसे किसी के पास नहीं जाने दिया जाता था और उसे भी तीन दिन अपनी मां के साथ वैसे ही गुजारने पडते थे.अगर किसी ने उस बच्ची को गोद ले लिया तो उसे उसी समय नहाना पडता था.

अपना देश धार्मिक है, इतना कि हर काम धर्म के छन्ने से ही छन कर आता है. ऋतुचक्र की यह स्वाभाविक प्रक्रिया कब धर्म और छुआ छूत से जोड दी गई, इसका पता छम्मक्छल्लो को नहीं है. वैज्ञानिक और चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि कहती है कि इस समय में अतिरिक्त स्राव से कमज़ोरी आने के कारण तनिक आराम की ज़रूरत है. लेकिन आराम की इस प्रक्रिया से गुजरना वैसा ही है, जैसे कोई आपको चार तमाचे लगा कर मिठाई खिलाए.

छम्मक्छल्लो के घर में संयोग से यह परम्परा नहीं थी, शायद मां के कामकाजी होने की वज़ह से. मगर अन्य बातें, जैसे तीन दिनों तक पूजा घर में नही जाना, पूजा नहीं करना, भंडार से सामान नहीं निकालना, घी और अचार के बोइयाम को तो हाथ भी नहीं लगाना, बदस्तूर जारी था. आज भी कई घरों में यह जारी है. छम्मक्छल्लो से बहुत कम उम्र की एक लडकी ने कहा, "आंटी, सच में अगर आपने पीरियड्स में अचार छू दिया तो उसका रंग खून की तरह ही लाल हो जाता है. भगवान को छू लो तो उनके कपडे दाग़ से भर जाते हैं. इतनी ख़राब होती है यह ‘चीज़.’ सच में इतनी ख़राब चीज़ यह होती है. गुपचुप बात ही इस पर की जा सकती है, खुल कर नहीं. पता नहीं क्यों औरतों की हर बात ही गुपचुप सी कर दी गई है, यहां तक कि उसकी शख़्सियत को भी.

छम्मक्छल्लो ने भी प्रयोग किया. मगर उसकी बदक़िस्मत कि अचार का रंग कम्बख़्त लाल हुआ ही नहीं और ना ही भगवान के कपडे दागदार हुए. छम्मक्छल्लो ने यह भी किया कि दशहरा, दीवाली, तीज़ आदि में भी भगवान की पूजा कर ली. उसने तो भगवान को चुनौती दे डाली कि पूजा करानी है तो अब तो इसी हालत में करानी होगी. इतनी ही शुद्ध पूजा चाहिये थी तो दो-चार दिन अवधि आगे बढा देते अपने प्रताप से.

छम्मक्छल्लो समझ नहीं पाती कि शुद्धता- अशुद्धता का यह खेल महिलाओं के साथ क्यों? और आप सब सावधान, छम्मक्छल्लो एक और बोल्ड बात कहने जा रही है. शुद्धता- अशुद्धता का यह खेल महिलाओं के साथ शादी के बाद भी होता है. नई-नई शादी, सुबह-सुबह उठना और सुबह उठने पर सबसे पहला फर्मान यह कि नहाओ. बग़ैर नहाए उसे कुछ छूने नहीं दिया जाता, उसे रसोई में नहीं जाने दिया जाता. कहा जाता है कि उसकी देह अशुद्ध हो गई है. यह अशुद्धता उसके पति के साथ नहीं लागू होती. नहाना-धोना शारीरिक स्वछता हो सकती है. यह सेहत के लिए अनिवार्य है. यह भी सही है कि सुबह सुबह के स्नान से मन दिन भर ताज़ा और हल्का बना रह्ता है. मगर बात शुद्धता- अशुद्धता की आ जाती है. गर्मी में तो सुबह-सुबह नहाना फिर भी चल जाता है, मगर सर्दी में?

छम्मक्छल्लो को एक दोहा याद आता है, जो छम्मक्छल्लो जैसी दुखी आत्माओं को खुश करने के लिए किसी ने लिख दिया होगा-
"नारी निन्दा मत करो, नारी नर की खान
नारी से नर होत हैं, ध्रुव- प्रह्लाद सुजान"
लेकिन कूढमगज छम्मक्छल्लो को तो इसके बदले यही लगता है
"नारी की निन्दा करो, नारी नरक की खान
भले नारी पैदा करे ध्रुव- प्रह्लाद सुजान"
इसलिये समाज के कर्णधारो, हमारी देह के नरक में मत पडो. यह भी मत सोचो कि इस नारी में कोई ना कोई नारी तुम्हारी मां, बहन, बीबी, बेटी भी होगी ही. पता नहीं, अपनी ही मां, बहन, बीबी, बेटी को नर की खान कहने के बजाय उसे नरक की खान कहने में बुरा क्यों नहीं लगता? छम्मक्छल्लो को तो लगेगा, अगर कोई उसके पिता, भाई, पति, बेटे के लिए ऊल-जुलूल बोले.
भला हो विज्ञापनवालों का कि उसने धीरे-धीरे टीवी पर सेनिटरी नेपकिन के प्रचार करने शुरु कर दिए. इसके लिए भी बडी चिल्ल-पों मची. कच्छे बनियान के प्रचार के लिए नहीं मची जी. वही भारतीय संस्कृति, कि टीवी पूरा परिवार देखता है, ऐसे विज्ञापन लोगों को शर्मसार करते हैं. शर्मसार करने के लिए सिर्फ औरतें ही तो बनी हैं या उनसे जुडी चीज़ें या बातें. फिर भी यह प्रचार बडे दबे-छुपे तरीके से होता था- इशारे में. इधर पहली बार एक सेनिटरी नेपकिन के प्रचार में देखा कि ‘पीरियड्स’ शब्द का बडे खुल कर, मगर बडे अच्छे तरीके से इस्तेमाल किया गया है. छम्मक्छल्लो इसके लिए सभी को धन्यवाद देना चाहती है. कहना चाहती है कि हम या हमारी देह या देह के कार्य-व्यापार शर्म की वस्तु नहीं है. इसलिये इतना घबडाइये नहीं, शर्माइये नहीं. शालीनता से कही बात हमेशा शालीन ही होती है.

Sunday, September 27, 2009

कन्या जिमाइये, छुट्टी पाइए!

मोहल्ला लाइव पर पढ़ें यह लेख। http://mohallalive.com/2009/09/27/vibha-rani-satirical-article-on-male-female-debate/

छम्मक्छल्लो की तरह आप भी इस कहावत से होंगे कि बारह बरस पर घूरे के भी दिन फिरते हैं। मगर हमारा धर्म उदार है। वह इतनी लंबी तपस्या नहीं कराता। वह स्त्रियों के बारे में भी बडा उदार है। वह कहता है कि जहां नारियों की पूजा होती है, वहां ईश्वर का वास होता है। वह तेज़, तप, शक्ति, बल, चरित्र, ममता, प्रेम सतीत्व – सभी के लिए स्त्री की पूजा करता है। इसके लिए वह किसी लड़की के स्त्री बनने तक की प्रतीक्षा नहीं करता। जन्म के बाद से ही उसकी आराधना करना शुरू कर देता है।
अभी नवरात्रि की धूम है। इसके पहले गणपति का उत्सव था। उसमें गणपति के साथ-साथ गौरी की पूजा हुई। उसके एक दिन पहले हरतालिका होती है। उसमें शंकर के साथ साथ पार्वती की पूजा हुई। इसके पहले जन्माष्टमी पर कृष्ण के साथ राधा की और श्रावण में शंकर के साथ पार्वती की हुई। सीता और राधा के लिए तो अलग से राधाष्टमी और जानकी नवमी है ही। नवरात्रि के बाद दीवाली आएगी। उसमें लक्ष्मी और काली की पूजा होगी। सभी में नारी या कह लें कि देवी के विविध रूपों की पूजा होती है। बड़ी श्रद्धा व भक्ति से इन तमाम देवियों की आराधना की जाती है। नवरात्रि में सप्तमी से ले कर नवमी तक घर-घर कुंआरी कन्याएं जिमायी जाती हैं। सभी उन्हें जिमाते हैं, दान-दक्षिणा देते हैं। और तो और, उनके पैर भी छूते हैं।
बस जी बस, इसके आगे नहीं। अपन ने की आराधना और पायी छुट्टी। इससे अधिक अपने बस की बात नहीं है। देवी को पूज लिया या कन्या जिमा लिया, तो इसका यह मतलब मत निकालिए कि हम कन्याओं या बेटियों के प्रति ज़िम्मेवारियों से भर गये। न जी न, यह बैठे-बिठाये रोग पालने वाली बातें हमसे न करो। जी, यह तो पूजा-पाठ की बातें हैं। सो पूजा पाठ कर लिया, धर्म निभा लिया। इसके लिए अपने घर में बेटी तो नहीं पैदा की जा सकती न। अखिर अपने घर की बेटी को तो हम कन्या जिमाने के लिए बिठाते नहीं। उसके लिए तो दूसरे के घर की बेटियों को ही लेते हैं। बेटा ब्याहने के लिए भी दूसरे के घर की बेटी को लाते हैं। बेटी पैदा करने या उसे पालने-पोसने, उसकी रखवाली करने, उसे सुरक्षित रखने के इतने सारे ताम-झाम हमसे नहीं होते जी। इसलिए हम तो अपने घर में बेटियां पैदा ही नहीं होने देते। सरकार कहती रहे कि लिंग जांच अपराध है, समाजसेवी ढिंढोरा पीटते रहें कि कन्या भ्रूण हत्या न करें। आंकड़े बताते रहें कि देश में 1000 लड़के पर केवल 833 लड़कियां रह गयी हैं। अपन को इन सबसे क्या?
कहावत है न कि जहां चाह, वहां राह। सो न तो डॉक्टरों की कमी है न क्लिनिकों की। कमी है तो सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति की। मेरी सलाह मानिए, अपनी इच्छा शक्ति जगाइए और कन्या गर्भ से मुक्ति पाइए। देवी-पूजा और कन्या भोजन की चिंता ना करें, देवी तो तय ही है, न तो वो बदलनेवाली हैं, न तो उनकी संख्या में कोई कमी या इज़ाफा होनेवाला है। रह गयी कन्याएं, तो देश में सिरफिरों की कमी तो है नहीं। कोई न कोई कन्या पैदा करेगा ही। आप उसी को जिमा कर पुण्य कमा लीजिएगा। आखिरकार, सभी तो मंदिर नहीं बनाते न। मंदिर तो कोई-कोई ही बनाता है, पूजा तो मगर सभी करते हैं कि नहीं। सो मेरी सलाह पर गौर फरमाइए। अभी भी समय है, अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। अपनी ज़‍िंदगी संभाल लीजिए और इन सब पचड़े में मत पड़‍िए। बस सीधे-सीधे कन्या जिमाइए, छुट्टी पाइए!

Saturday, September 26, 2009

तुलसीदास जी, अच्छा हुआ, आप मोहल्‍ला युग में नहीं हैं!

पढ़े यह लेख इस पर भी। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/09/26/vibha-rani-writeup-on-carbon-copy-literature/
हे गुसाईं बाबा, अच्छा हुआ जो आप इस युग में नहीं हैं। यह युग बहुत उन्नत है, नयी नयी तकनीक है, नये नये लोग हैं। एक समय था, जब लिखने की परंपरा नहीं थी, इसलिए गुरु अपने शिष्यों को सबकुछ कंठस्थ करा देते थे। फिर भोज पत्र आया। लिखने की नयी नयी तकनीक विकसित हुई और अब तो कागज कलम की ज़रूरत भी नहीं है। बस एक अदद पीसी हो, टाइप करने आता हो, मन में भाव का अभाव भी हो तो कोई बात नहीं। इतनी सारी बातें हैं कि भाव अपने आप पैदा हो जाएंगे। नहीं हुए तो मन, तन, दिल, दिमाग सबका सेजेरियन करवा देंगे भाई साब! यह महिलाओं की ही प्रसव पीर नहीं है, इसमें बड़े बड़े दिग्गज सद्पुरुष हैं जो ताल ठोक कर लेखन के अखाड़े मे उतरते हैं और धरती की सारी औरतों की ऐसी तैसी करते हुए अपने मर्दाने लेखन पर क़ुर्बान कुर्बान जाते हैं। औरतें तो हैं ही गालियां खाने के लिए। कायरता की प्रतीक, औरत की चूडियां, कमज़ोरी की निशानी, औरतों के आंसू। उन मर्दाना लेखक और उससे भी बढ़के उस वेबसाइट के माननीय मॉडरेटर महोदय कि उसे जस का तस छाप देते हैं। शायद यहां भी टीआरपी का सवाल है।
यही हाल लेखकों का है। एक तो हिंदी जगत में सभी महान लेखक हैं। वे ब्रह्मा और वेदव्यास से भी बड़े हैं। वे जो लिख देते हैं, वह परम और चरम सत्य हो जाता है। इतना परम और चरम कि उनकी केवल स्तुति ही की जा सकती है, उसके खिलाफ कुछ बोला या लिखा तो यक़ीन मानिए कि आपके सात जनम के पुरखों तक का तर्पण हो जाएगा।
अब मोहल्ला लाइव ने एक नया बिगुल छेड़ दिया है। वह अचानक लेखकों के लेखन के असली और नकलीपन की शिनाख्त में लग गया है। शब्दों और समय के धनी पिल पड़े हैं अपनी अपनी ज़ोर आजमाइश में। पहले अरविंद चतुर्वेद और प्रदीप सौरभ की कविताओं को ले कर हुआ, अब फिर से गीत चतुर्वेदी और किसी और की कविता को ले कर हो रहा है। कहा जा रहा है कि यह नकल है। अरे, ज़िंदगी नकल करते बीत जाती है, अब किसी ने किसी की कविता के भाव चुरा लिये कि नकल कर ली तो ऐसा कौन-सा कहर बरपा हंगामा हो गया जनाब! यह नहीं सोचते कि नकल नहीं करते तो अब तक बंदर ही बने घूम रहे होते।
छम्मक्छल्लो ने ये कविताएं पढीं। कविता में उसका हाथ वैसे भी ज़रा तंग है, फिर भी उसे नहीं लगा कि यह नकल है। हम सभी क्रिएटिव हैं और यह बहुत संभावनापूर्ण हो सकता है कि कई लोगों के मन में एक स्थिति को ले कर विचार पैदा हों और लिखने में एक समानता आ जाए। अभी-अभी हिंदी दिवस गुजरा है। सभी की नज़र में यह एक अनुष्ठान भर था। सभी ने अपने अपने तरीके से इसकी खील बखिया उधेरी। एक बात सभी कहते रहे कि हिंदी को बाज़ार के साथ जोड़ दो, अंग्रेजी की तरह यह सबकी भाषा अपने आप बन जाएगी। अब इसमें नकल को ले कर कोई अखाड़ेबाजी करने लगे तो कोई क्या कर सकता है? अख़बारों में भी एक घटना पर सभी लिखते हैं। कभी-कभी तो दो अखबारों के शीर्षक भी इतने एक से होते हैं कि लगने लगता है कि किसी एक ने ही लिखा है। जी नहीं, छम्मकछल्लो प्रेस विज्ञप्ति की बात नहीं कर रही कि एक ही प्रेस विज्ञप्ति सभी जगह गयी और सभी ने उसे जस का तस छाप दिया। अगर इस समान से शीर्षक को ले कर दो अखबार आपस में पिल पड़ें तो?
छम्मकछल्लो बहुत सुकून से है कि गोस्वामी तुलसीदास इस समय में नहीं हुए वरना क्या पता ऋषि वाल्मीकि उन पर अपनी रामायण की नकल का आरोप लगा देते। नरेंद्र कोहली और तुलसीदास के समय में बड़ा फर्क़ है, वरना गोंसाईं जी उन पर आरोप लगा देते। भगवान सिंह भी बच गये और अभी अभी ‘विश्वामित्र’ उपन्यास लिखनेवाले ब्रजकिशोर वर्मनभी। प्रतिभा राय और वेद व्यास में भी समय का बड़ा अंतर है, नहीं तो वेद व्यास भी कहते कि प्रतिभा राय ने द्रौपदी पर उपन्यास लिखते समय उनकी नकल मार ली है। जब लोग बौद्धिक हैं तो किसने कौन सा साहित्य कब पढ़ा और कब किसकी बात मन पर खुब गयी, किस साहित्य से कौन प्रभावित हो कर क्या लिख जाएगा, इस पर आज तक किसी का कोई एख्तियार रहा है क्या? जैसे कहा जाता है कि पुस्तक की चोरी, चोरी नहीं होती, वैसे ही विचार की चोरी, चोरी नहीं होती। विचार एक दूसरे से मेल खाते हैं। आप और हम उनसे प्रभावित होते हैं। विचार अच्छे लगते हैं तो हम उनका अनुसरण करते हैं, जैसे बुद्ध, महावीर, गांधी, सुभाष आदि के विचार हमारे प्रेरणास्रोत हैं। मगर कोई इनके विचारों को ताक पर रख कर इनकी वेश भूषा अपना ले तो उसे नकल ही कहा जाएगा। आरोप लगाते वक़्त इतना तो सोचें कि आरोप का आधार क्या है? कुछ शब्द किसी से मिल गये तो क्या शब्द किसी की बपौती है? लिखनेवाले ने उनका पेटेंट करा लिया है? और अगर ऐसा ही है तो फिर ऐसा क्या हम और आप लिख रहे हैं जो वेद पुराण या रामायण महाभारत में नहीं लिखा गया है कि जिसे आज के शेक्सपियर, लू शुन, प्रेमचंद, गोर्की या लिओ तॉल्सतॉय नहीं लिख गये हैं?
बहरहाल, छम्मकछल्लो को बड़ा मज़ा आ रहा है। वह लेखक तो नहीं है, फिर भी वह गर्व के साथ कह रही है कि उसने आजतक जो कुछ भी लिखा है, सब नकल कर के लिखा है। उसने तो अपनी आंख खुलने के बाद ही सब कुछ की नकल की है। नकल करके उसने चलना, बोलना, बात करना, लिखना पढ़ना सीखा है। स्कूल कॉलेज के सभी टीचर उसकी नकल के घेरे में इस तरह आ जाते कि कभी वह किसी यू सी झा की तरह अंग्रेज़ी पढ़ाने की नकल करती तो कभी डॉ रामधारी सिंह दिवाकर की तरह कथा साहित्य पढ़ाने की। और तो और, फिल्म देख कर घर आने पर वह सबसे पहले अपनी बहन के सामने उस फिल्म के अभिनेता अभिनेत्री के अभिनय की नकल करती, हेलेन के डांस की नकल उतारती। पहले वह इसे प्रेरणा समझती थी, मगर अभी अभी उसके ज्ञान चक्षु खुले हैं कि नहीं, यह सब प्रेरणा में नहीं, नकल के घेरे में आते हैं। छम्मकछल्लो को लगता है, इससे अच्छे तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री है। भाई लोग पूरी की पूरी फिल्म नकल कर के बना डालते हैं, सेट दर सेट, संवाद दर संवाद, संगीत दर संगीत, मगर लोग उसे “इंस्पायर्ड बाइ” बोलते हैं। “इंस्पायर्ड बाइ” भी बोल दिया तो बड़ी बात हो गयी। अभी हॉलीवुड में बॉलीवुड की बहार है। उसे भी लोग “इंस्पायर्ड बाइ” कहते हैं। ना कहें तो क्या घमासान मचाएं? मचा कर फायदा? मगर शायद मोहल्ला लाइव को है, लोगों को है। आखिर, धींगा मुश्ती देखने का मज़ा ही कुछ और है ना! किसी के दिल के तेल में अपने घर का भी दिया जला लो भाई!

Wednesday, September 23, 2009

फ़िल्म हिन्दी में, चर्चा अंगरेजी में- जवाब में- "हा, हा, ही ही, फिस्स-फिस्स!" !

http://reporterspage.com/miscellaneous/230-4
आज राजा मेनन की फिल्म "बारह आना" देखने गई. इसका आयोजन एंलाइटेन फिल्म सोसाइटी ने किया था. एंलाइटेन फिल्म सोसाइटी मुंबई में दो जगह हर रविवार को विश्व की सभी भाषाओं की बेहद स्तरीय फिल्में दिखाती हैं. ये सभी फिल्में अपने कथ्य, क्राफ़्ट, मेकिंग में इतनी उम्दा होती हैं कि इनके सामने जब हिन्दी फिल्में (कभी-कभी) दिखाई जाती हैं तो वे इन विश्व सिनेमाओं के पासंग में भी नहीं ठहरतीं. इसका सबसे बडा प्रमाण तो यह होता है कि जिस दिन हिन्दी फिल्म दिखाई जाती हैं, उस दिन हॉल में दर्शकों की उपस्थिति नगण्य हो जाती है.

बहरहाल, फिल्म "बारह आना" की बात ना पूछें. "बारह आना" फिल्म के पात्र शुक्ला जी यानी नसीरुद्दीन शाह कह देते हैं- यह ज़िन्दगी बारह आना ही है.. हिसाब लगाएं तो सोलह आना का एक रुपय होता है. यहां बारह आना मतलब- तीन चौथाई रुपया तो मतलब पौनी ज़िन्दगी. फिल्म में ही मुख्य तीन पात्र हैं, यानी इस हिसाब से भी फिल्म पौनी है. और उस पर से फिल्म में से अगर नसीरुद्दीन शाह को निकाल दें तो फिल्म की यह चौथाई क्या, पूरी की पूरी फिल्म ही निकल जाएगी.

हिन्दी फिल्में भी ऐसे ही पौनी-पौनी बनती हैं, जिसमें फिल्म की भाषा, गीत हिन्दी में होते हैं, मगर काम नहीं. स्क्रिप्ट से लेकर सारी बहसें अंग्रेजी में होती हैं. आपके पास फिल्म का प्रोपोजल (जान बूझ कर इस शब्द का इस्तेमाल किया गया है) है, तो उसका अंग्रेजी में होना अनिवार्य है. उस प्रस्ताव में क्या है, यह बताने के लिए भी आपका अंग्रेजी में बात करना आना अनिवार्य है. फिल्म बन गई तो उसके प्रोमो से ले कर उसके प्रचार-प्रसार और उस पर चर्चा, बहस तक सब कुछ अंग्रेजी में होना अनिवार्य है. फिल्म के सारे टाइटल्स तो वैसे ही अंग्रेजी में देने का रिवाज़ है. पूछने पर कह देते हैं कि हिन्दी फिल्म के दर्शक बहुभाषी हैं, इसलिए उन्हें हिन्दी नहीं आती या हिन्दी में पढने में दिक्कत होती है, इसलिए टाइटल्स अंग्रेजी में दिए जाते हैं. फिल्मवाले कहते तो हैं कि फिल्में वे लोगों को जागरुक बनाने के लिए, उन्हें सन्देश देने के लिए बनाते हैं, मगर जिस भाषा में बनाते हैं, उसी भाषा के प्रति लोगों को जागरुक बनाने की बात वे सिरे से भूल जाते हैं. भूल क्या जते हैं, यह उनकी प्राथमिकता में है ही नहीं. न निर्माता-निर्देशकों की, न अभिनेता-अभिनेताओं की.

दरअसल यह सवाल या हिन्दी के बारे में कुछ पूछना ही बडा बेवकूफाना मान लिया जाता है, जिसे छम्मकछल्लो जैसे बेवकूफ जब-तब उठाते रहते हैं. हिन्दी फिल्मों से हिन्दी को प्रचार-प्रसार मिलने की बात कहनेवाले फिल्म निर्माण की इस पूरी प्रक्रिया पर ग़ौर फर्माएं. किसी को भी हिन्दी से लेना-देना नहीं होता है. चूंकि फिल्म हिन्दी में बननी है, इसलिए उसके संवाद और गीत हिन्दी में होने ज़रूरी हो जाते हैं. अब तो वैसे भी फिल्में कस्बे और गांवों के लिए नहीं बनतीं, इसलिए अब सम्वाद भी शुद्ध हिन्दी के न हो कर हिदी-अंग्रेजी के हो गए हैं. यही हालत गीतों की है. तारीफ यह है कि हर भारतीय भाषा-भाषी, यहां तक कि अब विदेशी भी हिन्दी फिल्मों में काम करने का ख़्वाहिशमन्द है, मगर हिन्दी सीखने के नहीं. विदेशी तो फिर भी हिन्दी सीखने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं, मगर अपने लोग तो हिन्दी के नाम से ही ऐसा मुंह बनाते हैं, जैसे करेले का जूस पिला दिया गया हो. बडे से बडे नाट्य व अभिनय संस्थानों मेँ फिल्म, नाटक, अभिनय, निर्देशन आदि के सभी पक्षों पर बडी गहराई से जानकारी दी जाती है, मगर भाषा के बारे में सभी चुप रहते हैं.

आज भी यही हुआ. फिल्म "बारह आना" को दिखाए जाने के बाद राजा मेनन से गुफ्तगू कार्यक्रम रखा गया था. चूंकि परिचय देनेवाले से लेकर सवाल-जवाब सभी कुछ का माहौल ही अंग्रेजीमय कर दिया जाता है, इसलिए हिन्दी में सवाल पूछनेवाले आम तौर पर चुप ही रह जाते हैं. यह भी देखा जाता है कि हिन्दी में सवाल करनेवालों को यूं ही टालकर उसे इग्नोर भी कर दिया जाता है. बरसों पहले दिल्ले में साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम "मीट द ऑथर" के तहत गिरीश कर्नाड को बुलाया गया था. रु-ब-रु के तहत सवाल-जवाब के कार्यक्रम में एक ने जब अपना सवाल हिन्दी में पूछा तो वे यह बोले कि "मैं आपके सवाल पर आता हू", और आज तक वे आ ही रहे हैं.

आज भी छम्मक्छल्लो ने सवाल रखा कि "आखिर क्या बात है कि सभी हिन्दी फिल्म "मेकर्स" फिल्में तो हिन्दी में बनाते हैं, मगर सारी की सारी बहसें अंग्रेजी में करते हैं? क्या हिन्दी में बहस करने से विषय की गम्भीरता कम हो जाती है?"

जवाब पूरे हॉल के साथ-साथ राजा मेनन से भी मिला और वह यह था- "हा, हा हा हा, ही ही, फिस्स-फिस्स!"

Tuesday, September 22, 2009

“कम्बख्त इस आम आदमी को पैदा किसने कर दिया?”

मोहल्ललाइव पर पढ़ें छम्मक्छल्लो का आलेख। लिंक है- phttp://mohallalive।com/2009/09/21/vibha-rani-on-common-man-status/

छम्‍मकछल्‍लो ने हर बार की तरह इस बार भी ऊपरवाले को दोष देते हुए उन्हें कोसना शुरू कर दिया कि तभी चमत्कार हो गया। ऊपरवाला एकदम ऊपर से उतर कर नीचे वैसे ही आया, जैसे बड़े-बड़े लोग किसी भी बात पर गुस्सा हो कर एकदम से अपने घर की उपरी मंज़िल से नीचे उतर आते हैं, चाहे वह घर की सीढ़‍ियों से उतर कर नीचे आना हो या अपनी हरकत में नीचे आना हो। ऊपरवाला बड़े तैश में था। झट से पूछने लगा, “ऐ! मेरे को ये बता कि क्यों तूने बोला कि मैने आम आदमी क्यों बनाया?”
छम्‍मकछल्‍लो उसकी भाषा और तेवर पर हैरान। वह कुछ बोलना चाहती थी कि ऊपरवाले ने फिर कहा, “मेरी ज़बान पर मत जा छमिया। यह सब तेरी ही करतूत है। जब तू अपना नाम छम्‍मकछल्‍लो रख सकती है, तो क्या मैं ऐसी ज़बान नहीं बोल सकता?”
छम्‍मकछल्‍लो अभी भी पेसोपेश में थी। ऊपरवाले ने फिर कहा, “यह मत भूल कि यह दुनिया अब तुमलोगों की है, मेरी नहीं। मुझे तो जैसा बनाना आता था, बना कर दे दिया। और क्या नहीं दिया तुम लोगों को? प्यार, मोहब्बत की भाषा, आदर के गुर, सहानुभूति के तार, विनम्रता के एहसास, सहनशीलता की चादर। रहने के लिए इतनी बड़ी धरती, पीने के लिए इतने तालाब, जलाशय, झरने, खेती-बारी के लिए इतने बड़े भू खंड, छांव के लिए इतने बड़े-बड़े वृक्ष, चढ़ने के लिए हिमालय जैसा पर्वत। ऐसा क्या नहीं था जो नहीं दिया तुमलोगों को। और तुमलोग? अपने में ही मार-काट मचा-मचा कर एक-दूसरे के दुश्मन बन बैठे। सबको ज़्यादा चाहिए और इस दौड़ में जो आगे निकल गया, वह महान बन गया, खास बन गया, बाकियों को आम बना गया। मैंने तो सभी को एक ही जैसा बनाया था। आम और ख़ास तो तुम सबकी पैदाइश है। ग़लती करो तुम और गाली सुनें हम?”
छम्‍मकछल्‍लो के पास शब्द नहीं थे, उसे याद आ रहा था, खास लोगों द्वारा उचारे जानेवाले शब्द, आम लोगों के लिए, ये लोग जानवर हैं, सुअरबाड़े में रहते हैं। हवाई जहाज़ को भी पशुशाले में तब्दील कर देते हैं। अंग्रेज़ी में एक शब्द चल गया है – इकॉनॉमी। यह आपके आर्थिक स्तर से जुड़ जाता है। जहां किफायत की बात आती है, यह शब्द उसके साथ जुड़ जाता है। अब किफायत की बात तो आम आदमी ही करेगा ना। उसी की आमदनी सीमित है, उसे ही अपनी सीमित आमदनी में घर चलाना होता है, दुनिया के सारे कर्म निपटाने होते हैं। तरह-तरह के टैक्स भरने होते हैं। खास लोगों को इन सबसे मतलब नहीं होता। वे आम जन के पैसे पर अपने खास मकसद पूरे करते हैं, जैसे कोई बहुत बड़े-बड़े पद पर पहुंच जाते हैं और पांचतारा होटलों में रहने लगते हैं। उनका बंगला तैयार नहीं हुआ, तो वे क्या दोस्तों, रिश्तेदारों के यहां रहने जाएंगे? आम आदमी की तरह लिचरई करने लगे आप भी! अब आम आदमी क्या करे? उसके पास सिवा एक अफसोस के और हसरत है ही क्या कि काश, वह भी एक आम आदमी से खास आदमी बन पाता।
ऊपरवाले ने छम्‍मकछल्‍लो को उदास देखकर कहा, “लगता है, तुम्हें मेरी बात का बुरा लग गया। मगर तुम खुद सोच कर देखोगी तो पाओगी कि ख़ास आदमी बनने के बहुत फायदे हैं। लोग आपको पहचानने लगते हैं, आप किसी के पास रुक कर उससे दो बात कर लेते हैं तो वह आम आदमी अपने को धन्य-धन्य मानने लगता है। अगर उसके साथ चाय पी ली, या कुछ खा लिया या उसके साथ कहीं चले गये तो वह आपसे चाय के, रिक्शे के पैसे हर्गिज़-हर्गिज़ नहीं लेगा। वह तो इसी में “मन मेरो मुदित भयो आज” के तर्ज पर नाचता फिरेगा कि आप आज उसके साथ थे। आप उसके साथ फोटो खिंचवा लेते हैं तो वह आपको देवता से भी अधिक बढ़ कर पूजने लगेगा। तुम्हारे बारे में अख़बारों में छपेगा। बुरी भी बात छपी तो क्या हुआ? प्रचार तो होगा न? वो कहते हैं न कि बदनाम हुए तो क्या नाम नहीं होगा। नेता हो, अभिनेता हो, कुछ भी कर सकते हो। तुम्हारे देश में फिलहाल तो इन्हीं दोनों के पौ बारह हैं। हां, एक क़ौम और आ गयी है – खिलाड़‍ियों की। लेकिन सभी नहीं, केवल क्रिकेटर हो तो फायदे हैं। अब तनिक टेनिस की पूछ हुई है। लेकिन तुम तो ठहरी जनी जात, महिला क्रिकेटर की दुर्गत आम आदमी से कम नहीं। टेनिस खेल लो तो खेल लो, बाकी में कोई दम नहीं।”
ऊपरवाले ने छम्‍मकछल्‍लो से फिर कहा, “मेरी मानो, आम आदमी बने रहने पर गाली और अपमान के अलावा और कुछ भी नहीं मिलनेवाला। तुम ख़ास बन जाओ। सभी तुम्हें हाथो-हाथ लेंगे। अभी से इसकी क़वायद में लग जाओ।”
ऊपरवाले की ज़बान बदलने लगी थी। छम्‍मकछल्‍लो को समझ में आने लगा था कि उसके ख़ास बनने की प्रक्रिया शुरू होने लगी है। तभी तो ऊपरवाले की ज़बान बदलने लगी है। छम्‍मकछल्‍लो तनिक ऐंठी, ख़ास होने के भाव में तनिक अकड़ी कि नींद खुल गयी। ऊपरवाले का तो पता नहीं, मगर सोये-सोये में छम्‍मकछल्‍लो की कमर कचक गयी। अब वह सोच रही है कि किस नेता, अभिनेता, खिलाड़ी या अन्य खास आदमी को वह बुलाये कि उसकी कमर ठीक हो और वह चल-फिर सके। कल उसे अपनी ड्यूटी पर भी तो जाना है कि नहीं?