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Saturday, October 17, 2009

दास्‍तानगोई उर्फ हम कहें आप सुनें

http://mohallalive.com/2009/10/17/daastangoi-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में नाटक की अलग अलग प्रस्तुतियों के बाद इस बार दास्‍तानगोई पर एक प्रस्तुति "हम कहें आप सुनें" नादिरा ज़हीर बब्बर ने अपने "एकजुट थिएटर ग्रुप" की तरफ से की. लिलेट दुबे के 'ब्रीफ कैंडल' के बाद यह दूसरा नाटक रहा, जो किसी महिला निर्देशक का था. नादिरा बब्बर सज्जाद ज़हीर और रज़िया सज्जाद ज़हीर की बेटी, राज बब्बर की पत्नी, जुही और आर्य बब्बर की मां हैं. यह एक लाइन उन लोगों के लिए, जो नादिरा बब्बर का नाम आते ही तरह तरह से ये सवाल पूछने लगते हैं, जिनके जवाब पहले ही दे दिए गए.
सामान्यत: होता यह है कि लोग कहते हैं, आप कहें, हम सुनें, मगर चूंकि यह नाटक था, जिसमें नाट्यकर्मियों को अपनी बात कहनी होती है, इसलिए वे कहते हैं, दर्शकगण सुनते हैं. यह नाटक भी दर्शकता से ऊपर उठकर श्रोता के स्तर पर पहुंचकर अपनी बात कहता है, क्योंकि यह् नाटक है ही दास्तानगोई यानी किस्सागोई अर्थात स्टोरी टेलिंग पर. नादिरा बब्बर आज के युवाओं के प्रति और उनकी अपनी संस्कृति के प्रति की विमुखता से चिंतित हैं. दास्तानगोई भी हमारी एक परम्परा है, जो खतम सी हो रही है. यह इसलिए खतम हो रही है, क्योंकि इसके लिए अब लोगों के पास वक़्त नहीं. दास्तानगोई की इस परम्परा से जोडने के लिए तीन अलग अलग इलाके के किस्सों को तीन अलग अलग पात्र के द्वारा कहानी कथन के माध्यम से कहने की कोशिश की गई है. ये तीन कलाकार हैं- युद्धवीर दहिया, अनंत महादेवन और स्वयं नादिरा बब्बर. नाना हाव भाव के ज़रिये कहानी कही गई. इस कहानी कथन के लिए एक कहानी गढी गई कि किस तरह एक युवा खुर्रम (युद्दवीर दहिया) को उसका अभिभावक चाचा (अनंत महादेवन) एक पुरानी किस्सागो फनकारा (नादिरा बब्बर) के पास उसका गंडा बन्धवाने ले जाता है. युवा खुर्रम की अनिच्छा के बावज़ूद उसे वहां जाना पडता है, जा कर अपनी कहानीगोई की बानगी पेश करनी होती है. किस्सागो फनकारा उसमें से किस्सागोई के झोल निकालती हैं. चाचा भी एक कहानी कहते हैं और अंत में किस्सागो फनकारा अपनी दास्तानगोई करती है और युवा खुर्रम उनकी किस्सागोई से प्रभावित हो कर उन्हें अपना गुरु मान लेता है.
किस्सागोई आज बेशक किसी पेशे के रूप में उतनी मुखरित न हो, मगर आज भी दादी, नानी और अब एकल परिवार के कारण मां बच्चों को किस्से सुनाती ही हैं. आज के भारतीय युवाओं की अपनी अपनी समस्याएं हैं. फिर भी, कई युवा हैं जो आज भी अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला, रीति रिवाज़ से जुडे हुए हैं. किस्सागो फनकारा आज के युवाओं को खूब लानतें मलामतें भेजती हैं. अचानक से वे एकदम से आज की ज़बान भी बोलने लग जाती हैं.
नादिरा बब्बर भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्नातक और इब्राहिम अलकाजी की शिष्या हैं. वे उन चन्द एनएसडीयनों में से एक हैं, जो बम्बई या मुंबई में रहकर फिल्मों के ग्लैमर से बचते हुए अपने को थिएटर कर्म में लगाए रखा. उनका एकजुट अब 28 साल का हो गया है. उनके पास रंगकर्म के उत्सुक बच्चे आते रहते हैं और उनका रंगकर्म का कारवां चलता रहता है.
व्यक्ति जब व्यक्ति से ऊपर उठ कर संस्थान में तब्दील हो जाता है, तब उससे लोगों की अपेक्षाएं बढ जाती हैं. नादिरा बब्बर अब एक ब्रांड नेम बन चुकी हैं तो ज़ाहिर है कि लोगों की उनसे उम्मीदें भी बढी हैं. वे प्रयोगधर्मा हैं, इस लिहाज़ से उनसे यह अनुरोध किया जा सकता है कि किस्सागोई बचपन से ही डाली गई एक आदत है. इसलिए "हम कहें आप सुनें" को बडी उम्र के कलाकारों से न करवा कर बच्चों से करवाया जाए तो न केवल बच्चों के मुख से इस किस्सागोई का आनन्द दुगुना होगा, बल्कि हमारे किशोर और युवा अपनी उम्र के लोगों से और भी ज्यादा प्रभावित होंगे.
अभिषेक नारायण का प्रकाश सन्योजन अच्छा है. खुर्रम आज का युवा है, और किस्सागो फनकारा भी आज की ज़बान बोलती हैं. ऐसे में उनके सेवक एकदम पीरियड कॉस्ट्यूम में समझ में नहीं आते. वे आम गंवई वेश भूषा में भी रह सकते थे. (पुन: मुंबई में नाटक पर भी ग्लैमर हावी हय, यह इस शो में भी देखने को मिला. एक दर्शक ने कहा कि वे यह शो केवल नादिरा बब्बर को देखने के लिए आए हैं, क्योंकि वे राज बब्बर की वाइफ हैं. मेरे पीछे बैठी महिलाओं की फौज़ सारे समय इस बात को ले कर बहस करती रहीं कि स्टेज के पास खडी लडकी नादिरा बब्बर की बेटी जुही बब्बर है या नहीं. गनीमत हुई कि जुही नातक का परिचय देने के लिए मंच पर आईं, तब वे तसल्लीशुदा हुईं. कुछ मराठीभाषी दर्शक सह थिएटरदां ने कहा कि यह तो बस केवल कहानी कहना था, कह दिया, अब इसपर क्या बोलना? जुही की घोषणा "हम कहें आप सुनें" पर एक पीछे से बोलीं, "वही करने तो आए हैं" सोमवार का कार्य दिवस होने के बावज़ूद हॉल भरा हुआ था, क्योंकि नाटक हिन्दी में था.)

Friday, October 16, 2009

“अजिंठा” में कब्र से निकल आई “पारो”

http://mohallalive।com/2009/10/16/ajintha-in-nehru-theatre-festival/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=९६

http://janatantra.com/2009/10/16/ajintha-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में इस बार मुंबई विश्वविद्यालय के अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट की प्रस्तुति "अजिंठा" रही. विश्वविख्यात अजंता की पृष्ठभूमि पर एक आदिवासी प्रेम कथा इस नाटक का उत्स है. नाटक मराठी के सुप्रसिद्ध कवि ना धो महानोर के दीर्घ काव्य पर अधारित है. चूंकि नाटक अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट की प्रस्तुति थी, इसलिए इसे एक अकादमिक रूप से तैयार किया गया. नाटक के निर्देशक मिलिन्द इनामदार बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने बच्चों के साथ स्टडी टूर किया. अजंता तो वे गए ही, वहां के आदिवासी समाज से भी मिले. उनके उठने, बैठने, बात करने आदि के तौर तरीकों को देखा. साथ ही, वे सब ना धो महानोर के गांव पलसखेर भी गए. ना धो महानोर कहते हैं कि यह काव्य सत्य घटना पर अधारित है और मिलिन्द इनामदार बताते हैं कि नाटक की मुख्य पात्र पारो की उपेक्षित कब्र उन सबको मिली. रॉबर्ट गिल, जो अजंता के भित्तिचित्रों की पेंटिंग करने आए थे, वहां 10-12 साल रहे और इसके भी प्रमाण हैं. शायद अपने चित्रों में वे वह भारतीय भाव नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पारो के प्रेम के रूप में उन्हें वह भाव मिला. यह नाटक एक नाटक से अधिक एक अनुभव के रूप में अधिक है.
सत्य घटना पर आधारित इस दीर्घ काव्य में भी आवश्यकतानुसार कल्पना का सहारा लिया गया है और नाटक में भी. तकरीबन डेढ सौ साल पहले की घटना पर आधारित इस प्रेम गाथा में आदिवासी चरित्र होने के कारण अहिरानी बोली का प्रयोग किया गया है. अहिरानी बोली का प्रयोग 1980 में मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार भालचन्द्र झा ने अपनी एकांकी "चित्रकथी" में भी किया था. संयोग की बात है कि "अजिंठा" की तरह "चित्रकथी" भी मनोहर वाकोडे के काव्य पर आधारित है. अहीरानी का प्रयोग आज की आधुनिक भाषा बोल रहे लोगों के लिए एक चुनौती भरा काम होता है. मराठी सम्वाद के लिए तो अहीरानी का प्रयोग किया गया, मगर हिन्दी गंवई ज़बान के लिए बम्बैया हिन्दी फिल्मोंवाली ज़बान इस्तेमाल कर ली गई, जो मखमल में टाट के पैबन्द की तरह लगती रही.
'अजिंठा' के निर्देशक मिलिन्द इनामदार भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1993 के स्नातक हैं. इस नाटक के पहले उन्होंने "खेल" नाटक किया था और उसके पहले असगर वज़ाहत के सुपर्सिद्ध नाटक "जिन लाहौर नई वेख्या समझो जम्याई नहीं" को लेकर लाहौर भी गए थे. वे क्रिएटिव हैं और नाटकों में प्रयोग करना उन्हें पसन्द है. यह नाटक फ्री स्टाइल में था, जिसमें रीयलिज्म के साथ स्टाइलाइजेशन को ले कर चलना था. साथ ही, रीयलाइजेशन को तोडने के लिए उन्होंने सेलोरामा का भी प्रयोग किया. हालंकि नाटक में सेलोरामा का प्रयोग नाटक की एकाग्रता और उसके स्वाद को तोडता है.
नाटक में पात्रों द्वारा मां-बहन की गाली का भरपूर प्रयोग बुरी तरह से खटका. मिलिन्द बताते हैं कि डेढ सौ साल पहले भी ये गालियां थीं तो अब लगता है, जब से मां बहन की अवधारणा बनी होगी, तब से गाली भी अस्तित्व में आ गई होगी. यथार्थ के नाम पर इसका प्रयोग करना सही माना जा सकता है, मगर इसके प्रयोग से बचने पर भी नाटक के असर में कोई कमी नहीं आती. 'अजिंठा' को बहुभाषी नाटक का दर्ज़ा दिया गया, क्योंकि रॉबर्ट गिल अंग्रेजी बोलते हैं और नाटक के आदिवासी पात्र कभी कभी अचानक से हिन्दी फिल्म वाली गंवई ज़बान बोलने लग जाते हैं. चूंकि पूरा नाटक मराठी मे चल रहा होता है, इसलिए दर्शक मानसिक रूप से तैयार रहते हैं कि वे मराठी सुन रहे हैं, ऐसे में अचानक हिन्दी पहले तो समझ में ही नहीं आती. जबतक समझ में आती है, तबतक पात्र हिन्दी की सीढी से उतरकर मराठी के दरिया में गोते लगाने लगते थे.
'अजिंठा' में कई गीत आदिवासी समाज से लिए गए हैं, जिसके कारण लोक का स्वाद और लचक मिलता है. नृत्य अभिरामी थे. सभी पात्र चूंकि अकादमी के छात्र ही थे, इसलिए युवा एनर्जी से नाटक सराबोर था. मराठी नाटक की एक खासियत होती है, कम शब्दों में अधिक से अधिक कहना, 'अजिंठा' में भी यह दिखा. रंग, कला, शिल्प, मंच आदि के माध्यम से अपनी बात कहना रंगमंचीय नाटक को बहुत अच्छी अभिव्यक्ति देता है. संजय गीते का संगीत नाटक के साथ दर्शक को जोड कर रखता था.
सूत्रधार के रूप में वामन केन्द्रे का नाम लिया गया. वामन भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक हैं और वर्तमान में अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट के निदेशक भी हैं. उनके बारे में कहा जा सकता है कि वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उन चन्द लोगों में से हैं, जिनके पास थिएट्रिकल सेंस जबर्दस्त है. शायद इसकी एक वज़ह रतन थियम जैसे गुरु का मिलना हो. उनका विजुअल सेंस बहुत समृद्ध है. देवदासी प्रथा पर आधारित चेतन दातार के 'झुलवा' से वामन को जबर्दस्त प्रसिद्धि मिली. अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट से वे इस कदर जुडे हुए हैं कि अकादमी का नाम आते ही लोग यह पूछते हैं-"वामन केन्द्रे वाला?" किसी संस्था की किसी व्यक्ति के साथ इस तरह से परिचिति व्यक्ति को मज़बूत करता है तो संस्था को कहीं से प्रभावित भी करता है. (पुन: नाटक देखने के लिए पूरा हॉल भरा हुआ था. वामन केन्द्रे अकादमी के निर्देशक और इस नाते सूत्रधार के रूप में संस्था और नाटक पर बात कर सजकते थे. मगर अनुरोध के बावज़ूद बात करने पर रुचि नहीं दिखाई. नाटक अकादमी के बच्चों ने किया था और अच्छा किया था, इसलिए उसे कर पाने का आनन्द सभी के चेहरों पर दिख रहा था. यही संतोष दर्शकों के चेहरों पर भी दिख रहा था. मलयाली नाटक 'आयुस्संति पुस्तकम" के बाद थिएटर की भाषा में यह दूसरा नाटक था, जिसे नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल की एक और उपलब्धि कही जा सकती है.)

Saturday, October 3, 2009

गैलिलियो - नेहरु सेंटर, मुंबई के सराहनीय प्रयास की ढीली प्रस्तुति के बावज़ूद

खगोलशास्त्र वर्ष के उपलक्ष्य पर नेहरु सेंटर, मुंबई ने 30 सितम्बर, 2009 को बर्टोल्ड ब्रेख्त लिखित "गैलिलियो" नाटक की प्रस्तुति की. गैलिलियो इतालवी भौतिकशास्त्री और खगोलशास्त्री थे, जिन्होंने उस समय की मान्यता के खिलाफ अपने सिद्धान्त प्रस्तुत किए थे कि चांद चिकना नहीं, बल्कि रुखडा है और कोपरनिकस की मान्यता को सही ठहराया कि सूर्य स्थिर है और पृथवी और अन्य ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं. यह उस समय के कैथोलिक चर्च धार्मिक संगठनों की मान्यता के खिलाफ था. गैलिलियो का बहुत कडा विरोध हुआ. उन पर इतना दवाब बनाया गया कि अंत में उन्हें अपने शब्द वापस लेने पडे. उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा हुई. गैलिलियो की मृत्यु के लगभग सौ साल बाद यही सिद्धांत मान्य हुआ और इस तरह से गैलिलियो ने खगोल जगत को सर्वथा एक नई खोज का उपहार दिया.
मुंबई का नेहरु सेंटर पं. जवाहरलाल नेहरु के "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" के साथ साथ अपनी आर्ट गैलरी व तारांगण के लिए मशहूर है. सैलानियों के लिए यह एक आकर्षण का केन्द्र है. साथ ही इसके अपने ऑडीटोरियम हैं, जहां विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इस लिहाज़ से गैलिलियो पर नाटक करवा कर नेहरु सेंटर ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया है.
इस नाटक को शिवदास घोडगे ने निर्देशित किया है. शिवदास घोडगे भारतीय नाट्य विद्यालय के बहुत वरिष्ठ पास आउट हैं. नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में वे एक जाना- पहचाना नाम हैं. मगर इस नाटक में कसे निर्देशन की कमी बेहद खली. मराठी नाटक आज भी लम्बी अवधि के खेले जाते हैं, मगर हिन्दी में अब लम्बी अवधि के नाटक बहुत ही खास स्थिति में ही खेले जाते हैं. कसे निर्देशन के अभाव में नाटक की अवधि ने दर्शकों को जम्हाइयां लेने पर मज़बूर कर दिया. कई दर्शकों को तो मध्यांतर में ही नाटक खत्म सा लगा.
इस नाटक को मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडेमी ऑफ थिएटर के छात्रों से करवाया गया था. हॉल में उपस्थित छात्रों की संख्या भी इसका प्रमाण थी. गैलिलियो की मुख्य भूमिका में अशोक लोखंडे थे. अशोक लोखंडे मंजे हुए कलाकार हैं और वहां उपस्थित कमलाकर सोनटक्के ने बहुत सही कहा कि एक केन्द्रीय भूमिका में बहुत दिनों के बाद अशोक लोखंडे को देखना एक सुखद अनुभव रहा. लेकिन, अफसोस यह रहा कि अशोक लोखंडे नाटक के अंतिम चरण के 20-25 मिनट को छोड कर सारे समय अशोक लोखंडे ही बने रहे. कलाकार का यह रूप किसी भी प्रस्तुति को कमज़ोर करने के लिए काफी होता है.
बर्टोल्ड ब्रेख्त लिखित "गैलिलियो" नाटक का हिन्दी अनुवाद वी के शर्मा (पास पर नाम व्ही के शर्मा) का था. भाषा आज की हिन्दी से मेल नहीं खाती, जिसे आज की हिन्दी के अनुरूप करने का निर्देशकीय समाधान होना चाहिये था. विदेशी पृष्ठभूमि, पात्र विदेशी, चरित्राँकन विदेशी, विषय गम्भीर- ऐसे में भाषा का रूखापन और स्क्रिप्ट का ढीलापन इसे और नीरस बनाता गया. उस पर से कलाकारों के उच्चारण. फिल्मों की तरह ही नाटकों में भी भाषा पर काम नहीं किया जाता. लगभग सभी कलाकार गैर हिन्दी भाषी थे, इसलिए उनकी अपनी मातृभाषा का इतना गहरा असर सम्वाद अदायगी पर था कि कई बार कोफ्त होने लगती थी. ऐसे में उर्दू के तलफ्फुज़ की तो बात ही छोड दीजिए. स्क्रिप्ट और सम्वाद अदायगी नाटक ही क्या, किसी भी फिल्म, टीवी आदि के लिए भी उतना ही ज़रूरी है. कसी स्क्रिप्ट पढने या सुनने में भी पूरे नाट्क का आनन्द दे देती है.
सबसे बडी दिक़्क़त यह रही कि यह नाटक सम्वेदना के स्तर तक पहुंच नहीं पाया, जबकि वही उसके मूल में था. आखिर ऐसी क्या स्थितियां पैदा की गईं कि गैलिलियो को अपना वक्तव्य् बदलना पडा? आखिर पोप, पादरी, धर्म संस्थानो, चर्चों का किस तरह का वर्चस्व था, जो एक वैज्ञानिक को झुकने पर बाध्य कर देता है. यह दोनो दो ध्रुव थे, जिनकी दो अलग-अलग धाराएं थीं. नाटक में इन दोनों ध्रुवों का खिंचाव इतना सतही था कि दृश्य देखते समय कहीं कोई बेचैनी नहीं हुई. मतलब, नाटक का उतार-चढाव सतह पर ही चलता रहा.
कलकार सभी या तो छात्र थे या अकादमी से बस पास हो कर निकले थे. तो बिचारे बच्चे अपनी भूमिका में लगे हुए थे. अपनी वेशभूषा में कई असहज दीखे. पीरियड ड्रामा के कॉस्ट्यूम पहन कर काम करने के लिए उसका अभ्यास भी ज़रूरी है, जिसकी कमी दीखी. गनीमत थी कि मंच पर भारी भारी प्रॉप्स नहीं थे. सह निर्देशन में स्मिता ठाकूर और सुलेखा दोशी के नाम रहे. इन्हें नाटक की टाइमिंग का भी अन्दाज़ा नहीं रहा और पर्दा गिरने से पहले ही वे स्टेज पर आ खडी हुईं. और उनकी उद्घोषणा ने तो नाटक का रहा- सहा स्वाद भी बिगाड दिया. अकादमी के छात्रों को इस पर तो ध्यान देना ही चाहिये, शिक्षकों को भी इस पर सोचने की ज़रूरत है.
संगीत अमोद भट्ट का था और वे अपना प्रभाव छोड सके. गायक वृन्द की आवाज़ में पता नहीं क्यों अपेक्षित उमंग का अभाव दीखा. प्रकाश व्यवस्था अच्छी थी. खास कर सूरज का गोला सूरज, छंद, धरती, ब्रह्मांड सब कुछ बनकर प्रभावित तो करता था ही, दर्शकों तक वह अपनी तरंग भी छोड जाता था. बावज़ूद इन सबके, यह नाटक अति महत्वपूर्ण है. इसलिए इसे तनिक और सरल और कस-मांज कर दिखाया जाना चाहिये- हर वर्ग और हर उम्र के लोगों तक, क्योंकि थिएटर केवल मनोरंजन का नहीं, शिक्षा और विकास का सबसे बडा माध्यम है.

Thursday, October 1, 2009

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल

http://janatantra.com/2009/10/01/nehru-centre-theatre-festival/

नेहरु सेंटर, मुंबई का 13वां थिएटर फेस्टिवल 3 से 14 अक्तूबर, 2009 तक आयोजित हो रहा है। 12 दिनों तक चलने वाले इस फेस्टिवल में मलयालम, उर्दू और बांग्ला के कुछ पुरस्कार विजेता नाटकों की भी प्रस्तुति होगी। 3 अक्तूबर, 2009 को फेस्टिवल की शुरुआत मराठी संगीत नाटक के “मदन भूल” से की जाएगी। “मदन भूल” गिरीश कर्नाड के मशहूर नाटक “फूल”या ‘फ्लावर्स’ से अभिप्रेरित है। इसे नेहरु सेंटर, मुंबई प्रस्तुत कर रहा है। इसके अलावा इस फेस्टिवल में अलग अलग भाषाओं के 14 नाटक प्रस्तुत किए जा रहे हैं। यह फेस्टिवल नेहरु सेंटर की ओर से मुंबईकरों के लिए एक उपहार है। इसलिए इसके पास पर “निमंत्रण” शब्द छपा है, जो दर्शकों को एक भावात्मक संतुष्टि देता है। विस्तार से जानने के लिए आप इस लिंक का उपयोग कर सकते हैं।
थियेटर फेस्टिवल का ब्योरा
पास न होने पर भी निराश होने की अधिक आवश्यकता नहीं होती है। ऐसा देखा गया है कि लोग बाग अपने अपने बंधु बांधवों के लिए पास ले कर रख लेते हैं, मगर जब वे लोग नहीं पहुंच पाते, तब वे बिना पास के आए लोगों को अपने पास दे देते हैं। नेहरु सेंटर का ऑडिटोरियम भी काफी बडा और नाटक के अनुकूल है। इसलिए एक बार सभी पास धारियों के अंदर चले जाने के बाद अगर सीट बची रहती है तो वे दूसरों को भी अंदर ले लेते हैं। कई कई बार तो लोगों ने खडे होकर भी नाटक देखे हैं। नेहरु सेंटर ऐसे थिएटर प्रेमियों को सामान्यत: निराश नहीं करता।