आज एक छोटी सी फ़िल्म देखी- 'कलाकार'। मुख्य भूमिका रजित कपूर की। फ़िल्म अवाक। कहीं- कहीं गति में चार्ली चैपलिन की तरह लगती। संवाद समझाने के लिए लिखे हुए संवाद आते, जो कभी-कभी अनावश्यक लगते, जेसे किसी के दरवाजा खटखटाने पर -"नोंक-नोंक" कहना। हा, सारे कैप्शन अन्ग्रेज़ी में थे।
फ़िल्म की कहानी के लिए कुछ मौर्यकालीन समय जेसा पीरियड चुना गया था। कलाकार को आदेश हुआ है, प्रधान मंत्री की बेटी की तस्वीर में सुधार करने के लिए। कलाकार जब भी उस पर काम करता है, कभी छींक आने से तो कभी मच्छर के काटने से तासीर बिगड़ जाती है। वह काफ़ी परेशान व् चिंतित है। उसका दोस्त अंत में उसकी सहायता करता है। अचानक वह इरेजर ईजाद करता है और इसके बल पर कलाकार तस्वीर सही-सही बना देता है।
फ़िल्म के अंत में फ़िल्मकार के साथ बातचीत थी। भावना सोमाया इसे प्रस्तुत कर रही थीं। उनहोंने इसे बहुत ब्रिलियंट फ़िल्म बताई। पता नहीं, यह मौके की नजाकत थी, एक प्रस्तुतकर्ता की भुमिका में होने के नाते या सचमुच फ़िल्म उन्हें अच्छी लगी।
छाम्माक्छाल्लो समझ ना सकी कि यह फ़िल्म है क्या? यदि यह इरेसर की उत्पत्ति के लिए फ़िल्म थी, तब तो कोई बात नहीं। मगर एक कलाकार के माध्यम से इसे व्यक्त करने की कोशिश में यह एक हास्य ही उत्पन्न कर सका। कोई भी कलाकार इरेजर के इस्तेमाल से बड़ा नहीं हो सकता। हमारे गुरु हैं- पोलाजी सर, वे कहते हैं, "अगर तुमने ग़लत स्ट्रोक लगा भी दिए तो कोशिश करो कि उस ग़लत स्ट्रोक को अपने ब्रश या पेन्सिल से कैसे ठीक कर सकते हो? उसे ठीक करने के लिए इरेज़र का इस्तेमाल तुम्हारी कल्पना को छोटा करता है।" यह बात नई कलाकार विधा सौम्य भी मानती है। हम भी जब कभी आर्ट वर्कशौप करते हैं, बच्चों को इरेसर नही देते। वे शुरू में मायूस होते हैं, मगर बाद में अपनी ही कल्पना के अलग-अलग परिणाम देख खुश होते हैं। आज कल स्कूलों में भी बच्चों को इरेज़र के लिए हतोत्साहित किया जाता है, ताकि वे ग़लत ना लिखें, वरना इरेज़र तो है, मिटा देंगे, यह प्रवृत्ति बच्चे के मन में बढ़ने लगती है। दूसरे,इरेज़र के इस्तेमाल से कागज़ पर सफाई नहीं आती है।
छाम्माक्छाल्लो इस बात से मुतास्सिर है कि इरेज़र का इस्तेमाल होना चाहिए, मगर वहाँ, जहाँ इसके बिना काम ना बने। रचनात्मक कामों में इसका इस्तेमाल रचनात्मकता को कम करता है। फ़िल्म का यह संदेश फ़िल्म को कथ्य के स्तर पर कमजोर करता है और संदेश देता है कि आख़िर यह कलाकारी कलाकार की हुई या इरेज़र की?
Tensions in life leap our peace. Chhammakchhallo gives a comic relief through its satire, stories, poems and other relevance. Leave your pain somewhere aside and be happy with me, via chhammakchhallokahis.
Sunday, July 13, 2008
Friday, June 6, 2008
घुड़सवारी - राजेन्द्र बाबू की
कहा जाता है कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद के पिताजी को घुड़सवारी का बेहद शौक था। इसलिए उन्होंने अपने दोनों बेटों, महेन्द्र बाबू व राजेन्द्र बाबू को भी बहुत अच्छा घुड़सवार बना दिया था।
एक बार किसी संबंधी या मित्र की बरात में दोनों भाई गए। जनवासे में उन्हें ठहराया गया। जनवासे से बहुत ही ठाठ बात से बरात लड़कीवालों के दरवाजे तक पहुँचती। रास्ते में जहाँ खुला मैदान मिलता, लड़कीवाले वहाँ बरात की अगवानी के लिए आते। फ़िर तो दोनों पक्षों में घुड़ दौड़ की होड़ लग जाती।
इस बार इन दोनों भाइयों को दो घोडे दिए गए। संयोग से राजेन्द्र बाबू को मिला घोडा बेहद मुंहजोर, पर दौड़ने में सबसे तेज़ था। घुड़ दौड़ शुरू होते ही वह गाँव के बदले बाहर मैदान की और भाग चला। मुंहजोर इतना कि लगाम खींचने के बावजूद वह राजेन्द्र बाबू के कब्जे में नहीं आया। बारे भाई महेन्द्र बाबू, ज़ाहिर है, बड़े चिंतित हुए। जबतक वे अपने घोडे को पीछे ले जाते, तबतक तो राजेन्द्र बाबू का घोडा नौ-दो-ग्यारह हो गया था। उनका पता लगानेवाले भी खाली हाथ लौट आए। सभी अपनी-अपनी आशंका में डूबे हुए ही थे कि सभी ने देखा, अपने घोडे को बहुत ही धीमी चाल से चलाते हुए राजेन्द्र बाबू वापस आए। उतरने पर बताया कि " जब यह किसी भी प्रकार से वापस आने को तैयार नहीं हुआ, तो मैंने लगाम में ढील दे दी कि देखें, कहाँ तक ,कितना दौड़ सकता है? रास्ते में इसने मुझे गिराने की कोशिश की, किंतु मेरा आसन पक्का था, इसलिए मैं गिरा नहीं। लगभग सात-आठ मील दौड़कर घोडा जब अपने आप ही थकने लगा, तो मैं इसे वापस फेर सका और अब इसे इतना थका दिया है कि चाबुक मारने, एड लगाने पर भी अधिक दूर नहीं दौड़ सकता। अब यह सोलह आने मेरे काबू में आ गया है।"
-साभार- पुन्य स्मरण, लेखक- मृत्युंजय प्रसाद (राजेन्द्र बाबू के सुपुत्र)
विद्यावती फौन्देशन, पाटलिपुत्र कोलोनीपटना- ८०००१३, फोन- ०६१२-२६२६१८/224559
एक बार किसी संबंधी या मित्र की बरात में दोनों भाई गए। जनवासे में उन्हें ठहराया गया। जनवासे से बहुत ही ठाठ बात से बरात लड़कीवालों के दरवाजे तक पहुँचती। रास्ते में जहाँ खुला मैदान मिलता, लड़कीवाले वहाँ बरात की अगवानी के लिए आते। फ़िर तो दोनों पक्षों में घुड़ दौड़ की होड़ लग जाती।
इस बार इन दोनों भाइयों को दो घोडे दिए गए। संयोग से राजेन्द्र बाबू को मिला घोडा बेहद मुंहजोर, पर दौड़ने में सबसे तेज़ था। घुड़ दौड़ शुरू होते ही वह गाँव के बदले बाहर मैदान की और भाग चला। मुंहजोर इतना कि लगाम खींचने के बावजूद वह राजेन्द्र बाबू के कब्जे में नहीं आया। बारे भाई महेन्द्र बाबू, ज़ाहिर है, बड़े चिंतित हुए। जबतक वे अपने घोडे को पीछे ले जाते, तबतक तो राजेन्द्र बाबू का घोडा नौ-दो-ग्यारह हो गया था। उनका पता लगानेवाले भी खाली हाथ लौट आए। सभी अपनी-अपनी आशंका में डूबे हुए ही थे कि सभी ने देखा, अपने घोडे को बहुत ही धीमी चाल से चलाते हुए राजेन्द्र बाबू वापस आए। उतरने पर बताया कि " जब यह किसी भी प्रकार से वापस आने को तैयार नहीं हुआ, तो मैंने लगाम में ढील दे दी कि देखें, कहाँ तक ,कितना दौड़ सकता है? रास्ते में इसने मुझे गिराने की कोशिश की, किंतु मेरा आसन पक्का था, इसलिए मैं गिरा नहीं। लगभग सात-आठ मील दौड़कर घोडा जब अपने आप ही थकने लगा, तो मैं इसे वापस फेर सका और अब इसे इतना थका दिया है कि चाबुक मारने, एड लगाने पर भी अधिक दूर नहीं दौड़ सकता। अब यह सोलह आने मेरे काबू में आ गया है।"
-साभार- पुन्य स्मरण, लेखक- मृत्युंजय प्रसाद (राजेन्द्र बाबू के सुपुत्र)
विद्यावती फौन्देशन, पाटलिपुत्र कोलोनीपटना- ८०००१३, फोन- ०६१२-२६२६१८/224559
Tuesday, June 3, 2008
मुगदर के हाथ, राजेन्द्र बाबू के साथ
एक पाठक ने हमें यह सुझाव दिया है कि किताब व प्रकाशक का नाम-पाता दे दिया जाए, ताकि पाठअक इस किताब को स्म्गार्हित कराने में मदद मिल सके। उनकी राय का सम्मान करते हुए अबसे राजेन्द्र बाबू के प्रसंग लिखते समय किता के साथ- साथ प्रकाशक का भी नाम-पाता दिया जाएगा। )
(आन्दोलन में अपनी पढाई छोड़कर आनेवालों के लिए देश में जगह-जगह पर राष्ट्रीय विद्यापीठ व विद्यालय स्थापित किए गए थे- १९२९ में। बिहार विद्यापीठ के प्रथम प्राचार्य डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे। वे स्वय वहा छात्रों को पढाया भी करते, जो कालांतर में अत्यधिक व्यस्तता के कारण छूटता चला गया। वहाँ छात्र रोजाना कुछ सामूहिक व्यायाम किया करते। वहाँ पर मुग्दारों की तीन जोदियाँ थी, जिनमें एक बहुत वज़नी, एक हलके वजन औए एक मध्यम वज़न की थी।
एक बार राजेन्द्र बाबू बिहार विद्यापीठ में ठहरे हुए थे। मुगदर फेरने के तरीके को देख कर वे बोले- "तुमलोगों के मुगदर फेरने का तरिक्का ग़लत है। तुमलोग बहुत फुर्ती से बिना हाथ रोके मुगदर फेरते जाते हो। देखने में यह बहुत सुंदर तथा प्रभावकारी लगता है। किंतु, इसमें तुम्हारे हाथों व कन्धों पर बहुत अधिक वजन पङता है। तेजी से चलाने से मुगदर आप ही चलने लगते हैं और भुजाओं व मांसपेशियों का विकास नहीं हो पाता, क्योंकि उन्हें बहुत कम बल लगाना पङता है। सही तरीका यह है कि धीरे-धीरे मुगदर फेरो, जिसमें हर पल उन्हें फेरने में बल लगाते ही जाना पड़े और जब तुम्हारे हाथ ऊंचे से झुककर कन्धों तक जाएं, टैब उन्हें धरती के समानांतर ला कर सीधे रखो और पल भर के लिए मुगदर को वेग से रोक लो। रोकने में तुम्हें बल लगाना होगा। फ़िर वैसे ही नीचे से उठाते समय फेरो तो फ़िर रोकने व दोबारा उठाने में भी अधिक बल लगाना पड़ेगा।" फ़िर सबसे हलकी जोडी लेकर उनहोंने मुगदर फेरने के कई नए-नए हाथ भी दिखाए व बताये। राजेन्द्र बाबू के पिटा बहुत ही अच्छे कसरती जवान थे और बहुत ही बलवान थे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू और उनके बारे भाई महेन्द्र बाबू उनके बचपन में बहुत सी देसी कसरतें अखाडे भेजकर सिखाई थी, जिनमें से मुगदर फेरना भी थी।
-साभार- पुन्य स्मरण
विद्यावती फौन्देशन
२७४, पाटलिपुत्र कोलोनी
पटना- ८०००१३, फोन- ०६१२-२६२६१८/224559
(आन्दोलन में अपनी पढाई छोड़कर आनेवालों के लिए देश में जगह-जगह पर राष्ट्रीय विद्यापीठ व विद्यालय स्थापित किए गए थे- १९२९ में। बिहार विद्यापीठ के प्रथम प्राचार्य डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे। वे स्वय वहा छात्रों को पढाया भी करते, जो कालांतर में अत्यधिक व्यस्तता के कारण छूटता चला गया। वहाँ छात्र रोजाना कुछ सामूहिक व्यायाम किया करते। वहाँ पर मुग्दारों की तीन जोदियाँ थी, जिनमें एक बहुत वज़नी, एक हलके वजन औए एक मध्यम वज़न की थी।
एक बार राजेन्द्र बाबू बिहार विद्यापीठ में ठहरे हुए थे। मुगदर फेरने के तरीके को देख कर वे बोले- "तुमलोगों के मुगदर फेरने का तरिक्का ग़लत है। तुमलोग बहुत फुर्ती से बिना हाथ रोके मुगदर फेरते जाते हो। देखने में यह बहुत सुंदर तथा प्रभावकारी लगता है। किंतु, इसमें तुम्हारे हाथों व कन्धों पर बहुत अधिक वजन पङता है। तेजी से चलाने से मुगदर आप ही चलने लगते हैं और भुजाओं व मांसपेशियों का विकास नहीं हो पाता, क्योंकि उन्हें बहुत कम बल लगाना पङता है। सही तरीका यह है कि धीरे-धीरे मुगदर फेरो, जिसमें हर पल उन्हें फेरने में बल लगाते ही जाना पड़े और जब तुम्हारे हाथ ऊंचे से झुककर कन्धों तक जाएं, टैब उन्हें धरती के समानांतर ला कर सीधे रखो और पल भर के लिए मुगदर को वेग से रोक लो। रोकने में तुम्हें बल लगाना होगा। फ़िर वैसे ही नीचे से उठाते समय फेरो तो फ़िर रोकने व दोबारा उठाने में भी अधिक बल लगाना पड़ेगा।" फ़िर सबसे हलकी जोडी लेकर उनहोंने मुगदर फेरने के कई नए-नए हाथ भी दिखाए व बताये। राजेन्द्र बाबू के पिटा बहुत ही अच्छे कसरती जवान थे और बहुत ही बलवान थे। उन्होंने राजेन्द्र बाबू और उनके बारे भाई महेन्द्र बाबू उनके बचपन में बहुत सी देसी कसरतें अखाडे भेजकर सिखाई थी, जिनमें से मुगदर फेरना भी थी।
-साभार- पुन्य स्मरण
विद्यावती फौन्देशन
२७४, पाटलिपुत्र कोलोनी
पटना- ८०००१३, फोन- ०६१२-२६२६१८/224559
Friday, May 30, 2008
राजेन्द्र बाबू से भी पहले तिलक-दहेज़ -साभार 'पुन्य -स्मरण'
डॉ राजेन्द्र प्रसाद के बारे भाई महेन्द्र प्रसाद देश व समाज की सेवा अपने ढंग से किया करते थे। उनके समय में छपरा में नाटक खेले जाते थे। सामाजिक नाटकों का क्या प्रभाव परता था, यह एक उदाहरण से पाता चलता है।
तिलक-दहेज़ पर आधारित नाटक 'भारत स्मरणीय' नाटक खेला गया। टैब छपरा में पंडित विक्रमादित्य मिश्र नामक बहुत बारे ज्योतिषी रहते थे। उन्होंने अपने लडके का ब्याह तय कर दिया था। वे भी यह नाटक देखने आए थे। दूसरे ही दिन उनहोंने अपने भावी समधी को बुलाकर कहा कि 'ये तिलक की राशी मैं लौटा रहा हू। ' कन्या के पपीता घबदाये क्योंकि तिलक लौटाने का अर्थ है- ब्याह से इनकार करना। पंडित जी ने कहा, 'विवाह होगा, और इसी कन्या से होगा। किन्त्न्यु कल जो मैंने नाटक देखा और उसमें लड़की के पिटा कि जो दुर्गति देखी, उससे मैं समझ गया हूँ कि तिलक लेना महा पाप है। कन्या पक्ष पैसे लेने को राजी नहीं। अंत में इस विवाद का हल निकाला गया कि तिलक के वे रुपये कन्या के लिए स्त्री-धन के रूप में मान लिया जाए और जितनी भी रस्में आदि हैं, उनमें दस्तूर के मुताबिक मट्टी रकम न दी जाए और न ली जाए। केवल एक रुपया हर रस्म पर दिया जाए और इस प्रकार आगे का लें-देन आठ- दस रुपयों में समाप्त कर लिया जाए।
थिएटर की यह ताक़त अदभुत है। और यह समझ भी कि यदि व्यक्ति चाहे तो क्या नही कर सकता?
आज भी तिलक-दहेज़ कम नहीं हुआ है। हैरानी है किवार स्वयम भी इसके पक्ष में रहता है और इस मुद्दे पर घर-परिवार की दुहाई देकर चुप हो जाता है। कुछ लडके हैं, जो माँ-बाप कि इस इच्छा को सफल नहीं होने देते। वैसे सभी लड़कों और तिलक की चाह न रखनेवाले माता-पता को सलाम। सोचें, कि अगर यह उस ज़माने में सम्भव था तो आज जबकि समय इतना आगे बढ़ गया है और लडके-लड़की दोनों अपने पैरों पर क्खादे है, तो आज यह सब क्यों मुमकिन नहीं हो सकता। छाम्माक्छाल्लो का सपष्ट मत है कि ऐसा सम्भव है। बस आपकी नज़र और मन के भाव चाहिए।
तिलक-दहेज़ पर आधारित नाटक 'भारत स्मरणीय' नाटक खेला गया। टैब छपरा में पंडित विक्रमादित्य मिश्र नामक बहुत बारे ज्योतिषी रहते थे। उन्होंने अपने लडके का ब्याह तय कर दिया था। वे भी यह नाटक देखने आए थे। दूसरे ही दिन उनहोंने अपने भावी समधी को बुलाकर कहा कि 'ये तिलक की राशी मैं लौटा रहा हू। ' कन्या के पपीता घबदाये क्योंकि तिलक लौटाने का अर्थ है- ब्याह से इनकार करना। पंडित जी ने कहा, 'विवाह होगा, और इसी कन्या से होगा। किन्त्न्यु कल जो मैंने नाटक देखा और उसमें लड़की के पिटा कि जो दुर्गति देखी, उससे मैं समझ गया हूँ कि तिलक लेना महा पाप है। कन्या पक्ष पैसे लेने को राजी नहीं। अंत में इस विवाद का हल निकाला गया कि तिलक के वे रुपये कन्या के लिए स्त्री-धन के रूप में मान लिया जाए और जितनी भी रस्में आदि हैं, उनमें दस्तूर के मुताबिक मट्टी रकम न दी जाए और न ली जाए। केवल एक रुपया हर रस्म पर दिया जाए और इस प्रकार आगे का लें-देन आठ- दस रुपयों में समाप्त कर लिया जाए।
थिएटर की यह ताक़त अदभुत है। और यह समझ भी कि यदि व्यक्ति चाहे तो क्या नही कर सकता?
आज भी तिलक-दहेज़ कम नहीं हुआ है। हैरानी है किवार स्वयम भी इसके पक्ष में रहता है और इस मुद्दे पर घर-परिवार की दुहाई देकर चुप हो जाता है। कुछ लडके हैं, जो माँ-बाप कि इस इच्छा को सफल नहीं होने देते। वैसे सभी लड़कों और तिलक की चाह न रखनेवाले माता-पता को सलाम। सोचें, कि अगर यह उस ज़माने में सम्भव था तो आज जबकि समय इतना आगे बढ़ गया है और लडके-लड़की दोनों अपने पैरों पर क्खादे है, तो आज यह सब क्यों मुमकिन नहीं हो सकता। छाम्माक्छाल्लो का सपष्ट मत है कि ऐसा सम्भव है। बस आपकी नज़र और मन के भाव चाहिए।
Thursday, May 29, 2008
महाभारत किसलिए हुआ था?
छाम्माक्छाल्लो आज एक सेमिनार में थी। सेमिनार गीता ज्ञान के ऊपर aadhharit thaa। ka2rporeT जगत में giita को अज शिद्दत से समझाने की कोशिश की जा रही है। स्वामी जी गीता के माध्यम से Conflict Management and Dicision Making पर बात कर रहे थे। प्रसंगवश उनहोंने यह कहा कि महाभारत की लड़ाई द्रौपदी कू सार्वजनिक रूप से अपमानित कराने के कारण हुई थी। छाम्माक्छाल्लो की समझ में यह बात नहीं आई। महाभारत का युद्ध धर्म, अधिकार की वापसी और न्याय का युद्ध है। दिनकर ने बहुत खूब कहा है-
"अधिकार खो कर बैठा रहना यह महा दुशाकर्म है
न्याय्याढ़ अपने बंधू को भी दंड देना धर्म है
इस तत्व पर ही पांडवों का कौरवों से रण हुआ
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।"
छाम्माक्छाल्लो ने स्वामी जी से पूछा कि द्रौपदी तो बाद में अपमानित हुई सार्वजनिक, लेकिन जब वह अपने ही घर में ५ पुरुषों के बीच बाँट दी गई, टैब क्यों नहीं हुआ महाभारत? क्या जो अपराध या ग़लत काम घर, परिवार, समाज की सहमति से हो, वह ठीक और जो ना हो, वह ग़लत हो जाता है? स्वामी जी के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। छाम्माक्छाल्लो को लगता है कि यदि उसी समय द्रौपदी ने इसका विरोध कीया होता तो आज महिलाओं और बच्चियों पर जो अपने ही नजदीकियों द्वारा अत्याचार किए जा रहे हैं, वे शायद न होते।
प्रसंगवश स्वामी जी ने यह भी कहा कि गावं में आज भी स्त्रियाँ भाव से अधिक बंधी हैं, इसलिए वहांआन कलह आदि कम होते हैं, जबकि शहर में स्मार्ट स्त्रियों मी भाव को तिलांजलि दे दी है, इसलिए वे किसी के भी प्रती भावुक नहीं हैं, न घर, न पति, ना बच्चे। भाव और ह्रदय के नाम पर कबतक स्त्रियों को बरगलाया जाता रहेगा, यह पाता नहीं। छ्हम्माकछाल्लो ने कहा किस्मार्टनेस बुद्धिमानी से आती है और भाव को थोडा कम करके भुद्धि को वहाँ जगह देना आज की मांग है, ताकि स्त्रियाँ केवल छुई-मुई सी नाज़ुक सी गुडिया भर ही ना बनी रह जाए- ता उम्र, जन्म जन्मांतर। आख़िर कबतक भावना के नाम पर उन्हें दरकिनार किया जाता रहेगा? और आज जब स्त्रियाँ दिल और दिमाग दोनों से अमज्बूत हो रही हैं तो इसका असर समाज पर आ रहा है॥ आज के युवा, खासकर लड़कों की सोच में बदलाव आया है। यह सकारात्न्म्मक बदलाव अगली पीढी को और मजबूती देगा। निशचय ही इसका सेहरा आज की पढी-लिखी स्त्रियों पर जाता है, और हाँ, उनके माता-पिटा कू भी यह श्री है कि उन्होंने अपनी बेटियों को पढाया। बौद्धिक रूप से मज़बूत हो कर आज स्त्रियाँ अपने आपको हर कठिन हालत से लड़ने के लिए तैयार रखती हैं।
स्वामी जी के पास इसका भी कोई जवाब न था। न, भ्रमित ना हों कि वे कोई सड़क छाप महात्मा या साधू थे। अईईती के इंजीनियर थे। १० साल तक कार्पोरेट जगत में काम कराने के बाद अब अपना प्रतिष्ठान चलाते हैं और जगह-जगह प्रबंधन से संबंधित विषय पर अभिभाषण देते हैं।
छाम्माक्छाल्लो को लगा कि समाज में तक ये वर्ग भेद लगा रहेगा, एक सफल कार्पोरेट की संकल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि कार्पोरेट ही सबसे पहले महिलाओं को यह कहा कर खारिज कराने का प्रयास करता रहता है कि महिलायें ज़्यादा भावुक होने के कारण सही निर्णय नहीं ले पातीं, जबकि आज वे दिल और दिमाग के अद्भुत संयोजन के बल पर हर काम को बखूबी अंजाम दे रही हैं। सोच में यह बदलाव ज़रूरी है- चाहे वह द्रुँपदी हो या आज की नारी।
"अधिकार खो कर बैठा रहना यह महा दुशाकर्म है
न्याय्याढ़ अपने बंधू को भी दंड देना धर्म है
इस तत्व पर ही पांडवों का कौरवों से रण हुआ
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।"
छाम्माक्छाल्लो ने स्वामी जी से पूछा कि द्रौपदी तो बाद में अपमानित हुई सार्वजनिक, लेकिन जब वह अपने ही घर में ५ पुरुषों के बीच बाँट दी गई, टैब क्यों नहीं हुआ महाभारत? क्या जो अपराध या ग़लत काम घर, परिवार, समाज की सहमति से हो, वह ठीक और जो ना हो, वह ग़लत हो जाता है? स्वामी जी के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। छाम्माक्छाल्लो को लगता है कि यदि उसी समय द्रौपदी ने इसका विरोध कीया होता तो आज महिलाओं और बच्चियों पर जो अपने ही नजदीकियों द्वारा अत्याचार किए जा रहे हैं, वे शायद न होते।
प्रसंगवश स्वामी जी ने यह भी कहा कि गावं में आज भी स्त्रियाँ भाव से अधिक बंधी हैं, इसलिए वहांआन कलह आदि कम होते हैं, जबकि शहर में स्मार्ट स्त्रियों मी भाव को तिलांजलि दे दी है, इसलिए वे किसी के भी प्रती भावुक नहीं हैं, न घर, न पति, ना बच्चे। भाव और ह्रदय के नाम पर कबतक स्त्रियों को बरगलाया जाता रहेगा, यह पाता नहीं। छ्हम्माकछाल्लो ने कहा किस्मार्टनेस बुद्धिमानी से आती है और भाव को थोडा कम करके भुद्धि को वहाँ जगह देना आज की मांग है, ताकि स्त्रियाँ केवल छुई-मुई सी नाज़ुक सी गुडिया भर ही ना बनी रह जाए- ता उम्र, जन्म जन्मांतर। आख़िर कबतक भावना के नाम पर उन्हें दरकिनार किया जाता रहेगा? और आज जब स्त्रियाँ दिल और दिमाग दोनों से अमज्बूत हो रही हैं तो इसका असर समाज पर आ रहा है॥ आज के युवा, खासकर लड़कों की सोच में बदलाव आया है। यह सकारात्न्म्मक बदलाव अगली पीढी को और मजबूती देगा। निशचय ही इसका सेहरा आज की पढी-लिखी स्त्रियों पर जाता है, और हाँ, उनके माता-पिटा कू भी यह श्री है कि उन्होंने अपनी बेटियों को पढाया। बौद्धिक रूप से मज़बूत हो कर आज स्त्रियाँ अपने आपको हर कठिन हालत से लड़ने के लिए तैयार रखती हैं।
स्वामी जी के पास इसका भी कोई जवाब न था। न, भ्रमित ना हों कि वे कोई सड़क छाप महात्मा या साधू थे। अईईती के इंजीनियर थे। १० साल तक कार्पोरेट जगत में काम कराने के बाद अब अपना प्रतिष्ठान चलाते हैं और जगह-जगह प्रबंधन से संबंधित विषय पर अभिभाषण देते हैं।
छाम्माक्छाल्लो को लगा कि समाज में तक ये वर्ग भेद लगा रहेगा, एक सफल कार्पोरेट की संकल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि कार्पोरेट ही सबसे पहले महिलाओं को यह कहा कर खारिज कराने का प्रयास करता रहता है कि महिलायें ज़्यादा भावुक होने के कारण सही निर्णय नहीं ले पातीं, जबकि आज वे दिल और दिमाग के अद्भुत संयोजन के बल पर हर काम को बखूबी अंजाम दे रही हैं। सोच में यह बदलाव ज़रूरी है- चाहे वह द्रुँपदी हो या आज की नारी।
Wednesday, May 28, 2008
अब मम्मियों को छेड़ना होगा जेहाद
छाम्माक्छाल्लो शादी-ब्याह के समय बहुत मद मस्त हो जाती है कि अब उसे गाने, खाने, नाचने, मौज मस्ती कराने का मौका मिलेगा। मगर वह इसमें लिंग आधारित व माँ -बाप की दखल अंदाजी देख कर आहात है। माता- पिटा बच्चे के लिए सबकुछ हैं, मगर इसका यह मतलब नहीं कि वे बच्चों की इच्छा पर और खासा कर शादी-ब्याह के मामले में एक दम से तानाशाह हो जाएं।
अभी भी हिन्दुस्तान में प्रेम विवाह या पानी पसंद के विवाह को उतनी वरीयता नहीं दी जाती। बच्चों को पढ़ने, पहनने की आजादी देनेवाले मैं-बाप अभी भी इस पर अपना एकाधिकार समझते हैं। लड़केवाले और लड़कीवाले का गत फर्क यहाँ ऐसा सर चढ़कर बोलता है कि शादी के नाम से नफ़रत सी होने लगती है। शादी के बाद की असमानता, असंतुलन तो बाद की चीज़ है।
लड़की आज किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं हैं। बेटियों को भी मैं-बाप बेटों की तरह ही पढा रहे हैं। यह संतोष की बात होते हुए भी शादी के मुद्दे पर उन्हें आजादी न देना बच्चों के प्रति कहीं न कहीं एक अविश्वास को दिखाता है। एक शादी का खर्च तो लड़का-लड़की खोजने में ही ख़त्म हो जाता है। उस पर से बार-बार लड़की को हर लड़केवाले के सामने सजा-धजा कर प्रस्तुत करना। यह अपने आप में इतना गलीज लगता है, जैसे बेटियाँ न हीन, प्रसाधन या सजावट का कोई सामान हो गई, जो पुकार-पुकार कर कहता है कि लो मैं प्रस्तुत हूँ। आओ, मुझे देखो, परखो।
परखने की घटना- कोई हाथ फैलाकर तो कोई साड़ी टखने तक उठा कर देखेंगे कि लड़की कहीं लूली- लंगडी तो नहीं। आँखें ऊपर उठावायेंगे कि कहीं वह कानी तो नहीं। सवाल ऐसे-ऐसे कि मन करे कि एक बड़ा सा पत्थर उठाक आर सामने वाले ल्के सर पर मार दिया जाए।
उससे भी हैरानी की बात है कि इन बेतियूं की माताएं यह सब परम्परा के नाम पर अच्छा समझती रहती हैं। वे ख़ुद अपने समय में अपने को बीसियों बार इस दिखाने की नारकीय स्थिति से गुजर चुकी होती हैं। फ़िर भी अपनी बेटी को भी इसी स्थिति का सामना कराने के लिए मज़बूर करती हैं। बेटियाँ अभी भी मैं- बाप के कहे अनुसार चलती हैं तो यह सोच कर कि आख़िर लो वे माँ -बाप हैं। तो माँ- बाप को भी इतना अधिकार तो देना ही होगा कि बेटियाँ अपनी पसंद का लड़का तय करे और माँ- बाप अपनी सहमति कि मुहर उस पर लगाएं। बहस बहुत हो सकती है कि अगर लड़का अच्छा न निकला तो? तो इसकी भी क्या गारंटी कि माँ- बाप द्वारा पसंद किया गया लड़का सही ही होगा? इसमें पिटा से अधिक माँ की भुमिका है। माँ अपने समय को याद करे और बेटियों को इस तरह का शो केस बनने से बचाए।
ऐसा होता है तो छाम्माक्छाल्लो इसे अपने जीवन की एक और सफलता समझेगी। हे आज की माम्मियो, आप पढी-लिखी, समझदार हैं। आप अपने बच्चों के भीतर विश्वास भरें। भरोसा रखें, वे आपका विश्वास कभी नहीं तोदेंगे। उन्हें अपना जीवन जीने व अपना जीवन साथी ख़ुद चुनने की आजादी दीजिये। आख़िर कार यह उनकी जिन्दगी है और यह जिंदगी अब आपसे ज़्यादा उम्र और संभावनाओं की है। बको अन्य भी महत्वपूर्ण काम कराने के लिए सोचने दीजिये। शादी भी एक अहम् पक्ष है, इअसके लिए उसे आजादी दें।
अभी भी हिन्दुस्तान में प्रेम विवाह या पानी पसंद के विवाह को उतनी वरीयता नहीं दी जाती। बच्चों को पढ़ने, पहनने की आजादी देनेवाले मैं-बाप अभी भी इस पर अपना एकाधिकार समझते हैं। लड़केवाले और लड़कीवाले का गत फर्क यहाँ ऐसा सर चढ़कर बोलता है कि शादी के नाम से नफ़रत सी होने लगती है। शादी के बाद की असमानता, असंतुलन तो बाद की चीज़ है।
लड़की आज किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं हैं। बेटियों को भी मैं-बाप बेटों की तरह ही पढा रहे हैं। यह संतोष की बात होते हुए भी शादी के मुद्दे पर उन्हें आजादी न देना बच्चों के प्रति कहीं न कहीं एक अविश्वास को दिखाता है। एक शादी का खर्च तो लड़का-लड़की खोजने में ही ख़त्म हो जाता है। उस पर से बार-बार लड़की को हर लड़केवाले के सामने सजा-धजा कर प्रस्तुत करना। यह अपने आप में इतना गलीज लगता है, जैसे बेटियाँ न हीन, प्रसाधन या सजावट का कोई सामान हो गई, जो पुकार-पुकार कर कहता है कि लो मैं प्रस्तुत हूँ। आओ, मुझे देखो, परखो।
परखने की घटना- कोई हाथ फैलाकर तो कोई साड़ी टखने तक उठा कर देखेंगे कि लड़की कहीं लूली- लंगडी तो नहीं। आँखें ऊपर उठावायेंगे कि कहीं वह कानी तो नहीं। सवाल ऐसे-ऐसे कि मन करे कि एक बड़ा सा पत्थर उठाक आर सामने वाले ल्के सर पर मार दिया जाए।
उससे भी हैरानी की बात है कि इन बेतियूं की माताएं यह सब परम्परा के नाम पर अच्छा समझती रहती हैं। वे ख़ुद अपने समय में अपने को बीसियों बार इस दिखाने की नारकीय स्थिति से गुजर चुकी होती हैं। फ़िर भी अपनी बेटी को भी इसी स्थिति का सामना कराने के लिए मज़बूर करती हैं। बेटियाँ अभी भी मैं- बाप के कहे अनुसार चलती हैं तो यह सोच कर कि आख़िर लो वे माँ -बाप हैं। तो माँ- बाप को भी इतना अधिकार तो देना ही होगा कि बेटियाँ अपनी पसंद का लड़का तय करे और माँ- बाप अपनी सहमति कि मुहर उस पर लगाएं। बहस बहुत हो सकती है कि अगर लड़का अच्छा न निकला तो? तो इसकी भी क्या गारंटी कि माँ- बाप द्वारा पसंद किया गया लड़का सही ही होगा? इसमें पिटा से अधिक माँ की भुमिका है। माँ अपने समय को याद करे और बेटियों को इस तरह का शो केस बनने से बचाए।
ऐसा होता है तो छाम्माक्छाल्लो इसे अपने जीवन की एक और सफलता समझेगी। हे आज की माम्मियो, आप पढी-लिखी, समझदार हैं। आप अपने बच्चों के भीतर विश्वास भरें। भरोसा रखें, वे आपका विश्वास कभी नहीं तोदेंगे। उन्हें अपना जीवन जीने व अपना जीवन साथी ख़ुद चुनने की आजादी दीजिये। आख़िर कार यह उनकी जिन्दगी है और यह जिंदगी अब आपसे ज़्यादा उम्र और संभावनाओं की है। बको अन्य भी महत्वपूर्ण काम कराने के लिए सोचने दीजिये। शादी भी एक अहम् पक्ष है, इअसके लिए उसे आजादी दें।
Thursday, May 22, 2008
राजेन्द्र बाबू का पत्र- पत्नी के नाम -साभार- पुन्य स्मरण
इस पत्र से पाता चलता है कि टैब के नेता देश के लिए कितने प्रतिबद्ध रहते थे। घर-परिवार , पैसे उनके लिए बाद की बातें होती थी। मूल भोजपुएरी में लिखा पत्र यहाँ प्रस्तुत है-
आशीरबाद,
आजकल हमनी का अच्छी तरह से बानी। उहाँ के खैर सलाह चाहीं, जे खुसी रहे। आगे एह तरह के हाल ना मिलला, एह से तबीयत अंदेसा में बातें। आगे फील-पहल कुछ अपना मन के हाल खुलकर लीखे के चाहत बानीं। चाहीं कि तू मन दे के पढी के एह पर खूब बिचार करीह' और हमारा पास जवाब लिक्जिः'। सब केहू जाने ला कि हम बहुत पधालीन, बहुत नाम भेल, एह से हम बहुत र्पेया कमेब। से केहू के इहे उमेद रहेला कि हमार पढ़ल-लिखल सब रुपया कमाय वास्ते बातें। तोहार का मन हवे से लीखिह्तू हमारा के सिरिफ रुपया कम्माये वास्ते चाहेलू और कुनीओ काम वास्ते? लड़कपन से हमार मन रुपया कमाय से फिरि गेल बातें और जब हमार पढे मी नाम भेल टी' हम कबहीं ना उमेद कैनीं कि इ सब र्पेया कमाए वास्ते होत बातें। एही से हम अब ऐसन बात तोहरा से पूछत बानी कि जे हम रुपया ना कमाईं, टी; तू गरीबी से हमारा साथ गुजर कर लेबू ना? हमार- तोहार सम्बन्ध जिनगी भर वास्ते बातें। जे हम रुपया कमाईं तबो तू हमारे साथ रहबू, ना कमाईं, तबो तू हमारे साथ रहबू। बाक़ी हनारा ई पूछे के हवे कि जो ना हम रुपया कमाईं टी' तोहरा कवनो तरह के तकलीफ होई कि नाहीं। हमार तबीयत रुपया कमाए से फ़िर गेल बातें। हम रुपया कमाए के नैखीं चाहत। तोहरा से एह बात के पूछत बानीं, कि ई बात तोहरा किसान लागी? जो हम ना कमैब टी; हमारा साथ गरीब का नाही रहे के होई- गरीबी खाना, गरीबी पहिनना, गरीब मन कर के रहे के होई। हम अपना मन मी सोचले बानीं कि हमारा कवनो तकलीफ ना होई। बाक़ी तोहरो मन के हाल जान लेवे के चाहीं। हमारा पूरा विश्वास बातें कि हमार इस्त्री सीताजी का नाही जवना हाल मी हम रहब, ओही हल में रहिहें- दुःख में, सुख में- हमारा साथ ही रहला के आपण धरम, आपण सुख, आपण खुसी जनिः'। एह दुनिया में रुपया के लालच में लोग मारत जात बाते, जे गरीब बातें सेहू मारत बातें, जे धनी बाते, सेहू मारत बातें- टी' फेर काहे के तकलीफ उठावे। जेकरा सबूर बातें, से ही सुख से दिन कातात बातें। सुख-दुःख केहू का रुपया कमैले और ना कमैले ना होला। करम में जे लिखल होला, से ही सब हो ला।
अब हम लीखे के चाहत बानी कि हम जे रुपया ना कमैब टी' का करब। पहीले टी' हम वकालत करे के खेयाल छोड़ देब, इमातेहान ना देब, वकालत ना करब, हम देस का काम करे में सब समय लगाइब। देस वास्ते रहना, देस वास्ते सोचना, देस वास्ते काम करना- ईहे हमार काम रही। अपना वास्ते ना सोचना, ना काम करना- पूरा साधू ऐसन रहे के। तोहरा से चाहे महतारी से चाहे और केहू से हम फरक ना रहब- घर ही रहब, बाक़ी रुपया ना कमैब। सन्यासी ना होखब, बाक़ी घरे रही के जे तरह से हो सकी, देस के सेवा करब। हम थोड़े दिन में घर आइब, टी' सब बात कहब। ई चीठी और केहू से मत देखिः', बाक़ी बीचार के जवाब जहाँ तक जल्दी हो सके, लीक्जिः'। हम जवाब वास्ते बहुत फिकिर में रहब।
अधिक एह समय ना लीक्हब।
राजेन्द्र
आगे ई चीठी दस-बारह दीन से लीखाले रहली हवे, बाक़ी भेजत ना रहली हवे। आज भेज देत बानी। हम जल्दीये घर आइब। हो सके टी' जवाब लीखिः', नाहीं टी' घर एल पर बात होई। चीठी केहू से देखिः' मत। - राजेन्द्र
पाता- राजेन्द्र प्रसाद, १८, मीरजापुर स्ट्रीट, कलकत्ता
(अब आप सोचें कि ऐसे पत्र को पाकर उनकी पत्नी के क्या विचार रहे होंगे और देश को पहला राष्ट्रपति मिलाने में उअनाकी क्या भुमिका रही होगी?)
आशीरबाद,
आजकल हमनी का अच्छी तरह से बानी। उहाँ के खैर सलाह चाहीं, जे खुसी रहे। आगे एह तरह के हाल ना मिलला, एह से तबीयत अंदेसा में बातें। आगे फील-पहल कुछ अपना मन के हाल खुलकर लीखे के चाहत बानीं। चाहीं कि तू मन दे के पढी के एह पर खूब बिचार करीह' और हमारा पास जवाब लिक्जिः'। सब केहू जाने ला कि हम बहुत पधालीन, बहुत नाम भेल, एह से हम बहुत र्पेया कमेब। से केहू के इहे उमेद रहेला कि हमार पढ़ल-लिखल सब रुपया कमाय वास्ते बातें। तोहार का मन हवे से लीखिह्तू हमारा के सिरिफ रुपया कम्माये वास्ते चाहेलू और कुनीओ काम वास्ते? लड़कपन से हमार मन रुपया कमाय से फिरि गेल बातें और जब हमार पढे मी नाम भेल टी' हम कबहीं ना उमेद कैनीं कि इ सब र्पेया कमाए वास्ते होत बातें। एही से हम अब ऐसन बात तोहरा से पूछत बानी कि जे हम रुपया ना कमाईं, टी; तू गरीबी से हमारा साथ गुजर कर लेबू ना? हमार- तोहार सम्बन्ध जिनगी भर वास्ते बातें। जे हम रुपया कमाईं तबो तू हमारे साथ रहबू, ना कमाईं, तबो तू हमारे साथ रहबू। बाक़ी हनारा ई पूछे के हवे कि जो ना हम रुपया कमाईं टी' तोहरा कवनो तरह के तकलीफ होई कि नाहीं। हमार तबीयत रुपया कमाए से फ़िर गेल बातें। हम रुपया कमाए के नैखीं चाहत। तोहरा से एह बात के पूछत बानीं, कि ई बात तोहरा किसान लागी? जो हम ना कमैब टी; हमारा साथ गरीब का नाही रहे के होई- गरीबी खाना, गरीबी पहिनना, गरीब मन कर के रहे के होई। हम अपना मन मी सोचले बानीं कि हमारा कवनो तकलीफ ना होई। बाक़ी तोहरो मन के हाल जान लेवे के चाहीं। हमारा पूरा विश्वास बातें कि हमार इस्त्री सीताजी का नाही जवना हाल मी हम रहब, ओही हल में रहिहें- दुःख में, सुख में- हमारा साथ ही रहला के आपण धरम, आपण सुख, आपण खुसी जनिः'। एह दुनिया में रुपया के लालच में लोग मारत जात बाते, जे गरीब बातें सेहू मारत बातें, जे धनी बाते, सेहू मारत बातें- टी' फेर काहे के तकलीफ उठावे। जेकरा सबूर बातें, से ही सुख से दिन कातात बातें। सुख-दुःख केहू का रुपया कमैले और ना कमैले ना होला। करम में जे लिखल होला, से ही सब हो ला।
अब हम लीखे के चाहत बानी कि हम जे रुपया ना कमैब टी' का करब। पहीले टी' हम वकालत करे के खेयाल छोड़ देब, इमातेहान ना देब, वकालत ना करब, हम देस का काम करे में सब समय लगाइब। देस वास्ते रहना, देस वास्ते सोचना, देस वास्ते काम करना- ईहे हमार काम रही। अपना वास्ते ना सोचना, ना काम करना- पूरा साधू ऐसन रहे के। तोहरा से चाहे महतारी से चाहे और केहू से हम फरक ना रहब- घर ही रहब, बाक़ी रुपया ना कमैब। सन्यासी ना होखब, बाक़ी घरे रही के जे तरह से हो सकी, देस के सेवा करब। हम थोड़े दिन में घर आइब, टी' सब बात कहब। ई चीठी और केहू से मत देखिः', बाक़ी बीचार के जवाब जहाँ तक जल्दी हो सके, लीक्जिः'। हम जवाब वास्ते बहुत फिकिर में रहब।
अधिक एह समय ना लीक्हब।
राजेन्द्र
आगे ई चीठी दस-बारह दीन से लीखाले रहली हवे, बाक़ी भेजत ना रहली हवे। आज भेज देत बानी। हम जल्दीये घर आइब। हो सके टी' जवाब लीखिः', नाहीं टी' घर एल पर बात होई। चीठी केहू से देखिः' मत। - राजेन्द्र
पाता- राजेन्द्र प्रसाद, १८, मीरजापुर स्ट्रीट, कलकत्ता
(अब आप सोचें कि ऐसे पत्र को पाकर उनकी पत्नी के क्या विचार रहे होंगे और देश को पहला राष्ट्रपति मिलाने में उअनाकी क्या भुमिका रही होगी?)
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