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Thursday, June 2, 2016

माँ-बाप के चरणों में!- पति-पत्नी के जोक्स का उल्टा-पुल्टा रूप-9


क्या खूब जवाब था एक बेटी का, जब उससे पूछा गया कि तुम्हारी दुनिया कहाँ पर शुरू होती और कहाँ पर खत्म?
तो बेटी का जवाब था-
"
माँ की कोख से शुरू होकर
पिता के चरणों से गुजरकर
पति की खुशियों की गलियों से गुजरकर
बच्चों के सपनों को पूरा करने तक ख़त्म!"

(यानि बेटी की अपनी महत्वाकांक्षा कुछ भी नहीं?)
इसे छम्मकछल्लो उलट दे रही है। अब तनिक पढ़िए-
क्या खूब जवाब था एक बेटे का, जब उससे पूछा गया कि तुम्हारी दुनिया कहाँ पर शुरू होती और कहाँ पर खत्म?
तो बेटे का जवाब था-
"
माँ की कोख से शुरू होकर
पिता के चरणों से गुजरकर
पत्नी की खुशियों की गलियों से गुजरकर
बच्चों के सपनों को पूरा करने तक ख़त्म!"

(यानि बेटे की अपनी महत्वाकांक्षा कुछ भी नहीं?)

क्या आपको लगता है कि कोई बेटा ऐसा सोचेगा? अगर नहीं तो बेटियों के लिए ऐसी सोच और ऐसी पोस्ट क्यों? ###

Wednesday, May 28, 2008

अब मम्मियों को छेड़ना होगा जेहाद

छाम्माक्छाल्लो शादी-ब्याह के समय बहुत मद मस्त हो जाती है कि अब उसे गाने, खाने, नाचने, मौज मस्ती कराने का मौका मिलेगा। मगर वह इसमें लिंग आधारित व माँ -बाप की दखल अंदाजी देख कर आहात है। माता- पिटा बच्चे के लिए सबकुछ हैं, मगर इसका यह मतलब नहीं कि वे बच्चों की इच्छा पर और खासा कर शादी-ब्याह के मामले में एक दम से तानाशाह हो जाएं।
अभी भी हिन्दुस्तान में प्रेम विवाह या पानी पसंद के विवाह को उतनी वरीयता नहीं दी जाती। बच्चों को पढ़ने, पहनने की आजादी देनेवाले मैं-बाप अभी भी इस पर अपना एकाधिकार समझते हैं। लड़केवाले और लड़कीवाले का गत फर्क यहाँ ऐसा सर चढ़कर बोलता है कि शादी के नाम से नफ़रत सी होने लगती है। शादी के बाद की असमानता, असंतुलन तो बाद की चीज़ है।
लड़की आज किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं हैं। बेटियों को भी मैं-बाप बेटों की तरह ही पढा रहे हैं। यह संतोष की बात होते हुए भी शादी के मुद्दे पर उन्हें आजादी न देना बच्चों के प्रति कहीं न कहीं एक अविश्वास को दिखाता है। एक शादी का खर्च तो लड़का-लड़की खोजने में ही ख़त्म हो जाता है। उस पर से बार-बार लड़की को हर लड़केवाले के सामने सजा-धजा कर प्रस्तुत करना। यह अपने आप में इतना गलीज लगता है, जैसे बेटियाँ न हीन, प्रसाधन या सजावट का कोई सामान हो गई, जो पुकार-पुकार कर कहता है कि लो मैं प्रस्तुत हूँ। आओ, मुझे देखो, परखो।
परखने की घटना- कोई हाथ फैलाकर तो कोई साड़ी टखने तक उठा कर देखेंगे कि लड़की कहीं लूली- लंगडी तो नहीं। आँखें ऊपर उठावायेंगे कि कहीं वह कानी तो नहीं। सवाल ऐसे-ऐसे कि मन करे कि एक बड़ा सा पत्थर उठाक आर सामने वाले ल्के सर पर मार दिया जाए।
उससे भी हैरानी की बात है कि इन बेतियूं की माताएं यह सब परम्परा के नाम पर अच्छा समझती रहती हैं। वे ख़ुद अपने समय में अपने को बीसियों बार इस दिखाने की नारकीय स्थिति से गुजर चुकी होती हैं। फ़िर भी अपनी बेटी को भी इसी स्थिति का सामना कराने के लिए मज़बूर करती हैं। बेटियाँ अभी भी मैं- बाप के कहे अनुसार चलती हैं तो यह सोच कर कि आख़िर लो वे माँ -बाप हैं। तो माँ- बाप को भी इतना अधिकार तो देना ही होगा कि बेटियाँ अपनी पसंद का लड़का तय करे और माँ- बाप अपनी सहमति कि मुहर उस पर लगाएं। बहस बहुत हो सकती है कि अगर लड़का अच्छा न निकला तो? तो इसकी भी क्या गारंटी कि माँ- बाप द्वारा पसंद किया गया लड़का सही ही होगा? इसमें पिटा से अधिक माँ की भुमिका है। माँ अपने समय को याद करे और बेटियों को इस तरह का शो केस बनने से बचाए।
ऐसा होता है तो छाम्माक्छाल्लो इसे अपने जीवन की एक और सफलता समझेगी। हे आज की माम्मियो, आप पढी-लिखी, समझदार हैं। आप अपने बच्चों के भीतर विश्वास भरें। भरोसा रखें, वे आपका विश्वास कभी नहीं तोदेंगे। उन्हें अपना जीवन जीने व अपना जीवन साथी ख़ुद चुनने की आजादी दीजिये। आख़िर कार यह उनकी जिन्दगी है और यह जिंदगी अब आपसे ज़्यादा उम्र और संभावनाओं की है। बको अन्य भी महत्वपूर्ण काम कराने के लिए सोचने दीजिये। शादी भी एक अहम् पक्ष है, इअसके लिए उसे आजादी दें।