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Monday, May 4, 2009

जाना निरुपमा सेवती का

जिन लोगों की कहानियां पड़ती छाम्माक्छाल्लो बड़ी हुई है, उनमें से एक नाम निरुपमा सेवती का भी है। तब नीहारिका नाम की कहानियों की पत्रिका निकला करती थी। बड़ी अच्छी होती थी वह पत्रिका। उसमें उनकी कहानियां छपती थीं। छाम्माक्छाल्लो बड़े चाव से उनकी kahaaniyan पड़ती। पाता नहीं, कैसे, यह नाम उसके जेहन में बस गया। बाद में मुम्बई आने पर पाता चला की वे यहीं रहती हैं। बाद में यह भी पाता चला की वे सुप्रसिद्ध कवि, नाटककार, आलोचक डाक्टर विनय की पत्नी हैं। मगर कभी उनसे मुलाक़ात नहीं हो पाई। sooaraj prakaash द्वारा संपादित "बंबई-१" में उनकी कहानी के साथ फोटो भी थी। उनकी सुन्दरता से छाम्माक्छाल्लो बहुत प्रभावित हुई। मगर सबकुछ बस यहीं तक।

आज निरुपमा सेवती नहीं रहीं। १ मई को, जब सारा बिश्व मजदूर दिवस मना रहा था, कलम की इस मजदूर ने अपनी अन्तिम साँसें लीं। वे asthamaa से पीडित थीं, और जीवन के अन्तिम ८-१० दिन काफी बीमार-सी रहीं। उन्हें विस्मृति दंश भी हो गया था, khaanaa-पीना छूट गया था, जिस कारण काफी कमजोर भी हो गई थीं।

३० अक्टूबर, १९४९ को जन्मी निरुपमा सेवती की उम्र इतनी भी नहीं थी की कह diyaa जाए की चलो, उम्र हो गई। मगर हाँ, काम काफ़ी किया उनहोंने। पढाई-लिखाई देहरादून में हुई। फ़िर पिटा के बंबई आने पर वे भी जाहिर है की मुम्बई आ गईं। १९६८ में इनकी पहली कहानी छपी और छपते ही काफी चर्चा में आ गई। इनके कुल ७ कहानी संग्रह है-"खामोशी को पीते हुए", आतंक बीज", कच्चे makaan", "काले खरगोश", भीड़ में ", "दूसरा ज़हर","नई लड़की-पुरानी लड़की"। ५ उपन्यास हैं-"पतझड़ की आवाजें', बांटता हुआ आदमी", मेरा नरक अपना है", दहकन के पार", "प्रत्याघात"। इनके अलावा जें दर्शन पर इनका बहुत महत्वपूर्ण काम रहा। उनका पूरा काम २ वाल्यूम में आ चुका है।

निरुपमा सेवती कत्थक की बहुत कुशल न्रित्यानागाना थीं। पंडित गोपी कृष्ण से इन्होंने कत्थक सीखा और राधा-कृष्ण नृत्य मालिका में गोपीचंद के साथ raadhaa की भुमिका की। उनके सिखाए शिष्यों में से दो नाम बेहद चर्चित हैं- डिम्पल कपाडिया औअर संगीता बिजलानी।

वर्तमान में निरुपमा जी लेखन की और उन्मुख हो चुकी थीं। हाशूद दर्शन पर बालाशेम के ऊपर पहली किताब hindii में लिखी। ज्ञान पाल सार्त्र के ऊपर इनकी किताब है। प्लेटो की चिंतानामाला का संकलन इनके पास था। "भारतीय भाषाओं की स्त्री-शक्ति की कहानिया" का सम्पादन कर रही थी।

इन सबके अलावा निरुपमा जी होमियोपैथी की प्रैक्टिस किया करती थीं। होमियोपैथी चिकित्सा में भी एस्ट्रो होमियोपैथी में विशेष रूचि थी। दूरदर्शन के "तालियाँ" कार्यक्रम के तहत इनकी कई कहानियों पर तेली फिल्मों का निर्माण हुआ।

उनके जाने से साहित्य को नुकसान तो हुआ ही है, मगर साहित्यिक उदासीनता भी खाली। मुम्बई के सबसे बड़े हिन्दी दैनिक ने उनके निधन की ख़बर तक छपने की ज़हमत नहीं उठाई। तब लगता है, हिन्दी का लेखक होना कितनी बड़ी trasadiyon से गुजरने के समान है।

Friday, March 6, 2009

जेल में राजेन्द्र बाबू की कैदी के रूप में सबसे बड़ी लाचारी

इस बार डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद पर कुछ लिखने से पहले लेख पर छपी टिप्पणियाँ आपके अवलोकन के लिए। इसे हमारे मित्र व् राजेन्द्र बाबू के अनन्य भक्त हर्ष प्रसाद ने लिखा है। छाम्माक्छाल्लो अब से हर लेख पर पुस्तक का नाम आदि विवरण देने का प्रयास करेगी। आप सभी पाठकों और शुभ चिंतकों से अनुरोध है की इस किताब को खरीद कर बालिकाओं को साक्षर बनाने में अपना योगदान दें। हर्ष जी की टिपण्णी यहाँ प्रस्तुत है. vaise harSh jii, kahiin kuchh bhii avaidh kaary nahiin ho rahaa hai raajendr baaboo ke baare mein jaanakaarii dene mein. kaii baar pustak kaa naam aadi diyaa jaa chukaa hai, kaii baar rah gayaa hai. )

(आदरणीया विभा जी, राजेन्द्र बाबू की जीवनी के इतने अंतरंग उल्लेख तो आपने निश्चित ही कहीं से उद्हृत किये होंगे। हम पाठकों को उन संदर्भ ग्रंथों की सूची चाहिए, अन्यथा ऐसी कहानियाँ भ्रामक भी हो सकती हैं और यदि कहीं से उद्हृत हैं तो सन्दर्भ पुस्तक के बारे में न बताना अवैध और अनधिकृत होता है।इस सन्दर्भ में हमारी चर्चा हो चुकी है.जिस किताब से ये कहानियाँ अपने ब्लॉग पर आप धड़ल्ले से उध्रित करती जा रहीं हैं, आप को अच्छी तरह मालूम है किइस किताब की प्रत्येक प्रति की बिक्री से प्राप्त अल्प धनराशि बिहार की अप्राधिक्रित, पददलित और शोषित बच्चियों के नाम जाती है. इस सन्दर्भ में हमारे और आपके बीच चर्चा हो चुकी है. ऐसी लेखिका जो 'बालचंदा' और 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' जैसे नाटक लिख सकती है, उसका सब कुछ जानते हुए भी ऐसा संवेदनाविहीन होना खटकता है. हर्ष)

जेल में हर प्रकार की बड़ी या छोटी लाचारियाँ होती हैं। अगर वह न रहे तो जेल जेल ही न रहे। इन लाचारियों में भी सबसे बड़ी लाचारी तब होती है, जब बंदी अपने सगे-सम्बन्धियों, स्नेहियों, मित्रों को महाविपत्ति में पडा सुनता है और उनके साथ दुःख बांटना तो दूर, दिलासा के दो शब्द भी नहीं कह सकता। ऐसे में सबसे बड़ा संकट होता है किसी की बीमारी या मृत्यु।

राजेन्द्र बाबू अन्तिम बार ९ अगस्त, १९४२ से १५ जून, १९४५ तक पटना जेल में रहे। ज़ाहिर है, इतनी बड़ी अवधि में कई दुखद घटनाएँ घटीं। इन सभी से राजेन्द्र बाबू को बड़ा कष्ट होता। अपने घर में भी बड़ी दुखद मृत्यु उनकी बड़ी भतीजी की हुई। वे पटना आकर, जेल में राजेन्द्र बाबू से मिलकर अपने घर वापस गईं। वहीं कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हुई। घर में सभी भही -बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण वे सबकी बहुत प्यारी थीं। राजेन्द्र बाबू को उनकी मृत्यु से बहुत दुःख हुआ।

मित्रों में सबसे पहले गए गांधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई। च्मपारण के आन्दोलन के समय उनसे राजेन्द्र बाबू की घनिष्ठ दोस्ती हो गई थी। महादेव भाई के निधन से उनका पूरा परिवार बहु दुखी हुआ। गांधी जी का तो मानो दाहिना हाथ ही टूट गया।

बिहार में भी कई मित्र इस दरम्यान गुजर गए। विशेषकर वैद्यराज ब्रजबिहारी चतुर्वेदी जी का जाना। वे पीयूशामानी तो थे ही, आयुर्वेद के पुनरुद्धार के लिए बड़ा परिश्रम किया था। अन्यों में बिहार के कांग्रेसी नेता बाबू राम दयाल सिंह का नाम आता है। वैसे ही एक बुजुर्गवार मित्र थे डाक्टर सर गणेश दत्त सिंह। राजनीतिक मेल उनका कभी नहीं रहा, मगर सामाजिक व्यवहार में वे बहुत ही मधुर व् स्नेही थे। राजेन्द्र बाबू के साथ उनका प्रेम राजनीतिक विरोधों के बावजूद एक समान बना रहा।

जेल में रहते हुए ये सब लाचारियाँ राजेन्द्र बाबू ने खूब झेलीं।

साभार- पुन्य स्मरण, मृत्युंजय प्रसाद, विद्यावती फाउन्देशन, २७४, पाताली पुत्र कालोनी, पटना- 800013

Thursday, March 5, 2009

बाबा, फ़िर जेल कब जाओगे?

डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद जब पटना सदर जेल में थे, तब श्री गोडबोले के आदेश से कई डाक्टरों ने उनकी जांच की। इससे धीरे-धीरे उनकी सेहत में सुधार आने लगा। कुछ दिन बाद निकट के सम्बन्धियों से मुलाक़ात की सुविधा मिलाने लगी। एक माह में २ मुलाकातें और २ पात्र लिखने की छूट थी। राजेन्द्र बाबू ने पात्र लिखने के बदले मुलाक़ात का विकल्प लिउया। यानी अब माह में ४ मुलाकातें यानी हर हफ्ते मुलाक़ात। मुलाक़ात में पहले केवल ५ लोगों को जाने दिया जाता था। बाद में घरवालों के लिए इसमें थोड़ी छूट मिलाने लगी। बीमारी के कारण राजेन्द्र बाबू से मुलाकातें उनके लिए तय कमरे में होती थी, बाद में वही कमरा उन्हें दे भी दिया गया रहने के लिए। मुलाकातें भी इसी कमरे में होतीं। राजेन्द्र बाबू उस कमरे में १९४२ से १९४५ तक रहे। उनके साथ दूसरे बड़े लोग, जो वहाँ कैद करके लाये गए थे, वहीं उनके साथ रहे। उनकी देखभाल के लिए पहले बाबू मथुरा प्रसाद और बाद में श्री चक्रधर शरण वहीं रखे गए। हजारीबाग जेल से पारी-पारी कई अन्य मित्रों को भी सरकार वहाँ ले आई।
मुलाक़ात के लिए सारा परिवार, जो उस दिन पटना में होता, जाता। ५ की गिनती में बच्चे नहीं आते थे। १९४२ में राजेन्द्र बाबू का पोता अरुणोदय प्रकाश लगभग एक साल का था। वह भी जाता था। धीरे-धीरे वह चलने और दौड़ने लगा। जेल के फाटक पर पहुंचाते ही उसे खोलने के लिए शोर मचाने लगता। अपनी तोतली जुबां में पुलिस को दांत भी लगाता। फाटक खुलते ही वह सीधा राजेन्द्र बाबू के कमरे की दौड़ लगाता। वह उसे ही अपने बाबा का घर समझ बैठा था। जेल में बच्चों को २-३ बार मिठाईयां मिलीं। फ़िर क्या था, बच्चे वहाँ पहुंचाते ही खाने-पीअने की फरमाइशें शुरू कर देते। राजेन्द्र बाबू भी मुलाक़ात के दिन पहले से ही इसका प्रबंध करके रखते।
बच्चों को सप्ताह में एक बार बन-संवर कर जेल जाने की आदत पड़ चुकी थी। इसे वे सैर-सपाटे का एक हिस्सा मानने लगे थे। इसमें मिठाई का भी काफी लोभ थाजब १९४५ में राजेन्द्र बाबू छूटकर घर आए तो उनके पोते को बड़ी खुशी हुई। फ़िर जब उसके जेल जाने यानी सैर का दिन आया तो उसे न कोई बाबा के घर (जेल) ही ले गया और ना ही किसी ने उसे मिठाई ही दी। तब उसे बाबा का घर आना रुचा नहीं। तीसरे-चौथे दिन तो उसने पूछ ही liyaa-" बाबा, फेर जेल कब जैईब'?

Wednesday, March 4, 2009

जेल में राजेन्द्र बाबू का पुस्तक-लेखन

पटना जेल में जब डा राज्नेंद्र प्रसाद की सेहत काफी सुधर गई, तब उनहोंने किताब लिखने का काम अपने हाथ में ले लिया। पहली पुस्तक अन्ग्रेज़ी में लिखी गई थी, पाकिस्तान की मांग को लेकर। अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं-" कुछ ऎसी पुस्तकें, जो पाकिस्तान के समर्थन में लिखी गई थीं, मंगाई। उनको पढ़ने के बाद विचार हुआ की जिस आधार पर यह मांग पेश की जाती है, वह कहाँ तक ठीक है? यह भी देखना है की मुस्लिम लीग पाकिस्तान किसे कहती है? उसकी मांग यदि कोई मान ले तो उसे क्या देना होगा और मुस्लिम लीग को क्या मिलेगा? क्या पाकिस्तान अपने पांवों पर खडा हो सकेगा? अंत में सोचा की इस पर लिकहें की कुछ गुंजाइश है।"
इसा प्रकार सालों के घोर श्रम के बाद पुस्तक तैयार हुई। इसके लिए अन्य पुस्तकालयों सहित पटना के 'श्री सच्च्चिदानंद लाइब्रेरी से बहुत मदद मिली। सरकार ने भी वे किताबें जेल में जाने दीं। पुस्तक लिखी जा रही है, यह समाचार जेल से छूटकर आनेवालों से बाहर के लोगों को मिल गया और प्रकाशित भी हो गया।
राजेन्द्र बाबू आगे लिखते हैं की " कमिश्नर आए और पुस्तक कहाँ तक पूरी हुई है, इस बाबत पूछा। वे बोले की करीब-करीब पूरी हो चुकी है। उनहोंने देखना चाहा। राजेन्द्र बाबू ने हस्त लिखित बहियाँ उन्हें थमा दीं। एक तो महीन अक्षर लिखने के आदी राजेन्द्र बाबू, दूसरी और जेल में कागज़ की कमी के कारण और भी महीन अक्षरों का प्रयोग। कोई नई बात सामने आने पर उसे यहाँ-वहाँ चस्पां कर देना। इसलिए किसी दूसरे के लिए पुस्तक पढ़ना काफी मुश्किल था। कमिश्नर ने पूछा की क्या किताब छपाने का इरादा है? वे झट से बोले की अगर सरकार इज्ज़ज़त देगी तो छपाई जाएगी। वे बोले की बगेर देखे सरकार इसकी इज्ज़ज़त नहीं देगी। हस्तलिखित जो हालत है, उसमें तो इसे देखना भी मुश्किल है। तैअप प्रति ही सरकार देख सकेगी। राजेन्द्र बाबू ने कहा की टैप कराने का साधन मेरे पास नहीं है, मगर सरकार सुविधा दे तो टैप हो सकता है।"
टैप कराने के लिए ३ तरीके राजेन्द्र बाबू ने सरकार को सुझाए-१), उनके सहायक श्री चक्रधर शरण को टैप कराने का मौका दें, जो उनके अक्षरों से बखूबी परिचित हैं। वे उस समय तक रिहा हो चुके थे, इसलिए वे जेल के अन्दर आ नही सकते थे। न सरकार राजेन्द्र बाबू को रिहा करेगी, न पुस्तक बाहर जा सकेगी। इसलिए उनको जेलर के दफ्तर में बैठ कर टैप करना होगा। टैप और हस्तलिखित प्रति जेलर के दफ्तर में ही छोड़ना होगा। २) सरकार इसके लिए किसी कर्मचारी को नियुक्त कर दे और इसके लिए जो खर्चा होगा, वे दे देंगे। '३) यदि कोई टैप करनेवाला कैदी हो तो उसे बांकीपुर जेल में बुला लिया जाए। राजेन्द्र बाबू को याद आया की जमाशेदा पुर युनियन लेबर के मंत्री श्री माइकेल जान टैप करना जानते हैं। इससे उन्हें टाईप कराने में काफी सुविधा हो जाएगी। सरकार के लिए यह बात अच्छी रहेगी की उससे पहले बाहर का कोई भी आदमी इसे देख नहीं पायेगा।
इसा तरह से माकेल जान पटना आए। संयोग की बात की किताब की टाइपिंग का काम १४ जून, १९४५ को पूरा हुआ और १५ जून १९४५ को राजेन्द्र बाबू जेल से रिहा हुए।
इस किताब के आनाकदों की जांच का काम दूसरे राजनीतिक कार्यकर्ता और विग्न्यानावेत्ता श्री मनीन्द्र कुमार घोष ने किया। बाहर आने पर किताब के बचे खुची अंश को पूरा किया गया। पुस्तक का पहला संसकरण जनवरी, १९४६ को "इंडिया दिवैदेद" के नाम से छापा और एक माह के भीतर ही इसकी सारी प्रतियाँ बिक गईं। बाद में 'खंडित भारत' के नाम इस इसका हिन्दी संसकरण भी आया। पाकिस्तान कीआयातियों में से ऐसा कोई भी नहीं निकला, जो किताब पर बहस करता या उसमें कोई भूल निकालता। बस वे अपने अनुयायियों को इस किताब को पढ़ने से मना करते। वे कहते की यह तो 'ज़हर कातिल' है। जो पढेगा, उसकी अक्ल मारी जायेगी। मगर इस घातक जहर का कोई बुद्धि सांगत जवाब उनके पास नहीं होता। इसके उलट पाकिस्तान के जनादाता मो। अली जिन्ना ने हिन्दू-मुसलमान दो राष्टों की बात छोड़कर कुछ वैसी ही बातें पाकिस्तान की संविधान सभा में ११ अगस्त, १९४७ को कही थी, जैसी की वे २०-२५ साल पहले पाकिस्तान का सपना देखने के लिए कहा करते थे। उनहोंने कहा था- " बहुसंख्यक और अल्प संख्यक समुदायों, हिन्दुओं, और मुसलमानों का अन्तर दूर हो जायेगा, क्योंकि आख़िर मुसलमानों में भी पठान, पंजाबी, शिया, सुन्नी, जैसे भेद तो हैं ही, जैसे की हिन्दुओं में ब्राहमण, वैशनव, खत्री, बंगाली, मद्रासी के भेद हैं। हिन्दुस्तान की आजादी हासिल कराने में ये ही भेद सबसे बड़े रोड थे और ये न होते तो हम बहुत पहले ही आज़ाद हो गए होते। दुनिया की कोई भी ताक़त किसी राष्ट्र को, ख़ास कर ४० करोड़ आबादीवाले राष्ट्र को बहुत समय तक गुलाम बना कर नही रख सकती। तुम्हारा कोई धर्म हो, तुम किसी जात-पांत के हो, इसका राज-काज से कोई नाता नहीं। हमें अपने सामें यही आदर्श रखना चाहिए और तब हम देखेंगे की अपने-अपने धर्म में आस्था रखते हुए हिन्दू हिन्दू रहेंगे और मुसलमान मुसलमा। और सभी देश के एक समान नागरिक होंगे, नागरिक की जगह पर न कोई हिन्दू होगा और न कोई मुसलमान।" अफसोस की जिन्ना साहब के भाषण के संग्रह में से भाषण का यह अंश हटा दिया गया गई।

-साभार, पुन्य स्मरण, मृत्युंजय प्रसाद

Thursday, February 19, 2009

साथी बंदियों के प्रति राजेन्द्र बाबू का व्यवहार

सन १९४३ की बात है। जेल में आनेवाले नए कैदियों से पुराने कैदियों को बाहर के समाचार मिल जाया करते थे। बाद में राजेन्द्र बाबू को एक-दो अखबार भी मिलाने लगे थे। नाना प्रतिबंधों के कारण अखबार में सबकुछ छपता नहीं था। जो छपता भी था, उसमें बहुत कुछ साफ़ -साफ़ नहीं लिखा होता था। नए कैदियों से वे जानकारी मिलाती थी, जो कहीं छपनेवाली नहीं होती थी। यह जानकारी ख़ास-ख़ास लोगों के बारे में होतीं।
एक दिन राजेन्द्र बाबू ने मुलाक़ात के समय अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद से कहा की अमुक अमुक के परिवार बहुत ही आर्थिक संकट में हैं। उन्हें मासिक रूप से नियमित सहायता मिलनी चाहिए। बेटे के सामने विकत समस्या। एक तो राजेन्द्र बाबू की बात ताली कैसे जाय और दूसरे अपना परिवार बड़ा होने के कारण अपना ही वेतन कम पङता था। वे कुछ जवाब नहीं दे पाए। अगले महीने राजेन्द्र बाबू ने फ़िर से इस बात की चर्चा की। वे बोले-" तुम मेरे नाम पर ऋण ले कर इन लोगों की सहायता करो। मैं यदि जिंदा जेल से निकला तो यह करजा चुकाउंगा। मर गया तो यह भार तुम पर छोड़ जाउंगा।" मृत्युंजय प्रसाद ने कुछ प्रयत्न किया, मगर सफलता नहीं मिली। तब एक माह बाद फ़िर राजेन्द्र बाबू ने कहा की "मुझसे यह बर्दाशत नहीं होता की मेरा परिवार तो सुखी रहे, मगर जेल में साद रहे मेरे सहकर्नी के परिवार भूखों मारें। बहुत सम्भव है की एक दिन तुम्हें सुनाने को मिले की इसी के प्रायश्चित में मैंने आमरण अनशन करना आरम्भ कर दिया है। मृत्युंजय प्रसाद की घबराहट की सीमा न रही। राजेन्द्र बाबू के पुराने मित्र बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला राजेन्द्र बाबू का समाचार लेने घर आए। मृत्युंजय प्रसाद ne unhen सब कुछ बताया। उनहोंने ३०० रुपयों की व्यवस्था कर दी। उधर सरदार पटेल के पुत्र, जो ओरिएण्टल इंश्योरेंस में उच्च पड़ पर थे, वे भी बंबई से कुछ राशि भेज दिया करते थे। दो-एक बार सुदूर उत्कल से दो-तीन उच्च पदस्थ अफसर, जो बिहार से थे, वे भी कुछ राशि भेजते रहे। इअप्रकार, जब तक राजेन्द्र बाबू जेल से छूटकर न आ गए, तबतक दो-तीन परिवारों को ७५ रूपए मासिक तथा कई अन्यों को १०-१५ रुपये मासिक की सहायता मिलाती रही।

Wednesday, February 18, 2009

जेल में वकालत -- राजेन्द्र बाबू की.

२२ सालों की छोडी हुई राजेन्द्र बाबू की वकालत जेल में फ़िर से चमक उठी। हुआ यूँ की उन दिनों छोटे-मोटी झगडों को भी राजनीतिक रंग दे दिया जाता था और कम या कच्चे सबूतों पर भी लम्बी-लम्बी सजाएं सूना दी जाती थीं। कोई- कोई तो आजीवन कैद की सज़ा तक सूना देते थे। बाहुत बार तो गरीब कैदी के पास साधन ही नहीं होते थे की वह आगे की अदालत में अपील कर सके। या फ़िर अपील हो भी गई तो अच्छे वकील कर ही लें। अब जो मुकदमे चल रहे होते, खासकर राजनीतिक कैदियों के, उनमें राजेन्द्र बाबू को बहुत प्रकार की अर्जियां लिखना, सफाई के प्रमाणों का विश्लेषण करना, अपील की दरख्वास्तें लिखना आदि शामिल थे। बाद में तो कई जेलर भी ऐसे मामले सामने लाकर उनकी सलाह सफाई- पक्ष के वकीलों के पास भिजवा देते। दुखी कैदियों तथा उनके घरवालों की सेवा करके राजेन्द्र बाबू को बड़ा संतोष मिलता।
एक मनोरंजक केस था। एक ६० साल के बूढे पर आरोप था की वह दो-ढाई मन भारी बोरी पीठ पर लादकर, बरसात में खेत की मंदों पर भाग खडा हुआ था। एक मील तक पीछा कराने के बाद ही पुलिस उसे पकड़ सकी थी। वह बूढा बमुश्किल लानागादाकर चल पाटा था। उसके हाथों की उंगलियाँ मुड़ती नहीं थीं, मुट्ठियाँ बंधती नहीं थीं, फ़िर भी इस आरोप पर उसे लम्बी सज़ा हो गई थी। राजेन्द्र बाबू के बताये उपाय से अपील कराने पर हाई कोर्ट ने मान लिया की कैदी के लिए असंभव था की वह बोरी पीठ पर उठा सके और पीठ पर लादकर भागना तो एकदम असंभव था।
लगभा ३ वर्षों के जेल-जीवन में दया की अपीलें लिखने, खून के मामलों की असली बातें अभियुक्तों के मुख से सुनाने तथा उनके कागजात से यह जानने के बहुत से अवसर मिले की किस प्रकार अदालत में सच को झूठ और झूठ को सच साबित किया जाता है। संभवत: यही कारण रहा होगा की राष्ट्रपति बनने के बाद दया की अपीलों, फँसी को आजीवन कारावास में बदलने के फैसलों पर वे बहुत गौर देते थे तथा उन सबकी बड़ी बारीकी से निरीक्षण कराने के बाद ही वे कोई निर्णय लेते थे। दो-एक केस में उनहोंने अभियुक्त के बचाव पक्ष में उन्हीं कागजों में से वे बातें खोज निकाली थीं, जिन्हें सफाई के वकील तथा जज सभी नज़र- अंदाज़ कर गए थे और इस प्रकार से उन दण्डित अभियुक्तों के प्राण बचे थे।
जेल की अपीलों से जिनके प्राण बचे थे, उनमें से एक थे फतुहा के सिराजुद्दीन दर्जी। इन पर दो गोरों के क़त्ल का जुर्म लगाया गया था। अदालत की और से उसे फांसी की सज़ा सुनाई गई थी।

Tuesday, February 17, 2009

राजेन्द्र बाबू और उनका जेल जीवन

राजेन्द्र बाबू की जेल यात्रा से सम्बंधित बहुत से संस्मरण हैं, जिन्हें एक-एक करके यहाँ प्रस्तुत किया जाएगा।

सन १९४२ में राजेन्द्र बाबू जेल गए। अहस्त का महीना था। वे सदाकत आश्रम पटना में थे और बहुत बीमार थे। इसी कारण वे बंबई में आयोजित होनेवाले भारतीय कांग्रेस की महासमिति की बैठक में भी न जा सके थे। वहा पर मौजूद लगभग सभी नेता ८ या ९ अगस्त को पकड़ लिए गए थे। गांधी जी भी पूना के आगा खान पैलेस में भेज दिए गए थे। ९ अगस्त को पटना के कलक्टर तथा पुलिस सुपरितेंदेंत सदाकत आश्रम में राजेन्द्र बाबू को गिरफ्तार कराने पहुंचे। उन्हें बीमार देख वे वापस अस्पताल गए और एम्बुलेंस तथा सरकारी बड़े डाक्टर सिविल सर्जन को लेकर पहुंचे। तब डाक्टर की देख रेख में एम्बुलेंस में सुला कर उन्हें पटना जेल ले जाया गया। जेल तक उनके साथ मथुरा प्रसाद भी गए। वहा पर यह पाता चलने पर की उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है, इसलिए उन्हें जेल से लौटना पडेगा, उन्हें बहुत बुरा लगा। किंतु कोई उपाय नही था। फ़िर भी उनहोंने कलक्टर पर इतना जोर डाला की उन्हें कहना पडा की आप पहले आश्रम लौट जाएँ, हम आपको वहाँ जाकर गिरफ्तार कर लेंगे। और यही हुआ भी। राजेन्द्र बाबू के पास जेल में पहुचने के बाद मथुरा बाबू को शान्ति मिली। ये वही मथुरा बाबू थे, जिन्हें लोग मजाक में मौखिक प्रचार मंत्री कहते थे, क्योंकि वे काम बहुत तेजी से नहीं कर पाते थे।

चारो और बेहद सख्ती थी। घरवालों को जेल में मिलाने देने की इजाज़त नही थी। अफावाएहं रोज नए-नये रूप लेकर आती। उन दिनों बिहार सरकार के मुख्य सचिव यशवत राव गोडबोले थे। सरकारी नौकरी में होने के बावजूद दिल से देशभक्त थे। उन्हें पात्र लिखा गया राजेन्द्र बाबू की सेहत को लेकर और यह भी की उन्हें बीमारी की हालत में जेल ले जाया गया है । जेल में इलाज़ तो हो रहा है, मगर बीमारी पुरानी है, पाकर में न आने के कारण और भी गहरी होती चालली जा रही है। इसलिए उनके पुराने डाक्टर टी एन बनर्जी तथा दा। रघुनाथ शरण से उन्हें जाए। यह बात जेल के डाक्टर घोष को बेहद बुरी लगी। उन्होंने राजेन्द्र बाबू से कहा की "बीमारी के नाम पर आपको मृत्युंजय प्रसाद (राजेन्द्र बाबू के बेटे) मेडिकल बोर्ड बुलावा रहे हैं। सदा से मृदुभाषी राजेन्द्र बाबू गरज कर बोले- "डा। घोष, अब जबकि हमारे मित्र, सहकर्मी व् संगी-साथी, देशवासी गोलियों के शिकार हो रहे हैं, और मेरे भौनके कंधे-से-कंधा मिलाकर गोलियाँ झेलना नहीं लिखा है और बिस्तर पर एडियाँ रगड़कर ही मरना बड़ा है, तो इस जेल से उपायुक्त जगह मेरे लिए और कोई दूसरी नहीं हो सकती। और यहाँ भी आपके हाथों में रहकर। आप खातिर जमा रखिये। बीमारी के नाम पर सरकार मुझे छोड़ना भी चाहेगी, तो जहाँ तक मेरा वश चलेगा, मैं बाहर नहीं जाऊंगा और यहीं मारूंगा। " यह सुनकर डा। घोष चुपचाप बाहर आ गए और दूसरे डाक्टरों के साथ ही आए।

Tuesday, February 10, 2009

सरकारी मेहमान- राजेन्द्र बाबू

सन १९४२ से पहले कभी किसी समय हजारीबाग के कांग्रेसियों ने राजेन्द्र बाबू से शिकायत की की वे बिहार के सभी जिलों का दौरा करते हैं, और हमारे जिले को बहुत कम समय देते हैं। वे सब यह चाहते थे की वे यहाँ आयें और दो-तीन दिन ठहरें, ताकि वे सब अपना सुख-दुःख उनसे बतिया सकें। पहले तो राजेन्द्र बाबू ने उन सबको खूब समझाया की सब अपने आप में इतने सक्षम हैं की उनकी ज़रूरत ही किसी को नहीं है। मगर लोग माने नहीं। एक -दो लोगों ने फ़िर भी अपनी शिकायेतें दर्ज कीं। तब राजेन्द्र बाबू ने हंसते हुए कहा की आप सब मानें या न मानें, मगर सच तो यह है की एक साथ जमकर बैठने के जितने भी अवसर आए हैं, उन सबमें सबसे अधिक तो मैं हजारीबाग में ही रहा हूँ। कुछ समझ गए, कुछ नहीं समझे। उन्हें राजेन्द्र बाबू का ऐसा कोई प्रोग्राम याद नही आता था, जिसमें वे अधिक समय तक यहाँ रहे हों। उन सबने इसे स्पष्ट कराने का अनुरोध किया। राजेन्द्र बाबू ने हंसते हुए कहा की बचओपन के बाद तो कभी ऐसा मौका नहीं लगा की किसी एक जगह जमकर रहूँ, मगर सरकारी मेहमान बनाकर सबसे अधिक तो मैं यहीं रहा हूँ, राजेन्द्र बाबू का आशय था की वे हजारीबाग जेल में सबसे ज़्यादा रहे। सुनकर हँसी का फव्वारा फ़ुट पडा। बाद में सन १९४२ से १९४५ तक लगभग पौने तीन साल तक राजेन्द्र बाबू को पटना जेल के एक ही कमरे में रहना पडा था।

Tuesday, February 3, 2009

सरकारी नौकर- राजेन्द्र बाबू के लिए

अंग्रेजों के ज़माने में, कांग्रेस की सार्वजनिक सभाओं में खासा कर गांधी जी के दौरों पर, उनकी सभाओं में पुलिस के रिपोर्टर सादे लिबास में तैनात रहते थे, जो अपनी रिपोर्ट लिखकर सरकार को भेजते थे। बार-बार दो लोगो को ही रिपोर्ट लिखते देखकर लोग उनके बारे में समझ गए थे। फ़िर तो वे रिपोर्टर भी अपना काम छुपा कर नहीं करते थे। गांधी जी के र्तूफानी दौरों में सभी जगह पहुंचकर सारी रिपोर्ट लिखना उनके लिए सम्भव नहीं होता था। कठिन तो रहता ही था। कई बार तो राजेन्द्र बाबू उन्हें अपने लिए तय सवारी में जगह भी दे दिया करते थे। एक बार किसी के ध्यान दिलाने पर वे बोले की "मैं इन्हें भली-भाँती जानता हूँ। सरकार ने इन्हें हमारी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए हम भी इनकी सुविधा का थोड़ा ख्याल कर लेते हैं। लेकिन ज़्यादातर तो ये ही हमारा काम कर देते हैं। आप भी इन्हें अपना कर्मचारी या कांग्रेस का नौकर मानिए। " सभी हंस पड़े। यह थी राजेन्द्र बाबू की भलमनसाहत।
यही बात अहमदाबाद में होती थी। वहां पुलिस के अफसर सत्याग्रह-आश्रम में आने-जानेवालों के बारे में रिपोर्ट दर्ज करते थे। उनमे से एक की ड्यूटी लगी थी अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर। जब कभी राजेन्द्र बाबू अहमदाबाद जाते, वह स्टेशन पर मिलता, स्वागत में आगे दौड़कर आता, बाहर जा कर सवारी ठीक कर देता, और आराम से उन्हें गाड़ी में बिठा देता। उसके जिम्मे सामान छोड़कर जाने में भी कोई दिक्कत न होती। एक बार उससे पूछने पर राजेन्द्र बाबू ने वही पुराना जवाब दिया की "सरकार ने उसे आपलोगों की सेवा कराने के लिए नियुक्त किया है। वह बेचारा कटकर रह गया। मगर बोलाताक्या? हंसते हुए बोला, "हाँ जी, हूँ जी, इन्हीं का सेवक हूँ।" दुश्मनों को भी मीठी छुरी से हलाल करना राजेन्द्र बाबू खूब जानते थे।

Monday, February 2, 2009

राजेन्द्र बाबू का भाषा प्रेम

डोक्टर राजेन्द्र प्रसाद भाषा के बहुत प्रेमी थी और विविध भाषा-भाषी से उनकी ही भाषा में बात कराने का प्रयास करते थे। सीखने की ललक युवाओं से भी अधिक थी। इसी ललक ने उन्हें बुढापे में संस्कृत सिखाई, जिसका उपयोग श्रृंगेरी मैथ के जगदगुरु शंकराचार्य के साथ बात-चीत करके किया। दुभाषिये की ज़रूरत उन्हें नहीं पडी।
बात शाययद सन १९२५ की थी। सत्याग्रह की कितनी योग्यता इस देश में है, यह परखने के लिए कांग्रेस के नेताओं का एक दल सरे देश के दौरे पर निकला। राजेन्द्र बाबू को दक्षिण में उत्कल से लेकर बंगाल, असम होते हुए पश्चिमोत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तक सभी जगह जाना था। वे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में साधारण हिन्दी, जिसे बाद में हिन्दुस्तानी कहा गया, का प्रयोग करते रहे। बंगाल में बांगला में भाषण दिया। असम में संस्कृत मिश्र हिन्दी रही, उडीसा में जटिल संस्कृत बहुल हिन्दी बोलते रहे जो धीरे धीरे उर्दू इलाके की और बढ़ते हुए पंजाब-सिंध से होकर पशिक्मोत्तर प्रदेश में फारसी, अरबी मिश्रित कठिन उर्दू हो गई। हर इलाके में ऎसी कोशिश की की लोग उनकी बातों को पूरी तरह समझ सकें।
जब वे राष्ट्रपति थे, तब इरान के शाह भारत -यात्रा पर आए। प्रोटोकोल के मुताबिक राजेन्द्र बाबू ने उनका स्वागत किया। दोनों प्रमुख एक ही गाडी से राष्ट्रपति भवन आए। रास्ते में राजेन्द्र बाबू ने बी ऐ तक पढी हुई फारसी का प्रयोग किया और दुभाषिये के सहारे के बिना ही उनसे भली-भाँती बातें करते आए। जाहिर है, शाह बड़े खुश हुए और प्रधान मंत्री से इस पर अपनी खुशी भी ज़ाहिर की।
मातृभाषा तो राजेन्द्र बाबू kii भोजपुरी थी, मगर हिन्दी पर पूरा अधिकार था। वे हिन्दी के व्यावहारिक ज्ञान के हिन्मायाती थे। अपने भाषणों में वे उसी कोटेशन को डालते, जिसका अर्थ उन्हें पाता होता। उनका मानना था की दूसरों की भाषा जानने से आप उस व्यक्ति के साथ बहुत अच्छे सम्बन्ध बना सकते हैं, उनके दिल में अपनी जगह बना लेते हैं। कहना न होगा की इन सब भाषाओं के साथ अन्ग्रेज़ी के भी वे बहुत अच्छे जानकार थे। संविधान के 'सेक्युलर स्टेट ' के हिन्दी अर्थ 'धर्म निरपेक्ष के वे ख़िलाफ़ थे। उअनकी नज़र में "इसका मतलब यह हुआ की भारत का संविधान किसी धर्म को मानता ही नहीं।' उनहोंने कहा की जिन लोगों ने उस अन्ग्रेज़ी शब्द सेक्युलर का प्रयोग किया, उनहोंने सब सब धर्मों के प्रति समान भाव रखने का विचार रझा था, न की समान विरोध अथवा उपेक्षा रखने का विचार।

Thursday, January 29, 2009

धर्म और राजेन्द्र बाबू

सभी जानते हैं की दा। राजेन्द्र प्रसाद निष्ठावान हिन्दू थे। मगर अन्य धर्मों के प्रति उनके मन में भी उतना ही आदर-भाव था। उनका इस बाबत कहना था, " भारत इमं अनेक धर्म प्रचलित हैं। अतीतकाल से यहाँ विचार की पूरी आजादी मिली है। हमारे संविधान में सबको अपने धर्म को मानने की पूरी आजादी दी गई है। तो सवाल इतना ही रह जाता है की संविधान की इन शर्तों को पूरी तरह से अमल में कैसे लाया जाए?"

राजेन्द्र बाबू की आरंभिक शिक्षा मौलवी साहब के हाथों हुई, जिनसे वे उर्दू-फारसी पढ़ते थे। दशाहेरे के समय मौलवी साहब उर्दू में भगवान रामचंद्र पर कविता लिखा कर बच्चों को सिखाते, उनसे गवाते। इसी प्रकार मुहर्रम पर हिन्दू लडके पैक बनाकर जुलूस में चलते थे। खान-पान में पूरा बर्ताव होने के बावजूद पारस्परिक प्रेम भावना आज से कहीं अधिक थी। एक दूसरे पर पूरा भरोसा था।

वकालत की परीक्षा पास कराने पर राजेन्द्र बाबू ने दो साल तक खान बहादुर सैयद शमाशुला हुडा के यहाँ काम किया। उनके साथ उंके सम्बन्ध बड़े मधुर रहे। वकालत के प्रशिक्षण के बाद जब राजेन्द्र बाबू ने अपनी वकालत शुरू की तो उनके मुंशी थे मौलवी शराफत हुसैन। उनके लिए सामिष भोजन की पूरी छूट थी। यह सब आज अजूबा लग रहा होगा, क्योंकि आज धर्म और राजनीति में ऊंची-नीची जाती आदि का महत्त्व इतना बढ़ गया है की सामाजिक सम्बन्ध टूट से गए हें और जातिवाद और स्वार्थ ने समबन्धों में बिखराव ला दिया है। लेकिन राजेन्द्र बाबू की प्रकृति इसके उलटी रही और वे अपने मुसलमान दोस्तों के साथ भी उतने ही प्रेम भाव के साथ रहे, जैसे की वे निकट के रिश्तेदार हों।

Tuesday, October 14, 2008

राजेन्द्र बाबू की विदेश यात्रा, ज्योतिष और उनके कपडे

राजेन्द्र बाबू पढ़ने में बहुत तेज़ थे, इसलिए उनके बड़े भाई सहित हित-मित्रों की राय बनी की वे इंग्लॅण्ड जाकर वहाँ से आई सी एस की परीक्षा दें। घरवालों से छिपाकर तैयारी हो रही थी, कोट- पैंट सिलाए गए थे, मगर भेद खुल गया और उनकी दादी उन्हें घर पकड़कर ले आईं, क्योंकि तब विदेश जाना बहुत ग़लत माना जाता था। तब राजेन्द्र बाबू ने अपने लिए इंतज़ाम किए गए सभी कपडे व् पैसे अपने एक दूसरे मित्र को, जिनकी ऎसी कोई योजना नहीं थी, उन्हें दे दिए। वे मित्र आगे चलाकर पटना हाई कोर्ट के जज बने। वे थे- श्री सुखदेव प्रसाद वर्मा।
उन्हीं दिनों की एक मनोइरंजक घटना है। जब विदेश यात्रा की गुप-चुप तैयारी चल रही थी, तब राजेन्द्र बाबू अपने दो अन्य मित्रों के साथ कलकत्ता में घूमते-घामते किसी वृद्ध बंगाली ज्योतिषी के यहाँ पहुंचे। वे एक से बोले- "तुम्हारे भाग्य में विदेश यात्रा नही लिखा है।" सब हंस परे, क्योंकि वह मित्र धनी भी था और पारिवारिक विरोध भी नही था। राजेन्द्र बाबू से कहा की तुम्हारा जाना बही नहीं, २० साल बाद होगा और तीसरे को, जिसकी कुछ तैयारी नहीं थी, कहा की तुम्हें जल्द जाना होगा। तीनों ने इसे बकवास माना। मगर संयोग कहें की पहला मित्र वाकई नहीं जा सका। वह बंबई गया और वहा के समुद्र को dekh kar घबरा गया। (तब विदेश यात्रा समुद्र से होती थी) राजेन्द्र बाबू के बारे में कहा ही जा चुका है। लेकिन उस तीसरे का कार्यक्रम आनन्-फानन में बन गया। राजेन्द्र बाबू ने कभी उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया। राजेन्द्र बाबू का जाना १९०७ के बदले १९२८ में हुआ, वकालत के सिलसिले में। १९२० में उन्होंने वकालत छोड़ दी थी, मगर अपने बुजुर्ग मित्र व् मुवक्किल हरिहर प्रसाद सिंह के कहने पर केवल उसी केस के लिए लादे। इसके बाद आजीवन कूई अन्य केस नहीं लिया।
१९२८ में इंग्लैंड जाने के लिए गर्म ऊनी कपडे के बंद गले के लंबे कोट, पतलून व् टोपियाँ सिलवाई गईं। कुछ ऊनी कपडे वे विलायत साथ ले गए सिलवाने के लिए। मगर विलायती दर्जी हिन्दुस्तानी कैसा तो सिल पाता। उसने जैसे सिले, राजेन्द्र बाबू ने पहन लिए। बटन टेढी लाइन में तनके थे, काज भी बन गए थे। राजेन्द्र बाबू ने मान लिया की इन्हें ही पहनना है। साथ के मित्रों, वकीलों ने आपत्ति की तो हंसते हुए बोले, " अंग्रेजों को देशी कोट में क्या पाता चलेगा की क्या टेढा है, क्या सीधा है। किसी ने अगर टोक भी दिया तो कहूंगा की यह भी नया फैशन है।

Friday, October 10, 2008

कपडे और राजेन्द्र बाबू

कपडों के मामले में राजेन्द्र बाबू का सदा से यही विचार रहा की कपडे स्वच्छ, आरामदेह व् शरीर की रक्षा करनेवाले हों। इससे अधिक ध्यान देने की ज़रूरत नहीं। इसलिये स्कूल कॉलेज जाते समय पाजामा और शेरावानी जैसा कुछ पहनते थे और घर पर धोती -कुर्ता। वकालत के समय भी यही ढर्रा रहा। खुले गले का कोट -पतलून कलकत्ता या पटना हाई कोर्ट में नहीं पहना। वकालत के लिए तय बेंड बांधते और गाउन पहनते। ताई का तो सवाल ही नहीं था। सरदी से बचाव के लिए बंद गले के लंबे कोट का व्यवहार करते रहे।
उदार तो इतने की कपडे ख़राब सिलने पर भी दर्जी से कुछ नहीं कहते, चुपचाप पहन लेते। सन १९४० से भी पहले की बात है। पटना खादी भंडार में रामदास प्रधान नाम के दर्जी काम करते थे। उनकी ज़बान जितनी तेज़ चलती, केंची की धार उससे भी अधिक तेज़ और बेलगाम रहती। नतीजा साफ़ था। कई बार ऐसा हुआ की कुरते की दोनों बाँहें न तो एक सी और न ही बराबर बनीं। किसी ने कहा की इनसे कपडे बिगाड़ने के पेसे वसूलने चाहिए। राजेन्द्र बाबू ने हंस कर कहा की "दूसरे तो इनका बनाया कपडा पहनते नहीं, अब अगर हम भी ना पहनें, तो यह दरजी क्या करेगा? चलो, लम्बी बांह को एक अधिक मोड़ देकर पहन लूंगा।"

Wednesday, October 8, 2008

राष्ट्रपति भवन का शाही भोज और राजेन्द्र बाबू

कायस्थों में मांसाहार सदा से मान्य रहा है, मगर बचपन के बाद राजेन्द्र बाबू शाकाहारी ही बने रहे। शाकाहारी भोजन में भी सदा, तेल, घी, मिर्च मसाले से दूर। दूध इन्हे अति प्रिय था। गो सेवा संघ की स्थापना के बाद केवल गाय का दूध, दही, घी लेने का नियम बना लिया था। प्रायः शाम या तीसरे पहर नाश्ते में चने का भूंजा बहुत दिनों तक पसंद करते रहे, जो राष्ट्रपति भवन में भी चलता रहा- कभी कभार।
इन आदतों के कारण राष्ट्रपति भवन की बड़ी- बड़ी पार्टियों में भी उनका भोजन वही रहा। उनके लिए उनके निजी चौके से एक ही बार थाली आती। यानी वे दावत में शामिल तो होते थे, मगर दावत की कोई भी चीज़ नहीं खाते। केवल कभी-कभार अतिथि के सम्मान के लिए भोजन के अंत में कॉफी की प्याली मुंह से लगा लेते।
एक बार किसी देश के राजदूत का पत्र स्वीकार कर उन्हें मान्यता देन के लिए परम्परानुसार आयोजित होनेवाले छोटे से समारोह का अवसर था। परिचय पत्र प्रस्तुत करने के बाद, रिवाज़ के मुर्ताबिक, दरबार हॉल से राजदूत को कमरे में अपने साथ लिअवा कर राष्ट्रपति उनके साथ बातें करते और उन्हें चाय-नाश्ता कराते। चाय-पान कराके, राजदूत को विदा कराने के बाद राजेन्द्र बाबू आए और हंसते हुए कहा की आज वे अच्छी मुसीबत में फंस गए। कायदे के मुताबिक, अंत में पान की तश्तरी आई। राजदूत ने पान उठा लिया। उनके सम्मान के लिए उन्हें भी पान लेना पडा। पान चूंकि कोई विदेशी लेता नही, और वे भी नहीं लेते, इसलिए उगलदान रखने का ख्याल कभी आया नहीं। पान की पीक फेंकने की कोई सुविधा न देख, उन्हें उसे निगल जाना परा। बिचारे राजदूत को भी यही करना पडा। शायद वह यह जानता ही न हो की पान की पीक निकाल कर फेंक दी जाती है।

Monday, October 6, 2008

अनोखी स्मरण शक्ति- राजेन्द्र बाबू की

बट १९३९-४० की है। नेता जी के कांग्रेस से त्यागपत्र देने के बाद राजेन्द्र बाबू सभापति चुने गए थे। कई कारणों से उन्हें यह पद स्वीकार्य न था। फ़िर भी, इस पद पर उन्हें काम करना पडा। तब वे पटना के सदाकत आश्रम में थे। एक दिन दोपहर के भोजन के बाद आधा घंटा के विश्राम के बाद वे अपाने तत्कालीन सचिव श्री चक्रधर शरण के छोटे से कमरे में गए और आलमारी खोल कर कुछ खोजने लगे। पूछने पर पाता चला कि जिन्ना का पत्र किसी फाइअल में होना चाहिए। आज के समाचार पत्रों में उनका एक बयान आया है, जिसका उत्तर देना आवश्यक है। चक्रधर जी के लौटने तक नही रुका जा सकता। इसलिए राजेन्द्र बाबू ने अपनी स्मृति पर भरोसा करते हुए पत्र देखे बिना ही उत्तर लिखने का निरणय किया।
उन दिनों सदाकत आश्रम में बिजली नहीं थी। लहभग १ घंटे में दैनिक समाचार पत्र के डेढ़-दो कॉलम के आकार का उत्तर तैयार हुआ। पटना के पत्रकार- संवाददाता बुलाए गए और उन्हें प्रेस की प्रतिलिपि दी गई। jinnaa
साब के यहाँ दफ्तर बहुत ही कुशलता से काम करता था। सभी कागजात बहुत संभालकर रखे जाते थे। इसलिए जिस पात्र की ज़रूरत परती, मानत क्या, सेकेंड में हाज़िर हो जता। ऐसे व्यक्ति को उत्तर देने में सबसे बड़ा काम होता है पिछले पत्रों को बार बार पढ़ लेना, ताकि उत्तर देने में कोई छिद्र न निकल सके। परन्तु राजेन्द्र बाबू ने अपनी स्मरण शक्ति के भरोसे जिन्ना साब को जवाब दिया था। पर उस पात्र को पढ़ने के बाद जिन्ना साब को ऐसा कुछ भी कहने का मौका न मिला की उस पात्र में अमुक विषय को छोर दिया गया है या अपने मन से कुछ जोर दिया गया है।

Friday, June 6, 2008

घुड़सवारी - राजेन्द्र बाबू की

कहा जाता है कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद के पिताजी को घुड़सवारी का बेहद शौक था। इसलिए उन्होंने अपने दोनों बेटों, महेन्द्र बाबू व राजेन्द्र बाबू को भी बहुत अच्छा घुड़सवार बना दिया था।
एक बार किसी संबंधी या मित्र की बरात में दोनों भाई गए। जनवासे में उन्हें ठहराया गया। जनवासे से बहुत ही ठाठ बात से बरात लड़कीवालों के दरवाजे तक पहुँचती। रास्ते में जहाँ खुला मैदान मिलता, लड़कीवाले वहाँ बरात की अगवानी के लिए आते। फ़िर तो दोनों पक्षों में घुड़ दौड़ की होड़ लग जाती।
इस बार इन दोनों भाइयों को दो घोडे दिए गए। संयोग से राजेन्द्र बाबू को मिला घोडा बेहद मुंहजोर, पर दौड़ने में सबसे तेज़ था। घुड़ दौड़ शुरू होते ही वह गाँव के बदले बाहर मैदान की और भाग चला। मुंहजोर इतना कि लगाम खींचने के बावजूद वह राजेन्द्र बाबू के कब्जे में नहीं आया। बारे भाई महेन्द्र बाबू, ज़ाहिर है, बड़े चिंतित हुए। जबतक वे अपने घोडे को पीछे ले जाते, तबतक तो राजेन्द्र बाबू का घोडा नौ-दो-ग्यारह हो गया था। उनका पता लगानेवाले भी खाली हाथ लौट आए। सभी अपनी-अपनी आशंका में डूबे हुए ही थे कि सभी ने देखा, अपने घोडे को बहुत ही धीमी चाल से चलाते हुए राजेन्द्र बाबू वापस आए। उतरने पर बताया कि " जब यह किसी भी प्रकार से वापस आने को तैयार नहीं हुआ, तो मैंने लगाम में ढील दे दी कि देखें, कहाँ तक ,कितना दौड़ सकता है? रास्ते में इसने मुझे गिराने की कोशिश की, किंतु मेरा आसन पक्का था, इसलिए मैं गिरा नहीं। लगभग सात-आठ मील दौड़कर घोडा जब अपने आप ही थकने लगा, तो मैं इसे वापस फेर सका और अब इसे इतना थका दिया है कि चाबुक मारने, एड लगाने पर भी अधिक दूर नहीं दौड़ सकता। अब यह सोलह आने मेरे काबू में आ गया है।"

-साभार- पुन्य स्मरण, लेखक- मृत्युंजय प्रसाद (राजेन्द्र बाबू के सुपुत्र)
विद्यावती फौन्देशन, पाटलिपुत्र कोलोनीपटना- ८०००१३, फोन- ०६१२-२६२६१८/224559

Thursday, May 22, 2008

राजेन्द्र बाबू का पत्र- पत्नी के नाम -साभार- पुन्य स्मरण

इस पत्र से पाता चलता है कि टैब के नेता देश के लिए कितने प्रतिबद्ध रहते थे। घर-परिवार , पैसे उनके लिए बाद की बातें होती थी। मूल भोजपुएरी में लिखा पत्र यहाँ प्रस्तुत है-
आशीरबाद,
आजकल हमनी का अच्छी तरह से बानी। उहाँ के खैर सलाह चाहीं, जे खुसी रहे। आगे एह तरह के हाल ना मिलला, एह से तबीयत अंदेसा में बातें। आगे फील-पहल कुछ अपना मन के हाल खुलकर लीखे के चाहत बानीं। चाहीं कि तू मन दे के पढी के एह पर खूब बिचार करीह' और हमारा पास जवाब लिक्जिः'। सब केहू जाने ला कि हम बहुत पधालीन, बहुत नाम भेल, एह से हम बहुत र्पेया कमेब। से केहू के इहे उमेद रहेला कि हमार पढ़ल-लिखल सब रुपया कमाय वास्ते बातें। तोहार का मन हवे से लीखिह्तू हमारा के सिरिफ रुपया कम्माये वास्ते चाहेलू और कुनीओ काम वास्ते? लड़कपन से हमार मन रुपया कमाय से फिरि गेल बातें और जब हमार पढे मी नाम भेल टी' हम कबहीं ना उमेद कैनीं कि इ सब र्पेया कमाए वास्ते होत बातें। एही से हम अब ऐसन बात तोहरा से पूछत बानी कि जे हम रुपया ना कमाईं, टी; तू गरीबी से हमारा साथ गुजर कर लेबू ना? हमार- तोहार सम्बन्ध जिनगी भर वास्ते बातें। जे हम रुपया कमाईं तबो तू हमारे साथ रहबू, ना कमाईं, तबो तू हमारे साथ रहबू। बाक़ी हनारा ई पूछे के हवे कि जो ना हम रुपया कमाईं टी' तोहरा कवनो तरह के तकलीफ होई कि नाहीं। हमार तबीयत रुपया कमाए से फ़िर गेल बातें। हम रुपया कमाए के नैखीं चाहत। तोहरा से एह बात के पूछत बानीं, कि ई बात तोहरा किसान लागी? जो हम ना कमैब टी; हमारा साथ गरीब का नाही रहे के होई- गरीबी खाना, गरीबी पहिनना, गरीब मन कर के रहे के होई। हम अपना मन मी सोचले बानीं कि हमारा कवनो तकलीफ ना होई। बाक़ी तोहरो मन के हाल जान लेवे के चाहीं। हमारा पूरा विश्वास बातें कि हमार इस्त्री सीताजी का नाही जवना हाल मी हम रहब, ओही हल में रहिहें- दुःख में, सुख में- हमारा साथ ही रहला के आपण धरम, आपण सुख, आपण खुसी जनिः'। एह दुनिया में रुपया के लालच में लोग मारत जात बाते, जे गरीब बातें सेहू मारत बातें, जे धनी बाते, सेहू मारत बातें- टी' फेर काहे के तकलीफ उठावे। जेकरा सबूर बातें, से ही सुख से दिन कातात बातें। सुख-दुःख केहू का रुपया कमैले और ना कमैले ना होला। करम में जे लिखल होला, से ही सब हो ला।
अब हम लीखे के चाहत बानी कि हम जे रुपया ना कमैब टी' का करब। पहीले टी' हम वकालत करे के खेयाल छोड़ देब, इमातेहान ना देब, वकालत ना करब, हम देस का काम करे में सब समय लगाइब। देस वास्ते रहना, देस वास्ते सोचना, देस वास्ते काम करना- ईहे हमार काम रही। अपना वास्ते ना सोचना, ना काम करना- पूरा साधू ऐसन रहे के। तोहरा से चाहे महतारी से चाहे और केहू से हम फरक ना रहब- घर ही रहब, बाक़ी रुपया ना कमैब। सन्यासी ना होखब, बाक़ी घरे रही के जे तरह से हो सकी, देस के सेवा करब। हम थोड़े दिन में घर आइब, टी' सब बात कहब। ई चीठी और केहू से मत देखिः', बाक़ी बीचार के जवाब जहाँ तक जल्दी हो सके, लीक्जिः'। हम जवाब वास्ते बहुत फिकिर में रहब।
अधिक एह समय ना लीक्हब।
राजेन्द्र
आगे ई चीठी दस-बारह दीन से लीखाले रहली हवे, बाक़ी भेजत ना रहली हवे। आज भेज देत बानी। हम जल्दीये घर आइब। हो सके टी' जवाब लीखिः', नाहीं टी' घर एल पर बात होई। चीठी केहू से देखिः' मत। - राजेन्द्र
पाता- राजेन्द्र प्रसाद, १८, मीरजापुर स्ट्रीट, कलकत्ता
(अब आप सोचें कि ऐसे पत्र को पाकर उनकी पत्नी के क्या विचार रहे होंगे और देश को पहला राष्ट्रपति मिलाने में उअनाकी क्या भुमिका रही होगी?)