chhammakchhallokahis

रफ़्तार

Total Pageviews

छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

Pages

www.hamarivani.com
|
Showing posts with label महिला. Show all posts
Showing posts with label महिला. Show all posts

Monday, November 13, 2017

उल्टे पुल्टे जोक्स-40

इसे ज़रा ऐसे देखिए और महसूस कीजिये तो!

एक महिला ने jio के कस्टमर केयर पे फोन करके गुस्साते हुए कहा कि पिछले तीन घंटे से आपकी कम्पनी का इंटरनेट नहीं चल रहा है बताइये मैं क्या करूँ..??

दिल को छू जाये कुछ ऐसा जवाब दिया कस्टमर केयर वाले ने..

"बहनजी तब तक कुछ घर के काम ही कर लो "

😂😂😜😜😂😂😜😜
एक आदमी ने jio के कस्टमर केयर पे फोन करके गुस्साते हुए कहा कि पिछले तीन घंटे से आपकी कम्पनी का इंटरनेट नहीं चल रहा है बताइये मैं क्या करूँ..??

दिल को छू जाये कुछ ऐसा जवाब दिया कस्टमर केयर वाले ने..

"भाई जी तब तक कुछ घर के काम ही कर लो "

😂😂😜😜😂😂😜😜

Monday, July 14, 2008

हर बार की शूली- टुकडा आसमान भी उनके लिए नहींं?

बचना चाहती रही हूँ, अब इस तरह के विषय पर लिखने से, मगर हर बार कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है की लिखना पड़ जाता है। समाज में समानता की बात गोहरानेवालों को भी यह शायद नागवार गुजरे, मगर सोच के स्तर पर जबतक बात नहीं आयेगी, कुछ भी समाधान नहीं निकलेगा। हम केवल लकीर पीटते रहेंगे और एक दूसरे पर इल्जाम लगारे रहेंगे।
हाल ही में एक अखबार ने यह सर्वे किया की हिंद्स्तान में तलाक की डर क्यों बढ़ रही है? इसके सामान्य उत्तर के रूप में कह दिया गया की महिलाएं ही इसके मूल में हैं। उनकी शिक्षा, उनकी आर्थिक आत्म निर्भरता उन्हें तलाक की ओर प्रेरित कर रही है।
सुनने में यह बहुत सरल, सहज और सच सा जान पङता है। मगर इसके मूल में बातें कुछ और भी हैं। महिलायें अगर आज पढ़ लिख रही हैं, आर्थिक रूप से सक्षम हो रही हैं तो इसलिए नहीं, कि वे घर, परिवार या रिश्ते, सम्बन्ध को नहीं मानना चाहतीं। ऐसा होता तो वे शादी करना ही नहीं चाहतीं। करतीं भी नहीं, परिवार, बच्चे कुछ भी नहीं चाहतीं। बीएस आजाद पंछी की तरह घर और दफ्तर और उसके बाद यहाँ- वहाँ डोलती रहतीं। मगर ऐसा नहीं होता। लड़कियां शुरू से ही घर में रहना पसंद करती रही हैं, आज भी करती हैं। हाँ, अपनी चाहत के नाना रूपों को वह निखारना चाहती हैं, अपनी प्रतिभा को नए -नए आयाम देना चाहती हैं और इस देश का नागरिक होने के नाते यह उनका मौलिक अधिकार है। अपने को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखने के बाद अगर उन पर तोअहामत लगाए जाएँ तो यह मेरा भी कहना होगा कि ऐसे में उनका अपना वह तथाकथित घर छोड़ देना उनके लिए ज़्यादा मायने वाला होगा। महिला या लड़की से पहले एक इंसान हैं, और उन्हें इसी रूप में देखे जाने की ज़रूरत है। ऐसा न होने पर वे घर छोड़ती हैं या रिश्तों को तिलांजलि देती हैं तो यह सोचने वाली बात है कि इतने के बावजूद हम और हमारा समाज अपनी सोच में बदलाव क्यों नहींं लाता? क्यों उसे घर की लाज, घर की सबसे जिम्मेदार सदस्य, घर चलानेवाली और ये-वो से अभिहित किया जाने लगता है? वह सब करने को वह तैयार है, पर उसके लिए भी तो सोचें कि उसे एक व्यक्ति के रूप में अभी भी हम क्या दे रहे है? आज सवाल स्त्री-पुरूष के बीच भेद बढ़ाने का नहीं, दोनों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करने का है और इसके लिए हर पक्ष को बराबर- बराबर की साझेदारी निभानी ही होगी। महिलाओं पर हर बार की तरह दोषारोपण कराने की आदत से अब बाज़ आने की ज़रूरत है।

Thursday, May 29, 2008

महाभारत किसलिए हुआ था?

छाम्माक्छाल्लो आज एक सेमिनार में थी। सेमिनार गीता ज्ञान के ऊपर aadhharit thaa। ka2rporeT जगत में giita को अज शिद्दत से समझाने की कोशिश की जा रही है। स्वामी जी गीता के माध्यम से Conflict Management and Dicision Making पर बात कर रहे थे। प्रसंगवश उनहोंने यह कहा कि महाभारत की लड़ाई द्रौपदी कू सार्वजनिक रूप से अपमानित कराने के कारण हुई थी। छाम्माक्छाल्लो की समझ में यह बात नहीं आई। महाभारत का युद्ध धर्म, अधिकार की वापसी और न्याय का युद्ध है। दिनकर ने बहुत खूब कहा है-
"अधिकार खो कर बैठा रहना यह महा दुशाकर्म है
न्याय्याढ़ अपने बंधू को भी दंड देना धर्म है
इस तत्व पर ही पांडवों का कौरवों से रण हुआ
जो भव्य भारतवर्ष के कल्पान्त का कारण हुआ।"
छाम्माक्छाल्लो ने स्वामी जी से पूछा कि द्रौपदी तो बाद में अपमानित हुई सार्वजनिक, लेकिन जब वह अपने ही घर में ५ पुरुषों के बीच बाँट दी गई, टैब क्यों नहीं हुआ महाभारत? क्या जो अपराध या ग़लत काम घर, परिवार, समाज की सहमति से हो, वह ठीक और जो ना हो, वह ग़लत हो जाता है? स्वामी जी के पास इसका कोई उत्तर नहीं था। छाम्माक्छाल्लो को लगता है कि यदि उसी समय द्रौपदी ने इसका विरोध कीया होता तो आज महिलाओं और बच्चियों पर जो अपने ही नजदीकियों द्वारा अत्याचार किए जा रहे हैं, वे शायद न होते।
प्रसंगवश स्वामी जी ने यह भी कहा कि गावं में आज भी स्त्रियाँ भाव से अधिक बंधी हैं, इसलिए वहांआन कलह आदि कम होते हैं, जबकि शहर में स्मार्ट स्त्रियों मी भाव को तिलांजलि दे दी है, इसलिए वे किसी के भी प्रती भावुक नहीं हैं, न घर, न पति, ना बच्चे। भाव और ह्रदय के नाम पर कबतक स्त्रियों को बरगलाया जाता रहेगा, यह पाता नहीं। छ्हम्माकछाल्लो ने कहा किस्मार्टनेस बुद्धिमानी से आती है और भाव को थोडा कम करके भुद्धि को वहाँ जगह देना आज की मांग है, ताकि स्त्रियाँ केवल छुई-मुई सी नाज़ुक सी गुडिया भर ही ना बनी रह जाए- ता उम्र, जन्म जन्मांतर। आख़िर कबतक भावना के नाम पर उन्हें दरकिनार किया जाता रहेगा? और आज जब स्त्रियाँ दिल और दिमाग दोनों से अमज्बूत हो रही हैं तो इसका असर समाज पर आ रहा है॥ आज के युवा, खासकर लड़कों की सोच में बदलाव आया है। यह सकारात्न्म्मक बदलाव अगली पीढी को और मजबूती देगा। निशचय ही इसका सेहरा आज की पढी-लिखी स्त्रियों पर जाता है, और हाँ, उनके माता-पिटा कू भी यह श्री है कि उन्होंने अपनी बेटियों को पढाया। बौद्धिक रूप से मज़बूत हो कर आज स्त्रियाँ अपने आपको हर कठिन हालत से लड़ने के लिए तैयार रखती हैं।
स्वामी जी के पास इसका भी कोई जवाब न था। न, भ्रमित ना हों कि वे कोई सड़क छाप महात्मा या साधू थे। अईईती के इंजीनियर थे। १० साल तक कार्पोरेट जगत में काम कराने के बाद अब अपना प्रतिष्ठान चलाते हैं और जगह-जगह प्रबंधन से संबंधित विषय पर अभिभाषण देते हैं।
छाम्माक्छाल्लो को लगा कि समाज में तक ये वर्ग भेद लगा रहेगा, एक सफल कार्पोरेट की संकल्पना नहीं की जा सकती, क्योंकि कार्पोरेट ही सबसे पहले महिलाओं को यह कहा कर खारिज कराने का प्रयास करता रहता है कि महिलायें ज़्यादा भावुक होने के कारण सही निर्णय नहीं ले पातीं, जबकि आज वे दिल और दिमाग के अद्भुत संयोजन के बल पर हर काम को बखूबी अंजाम दे रही हैं। सोच में यह बदलाव ज़रूरी है- चाहे वह द्रुँपदी हो या आज की नारी।