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Monday, April 13, 2015

CAN series poems-4. गाँठ


गाँठ
गाँठ
मन पर पड़े या तन पर
उठाते हैं खामियाजे तन और मन दोनों ही
एक के उठने या दूसरे के बैठने से
नहीं हो जाती है हार या जीत किसी एक या दोनों की।
गाँठ पड़ती है कभी
पेड़ों के पत्तों पर भी
और नदी के छिलकों पर भी।
गाँठ जीवन से जितनी जल्दी निकले
उतना अच्छा ।
पड़ गए शगुन के पीले चावल
चलो उठाओ गीत कोई।
गाँठ हल्दी तो है नहीं
पिघल ही जाएगी
कभी न कभी
बर्फ की तरह।

Thursday, April 9, 2015

CAN- Poem from the series- Celebrating Cancer

What does it matter

if the breasts are flattened or curved?

If the face is beautiful or botched?

Is there anything as

captivating,

sensuous, or youthful

as life itself?

Let's celebrate life's growing pains!

Let's celebrate Life!

Saturday, April 4, 2015

CAN-3. मोबाइल और केमो


मोबाईल कभी रही होगी लक्जरी
अब है उनकी अनिवार्य ज़रूरत।
केमो के बेड पर लेटी औरतें
चलाती हैं गृहस्थी- मोबाइल से
सब्जी काटने से लेकर कपडे सुखाने तक
बच्चे की फीस से लेकर पति के टिफिन तक
दरजी के नाप से लेकर चिट फंड तक
एकादशी से लेकर सिद्दिविनायक 
और वैष्णोदेवी तक
पूजा से लेकर मन्नत तक
हरे से लेकर सफ़ेद तक
दफ्तर की मीटिंग से लेकर इन्स्पेक्शन तक
देश की पोलिटिक्स से लेकर जीवन की राजनीति तक।
जीवन का कोइ कोना नहीं है ऐसा
जो छूटा हो औरतों से- केमो के बेड पर।
जीवन से भरी और ड्यूटी से पगी इन औरतों को
कोई भगा सकता है कहीं?
जबतक ये खुद न चाहें भागना।
घर गृहस्थी, पति, बच्चे और 
संसार के मोह से होकर पस्त
औरतें - खुश हैं मोह के इस आवरण में
चलाती हैं गृहस्थी- केमो के बेड से 
लेटकर, बैठकर, नींद से जागकर।

Friday, April 3, 2015

कैंसर के घर में गृहस्थी


कैंसर के घर में गृहस्थी

औरतें-
बसा लेती हैं अपनी गृहस्थी कहीं भी
मकान में, दूकान में,
खेत में, खलिहान में
यहाँ तक कि सड़क और अस्पताल में भी।
उन्हें कोई फर्क़ नहीं पडता,
क्या सोचता है अगल-बगल
वे सांस लेती हैं निश्चिंतता की
और सो जाती हैं केमो के बेड पर गहरी नीन्द
दवा काम कर रही है,
मन भी कर चुका काम
समझाकर सभी को घर के सारे सरंजाम!
कहीं भी हों औरतें,
छूटती नहीं उनसे घर की रीत


अपनों पर प्रीत!

Thursday, March 26, 2015

कैंसर और जीवन! A series of poems under the title of "CAN: Cancer and Nightingale"


"CAN: Cancer and Nightingale" इस शीर्षक से कविताओं की शृंखला शुरू कर रही हूँ। उद्देश्य- कैंसर के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना और इसके प्रति अतिरिक्त डर को समाप्त करना है। कैंसर से निजात पाया जा सकता है, अगर आप पहले से सचेत रहें, अपने शरीर पर ध्यान देते रहें, शरीर में आई किसी भी असामान्यता पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लें। कैंसर अगर हो ही गया है तो घबड़ाइए नहीं, वैसे ही डटकर उसका मुक़ाबला कीजिए, जितना सीमा पर मौजूद हमारे जवान दुश्मनों का करते हैं। और सबसे ऊपर है आपकी सकारात्मक सोच। आप ही खुद को अपनी सोच से ठीक कर सकते हैं और अपने घर व आसपास के माहौल को ज़िंदादिल बनाए रख सकते हैं- कैंसर के बावजूद। तो आइये, कहें कि Yes! I can. and lets celebrate Cancer. 
You will get these poems in Hindi and English both. Your views, experiences and opinions are welcome!   
क्या फर्क पड़ता है!
सीना  सपाट हो या उभरा
चेहरा सलोना हो या बिगड़ा
सर घनबाल हो या गंजा!
ज़िन्दगी से सुंदर, गुदाज़
और यौवनमय
नहीं है कुछ भी।
आओ, मनाओ, जश्न इस यौवन का
 जश्न इस जीवन का! 

Thursday, March 12, 2015

नि:शब्द!- पूर्णिमा अवस्थी



नि:शब्द!
जिस कार्यक्रम से आप झूमते मुस्कुराते बाहर निकलें ,उस कार्यक्रम और उसके आयोजक को क्या कहेंगे?

कल 7 मार्च 2015 को ऐसा ही एक कार्यक्रम अवितोको रूम थिएटर की पहली वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में
 आयोजित किया गया था मुंबई के मणिबेन नानावटी महिला कॉलेज में.
सुबह का सत्र डिस्कशन और बाद का सत्र कविता पाठ और सांस्कृतक कार्यक्रम का. इतना सुनियोजित, सादगीपूर्ण तरीके से मनाया गया कही कोई खामी नहीं! सब समय पर !
मुझे भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला। वरिष्ठ पत्रकार सुदर्शना द्विवेदीजी, डॉ. शशि शर्मा, मेनका शिवदासानी, सीमा कपूर और शशि दंभारे! इन सबके साथ मंच पर बैठने का रोमांच वर्णन करना संभव नहीं। 
अपनी गज़लों से मन मोहनेवाली मालती जोशीजी! जिनके पिताजी अगर कवि सम्मलेन में हैं, तो भैय्या पास का जुगाड़ लगाने लग जाते थे, ऐसे आदरणीय शरद जोशी जी की बिटिया वो नेहा शरद, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता अभिनेत्री उषा जाधव राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कॉस्ट्यूम डिजाइनर माला डे जी, युवा पायलट अदिति गुप्ता नागपाल, कवयित्री कविता गुप्ता, शशि दंभारे, मनीषा लाखे, अर्चना जौहरी, छाउ डांसर और सिने एक्ट्रेस माधुरी भाटिया! इन सबके साथ दिन बिताना बहुत ही रोमांचकारी रहा। 
मेरे फेसबुक मित्र मधु अरोड़ा, पत्रकार चण्डीदत्त शुक्ल से मिलना भी कम रोमांचकारी नहीं था।
कार्यक्रम में जान फूंक दी झंकार और मेघा श्रीराम के मैथिली और झारखंडी लोक गीतों ने.!
आज महिला दिवस में क्या करूँ ,कैसे मनाऊँ ? कल के उल्लास से बाहर निकलूं तब ना ?
      इस सबका सारा श्रेय विभा रानी, अजय ब्रह्मात्मज जी को! इतनी ऊर्जावान, प्रतिभावान होते हुए भी कितनी विनम्र !
      दिमाग मन को सिग्नल देता है कि आदर भाव से उनके प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने के लिए, जिन्होने ये मौका और क्षण उपलब्ध कराये। 
      आभार विभाजी और बधाई हमारे अवितोको रूम थिएटर के जन्मदिवस की और शुभकामनाएं इसके तरक्की की।
-पूर्णिमा अवस्थी 

Wednesday, March 11, 2015

स्‍वस्‍थ शुरुआत...... “निषेधों के पार: सृजन का संसार!”- मधु अरोड़ा

अवितोको रूम थियेटर के “निषेधों के पार: सृजन का संसार!” पर हिन्दी की लेखक मधु अरोड़ा के विचार और "दबंग दुनिया" अखबार में उसकी रिपोर्ट। आइये, जुड़िये, अपनी सृजनात्मकता को अपनी आवाज व पहचान दीजिये। संपर्क- 09820619161/ gonujha.jha@gmail.com
 
मार्च, 2015 को अवितोको रूम थियेटर का एक वर्ष पूर्ण होना और अंतर्राष्‍ट्रीय महिला वर्ष का आना एकसाथ हुआ। सो इन दोनों को उत्‍सव रूप प्रदान करने हेतु अवितोको रूम थियेटर ने मणिबेन नानावटी महिला कॉलेज के साथ एक दिवसीय कार्यक्रम “निषेधों के पार: सृजन का संसार!” शीर्षक के तहत आयोजित किया। जिसमें दो पैनल चर्चां, काव्‍य पाठ, लोकगीत व सोलो नाटकों का समावेश था....

 कार्यक्रम का उद्घाटन नेशनल अवार्ड से सम्‍मानित अभिनेत्री उषा जाधव ने किया। पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज ने सभी ागतों का स्‍वागत किया। उषा जाधव ने अपने संघर्ष के सफ़र का ज़िक्र किया, तो दूसरी ओर गो -एअर की पायलट अदिति गुप्‍ता नागपाल ने अपनी मनचाही मंज़िल पाने का श्रेय अपने माता-पिता को दिया। कॉस्‍ट्यूम डिज़ाइनर माला डे ने स्‍वीकारा कि उन्‍होने भी अपने दिल की बात सुनी और यह क्षेत्र चुना। निष्‍कर्षत: तीनों महिलाओं का एक ही मानना था कि अपने मन का काम करने से सफलता मिलती है और इसके लिये शिद्दत, धैर्य व मज़बूत मनोबल की ज़रूरत है।

 दूसरी पैनल चर्चा में महिलाओं के अधिकारों की बात की अपने जमाने की महत्वपूर्ण पत्रिका धर्मयुग की प्रखर पत्रकार डॉक्‍टर सुदर्शना द्विवेदी, वरिष्ठ एडवोकेट पूर्णिमा अवस्‍थी, अङ्ग्रेज़ी कवि व पत्रकार मेनका शिवदासानी, मराठी कवि शशि दंभारे फिल्म, टीवी, रंगमंच निर्देशक सीमा कपूर ने। उनके अनुसार हर महिला को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। यदि महिलाएं अपने साथ हुई ज्‍य़ादतियों को पुलिस तक या महिला प्रकोष्‍ठों में नहीं कह पातीं और वह भी सामाजिक परिवेश की वजह से...तो यह कारा उन्‍हें तोड़नी होगी।

 काव्‍यपाठ में कवियत्री मालती जोशी, नेहा शरद, मेनका शिवदासानी, शशि दंभारे, मनीषा लाखे, अर्चना जौहरी, कविता गुप्ता के साथ-साथ कॉलेज की छात्राओं की कविताएं खूब पसंद की गई। मालती जोशी के “तेरे नाम का खत महकता बहुत है” ने सभी का मन मोह लिया।

झंकार व मेघा श्रीराम ने अपने लोकगीतों से माहौल को सम्मोहित कर दिया। अभिनेत्री  माधुरी भाटिया ने पश्चिमी व छानृत्‍य व गीत के माध्यम से 'आई एम वूमन, मैं औरत हूं' की एकल नाट्य प्रस्तुति की, जिसपर दर्शक मुग्‍ध हो गये। पुणे की कलाकार मीनाक्षी सासने ने एकल नाटक प्रस्‍तुत किया। विभा जी के जीवट को सलाम करना ही होगा कि वे इतना श्रम करती हैं और इतने कलाकारों को मंच प्रदान किया है, ताकि नये- पुराने कलाकार अपनी प्रतिभा से एक दूसरे के साथ साक्षात्कार कर सकें। मैंने महसूस किया कि हिंदी साहित्‍यकारों को इस प्रकार के कार्यक्रमों में अपनी उपस्‍थिति दर्ज़ करानी चाहिये, ताकि नई पीढ़ी की नब्‍ज़ को पहचाना जा सके और वे अपना सर्वोत्तम नई पीढ़ी को दे सकें।

 -मधु अरोड़ा.....लेखिका.....मुंबई