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Saturday, April 4, 2015

CAN-3. मोबाइल और केमो


मोबाईल कभी रही होगी लक्जरी
अब है उनकी अनिवार्य ज़रूरत।
केमो के बेड पर लेटी औरतें
चलाती हैं गृहस्थी- मोबाइल से
सब्जी काटने से लेकर कपडे सुखाने तक
बच्चे की फीस से लेकर पति के टिफिन तक
दरजी के नाप से लेकर चिट फंड तक
एकादशी से लेकर सिद्दिविनायक 
और वैष्णोदेवी तक
पूजा से लेकर मन्नत तक
हरे से लेकर सफ़ेद तक
दफ्तर की मीटिंग से लेकर इन्स्पेक्शन तक
देश की पोलिटिक्स से लेकर जीवन की राजनीति तक।
जीवन का कोइ कोना नहीं है ऐसा
जो छूटा हो औरतों से- केमो के बेड पर।
जीवन से भरी और ड्यूटी से पगी इन औरतों को
कोई भगा सकता है कहीं?
जबतक ये खुद न चाहें भागना।
घर गृहस्थी, पति, बच्चे और 
संसार के मोह से होकर पस्त
औरतें - खुश हैं मोह के इस आवरण में
चलाती हैं गृहस्थी- केमो के बेड से 
लेटकर, बैठकर, नींद से जागकर।

Tuesday, April 29, 2014

सीप में बंद...!


 छममकछल्लो "कैन" (CAN) सीरीज से कैंसर पर आधारित कविताओं की शृंखला शुरू करने जा रही है। इसका उद्देश्य है कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करना, इस पर बात करना और अपने मन से इस बीमारी को लेकर जितनी आशंका, डर, झिझक आदि की गांठें हैं, उन्हें जीवन से दूर करना। आइए, सुनते, पढ़ते हैं- यह कविता। अपनी राय, विचार दें, इसे शेयर करें और लोगों को कैंसर के प्रति जागरूक बनाने में हमारी मदद करें। 

यह मैं ही हूं,
अपनी मादक गन्‍ध
और सुरभित हवा के संग
अपनी बातों के खटमिठ रस
और तरंगित देह-लय के संग
यह मैं ही हूं,
फैले आसमान की चौड़ी बांहों की तरह
यह मैं ही हूं,
कभी हरी तो कभी दरकी धरती की
भूरी माटी की तरह।

समय ने छेड़ी है एक नई तान
देह मे दिये हैं अनगिन विरहा गान
मन की सीप में बंद हैं
कई बून्‍द- स्वाति के!
सबको समेटने और सहेजने को आतुर,
व्‍याकुलउत्‍सुक

यह मैं ही हूं ना!