chhammakchhallokahis

रफ़्तार

Total Pageviews

छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

Pages

www.hamarivani.com
|
Showing posts with label कैंसर. Show all posts
Showing posts with label कैंसर. Show all posts

Monday, April 13, 2015

CAN series poems-4. गाँठ


गाँठ
गाँठ
मन पर पड़े या तन पर
उठाते हैं खामियाजे तन और मन दोनों ही
एक के उठने या दूसरे के बैठने से
नहीं हो जाती है हार या जीत किसी एक या दोनों की।
गाँठ पड़ती है कभी
पेड़ों के पत्तों पर भी
और नदी के छिलकों पर भी।
गाँठ जीवन से जितनी जल्दी निकले
उतना अच्छा ।
पड़ गए शगुन के पीले चावल
चलो उठाओ गीत कोई।
गाँठ हल्दी तो है नहीं
पिघल ही जाएगी
कभी न कभी
बर्फ की तरह।

Saturday, April 4, 2015

CAN-3. मोबाइल और केमो


मोबाईल कभी रही होगी लक्जरी
अब है उनकी अनिवार्य ज़रूरत।
केमो के बेड पर लेटी औरतें
चलाती हैं गृहस्थी- मोबाइल से
सब्जी काटने से लेकर कपडे सुखाने तक
बच्चे की फीस से लेकर पति के टिफिन तक
दरजी के नाप से लेकर चिट फंड तक
एकादशी से लेकर सिद्दिविनायक 
और वैष्णोदेवी तक
पूजा से लेकर मन्नत तक
हरे से लेकर सफ़ेद तक
दफ्तर की मीटिंग से लेकर इन्स्पेक्शन तक
देश की पोलिटिक्स से लेकर जीवन की राजनीति तक।
जीवन का कोइ कोना नहीं है ऐसा
जो छूटा हो औरतों से- केमो के बेड पर।
जीवन से भरी और ड्यूटी से पगी इन औरतों को
कोई भगा सकता है कहीं?
जबतक ये खुद न चाहें भागना।
घर गृहस्थी, पति, बच्चे और 
संसार के मोह से होकर पस्त
औरतें - खुश हैं मोह के इस आवरण में
चलाती हैं गृहस्थी- केमो के बेड से 
लेटकर, बैठकर, नींद से जागकर।

Monday, August 18, 2014

कविताएं

छम्मकछल्लो की 3 कविताएं शब्दांकन के बहीखाता में। पढ़िये और धता बताइये अपने मन की गांठों और बीमारियों को।  

http://www.shabdankan.com/2014/08/poems-vibha-rani.html?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+shabdankan+%28%E0%A4%B6%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%A8%29&utm_content=FaceBook#.U_F9r_mSySo

 आज नहीं खेली होली!
आज नहीं खेली होली  
पर पूरियां बेलीं
भरी कचौरियां - हरे मटर की
काटी थोड़ी सब्जियां,
रिश्तों की गर्मी और होली की नमी के बीच
हिलते रहे पेड़ों के पत्ते
और खिड़कियों पर टंगे परदे।
पक गए सारे पकवान- पारंपरिक
नाम लूं तो भर आएगा पानी- मुंह में
यही पानी तो है जीवन का सार
जो बहता है होली में
पुआकचौड़ीदही बड़ेटमाटर की चटनी
कटहल की सब्जीमटन और भांग की
ठंढई में।
कैंसर ने मेरे कानों में इठलाते हुए कहा-
“देखानहीं खेलने दिया मैंने तुम्हे होली ना।“
मैंने भी इतराकर कहा- 
“इतने गाए गीतइतना हंसी उत्तान तरंग
जगी इतनी देरनींद भी आई चंगी
खाया भी खूबसिलाए भी कपडे
ए भाई! मन की दहन कहीं और करो बयान
हमारे पास तो है रंगों से लेकर 
होलिका दहन तक के सामान
नगाडों से लेकर फगुनाहट की 
झनझनाहट तक के जीवन-राग!
जाओ भाई! कर लो खुद को नज़रबंद
बसा लो अपनी एक दुनिया
उसी में घूमते रहो 
ओ मेरे बनैले सफरचंद!!!”
###

सितारों की सौगात!
केमो की रात
नींद की बरात
किसी और के साथ
अपने हाथ
सितारों की सौगात!
उनसे हो रही बात- मुलाक़ात!
कल सुनेंगे सूरज का नात
धूप का गर्म स्नान
बिना घातबिन प्रतिघात
फिलवक्तकेमो की रात
परीक्षा के पात
भूखे का भात
रात और प्रात!
छिड़ी है जंग
देखें, कौन देगा किसको मात!
तन की या निसर्ग की वात
दिन है सातचक्र है सात!
केमो की रात
थोड़ी ज्ञातथोड़ी अज्ञात!
####

छोलेराजमा, चने सी गाँठ!

उपमा देते हैं गांठों की
अक्सर खाद्य पदार्थों से
चने दाल सी
मटर के साइज सी
भीगे छोले या 
राजमा के आकार सी
छोटेमझोलेबड़े साइज के आलू सी।
फिर खाते भी रहते हैं इन सबको
बिना आए हूल
बगैर सोचे कि 
अभी तो दिए थे गांठों को कई नाम- उपनाम।
उपमान तो आते हैं कई-कई
पर शायद संगत नहीं बैठ पाती
कि कहा जाए- 
गाँठ-
क्रोसिन की टिकिया जैसी
बिकोसूल के कैप्सूल जैसी। 
भी को पता है
आलू से लेकर छोलेचनेराजमे का आकार-प्रकार
क्या सभी को पता होगा
क्रोसिन- बिकोसूल का रूप-रंग?
गाँठ को जोड़ना चाहते हैं
जीवन की सार्वभौमिकता से
और तानते रहते हैं उपमाओं के
शामियाने- चंदोबे।
####


Tuesday, April 29, 2014

सीप में बंद...!


 छममकछल्लो "कैन" (CAN) सीरीज से कैंसर पर आधारित कविताओं की शृंखला शुरू करने जा रही है। इसका उद्देश्य है कैंसर के प्रति लोगों को जागरूक करना, इस पर बात करना और अपने मन से इस बीमारी को लेकर जितनी आशंका, डर, झिझक आदि की गांठें हैं, उन्हें जीवन से दूर करना। आइए, सुनते, पढ़ते हैं- यह कविता। अपनी राय, विचार दें, इसे शेयर करें और लोगों को कैंसर के प्रति जागरूक बनाने में हमारी मदद करें। 

यह मैं ही हूं,
अपनी मादक गन्‍ध
और सुरभित हवा के संग
अपनी बातों के खटमिठ रस
और तरंगित देह-लय के संग
यह मैं ही हूं,
फैले आसमान की चौड़ी बांहों की तरह
यह मैं ही हूं,
कभी हरी तो कभी दरकी धरती की
भूरी माटी की तरह।

समय ने छेड़ी है एक नई तान
देह मे दिये हैं अनगिन विरहा गान
मन की सीप में बंद हैं
कई बून्‍द- स्वाति के!
सबको समेटने और सहेजने को आतुर,
व्‍याकुलउत्‍सुक

यह मैं ही हूं ना!

Thursday, July 29, 2010

कुछ कविताएं - इस बार.

कोई जंगल बचा रहा है, कोई पहाड, 
कोई पेड तो कोई नदी,
कोई लडकी तो कोई बच्चा. 
नहीं है किसी का ध्यान, छीजती इंसानियत पर. 
कोई आओ, बचाओ उसे. 
वह बच गई तो सब बच जाएंगे, 
पेड, पहाड,धरती, स्त्री, बच्चे, खेत- सबकुछ. 
###


कैंसर (1)


सिगरेट का धुआं
धुएं में भविष्य
भविष्य में वर्तमान,
वर्तमान में अतीत

सिगरेट का धुआं
####
कैंसर (2)

एक निरंतर् पीडा
आस की धुंआती गन्ध
दवाओं के काले मेघ
इलाज की गूंज
लुका छिपी,लुका छिपी
कैंसर ,कैंसर ! ###

ताकत

हम समझदार हैं,
वर्तमान हमसे कांपता है,
भविष्य हम पर इतराता है,
अतीत मुंह चुराता है,
वक्त के जबडे में हम
हमारी हथेली में सिगरेट, धुंआ, शराब, 
तम्बाकू, गुटखा और अपने होने का ताकतमय एहसास,
अदम्य है आकर्षण
नीति सोभती हैं किताबों में
हम हैं अविरल,अविकल,अविचल!
####

पापा,छोड दो शराब हमारे लिए,
पापा,छोड दो गुटखा हमारे लिए,
पापा,छोड दो तम्बाकू हमारे लिए,
पापा,मत करो फिक्स्ड डिपॉजिट हमारे लिए,
पापा,मत बनाओ घर हमारे लिए
पापा,मत खरीदो गाडी हमारे लिए
पापा, बस तुम रहो हमारे सामने घने छतनार पेड की तरह 
पापा, बस, इतना ही करो हमारे लिए! 
#####