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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Sunday, October 2, 2011

मैनेजमेंट के कुशल कारीगर- हमारे ईश्वर!


 हे भगवान! छम्मकछल्लो को आप पर बडी दया आ रही है. किस कुघड़ी में आपने हम इंसानों को बनाया. ये निगोडे इंसान! करते सब कुछ हैं खुद और थोप देते हैं भगवान पर.
सोचा था भगवान ने कि बनाकर हम इंसानों को दिमागदार, हो जाएंगे वे निश्चिंत. मनुष्य भी बनकर (?), ऊंहंह! पैदा होकर इंसान- याद करते रह गए भगवान-भगवान! अरे, अब छम्मकछल्लो है परेशान! जिसे देखो, गुहराता रहता है- भगवान-भगवान! कह गए कबीर कि ‘दुख मे सुमिरन सब करए, सुख मे करे न कोए.’ पर आज देखती है छम्मकछल्लो कि सुख का सारा श्रेय लोग दे देते हैं भगवान को. बच्चा पास, भगवान की कृपा, फेल तो बच्चे का नसीब! मरीज ठीक हो गया, बच गया, भगवान की कृपा, मर गया- डॉक्टर खराब. आपने किसी की मदद की- भगवान का पुन्न प्रताप. नहीं की- आप रौरव नरक से भी भयानक और बदबूदार. अपनी मेहनत से आपने सबकुछ हासिल किया, भगवान की कृपा, खो दिया- नसीब का दोष. क्या भगवान जी आप भी! कभी कुछ दोष-वोष भी तो ले लिया करो अपने सिर. कभी तो कहो कि मरीज ठीक हुआ डॉक्टर के कौशल से, बच्चा पास हुआ अपनी लगन से, तुमने सब हासिल किया- अपनी मेहनत से. मगर नहीं! भगवान ठहरे गहरे गुरु घंटाल! वे क्यों दे दूसरों को अच्छे काम के सिला का माल! यही तो है उनके मैनेजमेंट का कमाल!
लोगों के मैनेजमेंट की कुशल कारीगरी भी यहीं से तो होती है आरम्भ. दफ्तर में काम अच्छा- बॉस का कॉलर ऊंचा, बिगडा तो मातहत की अकुशलता. बच्चा बन-संवर गया, बाप का सीना चौडा- आखिर बेटा किसका है! नहीं बना तो –कैसी मां हो तुम. बच्चे पर ध्यान नहीं दे सकती थी! करती क्या हो दिन भर एक खाना बनाने के सिवाय? मैनेजमेंट की कुशल कारीगरी लोगों ने भगवान से ही सीखी है. वे भी सारा श्रेय खुद लेते हैं, दोष दूसरों के मत्थे छोड देते हैं. आखिर उसी की तो प्यारी-दुलारी संतान हैं ना हम! वरना हमें भी जन्मा दिया होता ईश्वर ने जानवरों-चिडियों की तरह बिन दिमाग के तो हम क्या बिगाड लेते उनका?
लेकिन क्या सचमुच जानवर-चिडिए होते हैं बिन दिमाग के? हां भई हां, जभी तो वे बिना भूख के किसी का शिकार नहीं करते, अपने लिए करोडों की मांद या घोसला नहीं बनाते, अरबों के जंगल नहीं खरीदते, खरबों का बैंक बैलेंस बरगद की डाल से लटका कर उसकी जड अगम पाताल तक नहीं टिका देते. खुद को पाक-साफ और दूसरों को दागदार नहीं बनाते. बेवज़ह दूसरों को मारकर आतंक का भयानक जाल नहीं फैलाते. और तो और, खुद ईश्वर के ही नाम पर देश, दुनिया, दिल, देमाग, देह दरबार का सौदा नहीं करते. मान गई छम्मकछल्लो आपको! ओ भगवान !! कृपानिधान!!!  
   

Thursday, September 22, 2011

ये हुसैन नहीं, हारान हैं, इसलिए कोई बात नहीं!


 दुर्गा पूजा आ रही है. देश और देवी का अपने यहां अन्योन्याश्रित सम्बंध है. देवी पर हमारी आस्था बहुत गहरी है. हमारी आस्था पर आक्रमण करनेवाले गद्दार और नालायकों को उनकी सजा देने में हम माहिर हैं. इतने कि चाहें तो इसके लिए कंसल्टेंसी खोली जा सकती है. प्रशिक्षण दिया जा सकता है. कंसल्टेंसी की एक्सपर्ट राय अथवा प्रशिक्षण देने के लिए छम्मकछल्लो से सम्पर्क करें.
देवी के दिन हैं तो देवी की मूर्ति बनेगी ही, चाहे वह सरस्वती पूजा हो या काली पूजा या दुर्गा पूजा. हर पूजा के पहले प्राण प्रतिष्ठा भी होगी. बिन प्राण प्रतिष्ठा के मूर्ति बस केवल मूर्ति मानी जाती है.
छम्मकछल्लो दो दिन पहले एक अखबार में देख रही थी दुर्गा पूजा के लिए बनाई जा रही प्रतिमाओं की तस्वीर. आप भी देख लीजिए. आखिर, अपनी ही देवी है और बनानेवाले भी अपने ही हैं. कोई एम एफ हुसैन नहीं कि उनकी लक्ष्मी-सरस्वती की पेंटिंग से हमारी हिंदू भावना तार- तार हो जाए और हम उन्हें ऐसे दर-ब-दर कर दें कि मरने के बाद उन्हें अपने वतन में दो गज ज़मीन भी मुहय्या न कराएं. यह कोई फैशन डिजाइनर लीसा ब्ल्यू नहीं, जिसके स्विम सूट पर लगी देवी लक्ष्मी की तस्वीर पर ललकार-ललकार कर लोगों के मन में आग लगा दें. यह तो अपने कोई राखाल दा, हारान दा, मोहन भाई, गिरिराज चाचा, रामसुख भैया हैं. ये देवियों की मूर्तियां नग्न बनाएं या कपडे के साथ, कोई बात नहीं. ये अपने लोग हैं, इसलिए इनकी भावना पर संदेह आपको नास्तिक बना देगा. इन पर न तो कुदीठ डालिये, न ही मन में कोई दुर्भावना लाइए. बिन प्राण प्रतिष्ठा के राखाल दा, हारान दा, मोहन भाई, गिरिराज चाचा, रामसुख भैया की मूर्ति बस केवल मूर्ति है, बिन प्राण प्रतिष्ठा के हुसैन की पेंटिंग या लीसा ब्ल्यू की तस्वीर प्रतिष्ठा- प्रश्न बन जाते हैं. वे सब तो प्रश्न कर सकते हैं, छम्मकछल्लो नहीं. धर्म का मामला है, आस्था का प्रश्न है. देवी की सत्ता स्थापित करने में हम देवताओं की महानता है. आइये, इस महानता पर छम्मकछल्लो के साथ-साथ आप भी वारी-वारी जाएं-
            “या देवी सर्वभूतेषु, नग्नरूपेण संस्थिता
            नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:.”

         

Friday, September 2, 2011

“बिम्ब-प्रतिबिम्ब”:नाटक में विधवा जीवन का निरूपण - नानावती कॉलेज, मुंबई में


विधवापन स्त्री की मनोवांछित अभिलाषा नहीं, अपितु, नियति का एक मजाक है. इस मजाक की शिकार स्त्रियां आज भी विधवापन के अभिशाप को जीवन भर ढोती रहती हैं. भारतीय मिथक से अलग एक धारणा बना दी गई है कि विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता. किस धर्म के तहत? यह आज भी अनुत्तरित है. यह विधवाओं का प्रश्न है कि क्या वे विधवा अपने मन से बनीं हैं?
एक ओर भारत विश्वव्यापी देश बन रहा है और दूसरे ओर अपने ही घर में स्त्रियां प्रताडित हो रही हैं. देश में विधवाओं की स्थिति आज भी दयनीय बनी हुई है. विधवाओं की स्थिति को दर्शाता विभा रानी लिखित व अभिनीत एकपात्रीय नाटक “बिम्ब-प्रतिबिम्ब” का मंचन 30 अगस्त, 2011 को मुंबई के नानावती महिला कॉलेज की छात्राओं के लिए किया गया. नाटक एक सत्य पात्र बुच्चीदाई की ज़िंदगी और उसके माध्यम से उसके समय के ताने-बाने और उसमें छटपटाते एक विधवा मन की भावनाओं को दर्शाता है. दुख लोगों को तटस्थ और मजबूत दोनों बनाता है. नाटक की मुख्य किरदार बुच्चीदाई अपने एक खालिस व्यक्तित्व के रूप में नज़र आती है, जो खुद तो जीवन भर विधवा बनी रहने को अभिशप्त रहीं, मगर अन्य किसी को दूसरी बुच्चीदाई नहीं बनने देती है. विभा के मंजे हुए अभिनय ने एक ओर जहां बुच्चीदाई की पीर को पूरी शिद्दत से उभारा, वहीं उसके जीवन के कई मनोरंजक प्रसंगों पर दर्शकों को हंसाया और गुदगुदाया भी. परंतु, हर हंसी के पीछे एक स्थिति थी, जिसे दर्शक समझे बिना नहीं रह सके.
निर्देशक के रूप में सीमा कपूर ने इस नाटक को एक नया स्वरूप दिया. संगीत धनराज का था. बैक स्टेज संभाला राकेश जायसवाल ने.  
आज एक बडा तबका है हर आयु वर्ग का, जो थिएटर से एकदम अंजान है. वह फिल्म और टीवी से परिचित है, मगर नाटक के रूप में स्कूल-कॉलेज के नाटकों से आगे नहीं बढा है. ऐसे में, अपने प्रोसेनियम रूप से अलग हटकर “थिएटर –जन जन तक” और “थिएटर- एक शिक्षण टूल” की अवधारणा के संग विभा और उनका ग्रुप अवितोको आज कॉलेज की छात्राओं के सामने प्रस्तुत हुआ. शो के बाद छात्राओं के सवाल-जवाब भी हुए, जो इस शो का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा.
एक्सपेरिमेंटल थिएटर के साथ विभा यह नाटक कालाघोडा आर्ट फेस्टिवल, 2010 में आरम्भ करने के बाद इसके कई शो अलग-अलग कॉर्पोरेट हाउसेस में हुए. इसका एक शो मुंबई जिला जेल की महिला बंदियों के लिए भी किया गया है.
अवितोको नाटक के माध्यम से कॉर्पोरेट प्रशिक्षण और व्यक्ति-विकास व मन-परिवर्तन पर भी काम करता है. सम्पर्क सूत्र- gonujha.jha@gmail.com/ +919820619161.
- रंग जीवन:संग जीवन    

Saturday, August 27, 2011

दूध में पानी कि पानी में दूध?


छम्मकछल्लो को धारा के विरुद्ध जाकर कुछ बोलना बहुत खतरनाक लगता है. आजकल देश में एक आंधी चल रही है. तारीफ कि इस आंधी से बचाव के लिए सरकार तक गुहार नहीं लगाई जा रही है. राहत कोष भी नहीं खोला गया है, कोई देश-विदेश की सरकारी-गैर सरकारी संस्थाएं भी अपने यहां से राहत की बात नहीं कर रही है.
हमारा देश फैशन और फिल्म परस्त है. वह एक फिल्म में देखता है कि लोग मोमबत्ती लेकर खडे हो गए. नाम, दाम, देश, दिशाएं तो फिल्मवाले ही देते हैं, चाहे संकट का लगान हो या संघर्ष का रंग दे बसंती या खेल का चक दे इंडिया! मैंनेजमेंट गुरु पढाई में बल्ला लेकर कूद पडते हैं, विज्ञापनवाले चक दे भारत लिखने लगते हैं. आमजन अपने संघर्ष की मौन आवाज़ में मोमबत्ती लेकर खडे हो जाते हैं.
आजादी कभी एक कॉमन फैक्टर था लोगों के पास. आज भी वही कॉमन फैक्टर है. हम कॉमन पर बहुत बढिया से रिएक्ट करते हैं, चाहे कॉमन मैन हो या कॉमन विषय या कॉमन वेल्थ गेम. यह कॉमन मैन या विषय जब अपने कॉमनपन से निकलकर हमारे घर या मन में दस्तक देने लगता है, तब हम या तो इसे बाहर निकालते हैं या बापू के तीनों बंदर हो जाते हैं- न देखो, न सुनो, न बोलो- बस, ‘बुरा’ शब्द साइलेंट कर देते हैं.
छम्मकछल्लो ने घर बुक करते समय 30-40% काला धन, हाउसिंग बोर्ड से पेपर पास कराने, रजिस्ट्रेशन आदि के लिए तयशुदा कीमत दी थी. बच्चों के नामांकन के लिए वैध फीस के रूप में लाखों रुपए भरे हैं. उन रुपयों का क्या होता है, वह पूछती भी नहीं. संस्थान बच्चे को बाहर निकाल फेंकेगा. वह यह भी नहीं पूछती कि सर्दी- जुकाम के लिए एक डॉक्टर 600-700 रुपए की कंसल्टेशन फीस क्यों लेता है? दस दिन के बुखार के इलाज में 30 हजार रुपए कैसे खर्च हो जाते हैं? ऑटो-टैक्सी का मीटर क्यों बढा हुआ है? ऑटॉवाले मनमानी वसूलते हैं, हम देते हैं. सिग्नल तोडकर हमीं ट्रैफिक पुलिस को घूस देते हैं, क्योंकि हमारे पास उनके दफ्तर जाकर जुर्माना भरने का समय नहीं होता. बिजनेस करते हैं तो सबसे पहली कोशिश होती है कि इन्कम टैक्स कैसे कम से कम लगे? कम करने के लिए कितने पापड बेलने पडते हैं, यह तो बिचारे बिजनेसवालों से पूछिए. यह सब ना करें तो जीना मुहाल हो जाए.
छम्मकछल्लो यह सब करके भी भ्रष्ट नहीं कहलाती. हमें लोग भ्रष्ट ना कहें, इसके लिए हम मोमबत्ती भी जलाते हैं, नारे भी लगाते हैं, जुलूस भी निकालते हैं.
छम्मकछल्लो आजकल चेन्नै में है. चेन्नै में आपको मुंबई से भी अधिक पैसे की कीमत का पता चलता है. अपने घर के पिछवाडे भी जाने के लिए यहां के ऑटॉवाले बडे आराम से 60-100 रुपए तक मांगेंगे- दलील के साथ कि आपके घर के पीछे तक जाना है- ओइयोयो, कितना लम्बा...! एक चैनल ने अभी हाल में दिखाया कि चेन्नै के एक ऑटॉवाला भी आज के इस फैशनेबल सत्याग्रह में है. छम्मकछल्लो को ज़रा ये चैनलवाले या ये ऑटो-टैक्सीवाले या साग-भाजीवाले बता दें कि वे जो हम कॉमन मैन से वसूलते हैं, वह जायज है? और अगर जायज है तो इस आंदोलन में भाग लेना भी जायज है?
दो बातों के लिए छम्मकछल्लो की माफी. आज के गडबड भाषाई समाज में अंग्रेजी फैशन है- बात के लिए, समाज के लिए, प्रगति के लिए, कैंडल और कैंडल लाइट के लिए. इसलिए इसका उपयोग उसने किया है. और दूसरे इसके लिए कि कॉमन फैक्टर के फैशन से निकल कर कभी हम निजी तत्व पर भी आएं और अपना आत्मावलोकन करें. हर चीज की शुरुआत घर से और मन से होती है- युधिष्ठिर की तरह, जब द्रोणाचार्य ने उनसे कहा कि पाठ याद करो कि ‘मैं झूठ नहीं बोलूंगा.” युधिष्ठिर को इसे याद करने में 6 माह से अधिक लग गया. गुरु के पूछने पर उन्होंने बताया कि वे इसे पहले जीवन पर लागू कर रहे थे. आज जाकर उन्हें लगा कि अब वे झूठ नहीं बोलेंगे, इसलिए पाठ याद हुआ समझें.”
चलते-चलते, एक दूधवाला दूध में पानी मिला रहा था. दूसरे ने उसे डांटा. दूधवाले ने कहा, ‘पहले आप यह तो बताइये कि आप घी की मिठाई में वनस्पति, साबुत बासमती में टुकडा बासमती मिलाते हैं कि नहीं? आप दफ्तर के समय में हर 1 घंटे पर बीस मिनट के लिए धुंआखोरी के लिए निकलते हैं कि नहीं? ...और भी बहुत कुछ... अगर आप यह सब नहीं करते तो बताइये, हम दूध में पानी मिलाना क्यों छोड़ें? और अभी तो दूध में पानी मिला रहे हैं. ज्यादे बोलियेगा तो पानी में दूध मिलाना शुरु कर देंगे. पीजियेगा फिर डायरेक्ट चाय- बिन पानी मिलाए. पानी में दूध कि दूध में पानी? हममें भ्रष्टाचार कि भ्रष्टाचार में हम?   

Friday, July 15, 2011

गुरु पूर्णिमा पर विश्व के समस्त गुरुओं द्वारा दान की घोषणा


      छम्मकछल्लो आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विश्व के समस्त गुरुओं को प्रणाम करती है, क्योंकि गुरु को तीनों लोकों और छत्तीस करोड देवताओं से भी ऊपर का स्थान दिया गया है. गुरु की महिमा में कबीर बाबा भी कह गए-
            गुरु गोविंद दोनों खडे, काको लागूं पाय
            बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दिये बताय
      कबीर बाबा को अच्छे और सच्चे गुरु मिल गए होंगे. इसलिए कह दिया होगा. छम्मकछल्लो को तो जो गुरु मिले, वे पक्षपात का अतीव उदाहरण बन कर आए. एक गुरु द्रोणाचार्य ने अपने अदेखे, अचीन्हे शिष्य एकलव्य से अंगूठा मांग लिया. एकलव्य ने अपनी श्रद्धा क्या दिखा दी, वे उसके ऊपर चढ ही बैठे- गुरु मानता है ना? तो ला दक्षिणा. और मैं ऐसा-वैसा गुरु नहीं हूं जो दक्षिणा में दाल-चावल मांगूं. हमारे पास वैसे शिष्य हैं, जो हमें हर तरह से फेवर करते हैं. धनी-गरीब, छूत-अछूत उस समय भी था. हस्तिनापुर (अपर कास्ट व एलीट क्लास) से गुरु द्रोण की आमदनी थी. यह जंगली, गरीब भील (शिड्यूल ट्राइब) एकलव्य...! इसकी यह मजाल कि हमारे परम प्रिय शिष्य अर्जुन से आगे निकल जाए? वह भी बिना मुझसे पढे? बिना मेरी मर्जी के मुझे गुरु मान लिया? याद कीजिए गब्बर सिंह का डायलॉग- “हूं, इसकी सजा तुम्हें मिलेगी, जरूर मिलेगी.” सो एकलव्य को मिली. आजतक मिल रही है. आरक्षण देख लीजिए. महाभारत काल से यह अपर-लोअर क्लास का संघर्ष जारी है भैया.
      एक गुरु परशुराम थे. हम कहते हैं कि धर्म (यदि अपने सच्चे और सही रूप में है) तो कहता है कि हर मनुष्य बराबर होता है. मगर शिक्षा का दान देनेवाले अपने गुरु लोग ही इसके विरोधी निकले. कर्ण को कुंती ने समाज के डर से त्याग दिया तो वह सारथी के घर पल-बढ कर उसी का पूत कहलाया. एकलव्य की तरह वह भी उतना ही वीर, बहादुर था. लेकिन शिक्षा ग्रहण करने के लिए उसे भी झूठ बोलना पडा, वरना नीची जाति को गुरु परशुराम शस्त्र शिक्षा नहीं देते. उसी कर्ण की जाति (?) की सच्चाई उजागर होने पर उसे श्राप दे दिया गया कि प्राण जाने के संकट काल में ही तुम सारी विद्या भूल जाओगे. कहिए तो भला. आज के शिक्षक ऐसा करते तो उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा चलता. गुरु परशुराम ने यह नहीं सोचा कि अगर उन्होंने जाति-पाति, ऊंच-नीच का भेद नहीं रखा होता तो कर्ण को झूठ क्यों बोलना पडता? माने समरथ को नहिं दोष गुसाईं. द्रोण सामर्थ्यवान, परशुराम सामर्थ्यवान. सो दोषी कौन? सही उत्तर- एकलव्य, कर्ण.
      यह तो द्वापर युग की बात हुई. आज के कलियुग में तो गुरुओं की बहार है, ढेर के ढेर गुरु हैं- सबकी अपनी अपनी मान्यताओं की दुकानदारी है- करोडों एकड में फैली हुई- करोडों रुपए के गुरु मंत्र और प्रसाद के साथ. हिंदुस्तान के हर कोने में ऐसे गुरु भरे मिलेंगे. जिसकी दुकान में जितनी अधिक गोरी चमडी, वह गुरु उतना ही सफल. उनके चमत्कार और एक अदना से जादूगर के हाथ की सफाई में कोई अंतर नहीं है. पर बेचारा जादूगर सौ रुपए में जादू दिखाता है, उसी जादू के ये गुरु करोडों लेते हैं. और हम भक्तिभाव से भरकर देते हैं.मंच पर उनके नाटक पर करोडो वारे-न्यारे होतेहैं, नाटक और थिएटर करनेवाले 50 रुपए का टिकट भी नहीं बेच पाते.   
      ये गुरु उपदेश देते हैं- माया मन का विकार है. पैसा तिनका है. मगर खुद के मरने पर हजारो-हजार करोड की सम्पत्ति मिलती है. ये गुरु कहते हैं- जीवन नश्वर है. गीता ने कहा है कि शरीर आत्मा का वस्त्र है, सो आत्मा चोला बदलती रहती है. उनकी अपनी आत्मा का चोला ना बदले, इसलिए वे एके 47 के वर्तुल में चलते हैं. ये गुरु कहते हैं कि शरीर को जितना तपाओगे, शरीर कुंदन सा दमकेगा. और खुद बिजनेस क्लास में उडते हैं और सबसे मंहगी कार में यात्रा करते हैं. उनके करीब वे ही लोग होते हैं, जिनके पास उनकी ऐसी सेवा की लछमीनुमा सुविधा है. बाकी लोग हैं- चटाई उठाने और उस पर पडी धूल झाडने के लिए.
      गुरु पूर्णिमा है, सो छम्मकछल्लो को आज कई गुरुओं के सपने और संदेश आए कि ऐ छम्मकछल्लो ! धन और माया का खेल खेलते खेलते अब हम थक चुके हैं और सही मायने में एकदम त्यागी गुरु बनना चाहते हैं. इसलिए अपने सभी संचार माध्यमों का प्रयोग करके सभी को बताओ कि दुनिया के सभी गुरुओं ने आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर दान लेने के बदले दान देने की घोषणा की है. यही नहीं, आज वे सबकुछ को तिनका और धूल समझते हुए सभी को अपनी कृपा का प्रसाद भी देंगे. वे सब पहुंचे हुए गुरु हैं और पहुंचे हुओं के पास पहुंचे हुए लोग ही पहुंचते हैं. सत्य साईं बाबा के समय देश के आलाकमान तक पहुंच गए थे. उनके शव को तिरंगे से ढका गया था, जाने किस नियमावली के तहत. आज उनका समाधि स्थल खुल गया होगा. देश से लाखों लोग पहुंच गए हैं. सभी पढे-लिखे, सभी समझदार- बस, इन्हीं सभी समझदारों को सभी जीवित गुरु अपनी तरफ से उपहार भी देंगे, भले इसके लिए उन्हें विश्व बैंक से कर्जा लेना पडे. छम्मकछल्लो ने कह दिया कि गुरु जी, न दान दीजिए, न उपहार, बस एक ही काम कीजिए, लोगों को इस गुरु घंटाल के खेल में मत फंसाइये. लोग अपने आप पर भरोसा रखें और जीवटता से काम करें, खुद भी जियें और दूसरों को भी जीने दें. सपने में ही गुरु आग बबूला हो गए. बडी मुश्किल से छम्मकछल्लो जान बचा कर भागी. इसी डर से यह लेख दिन में नहीं लिखा. अब रात हो गई है. सभी गुरु लोग अपना अपना दाय लेकर सोने चले गए होंगे. यही मौका है छम्मकछल्लो के लिए. लगा दे पोस्ट छम्मकछल्लो, मना ले तू भी गुरु पूर्णिमा.

Friday, July 1, 2011

काला- काला, कितना प्याला.


छम्मकछल्लो को देश की प्रगतिशीलता पर नाज है. देश आगे बढ गया है. वह रूढियों से मुक्त हो रहा है. वह कालेपन के दुखदाई असर से आगे बढ रहा है.
कहते थे कभी लोग कि काला रंग अशुभ होता है. इसलिए, शुभ काम में काले से लोग खुद को दूर रखते थे. ब्याह हो कि छठी-मुंडन, काले रंग के कपडे या सामान देने- पहनने की मनाही थी. भला हो अपने फिल्लमवालों का, जिन्होंने इस भूत का खात्मा किया. उससे भी बडा भला हुआ अपने उन लोगों का, जिनके बल पर लोगों के मन से काले के प्रेत का डर निकला. यह काला नहीं रहता तो बाबा लोग साधारण से महान बनकर भगवान की अवस्था तक नहीं पहुंचते.
बडे बन गए लोगों से काले की चर्चा नहीं की जाती. उनसे काले की महिमा का हिसाब नहीं पूछा जाता. उनसे भी काले का हिसाब नहीं पूछा जाता जो अपने 5 साल के शैशवकाल में ही 5 सौ वर्ष की सुखदा पा लेते हैं- जाने किस भगवान के आशीष से. आम जनता 5 साल पहले भी भूखी-प्यासी मरती रहती है और 5 साल बाद भी.
काले की महिमा से लोग योग से भोग तक पहुंचने लगे हैं. योग से लोगों की देह दुरुस्त करनेवाले अब कालेपन का काजल आंखों में आंजने लगे हैं. लोग कारागार को कारी कोठरी कहते थे. उस कारी कोठरी में छुपी काली लछमी मैया महिमामयी है. कोई दूसरा देवी का रूप बिगादता है तो हमारे हिंदू हृदय आहत हो जाता है. मगर अपनी इसी देवी को काले वस्त्र पहनाते हम उजले होते चले जाते हैं. यह काले की महिमा है भैया! समझा करो. उजला तभी उजला दिखता है, जब उसके सामने उसका विपरीत रंग हो. सो उसके सफेद दिखते रहने के इंतज़ाम में लगा बिचारा काला रंग! यह दिखता नहीं, मगर उजले तन और वस्त्र के भीतर से अपने  होने का अहसास दिन दूना रात चौगुना कराता रहता है. लोग इसे देखने की चाह में  कभी जन्तर-मंतर में भटकते हैं तो कभी रामलीला के मैदान में सैकडों लीलाएं करते हैं. कभी किसी पराई धरती के कोश में बंद हो जाते हैं तो कभी पलक झपकते मिट्टी से सोने का खेल देखने लगते हैं. सोना संज्ञा भी है और क्रिया भी. संज्ञा के बाद ही क्रिया आती है सो संज्ञा के बाद वे क्रियामय-प्रक्रियामय हो जाते हैं. लोग कभी मिल की मील दर मील जमीन बिकते देखते हैं तो कभी एकड दर एकड में शिक्षण संस्थानों के चमत्कारी खुल जा सिम सिम जादू.  काले कपडे से भले हम काले शनि महाराज की तरह भय खाते रहें, उजली काया और वस्त्र के भीतर का काला रंग बडा लुभावना होता है, बडा चमत्कारी होता है, चिरकालिक नहीं, आत्मा की तरह अजर और अमर होता है. इस अमरत्व पर कौन ना वारी-वारी जाए! छम्मकछल्लो की भला क्या बिसात! वह वारी वारी जाने के लिए बिसात की तरह बिछने को तैयार है.     

Sunday, June 5, 2011

ऐसे थे बादल दा- सदानंद मेनन

मोहल्ला लाइव पर प्रस्तुत सदानंद मेनन के आलेख का दूसरा हिस्सा पढें. संस्मरण सदा से दिलचस्प होते हैं. इसमें आप व्यक्ति के जीवन के उन अनछुए पहलुओं को देखते-जानते हैं, जिनके बारे में आमतौर पर हमें पता नहीं होता. बादल सरकार के कुछ इन्हीं मोहक बातों को सदानंद ने यहां प्रस्तुत किया है. पढें और अपनी राय दें. - प्रस्तुति : विभा रानी
लिंक यह रहा.
http://mohallalive.com/2011/06/04/a-curtain-call-for-political-theatre-part-two/

बादल सरकार पर लिखे सदानंद मेनन के इस लेख का हिंदी अनुवाद विभा जी प्रस्‍तुत किया है। इसका पहल हिस्‍सा था : बादल सरकार के साथ राजनीतिक नाटकों का पटाक्षेप। पूरे लेख को अंग्रेजी में 28 मई-3 जून के इकॉनॉमिक & पॉलिटिकल वीकली[epw.org.in] में पढ़ा जा सकता है : मॉडरेटर
बादल दा से पहली बार मैं मद्रास में 1970 में प्रसिद्ध नृत्यांगना चंद्रलेखा (अब स्वर्गीय) के घर पर मिला। वे वहां फिजिकल थिएटर की विस्तृत व्याख्या करने के बाद बीड़ी फूंक रहे थे। मुझे याद है, वे चंद्रलेखा को भारतीय प्रस्तुति की परंपरा और प्रशिक्षण अनुशासन के प्रति उनकी अनभिज्ञता को लेकर बड़ी निर्दयता से उन्हें चिढ़ा रहे थे। चंद्रलेखा यहां की प्रमुख हस्ती थीं। उनके साथ बादल दा को इतना निर्मम होते देखकर हैरानी हुई थी। थोड़ी देर बाद चंद्रलेखा ने मुझे कहा कि मैं उन्हें अपने स्कूटर पर बादल दा को उनके होटल छोड़ आऊं। मैंने देखा कि बादल दा बुरी तरह से गर्दन हिलाते हुए ’नो’, ‘नो’, ‘नो’, नो’ किये जा रहे थे और कह रहे थे कि “मैं पैदल ही चला जाता हूं।” बाद में मुझे पता चला कि वे उस दिन पहली बार स्कूटर पर बैठ रहे थे।
चालीस साल बाद, जब मैं इंटरनैशनल थिएटर फेस्टिवल ऑफ केरल का जूरी था, बादल दा थिएटर में लाइफ टाइम अचीवमेंट के लिए अम्मानुर पुरस्कारम (2010) के लिए चुने गये। इस पुरस्कार में अच्छी खासी धनराशि भी थी। मैंने बादल दा को फोन पर बधाई देते हुए कहा कि पुरस्कार ग्रहण करने के लिए आते समय अपनी देखभाल के लिए किसी को साथ भी ला सकते हैं। तुरंत उस तरफ से वही आवाज आयी – ’नो’, ‘नो’, ‘नो’, नो’। मुझे हंसी आ गयी। मैंने उन्हें उनके चालीस साल पुराने विरोध की याद दिलायी और कहा कि अब यह मत कहिएगा कि मैं हवाई जहाज पर पहली बार चढ़ रहा हूं। वे हंसे और अपने साथ एस्कॉर्ट लाने को तैयार हो गये।
बादल दा के विद्रोही तेवर उनकी अपनी कार्य संस्कृति के कारण बने। पूरी जिंदगी में पैसे की फिजूलखर्ची उनमें अपराधबोध भरती रही। उनकी केवल एक ही लत थी – बीड़ी पीना। इसमें उन्हें मजा आता था। मद्रास में वे दो बार थिएटर वर्कशॉप के लिए आये – कलाक्षेत्र डांस स्कूल और मद्रास आईआईटी में। दोनों बार मेरी ड्यूटी थी कि हर दो घंटे के बाद मैं अपने स्कूटर से उन्हें गेट के बाहर ले जाता था, जहां वे बड़ी मस्ती में बीड़ी फूंका करते।
बादल दा का एक और जुनून था, जिसके बारे में लोग शायद कम जानते हैं – ‘एस्पेरांटो भाषा’। भारत में वे इसके मुखिया थे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘एस्पेरांटो समुदाय’ की एक प्रमुख हस्ती। इस भाषा के ईजाद का श्रेय वे पॉलिश डॉक्टर एलएल जमेनहॉफ को देते थे, जिन्होंने 1887 में इस भाषा का सृजन किया। बादल दा के लिए यह बड़ा महत्वपूर्ण था कि ‘एस्पेरांटो भाषा’ ने भाषा की सीमाओं को तोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने मुझे Esperanto का मतलब बताया था – आशापूर्ण जीवन। यह आशा उनके ‘थिएटर की भाषा” में भी परिलक्षित होती है।
बादल दा से मेरी आखिरी मुलाकात तीन महीने पहले फरवरी, 2011 में हुई – पियरी रो, ऑफ बेडॉनरोड, माणिक तला स्थित उनके ‘रेड बिल्डिंग” के दूसरे माले के उनके छोटे से कमरे में। हम लगभग एक दशक के बाद मिल रहे थे। उन्होंने मुझे गले लगाया। वे अपनी आत्मकथा ‘पुरॉनो कासुंदी’ (बासी अचार) को अंतिम स्वरूप दे रहे थे। उस छोटे से कमरे के बीच में एक चारपाई थी, दो गोदरेज आलमीरे – विभिन्न पत्रिकाओं से छांटकर काटे हुए बहुविध रंग के कागजात, और बाहर की ओर झांकती उनकी टेबल-कुर्सी।
चंद्रलेखा और दशरथ पटेल के निधन पर अपना दुख जताने के बाद वे बोले – “मुझे तुमसे दो बड़ी महत्वपूर्ण बातें बतानी हैं। एक तो यह कि मैं अपने आप को 25 साल छोटा महसूस कर रहा हूं। मैंने पहले कभी इतना बेहतर महसूस नहीं किया। दूसरा यह कि मेरे पास कुछेक पुरस्कारों से कुछ पैसे आ गये हैं। जाहिर है, इसके लिए तुम सब भी जिम्मेवार हो। मैं खुद को अमीर महसूस कर रहा हूं। अब, ये पैसे बचाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। मैंने यह तय किया है कि इसे मैं अच्छे से खर्च करूंगा। इसलिए मैंने यह फैसला किया है कि मैं छह माह के विश्व भ्रमण पर निकलूंगा और दुनिया भर में जो मेरे दोस्त हैं, उनसे मिलूंगा। चिंता की कोई बात नहीं है। मेरे एस्पेरांटो दोस्त मेरे रहने-खाने का इंतजाम हर जगह कर देंगे।”
इसके बाद उन्होंने एक सांस में अपनी सारी योजनाएं, सारे देश, सारे शहर के नाम बता डाले – यूरोप, इंग्लैंड, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, जापान, कोरिया, लाओस, एंजेलस, थाइलैंड, म्यांमार और उसके बाद वापस कोलकाता। मैंने कहा – ‘बादल दा, चेन्नै आपने छोड़ दिया।’ वे हंसे – “बिलकुल! बहुत दिन हो गये तुम्हारे हाथ की फिल्टर कॉफी पिये हुए।”
हर योजना की तरह उनकी यह योजना भी अधूरी रह गयी। उनका सबसे बड़ा स्वप्न था – उनके यूनिक ‘थर्ड थिएटर का – अंतिम उत्तर’ … लोगों के जीवन के बारे में शहरी थिएटर ग्रुप उनके जीवन की गाथा न रचें। कामगार, फैक्ट्री मजूर, किसान, भूमिहीन मजदूर, अपना नाटक खुद लिखें और खेलें … यह प्रक्रिया हालांकि तभी आगे बढ़ेगी, जब कामगार वर्ग के लोगों की सामाजिक-माली हालत बदलेगी। जब यह होगा, थर्ड थिएटर के पास अपना ऐसा कोई खास काम नहीं रहेगा और तब उसका विलय ‘फर्स्ट थिएटर’ में हो जाएगा।
… इसके लिए अब किसी और बादल दा की राह तकनी है।
(सदानंद मेनन। लेखक, फोटोग्राफर और स्टेज लाइट डिजाइनर। फिलहाल एशियन कॉलेज ऑफ चेन्नै में असोसिएट फैकल्टी। उनसे sadanandmenon@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।)