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Tuesday, June 2, 2020
आखिर, प्रोब्लेम क्या है इंटर कास्ट मैरेज़ में?
Friday, July 1, 2011
काला- काला, कितना प्याला.
Sunday, September 13, 2009
आखिर हिंदी वंचितों और शोषितों की भाषा ही क्यों रहे, शासन की क्यों नहीं?
रिपोर्टर्स पेज पर पढें छम्मक्छल्लो का यह लेख. लिंक है- http://reporterspage.com/glimpse/23-22#more-687
छम्मक्छल्लो हैरान-परेशान है कि आखिर क्यों कहा जाता है कि हिन्दी वंचितों और शोषितों की भाषा है? आखिर क्यों "राजभाषा” हिंदी का प्रयोग नहीं किया जा सकता? क्यों मान लिया गया है कि "राजभाषा” हिंदी दुरूह और ना समझ में आनेवाली भाषा है? इसके सीधे-सीधे कारण हैं. सबसे पहला तो यह कि जबरन यह मान लिया गया है कि हिन्दी गरीबों, निचले तबके और अनपढ नसमझ लोगों की भाषा है. हिन्दी को इसी गरीब की भाषा मान लिये जाने के कारण इसे ऊपरी वर्ग तक जाने का मौका नहीं मिल पा रहा है. दूसरे, अगर हिन्दी में यह ऊपरी वर्ग का काम भी होने लगे तो ऊपरी वर्ग का वर्चस्व खत्म हो जायेगा, जिसे यह वर्ग क़तई नहीं चाहेगा. कौन अपनी गद्दी छोडना चाहता है? तीसरे, हिन्दी के अलग- अलग रूपों की चर्चा कर-कर के यह साबित करने के कोशिश की जाती रही है कि हिन्दी गम्भीर विषयों के लिए नहीं है. आप कहानी-कविता, नाटक, फिल्म तो हिन्दी में लिख-बना सकते हैं, मगर इन पर चर्चा करनी हो तो वह हिन्दी में नहीं हो सकती. मतलब, मनोरंजन हिन्दी में, मगर विचार अंग्रेजी में.
सवाल है कि राजभाषा हिन्दी का प्रयोग क्यों नहीं होना चाहिये? क्यों इसे भी हिन्दी का एक सामान्य स्वरूप मानकर स्वीकार नहीं किया जाता? क्यों यह तर्क दिया जाता है कि राजभाषा हिन्दी बहुत कठिन होती है और यह सभी के सर के ऊपर से निकल जाती है. दर असल, हिन्दी को स्वीकार न करनेवाले कुछ लोगों ने हिन्दी को चन्द मज़ाकिया जुमले में ढाल कर यह कहने की कोशिश की कि देख लो, अगर हिन्दी में काम करना पडा तो ऐसी हिन्दी बोलनी पडेगी. ज़ाहिर है कि ऐसी हिन्दी से सभी बिदक गये. जो हिन्दी नहीं चाहते थे, उनकी बन आई. हम वैसे भी कुछ करने से पहले सोचते कम हैं, सो कुछ ने कोई फतवा दे दैया तो ले उदे, जैसे कोई कहे कि कौआ कान ले उड तो बगैर अपने कान जांचने के, कौए के पीछे भाग चले. कहीं भी आप जाये, कोई भी भाषा बोलें, वह अपने व्याकरण और विन्यास में एक ही होती है, सिर्फ उसके प्रयोग के स्थल अलग-अलग होने से उसके स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं. सोचिए कि एक सब्ज़ीवाले और एक कॉलेजवाले से एक ही तरीके से बात की जा सकती है क्या? क्या आवेदन पत्र और प्रेम पत्र की एक ही भाषा हो सकती है?
राजभाषा हिन्दी के लिए यह भी कुतर्क दिया जाता रहा है कि इसके शब्द बहुत कठिन होते हैं, जबकि शब्दों के ज्ञाता जानते हैं कि प्रयोग से ही शब्दों से अजनबियत मिटती है. सुनामी या कटरीना के आने से पहले किसी ने इसका नाम भी नहीं सुना था, मगर आज सभी इसे जानते हैं. गूगल, ऑर्कुट, याहू, रेडिफ से क्या आज हम परिचित नहीं हुए हैं? 20 साल पहले ये सब शब्द बडे डरावने लगते थे. लोग तो तब ऑफिस के कम्प्यूटर तक नहीं छूते थे. शब्द हमारी ज़रूरत के मुताबिक बनते हैं, गढे जाते हैं, प्रयोग में लाए जाते हैं. आज़ादी के बाद हमें अपनी भाषा गढनी थी, हमने गढी, मगर उसे स्वीकार करने के बजाय हम उसे मज़ाक में लेते रहे. इस बात पर बल देते रहे कि सरल हिन्दी का प्रयोग करें. इस सरलता की तह में जाने पर पता चलता था कि अंग्रेजी के शब्दों को जस के तस बोलते चले जाओ. सरक हिन्दी हो जायेगी. नतीजा यह हुआ कि हम बोलते तो हैं हिन्दी, मगर इस्तेमाल करते हैं मैनेजर, डायरेक्टर, ऑफिस, प्रिंसिपल, न कि प्रबँधक, निदेशक, कार्यालय, प्राचार्य. ध्यान दें कि ये सभी शब्द हिन्दी में पहले से ही हैं, फिर भी इनका प्रयोग करने से हमें हिन्दी के कठिन होने का भय दिखाया जाता रहा.
राजभाषा हिन्दी के लिए भी सारे कुतर्क गढने में माफ करें, हमारे हिन्दीभाषियों ने ही अधिक भूमिका निभाई है. हिन्दी उनकी भाषा रही है और इसका खामियाज़ा यह कह कर उन्होंने दिया कि हिन्दी-विन्दी पढने से क्या होत है? हिन्दी में काम करना बकवास है. राजभाषा हिन्दी के क्षेत्र में काम करते हुए यह मेरा अनुभव रहा है कि अहिन्दीभाषी हिन्दी को जितना अधिक महत्व देते हैं, हिन्दीभाषियों को मैने हिन्दी की उपेक्षा करते या उसका मज़ाक उडाते ही अधिक देखा. जब कभी हिन्दीभाषी अफसरों से सामना हुआ, वे निखालिस अंग्रेजी में बोलते रहे और साथ ही साथ यह भी जताते रहे कि उन्हें अंग्रेजी आती है और यह कि हिन्दी में काम करना? "बुलशिट." लेकिन जब कभी अहिन्दी भाषी अफसरों से सामना हुआ. वे अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में न केवल बतियाते रहे, बल्कि यह भी बताया कि कब-कब, कहां-कहां वे हिन्दी का प्रयोग कर लेते हैं.
हिन्दी कबतक दुख-दर्द और नाटक मनोरंजन का माध्यम बनी रहेगी? कबतक यह केवल वंचितों की ज़बान बनी रहेगी? ध्यान रहे कि जबतक यह केवल वंचितों की ज़बान बनी रहेगी, कोई इस पर गम्भीरता से नहीं सोचेगा. राजभाषा हिन्दी के प्रयोग में दिक्कत क्या है? दफ्तरों में एक तयशुदा तरीके से काम होता है. सभी तरह के पत्रों के तय प्रारूप होते हैं. आप अंग्रेजी में लिखें या हिन्दी में, प्रारूपों को कोई फर्क़ नहीं पडनेवाला. महज 200-300 अंग्रेजी शब्दों में सारा काम होता है. हिन्दी में भी लगभग इतने ही शब्द रहते हैं. जब हम अंग्रेजी सीख सकते हैं तो क्या इतनी हिन्दी नहीं सीख सकते? दूसरी बात कि भारत में अंग्रेजी का एक सीखा सिखाया रूप ही प्रयुक्त होता है, जबकि हिन्दी अपनी भाषा होने के कारण इसकी व्यापकता बडी हो जाती है. अलग अलग तरीके से लोग एक ही शब्द का प्रयोग करते हैं. आखिर सीखी हुई सीमित अंग्रेजी और स्वाभाविक रूप से फैली-पसरी हिन्दी का यह भेद तो उसकी सम्रृद्धि का दस्तावेज़ है, जिस पर गर्व करने के बदले उस पर शर्म करने जैसी स्थिति बना दी गई है. तीसरी बात, कोई भी भाषा सुनने से अधिक प्रचलन में आती है. हम आज कहने को तो हिन्दी बोलते हैं, मगर उसके वाक्य विन्यास ही केवल हिन्दी की प्रकृति के अनुसार होते हैं, पूरे वाक्य में जितना मुमकिन हो सकता है, अंग्रेजी के शब्द घुसा दिए जाते हैं. हम यह कहते हैं कि "आज एमडी ने अर्जेंट मीटिंग कॉल की है." यह नही कहते कि "प्रबंध निदेशक ने आवश्यक या अत्यावश्यक बैठक बुलाई है." कोई यह बताए कि इसमें ऐसा कौन सा शब्द है, जो लोगों की समझ में नहीं आता? मगर इस्तेमाल न करने की वज़ह से यह सुनने में अटपटा लगता है और तब हम सीधा-सीधा फतवा दे देते हैं कि राजभाषा हिन्दी है ही ऐसी. कोई बोले तो उसका इस कदर मजक उडाया जाने लगता है कि वह बोलने से तौबा कर ले और फिर हम दुन्दुभी बजा-बजा कर कहने लगते हैं कि राजभाषा हिन्दी- बाबा रे बाबा!
यह सोचिए कि ऐसा कह कर हम हिन्दी के ही एक स्वरूप को नष्ट करते आये हैं और अभी तक कर रहे हैं. राजभाषा हिन्दी का प्रयोग राज-काज के लिए है तो उसका प्रयोग भी राज-काज में ही होगा. कानून की भाषा का प्रयोग घर में सब्ज़ी बनाते समय या पार्टी मनाते समय् तो नही किया जा सकता है, जैसे बनारसी साडी पहन कर बाजार-हाट नहीं जाया जाता. लेकिन शादी-ब्याह पर भी अगर इसे नहीं पहना जाय तो घर में ऐसे कपडों के होने का मतलब क्या है? राज-काज में हिन्दी का प्रयोग होगा तो हिन्दी का वर्चस्व बढेगा और तब शासन की ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुकमरान इसकी ज़रूरत को समझने पर बाध्य होंगे और झक मार कर इसका प्रयोग करेंगे. वैसे कहनेवाले जितना भी कहें, हिन्दी बडी जीवट भाषा है और तमाम बाधाओं के बाद भी अपनी मंज़िल तय करती ही आ रही है. जिस तरह से वह सम्पर्क भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाती जा रही है, उसी तरह से वह राजभाषा हिन्दी के क्षेत्र में भी आगे बढती आ रही है. आज से 20-25 साल पहले तक अफसरान हिन्दी बोलना पसन्द तक नहीं करते थे, आज दफ्तरों में देखिए, अंग्रेजी से कब वे हिन्दी में उतर आते हैं, उन्हें भी पता नहीं चलता. पहले हिंन्दी के नाम पर सभी कडुआ मुंह बनाते थे. हिन्दी में पत्र लिख दिया तो उसका अनुवाद मांगा जाता था, लिखनेवाले से यह तक कह दिया जाता था कि अंग्रेजी में पत्र लिख कर लाओ. आज यह जागरुकता अधिकारियों के बीच बढी है और अब वे ऐसी मांग नहीं करते. राजभाषा नियम और नीति से भी वे पहले से अधिक परिचित हुए हैं. कम्प्यूटर पर हिन्दी अने से और इंग्लिश फोनेटिक में हिन्दी में टाइप करने की सुविधा के कारण अब उनकी निर्भरता अपने स्टाफ पर से खत्म हुई है. अब वे ख़ुद भी हिन्दी में काम कर लेते हैं. हिन्दी के शब्दों से उनकी परिचिति बढी है और वे खुद भी (ख़ासकर अहिन्दीभाषी) खिचडी भाषा के बदले शुद्ध हिन्दी के प्रयोग को असधिक वरीयता देते हैं. अब यह हम पर है कि हम अब भी राजभाषा हिन्दी कठिन है का रोना रोते रहें या उसे सत्ता के ऊंचे और ऊंचे पायदान पर ले जाने की कोशिश करें. राजभाषा हिन्दी कोई लाल कपडा नहीं है और ना ही हम भैंस. फिर भी उसे देख कर हम बिदकते हैं तो यह हमारी ही ख़ामी है.
Friday, September 4, 2009
हम बहुत धार्मिक हैं. इसलिये हम कुछ नहीं करेंगे.
देश धार्मिक है, हम धार्मिक हैं तो सारे समय देश में धर्म की धज फहराती रहती है. श्रावण मास के आते ही पूजा-पाठ, व्रत-उपवास के अम्बार लग जाते हैं. जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसी भक्ति. आखिरकार यह धर्म और उससे उपजी श्रद्धा का मामला है.
मुँबई में ग़नपति यानी गणेश चतुर्थी का बहुत महत्व है. इसकी महिमा तो अब इतनी है कि अब मुंबईकर या महाराष्ट्रीयन से अधिक गैर मुंबईकर या ग़ैर महाराष्ट्रीयन इसे मनाते हैं. चलिये, इससे कोई फर्क़ नहीं पडता कि कौन सा पर्व कौन मना रहा है. छम्मक्छल्लो को अपना कलकता-प्रवास याद आता है, जब उत्तर भारतीयों का एक दल अष्टयाम के लिए चन्दा मांगने पहुंचा था और इस बिना पर अधिक चन्दा चाह रहा था, क्योंकि यह "अपनी" पूजा है. गैर की पूजा कौन सी हुई, यह पूछने पर तपाक से उत्तर भी मिला था कि वही, जो बंगाली लोग सब करता है, यानी कि दुर्गा पूजा. छम्मक्छल्लो को हंसी आ गई थी यह सुनकर कि अब दुर्गा पूजा खालिस बंगालियों की पूजा हो गई.
पूजा कोई भी हो, कोई भी करे, श्रद्धा जैसा तत्व सभी में एक समान रहता है. सभी अपनी अपनी श्रद्धा, आस्था से पूजा करते हैं, मगर बस पूजा तक. सभी पूजा में विसर्जन की भी प्रथा है. विसर्जन के बाद देवी-देवता का आसन हिला दिया जाता है, कह दिया हाता है-"स्वस्थानम गच्छतु:" यानी," हे देव, आप जहां से आये थे, वहीं के लिए पुन: प्रस्थान कीजिये". टपोरी ज़बान में कहें तो " जा रे बाबा, अपने घर जा, बहुत किया तेरा, खाली-पीली अब ज्यास्ती मुंडी पर बैठने का नहीं". और फिर देव प्रतिमा जा कर पानी में डाल आइये. पानी में डालने तक तो खूब जय-जय, खूब-खूब श्रद्धा का प्रदर्शन, और पानी में डालने के बाद पीठ फेरते ही देव, तू जा खड्डे में.
गणपति का विसर्जन दूसरे दिन, पांचवे दिन, सातवें दिन और दसवें दिन यानी कि अनंत चतुर्दशी के दिन होता है. हर दिन के विसर्जन के दूसरे दिन समुद्र का किनारा छम्मक्छल्लो ने देखा - फूल, पत्ते, माला, के अलावे अंग-भंग हुई प्रतिमा. सिर कहीं तो हाथ कहीं तो सूंढ कहीं. समुद्र तो अपनी लहरों में कुछ बहा कर ले जाता नहीं. वह दूसरे दिन "त्वदीयं वस्तु गोविन्दे, तुभ्यमेव समर्पिते" की तरह किनारे पर सबकुछ छोड देता है. भक्तों की श्रद्धा यहां काम नहीं करती. वह इन सबसे भी दूर रहती है कि इन मूर्तियों के बनने या उनके सजावट में कितने केमिकल्स का इस्तेमाल हुआ? इन केमिकल्स से समुद्रे जीव का कितना नुकसान होगा? आस-पास कितनी गन्दगी फैलेगी, उससे कितनी बीमारियां होंगी? यह सब होता है, होने दो. ग्लोबल वार्मिंग बढ रही है, बढने दो. देश भर में बारिश कम हुई, होने दो, पर्यावरणवादी लाख प्रदूषण -प्रदूषण चिल्लाते रहें, चिल्लाने दो. अपन का क्या? अपन इन सबले लिए थोडे ना बने हैं. इन सबके लिए एनजीओ और पागल लोग हैं जो कुछ ना कुछ करते रहते हैं. आखिर उनको भी तो काम-नाम मिलना चाहिये कि नहीं?
एक ने कहा कि पूजा-पाठ पर इतना खर्च ना करके ये सार्वजनिक वले इन पैसों से स्कूल-कॉलेज, अस्पताल क्यों नहीं खुलवाते? असमर्थ बच्चों की फीस क्यों नहीं भर देते? गरीबों का इलाज क्यों नहीं करा देते? फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया कि तब लोग उनके बारे में जानेंगे कैसे? या फिर इन सब पचडे में कौन पडे? अपन का काम तो बस मस्ती करने का है, सो करेंगे. बाकी दुनिया जहन्नुम में जाये. एक ने कह, सरकार को फिक्स कर देना चाहिये कि इतनी संख्या से और इतनी ऊंचाई से ज़्यादा की मूर्ति नहीं बनेगी. फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया- " धर्म के मामले में तो सरकार भी नहीं बोलेगी"
छम्मक्छल्लो को एक लतीफा याद आ गया. अलग-अलग धर्मों के कुछ आदमी एक नाव पर सवार थे. नाव में छेद हो गया. पानी भर गया. नाव डूबने लगी. सभी ने अपने-अपने धर्म के भगवानों को याद किया और सभी धर्म के देवता आ कर उनकी जान बचा गये. एक ने गणपति को पुकारा. गणपति आये और नाचने लगे. आदमी ने गुस्से से कहा, "मेरी जान जा रही है, मैने अपनी जान बचाने के लिए आपको पुकारा औअर आप हैं कि जान बचाने के बदले नाच रहे हैं? गणपति ने कहा, "याद करो, जब मैं डूब रहा होता हूं तब तुमलोग भी इसी तरहे से नाच रहे होते हो." और गणपति वहां से अंतर्ध्यान हो गये. हम भी उनके विसर्जन के बाद वहां से अंतर्ध्यान हो जाते हैं. अपनी-अपनी श्रद्धा है. कोई कचरा लगाता है, भगवान के नाम पर तो कोई उसकी साफ-सफाई करता है, भगवान के ही नाम पर.
Wednesday, August 19, 2009
महिलाओं के अंतर्वस्त्र? राम-राम, तोबा-तोबा!
बात करते समय यह अक्सर कह दिया जाता है कि "लेडीज़" हैं, बेचारी. यानी लेडीज़ या स्त्री होना एक पूरी की पूरी बेचारगी का बायस है. फलाने जो हैं, अमुक के पिता हैं, या भाई हैं या पुत्र हैं या पति हैं, मगर इसके उलटा जाते ही आवाज़ के तार धीमे पड़ जाते हैं. अंतिम रिश्ते में तो लोग और भी इतने असहज हो जाते हैं, जैसे कोई बड़ी ही गलत बात कहने जा रहे हों.
ऐसे में महिलाओं के अंतर्वस्त्र पर तो बात भी नहीं की जा सकती. जब महिलायें ही इतने धीमे से बात करने लायक बना दी जाती हैं, तब उनके वस्त्रों और अंतर्वस्त्रों पर बात कैसे की जा सकती है? छम्मक्छल्लो बचपन से देखती आई है कि महिलायें बड़ी सकुचाती सी दूकान में घुसती हैं, खरीदारी करती हैं और नज़रें झुकाये वापस हो लेती हैं. उनकी पूरी कोशिश रहती है कि इन सबकी खरीदारी करते समय कोई उन्हें देख ना ले. लोग क्या कहेंगे? आम तौर पर घरों में नहाने के बाद उनके वस्त्र सूखते हैं तो ऊपर से दूसरे वस्त्रों के भीतर. अगर वे वस्त्र उघर गए तब उन्हें झिड़कियां मिलाती हैं- "ये क्या? ऐसे कैसे खुले में कपडे सुखा रही हो? कुछ शर्म-हया है कि नहीं?" आज तक यह परम्परा जारी है.
मुम्बई में आँगन नहीं होते. कमरे की खिड़कियों पर कपडे सुखाये जाते हैं. अब एक भी कपडा उघडा हुआ सूख जाये तो घर के मरद माणूस कहते नज़र आते हैं कि कैसे सुखाती हो कपडे? नीचे से नज़र जाती है इन पर. इतना खराब लगता है."
पुरुषों के अंतर्वस्त्र सूख रहे हों खुले में तो कोई बात नहीं. वे तो कच्छे-बनियान मैं घूमते भी नज़र आ जाते हैं. छम्मक्छल्लो की बिल्डिंग के सामने एक मोटा सा आदमी रहता है. वह केवल हाफ निकर में रहता है. उसे इस रूप में देखने की इतनी आदत हो गई है कि अब जब कभी वह पूरे कपडे पहन लेता है तो पहचान में ही नही आता. बनियान-लुंगी में रहना तो जैसे जन्मजात अधिकार है. घर में घुसते ही मरद मानूस kurta yaa kamiiz बनियान उतार कर घर में बिंदास घूमते रहते हैं. यह बुरा नहीं लगता. मगर स्त्री? हाय राम!
ये ऊपरवाले ने औरत जात बनाई ही क्यों? मगर छम्मक्छल्लो ऊपरवाले को क्यों दोष दे? ऊपरवाले ने स्त्री को बना कर यह तो नही कह दिया था कि वह इस तरह से सात परेड के भीतर रहेगी, या उसे अपने तन, मन तो छोडिये, अपने वस्त्र और अंतर्वस्त्र पर भी सोचने-बोलाने का अधिकार नहीं रहेगा, उस पर सारी की सारी बंदिशें लगाई जाएंगी, सारे घर की मान-मर्यादा का जिम्मा उसके सर डाल दिया जाएगा. ऊपरवाले ने तो सृष्टि और प्रकृति को नारी के रूप में एक अनुपम रचना दी थी. अब हम बैठ कर उस रचना की गर्दन रटते रहें तो ऊपरवाला क्या कर लेगा? छम्मक्छल्लो यही सोच-सोच कर परेशान हो रही है कि यह स्त्री और उसकी चीजें इतनी शर्मसार करनेवाली क्यों बना दी गई है? आपको कुछ सूझे तो छम्मक्छल्लो को बताएं, वरना आप भी इस राम-राम, तोबा-तोबा के दलदल में एक धेला मार आयें. हम स्त्रियों का क्या है? मुर्दे पर आठ मन लकडी कि बारह मन, इससे उसका क्या लेना-देना!
