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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Friday, August 6, 2010

हां जी हां, हम तो छिनाल हैं ही! तो?

http://baithak.hindyugm.com/2010/08/haan-ji-haan-ham-chhinal-hain.html


http://www.janatantra.com/news/2010/08/06/vibha-rani-on-chhinal-vibhuti-kand/

लोग बहुत दुखी हैं. एक पुलिसवाले लेखक ने हम लेखिकाओं को छिनाल क्या कह दिया, दुनिया उसके ऊपर टूट पडी है. इनिस्टर-मिनिस्टर तक मुआमला खींच ले गए. अपने यहां भी ना. लोग सारी हद्द ही पार कर देते हैं. भला बताइये कि जब हम बंद कमरे में किसी को गलियाते हैं, तब सोचते हैं कि हम क्या कर रहे हैं? जब एक भद्र महिला किसी अन्य पुरुष के साथ सम्बंध बनाती है तो वह छिनाल कहलाती है, मगर जब भद्र पुरुष किसी अन्य भद्र-अभद्र महिला के साथ सम्बंध बनाते हैं तब? निश्चित जानिए, ये छिनालें भी भद्र मानुसों के पास ही जाती होंगी. लेकिन छिनाल के बरअक्स उनके लिए कोई शब्द नहीं होता, तब कहा जाता है कि मर्द और घोडे कभी बुढाते हैं भला? और अपने हिंदी जगत में ऐसे भद्र लेखकों की कमी है क्या? और ‘ज्ञानोदय’ का तो नया नाम ही है, “नया ज्ञानोदय” तो इसमें कुछ नई बातें होनी चाहिये कि नहीं? प्रेम और बेवफाई के बाद अब छिनालपन आया है तो आपको तो उसे सराहना चाहिए.

अपने शास्त्रों में तो कहा ही गया है कि मन और आत्मा को शुद्ध रखो. इसका सबसे सरलतम उपाय है अपने मन की बात उजागर कर दो, मन को शान्ति मिल जाएगी. सो पुलिसवाले ने कर दिया. वह डंडे के बल पर भी यह कर सकता था. आखिर रुचिका भी तो लडकी थी ना.

अब अपने विभूति भाई स्वनाम धन्य हैं. अपने कुल खान्दान के विभूति होंगे, अपनी अर्धांगिनी के नारायण होंगे, अपनी पुलिसिया रोब से कभी कभार उतर कर कुछ कुछ राय भी दे देते होंगे. अब इसी में एक राय दे दी कि हम “छिनाल” हैं तो क्या हो गया भाई? कोई पहाड टूट गया कि ज्वालामुखी फट पडी.

छम्मकछल्लो तो खुश है कि उन्होंने इस बहाने से अपनी पहचान भी करा दी. नही समझे? भई, गौर करने की बात है कि हमलोगों को छिनाल या वेश्या या रंडी कौन बनाता है? हमसे खेलने के लिए, हमसे हमारे तथाकथित मदमाते सौंदर्य और देह का लुत्फ उठाने के लिए, हम पर तथाकथित जान निछावर करने के लिए हमारे पास क्या किसी गांव घर से कोई लडकी या औरत आती है? ये भद्र मानुस ही तो बनाते हैं हमें छिनाल या रंडी. तो अपने इस सृजनकारी ब्रह्मा के स्वरूप को उन्होंने खुद ही ज़ाहिर किया है भाई? पुलिसवाले आदमी हैं, इसलिए कलेजे में इतना दम भी है कि इसे बता दिया. वरना अपने स्वनाम धन्य लेखक लोग तो कहते -कहते और करते- करते स्वर्ग सिधार गए कि “भई, दारू और रात साढे नौ बजे के बाद मुझे औरतों की चड्ढियां छोडकर और कुछ नहीं दिखाई देता. इतने ही स्वनाम धन्य लेखकों की ही अगली कडी हैं अपने विभूति भाई. छिनालों के पास जाने के लिए तो पैसे भी नहीं खर्चने होते भाई! आनंद ही आनंद.

इतना ही नहीं, अपने लेखकों की जमात जब एक दूसरे से मिलती है तो खास पलों में खास तरीके से टिहकारी-पिहकारी ली जाती है, “क्यों? केवल लिखते ही रहे और छापते ही रहे कि किसी को भोगा भी? और साले, भोगोगे ही नहीं तो भोगा हुआ यथार्थ कहां से लिख पाओगे?”

मूढमति छम्मकछल्लो को इसके बाद ही पता चल सका कि भोगे हुए यथार्थ की हक़ीक़त क्या है? वह तो अपने लेखन की धुन में सारा आकाश ही अपने हवाले कर बैठी थी और मान बैठी थी कि भोगा हुआ यथार्थ लिखने के लिए स्थितियों को भोगने की नहीं, उसे सम्वेदना के स्तर पर जीने की ज़रूरत है. वह तर्क पर तर्क देती रहती थी कि भला बताइये, कि कातिल पर लिखने के लिए किसी का कत्ल करना ज़रूरी है? बलात्कृता पर लिखने के लिए क्या खुद ही बलात्कार की यातना से गुजर आएं? छम्मकछल्लो ने अपनी कायरता में इन लोगों से सवाल नहीं किए. अब समझ में आया कि नहीं जी नहीं, पहले अपना बलात्कार करवाइये, फिर उस पर लिखिए और फिर देखिए, भोगे हुए यथार्थ के दर्द की सिसकी में उनकी सिसकारी भरती आवाज़! आह! ओह!

छम्मकछल्लो तो बहुत खुश है कि पुलिस के नाम को उन्होंने और भी उजागर कर दिया. छम्मकछल्लो जब भी पुलिस पर और उसकी व्यवस्था पर विश्वास करने की कोशिश करती है, तभी उसके साथ ऐसा-वैसा कुछ हो जाता है. छम्मकछल्लो के एक फूफा ससुर हैं. दारोगा थे. अब सेवानिवृत्त हैं, कई सालों से. वे कहते थे कि रेप करनेवालों के तो सबसे पहले लिंग ही काट देने चाहिये, फिर आगे कोई कार्रवाई होनी चाहिये.” छम्मकछल्लो के एक औए रिश्तेदार आई जी हैं. वे कहते हैं कि बलात्कार से घृणित कर्म तो और कोई दूसरा हो ही नहीं सकता.

छम्मकछल्लो के कुछ मित्र जेल अधीक्षक हैं. वे सब भी कहते हैं कि हमें सोच कर हैरानी होती है कि लोग कैसे ऐसा गर्हित कर्म कर जाते हैं. वे बताते हैं कि जेल में जब इसका आरोपी आता है तो सबसे पहले तो अंदर के दूसरे ही कैदी उसकी खूब ठुकाई कर देते हैं. कोई भी उससे बात नहीं करता. रेप के अक्यूज्ड को दूसरे कैदी भी अच्छी नज़रों से नहीं देखते.” छम्मकछल्लो ने जब रेप पर एक लेख लिखा था तो एक सह्र्दय पाठक ने बडे ठसक के साथ उससे पूछा था, “आप जो ऐसे लिखती हैं तो क्या आपका कभी बलात्कार हुआ है?” और अगर नहीं हुआ है तो कैसे लिख सकती हैं आप इस पर?” मतलब कि फिर से वही भोगा हुआ यथार्थ.

अब छम्मकछल्लो सगर्व कह सकती है कि हां जी हां, उसके साथ बलात्कार हुआ है. भाई लोग उसे लेखिका मानें या न मानें वह तो अपने आपको मानती ही है. वह यह भी मानती है कि जिस तरह से घरेलू हिंसा दिखाने के लिए शरीर पर जले, कटे या सिगरेट के दाग के निशान ज़रूरी नहीं, उसी तरह बलात्कार करने के लिए किसी के शरीर पर जबरन काबू करना जरूरी नही. इस मानसिक बलात्कार से विभूति भाई ने तो एक साथ ही साठ हज़ार रानियों और आठ पटरानियों का सुख उठा लिया. भाई जी, हम आपके नतमस्तक हैं कि आपने अपने करतब से हम सबको इतना ऊंचा स्थान बख्श दिया. जहां तक बात चटखारे लेने की है तो जब स्वनाम धन्य लेखक भाई लोग सेक्स पर लिखते हैं तब क्या लोग चटखारे नहीं लेते? सेक्स को हम सबने अचार, पकौडे, मुरब्बे की तरह ही चटखारेदार, रसीला, मुंह में पानी ला देनेवाला बना दिया है तो सेक्स पर कोई भी लिखेगा, मज़े तो लेगा ही. सभी मंटो नहीं बन सकते कि उनके सेक्स प्रधान अफसाने बदन को झुरझुरा कर रख दे और आप एक पल को सेक्स को ही भूल जाएं या सेक्स से घृणा करने लग जाएं.

इसलिए हे इस धरती की लेखिकाओं, माफ कीजिए, हिंदी की लेखिकाओं, अब इन सब बातों पर हाय तोबा करना बंद कीजिए. अपने यहां वैसे भी एक कहावत है कि “हाथी चले बाज़ार, कुत्ते भूंके हज़ार.” तो बताइये कि उनके भूंकने के डर से क्या हाथी बाज़ार में निकलना बंद कर दे? हिंदी के, जी हां हिंदी के ये सडे गले, अपनी ही कुंठाओं और झूठे अहंकार में ग्रस्त ये लेखक लोग इस तरह की बातें करते रहेंगे, अपना तालिबानी रूप दिखाते रहेंगे. हर देश में, हर प्रदेश में, हर घर में फंदा तो हम औरतों पर ही कसा जाता है ना! इससे क्या फर्क़ पडता है कि आप लेखिका हैं. लेखिका से पहले आप औरत हैं महज औरत, इसलिए छुप छुप कर उनकी नीयत का निशाना बनते रहिये, उनके मौज की कथाओं को कहते सुनते रहिये. बस अपने बारे में बापू के तीन बंदरों की तरह ना बोलिए, ना सुनिए, ना कहिए. हां, उनकी बातों को शिरोधार्य करती रहिए. आखिरकार आप इस महान सीता सावित्रीवाले परम्परागत देश की है, जहां विष्णु और इंद्र जैसे देवतागण वृन्दा और अहल्या के साथ छल भी करते रहने के बावज़ूद पूजे जाते रहे हैं, पूजे जाते रहेंगे. आखिर अपनी एक गलत हरक़त से सदा के लिए बहिष्कृत थोडे ना हो जा सकते हैं? यह मर्दवादी समाज है, सो मर्दोंवाली प्रथा ही चलेगी. हमारे हिसाब से रहो, वरना छिनाल कहलाओ.

मां तुम काम करो!

मां तुम काम करो

खेत में, खलिहान में

स्कूल में, मैदान में,

दफ्तर में , दुकान में,

तुम्हारा काम, हमारा विश्वास

पढने का, आगे बढने का

अच्छा सीखने का, अच्छा कमाने का

तुम काम करो मां!

रोती तो पक ही जाएगी,

भात भी सिंझ ही जाएगा,

फर्श भी साफ हो ही जाएगा

जाले- धूल भी निकल ही जाएंगे

राधा मौसी, रम्भा काकी

सरला दीदी, शांति मौसी बनने से बचने के लिए

तुम काम करो मां!


होते रहेंगे विधवाघर आबाद

बनती रहेंगी यातना घर की जीवंत दास्तान

छेदते रहेंगे लोग आंखों से घर के दरवाज़े, खिडकियां

गढते रहेंगे किस्से कहानियों की झालरें, बंदनवार

हम एक समोसे, एक जामुन, एक अमरूद के लिए

ताकते रहेंगे चचेरे –ममेरे भाई-बहनों को

पडोस के चाचाओं, ताउओं को

डिवोर्सी होना इतना आसान नहीं होता मां

मेरे कल के कॉल लेटर के लिए

तुम आज काम करो मां!


किसी के सामने हाथ न फैलाने के लिए

किसी को दान देने के लिए

किसी के इलाज के लिए

किसी की मदद के लिए

किसी बच्चे को पढाने के लिए

किसी बिटिया को सजाने के लिए

किसी का घर बसाने के लिए

किसी का वर सजाने के लिए

तुम काम करो मां!


अपनी आज़ादी के लिए

चार पैसे बिना पूछे खर्चने के लिए

मनपसंद कपडे या चप्पल खरीदने के लिए

होटल बिल खुद से चुकाने के लिए

सबकुछ ठीक रहने पर भी

अपने ज़िंदा रहने के लिए

अपने होने के अहसास के लिए

तुम काम करो मां!

Thursday, July 29, 2010

कुछ कविताएं - इस बार.

कोई जंगल बचा रहा है, कोई पहाड, 
कोई पेड तो कोई नदी,
कोई लडकी तो कोई बच्चा. 
नहीं है किसी का ध्यान, छीजती इंसानियत पर. 
कोई आओ, बचाओ उसे. 
वह बच गई तो सब बच जाएंगे, 
पेड, पहाड,धरती, स्त्री, बच्चे, खेत- सबकुछ. 
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कैंसर (1)


सिगरेट का धुआं
धुएं में भविष्य
भविष्य में वर्तमान,
वर्तमान में अतीत

सिगरेट का धुआं
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कैंसर (2)

एक निरंतर् पीडा
आस की धुंआती गन्ध
दवाओं के काले मेघ
इलाज की गूंज
लुका छिपी,लुका छिपी
कैंसर ,कैंसर ! ###

ताकत

हम समझदार हैं,
वर्तमान हमसे कांपता है,
भविष्य हम पर इतराता है,
अतीत मुंह चुराता है,
वक्त के जबडे में हम
हमारी हथेली में सिगरेट, धुंआ, शराब, 
तम्बाकू, गुटखा और अपने होने का ताकतमय एहसास,
अदम्य है आकर्षण
नीति सोभती हैं किताबों में
हम हैं अविरल,अविकल,अविचल!
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पापा,छोड दो शराब हमारे लिए,
पापा,छोड दो गुटखा हमारे लिए,
पापा,छोड दो तम्बाकू हमारे लिए,
पापा,मत करो फिक्स्ड डिपॉजिट हमारे लिए,
पापा,मत बनाओ घर हमारे लिए
पापा,मत खरीदो गाडी हमारे लिए
पापा, बस तुम रहो हमारे सामने घने छतनार पेड की तरह 
पापा, बस, इतना ही करो हमारे लिए! 
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Wednesday, July 21, 2010

प्रेम भी करोगे और जान भी नहीं लेंगे?

छम्मकछल्लो को आजकल शोले के संवाद बडे याद आ रहे हैं- “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर.” देने से लेने की परम्परा में बदलता हमारा समाज. छम्मकछल्लो बहुत खुश है. भले हमारा हिंदू धर्म कहे कि हाथ देने के लिए होते हैं, शरीर परमार्थ के लिए होता है. दधीचि ने परमार्थ अस्थि दान दे दिया. रामचंद्र ने पिता की वचन की खातिर राजपाट भाई को दे दिया. कुंती ने माता बनने के लिए मंत्र सिद्धि का दान अपनी सौत माद्री को दे दिया. उर्मिला ने अपने नव विवहित जीवन की परवाह ना करके अपने पति लक्ष्मण को रामचंद्र के साथ वन जाने दे दिया. त्याग यानी देने की मिसाल अपने हिंदू धर्म में कूट कूट कर भरी है. यहां तक कि मृत्यु शय्या पर पडे रावण ने नीति का उपदेश लक्ष्मण को दे दिया. देने से अर्थ है दान देना. इस ‘दे’ में अपना स्वार्थ नहीं देखा जाता.

मगर छम्मकछल्लो क्या करे कि वह अपने महान हिंदू धर्म के पालन में अपने ही लोगों द्वारा कोताही बरती जाते देखकर दुखी पर दुखी हुई जा रही है. भाई लोग नाम लेते हैं हिंदू धर्म का और मानने से इंकार कर देते हैं इसी धर्म की बातों को. अब देखिए ना, हाथ का धर्म है देना, मगर हम ‘शोले’ के गब्बर सिंह की तरह कहते हैं- “ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर.” इस तरह से गब्बर ठाकुर से हाथ मांगता नहीं, छीन लेता है. हम भी जान मांगते नहीं, छीन लेते हैं. प्रेम से जान मांगिए, लोग हथेली पर ले कर आपके सामने आ जाएंगे. मगर यही प्रेम तो सभी की जान का जंजाल बना है. इसलिए इस प्रेम की बात करेंगे तो आपकी भी जान ले ली जाएगी, सावधान!

खाप, मर्यादा, जाति, धर्म, प्रतिष्ठा और ना जाने किस किस नाम पर जान ले लेने की परम्परा बन गई है. कृष्ण के देश में प्रेम पर इतना बडा व्यभिचारी आरोप! ज़रा कुंती के पुत्र जन्म की बात सोच लीजिए. ज़रा माता सत्यवती के आग्रह पर वेदव्यास के कर्तव्य का स्वरूप सोच लीजिए, जिसके कारण धृतराष्ट्र और पांडु का और फिर माता सत्यवती के ही आग्रह पर वेदव्यास के पुण्य प्रताप से विदुर का जन्म हुआ. स्वयं माता सत्यवती से ही वेदव्यास के ही जन्म की गाथा जान लीजिए. ज़रा अर्जुन और सुभद्रा के विवाह के पहले के रिश्ते की जांच कर लीजिए. ज़रा अहिल्या के साथ इंद्र के और वृन्दा के साथ विष्णु के कारनामे की बात पर गौर कर लीजिए और फिर अपने महान धर्म का झंडा उठाकर गौरव से चलिए और प्रेम की राह चलते लोगों की जानें लेते रहिए.

कोई कहे इन वीर-बांकुरों से कि हे इस महान धरती के महान सपूत, इस तथाकथित जाति, गौरव, धर्म और गोत्र के नाम पर तुम ही अपनी जान दे दो, तो वे उछल कर चार मील दूर जा गिरेंगे और वहीं से आपकी जान लेने का फर्मान भी निकाल देंगे, जिस पर तुरंत ही कोई दूसरा अमल भी कर देगा. और वे तो चैतन्य चूर्ण और अमिय हलाहल मद भरे, स्वेत स्याम रतानार पर वारी वारी जाते हुए तनिक नखरीले नाजुक स्वर में कहते रहेंगे कि ना जी ना. हम जान देने के लिए थोडे ना बने हैं.

फिर उनका वीर रस जागेगा और वे हुंकारा भरेंगे कि “रामपुर के वासियो!” (यह भी गब्बर का सम्वाद है) हम तो लेने के लिए बने हैं. यही हमारी ताकत है. इस ताकत का आधार हमारा महान धर्म है. इस महान हिंदू धर्म के वेद-पुराण, गीता, रामायण, महाभारत के संदर्भ निकालोगे तो मां कसम हमें आपको भी धर्म विरोधी कहते और आपकी जान लेते देर नहीं लगेगी.

ओये जी, छोडो बुद्ध, महावीर की इस बात को कि आप किसी को जान दे नहीं सकते, तो ले कैसे सकते हैं? उसने कह दिया और हमने मान लिया, ऐसा होता है क्या? नियम ही मानने लग जाएं तो इस देश की निरुपमाएं, बबलियां बेटियां हो कर पैदा भी होती रहेंगी और दूसरी जाति या अपने गोत्र में ब्याह कर हमारी मूंछें भी मुंडाती रहेंगी. एक करेला खुद तीता, दूजा चढा नीम पर.

हां जी हां हम माने लेते हैं कि हां, हमारी मूंछ के बाल इतने कमजोर हैं कि अपने मन की ताकत से उसे ऊंची उठाए नहीं रख सकते? हम मन से इतने कमजोर हैं कि किसी के द्वारा हम पर एक व्यंग्य बाण छोड देने से हम इतने तिलमिला जाते हैं कि हम और किसी की नहीं, अपने ही बच्चों की जान ले लेते हैं? हमारा धर्म और हमारे संत तो सहनशीलता का अमिट पाठ पढाते आए हैं. मगर हम पाठ पढ ही लें तो जी हम बडे कैसे बने रहेंगे? बडे की बात तो तब है ना, जब हम आप सबके लिए आतंक का पर्याय बने रहें. नियम को माननेवाले से कोई डरता है क्या? जो नियम कायदे कानून तोडता है, देखिए, लोग उससे कैसे डरते हैं, चाहे वह चोर हो या डाकू, या जान देने के बदले जान ले लेनेवाले हम वीर-बांकुरे. देना तो कर्तव्य भाव दिखाता है और लेना अधिकार भाव. और हम अब काहे के लिए कर्तव्य के पीछे माथापच्ची करें? हमारा अधिकार हमारा अधिकार है और जो हमें हमारा अधिकार नहीं लेने देगा, उससे हम यह छीन लेंगे, चाहे उसके लिए अपने ही बच्चों की जान क्यों न लेनी पडे? आखिर वह हमारा बच्चा है. पाल रहे थे तो पूछा कि क्यों पाल रहे हो? जान ले ली तो पूछने आ गए. चल फूट यहां से!

Tuesday, July 20, 2010

ये क्या? आदमी पूरे कपडे में और औरतें आधे- अधूरे में?

छम्मकछल्लो से नाराज रहनेवाले भाई लोगो, इस बार आप उससे नाराज़ होने का कोई सबब न पा सकेंगे. बडे दिनों से छम्मकछल्लो अपने भाई लोगों की नसीहतों पर ध्यान दे रही थी. एक दिन अचानक उसे भी बिना किसी पेड के नीचे बैठे ही और बिना किसी के हाथ की खीर खाए ही दिव्य ज्ञान मिल गया. निस्संदेह यह ज्ञान उसे आप भाई लोगों से ही मिला है. इसलिए सारा श्रेय आप भाई लोगों को ही जाता है, सो जानिएगा और इसका मान रखिएगा.

अब इस दिव्य ज्ञान की बात आपको बताई जाए. हुआ यों कि छम्मकछल्लो एक दिन एक सेमिनार में भाग लेने गई. सेमिनार था न, सो बडे बडे लोग बुलाए गए थे. सो भैया, ये बडे बडे लोग वो सूट-बूट और टाई में थे कि क्या कहें! उन लोगों की कंठलंगोट रोबदारी देख कर तो छम्मकछल्लो के होश ही फाख़्ता हो गए. फिर भी होशो-हवास को अपने काबू में रखकर वह वहां के सारे तामझाम देखती रही. अचानक उसके दिमाग़ की घंटी टनटना उठी, जब उसने देखा कि ये सारे के सारे स्वनाम धन्य तो ऊपर से नीचे तक गलेबंद कपडों मे बंद हैं. छम्मकछल्लो को दिव्यज्ञान इसी में मिला कि इसीलिए तो ये सभी के सभी हम औरतों को सात सात कपडों के भीतर रहने की बराबरी की बात करते हैं.

अब आप ही देखिए न! आदमी सूट, टाई से लेकर जूते मोजे तक में सम्पूर्ण रूप से बंधा रहता है. टाई के कारण तो उसका गला ऐसा बंधा रहता है कि जब वे शाम में टाई से मुक्त होते हैं तो राहत की लम्बी सांस छोडते हैं. आप गौर से देखेंगे तो पाएंगे कि वह गरदन से लेकर पैर तक ढंका हुआ है. उसके शरीर में केवल सर और हथेलियां खुले हैं. अब महिलाएं ज़रा सोचें. वे जब कपडे पहनती हैं, तब उनके शरीर के कितने हिस्से खुले रहते हैं? लोग कहते हैं कि आदमी औरतों को बराबरी का दर्ज़ा देना नं का. सरासर ग़लत है. वह तो सदा से उसे अपनी बराबरी का दरज़ा देते हुए उसके पूरे कपडे में रहने की चाहत रखता है. और अब शोले के गब्बर सिंह की तरह छम्मकछल्लो का भी सवाल है कि ‘अगर वह ऐसा चाहता है तो क्या गुनाह करता है?” और छम्मकछल्लो कहती है कि नहीं, वह कोई गुनाह नहीं करता.

इसलिए हे इस देश की तमाम देवियो! पुरुषोंकी बराबरी करना चाहती हो तो पहले उनके शरीर ढंकने के रिवाज में ही उनकी बराबरी में आ जाओ. पूरे कपडे में रहो. यह दीगर बात है कि तुम पूरे कपडे में भी रहोगी, तब भी उनमें से कितनों की बेधक नज़रें कपडों की उन सात सात तहों के भीतर भी जा पहुंचेंगी, जिधर आमतौर पर औरतों की नज़रें नहीं जातीं. पर यह तो नज़र और नज़रिया का मामला है. कपडों का उससे क्या लेना-देना!

Thursday, June 24, 2010

समलैंगिकता, शादी और ऑनर किलिंग

अभी समलैंगिकता पर बहस चल रही है. कानूनी मान्यता के बावज़ूद हमारा मन इसे स्वीकार नहीं कर पा रहा है. देश के लडके अब क्या करें? ऐसे ही गर्भ में या जनमते ही बेटियों को मार दिए जाने के कारण बेटियों की संख्या हज़ार लडकों पर 833 हो गई है. मां-बाप की गलती का खामियाज़ा वे भुगतेंगे कि हर हज़ार में से 167 लडके बिन ब्याहे ही रह जाएंगे. समलैंगिकता उनके लिए एक वरदान है, यह लोगों की समझ में नहीं आ रहा. हम शिखंडी जैसे महाभारत को चरित्र को भूल जाते हैं, विष्णु के मोहिनी रूप को दरकिनार कर देते हैं. द्रौपदी और उनके पांच पतियों को नकार देते हैं. आप धर्म को जितना नकारेंगे, उसके मूल रूप के साथ छेडछाड करेंगे, लोग उतने ही उसको नकारते हुए अपने लिए अलग अलग राहें बनाते चले जाएंगे. धर्म के नाम पर आखिर कबतक आप लोगों को गुमराह करते रहेंगे?

अभी दो-चार दिन पहले किसी ने यूं ही छम्मकछल्लो पर अंधेरे का तीर छोड दिया कि सुना कि उसकी बेटी ने शादी कर ली है. छम्मकछल्लो ने उन्हें समझाया कि उसकी बेटी अपने से शादी नही करेगी, क्योंकि उसे अपने मां-बाप की ओर से इसकी आशंका नहींहै कि वह जिस लडके को पसंद करेगी, वह उसके मां-बाप को पसंद आएगा कि नहीं. छम्मकछल्लो ने अपने मित्र को आश्वस्त किया कि वे घबडाएं नहीं. छम्मकछल्लो अपनी बेटी की शादी बेटी की मर्ज़ी से ही करेगी और उन्हें भी शादी में ज़रूर बुलाएगी. छम्मकछल्लो को अपनी बेती पर भरोसा है और बेटी को भी अपनी मां पर. दूसरे छम्मकछल्लो बेटी की शादी की आज़ादी में कभी कोई बाधक नहीं बनेगी. यह मां की तरफ से बेटी को उपहार है, ऑनर किलिंगका डर नहीं.

ऑनर किलिंग एक नया रूप है लोगों की आज़ादी छीनने का. हम बचपन से अपने बच्चों को उनकी इच्छा के अनुसार खाने देते हैं, पहनने देते हैं, उनको अपना कैरियर चुनने देते हैं, मगर उन्हें अपना जीवन साथी चुनने की इज़ाज़त नहीं देते. जिस जीवन साथी के बल पर उनकी पूरी ज़िंदगी की खुशहाली या बदहाली टिकी होती है, उसी पर हम कुंडली मारकर बैठ जाते हैं और सगर्व कहते हैं कि हम उनके मां-बाप हैं. छम्मकछल्लो मां-बाप के रूप में बैठे ऐसे सांपरूपी मां-बाप को सिरे से खारिज करती है और भगवान बुद्ध का पूछा सवाल ही दुहराती है कि किसी को जीवन जब दे नहीं सकते तो उसे छीनने का अधिकार तुम्हें कहां से मिल गया? मां-बाप या समाज के रूप में बैठे देश के इन सपूतों के साथ क्या सुलूक हो, देश के सपूत ही बताएं. हर बात में युवा वर्ग को ही दोषी देनेवाले ज़रा कभी इस पर सोचने की ज़हमत उठाएंगे?

अपने आप को बुद्धिमान, सयाना कहनेवाले इस देश के लोग अब क्या हर बात के लिए कोर्ट कचहरी का ही मुंह देखेंगे? क्या अदालत ही सबकुछ तय करती रहेगी? क्या हमलोग बुद्धि या सम्वेदना से बिलकुल शून्य हो गए हैं?

Sunday, June 6, 2010

क्रिश्चन हो तो क्या हुआ?

छम्मकछल्लो मुदित है, 'घर-घर देखा, एक ही लेखा' की परिपाटी से. धर्म के ठेकेदारों ने धर्म की बहुत बढिया हालत बना दी है अपने समाज मे, इस सभ्यता से भरे विश्व में. कमलेश्वर ने लिखा 'कितने पाकिस्तान'. आज ज़र्रे ज़र्रे में धर्म के ठेकेदार दीमक की तरह धर्म के तखत में इस तरह पैठ बनाए हुए है कि इंसानियत कहीं से भी अपना आसन जमा ही नही सकती.
छम्छम्मकछल्लो की एक  दोस्त है. दोस्त की एक बेटी है. बेटी के हाथ में 12वीं का रिजल्ट है. रिजल्ट के साथ छुपे हैं कई कई सपने उसकी आंखों में. उनमें से एक है, मुंबई के दो बडे संस्थानों में पढने का. दोस्त की बेटी मुतमईन है कि अगर कट ऑफ से मार्क्स कम भी हुए तो उसे कोटा में तो एडमिशन मिल ही जाएगा. मुंबई में सभी शैक्षणिक संस्थानों पर उसके खोलनेवाले धर्म, सम्प्रदाय, कम्यूनिटी की प्रधानता रहती है, जिस समुदाय द्वारा उसे खोला गया है, उसके बच्चों को कम नम्बर मिलने पर भी एडमिशन मिलने की सम्भावना प्रबल रहती है.
दोस्त की बेटी जाती है, दोनों संस्थानों में. आवेदन देती है. उसे कहा जाता है-" यू विल नॉट गेट एडमिशन हेयर."
"बट व्हाइ सर?"
"बिकॉज़, यू डोंट बिलॉंग टू माइनॉरिटी."
"बट आ'म क्रिश्चय्न सर."
"सो व्हॉट! यू आ' नॉट अ कैथोलिक."
 "सर. आ' मे नॉट बी ए कैथोलिक, बट आ'म अ क्रिश्च्न नो सर?"
दोस्त की बेटी लौट आती है मायूस होकर. उसकी आंखों में अब सपनों के बदले मायूसी है. मगर इसकी चिंता न तो धर्म के ठेकेदारों को  है और ना ही धर्म समुदाय आदि द्वारा खोले गए शिक्षण संस्थानों के ठेकेदारों को. छम्मकछल्लो बचपन से सुनती आई है कि हिन्दू धर्म में ही इतने देवी-देवता, पंथ, सम्प्रदाय होते हैं. मुस्लिम और क्रिश्चन धर्म में ऐसा कोई भेद-भाव नहीं है. छम्मकछल्लो बचपन से देखती आई है कि सभी मुसलमान एक ही भाव से ईद की नमाज़ पढने जाते हैं, एक ही भाव से मुहर्रम के ताज़िए निकालते हैं, सभी क्रिश्चन एक ही भाव से क्रिस्मस और गुड फ्राएडे मनाते हैं. सभी मुसलमान पांचो वक़्त की नमाज़ अदा करते हैं. सभी क्रिश्चन हर रविवार की सुबह के 'संडे मास' में जाते ही जाते हैं. तो फिर यह भेद-भाव कैसा? छम्मकछल्लो को बहुत बाद में पता चला कि मुसलमान में शिया-सुन्नी होते हैं और क्रिश्चन में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट्स. दोनों एक -दूसरे से खुद को बडा साबित करने पर तुले रहते हैं. शिया सुन्नी को और सुन्नी शिया को और कैथोलिक प्रोटेस्टेंट को और प्रोटेस्टेंट कैथोलिक को नफरत की निगाहों से देखते हैं. उनके बीच रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं होने देते. छम्मकछल्लो ने एक बार इद्दत पर आधारित अपनी एक कहानी "बेमुद्दत" भोपाल में आयोजित एक अनौपचारिक गोष्ठी में सुनाई. भोपाल के बडे मशहूर लेखक वहां थे. उन्होंने कहानी को सिरे से नकार दिया यह कहकर कि यह मुसलमान के पृष्ठभूमि की कहानी नहीं है. उनमें ऐसा नहीं होता. बाद में कहा कि उन्हें मुसलमान के इस कौम बोरी मुस्लिम की जानकारी नहीं है. ए पता करेंगे और तब इसके बारे में बात करेंगे."  छम्मकछल्लो ने वही कहानी पटना में अपने एक दोस्त -लेखक को दी. लेखक ने कहानी को तो नकारा ही, उन्होंने तो बोरी मुस्लिम, को ही नकार दिया यह कहते हुए कि " क्या बकवास कहानी है. और यह बोरी मुस्लिम क्या होते हैं? हम तो उनको मुसलमान मानते ही नहीं." जैसे हिन्दू धर्म के नुमाइन्दे शूद्रों को हिन्दू या मनुष्य मानते ही नहीं.
छम्मकछल्लो खुश है. धर्म-धर्म के बीच की लडाई नहीं, धर्म के भीतर की ही लडाई में हम बडे तो हम बडे, ''वो छोटा' तो 'वो घटिया", ' वो हमारे धर्म का नहीं' तो 'उसका हमारे धर्म से कोई लेना-देना नहीं" में लोग फंसे हैं. मंटो ने शिया-सुन्नी के आपसी विवादों को लेकर कई कहानियां लिखीं, दलित हिन्दुओं के खिलाफ लिखते हैं, कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट आपस में एक-दूसरे को नहीं मानते. सभी जगह धर्म की एक ही स्थिति है. वह थाली के बैगन की तरह है. जिसे जहां मर्ज़ी, वहां उसे लुढका देता है. काश कि धर्म के भी हाथ-पैर, दिल-दिमाग होते और वह एक स्वतंत्र अस्तित्व की तरह अपने बारे में अपना निर्णय ले सकता. तब शायद दोस्त की बेटी को नामांकन भी मिल जाता और छम्मकछल्लो की कहानी को कुछ सह्र्दय मुसलमान भी, खासकर मुसलमान-लेखक. मुसलमान लेखन जैसे विशेषण देते हुए छम्मकछल्लो बहुत तकलीफ महसूस कर रही है, मगर कई बार तकलीफ होते हुए भी हमें अपनी ज़बान खोलनी ही पडती है. छम्मकछल्लो के सामने उसकी दोस्त की बेटी का मायूस चेहरा है तो उसके सामने उस दोस्त का भी, जिसने अपनी 72 साला सास पर थोपे गए इद्दत की इस प्रथा पर गहरा दुख ज़ाहिर करते हुए कहा था कि अगर तुम कुछ इस पर लिख सकती हो तो लिखो.