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Thursday, February 3, 2011

मां

आज मां की बहुत याद आ रही है. उनके लिए बहुत पहले लिखी थीं कुछ पंक्तियां.
निष्ठा, ममता, दृढता, समता
अपनेपन की मूरत से
जीवन में भर गई उजाला
शक्ति, प्रेरणा, करुणा से

मां होती जब पास किसी के
शक्ति स्वरूप बन जाती है
देकर मन की सारी पूंजी
जीवन ज्योति जगा जाती है.

Friday, August 6, 2010

मां तुम काम करो!

मां तुम काम करो

खेत में, खलिहान में

स्कूल में, मैदान में,

दफ्तर में , दुकान में,

तुम्हारा काम, हमारा विश्वास

पढने का, आगे बढने का

अच्छा सीखने का, अच्छा कमाने का

तुम काम करो मां!

रोती तो पक ही जाएगी,

भात भी सिंझ ही जाएगा,

फर्श भी साफ हो ही जाएगा

जाले- धूल भी निकल ही जाएंगे

राधा मौसी, रम्भा काकी

सरला दीदी, शांति मौसी बनने से बचने के लिए

तुम काम करो मां!


होते रहेंगे विधवाघर आबाद

बनती रहेंगी यातना घर की जीवंत दास्तान

छेदते रहेंगे लोग आंखों से घर के दरवाज़े, खिडकियां

गढते रहेंगे किस्से कहानियों की झालरें, बंदनवार

हम एक समोसे, एक जामुन, एक अमरूद के लिए

ताकते रहेंगे चचेरे –ममेरे भाई-बहनों को

पडोस के चाचाओं, ताउओं को

डिवोर्सी होना इतना आसान नहीं होता मां

मेरे कल के कॉल लेटर के लिए

तुम आज काम करो मां!


किसी के सामने हाथ न फैलाने के लिए

किसी को दान देने के लिए

किसी के इलाज के लिए

किसी की मदद के लिए

किसी बच्चे को पढाने के लिए

किसी बिटिया को सजाने के लिए

किसी का घर बसाने के लिए

किसी का वर सजाने के लिए

तुम काम करो मां!


अपनी आज़ादी के लिए

चार पैसे बिना पूछे खर्चने के लिए

मनपसंद कपडे या चप्पल खरीदने के लिए

होटल बिल खुद से चुकाने के लिए

सबकुछ ठीक रहने पर भी

अपने ज़िंदा रहने के लिए

अपने होने के अहसास के लिए

तुम काम करो मां!