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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Wednesday, March 23, 2011

गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण

छम्मकछल्लो के एक मित्र ने गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण कुछ इस तरह से किया है. आप भी देखें. आपके मन में भी कुछ विचार आ रहे हों तो बताएं.


1.. सादा जीवन, उच्च विचार: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था. पुराने और मैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ों पर खानाबदोश जीवन. जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो. जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतना समर्पित कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल की भी फुर्सत नहीं. और विचारों में उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया, सो मर गया' जैसे संवादों से उसने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.
२. दयालु प्रवृत्ति: ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था. इसलिए उसने ठाकुर के सिर्फ हाथों को सज़ा दी. अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था. पर उसके ममतापूर्ण और करुणामय ह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.
3. नृत्य-संगीत का शौकीन: 'महबूबा ओये महबूबा' गीत के समय उसके कलाकार ह्रदय का परिचय मिलता है. अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदय शुष्क नहीं था. वह जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझता था. बसन्ती को पकड़ने के बाद उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जाग उठा था. उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को एक पल में पहचान लिया था. गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.
4. अनुशासनप्रिय नायक: जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्ट से नाकाम होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती. अनुशासन के प्रति अपने अगाध समर्पण को दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.
5.. हास्य-रस का प्रेमी: उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था. कालिया और उसके दो दोस्तों को मारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था. ताकि वो हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें. वह आधुनिक यु का 'लाफिंग बुद्धा' था.
6. नारी के प्रति सम्मान: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरण करने के बाद उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया. आज-कल का खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.
7. भिक्षुक जीवन: उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुद्ध द्वारा दिखाए गए भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था. रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जो भी सूखा-कच्चा अनाज मिलता था, वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था. सोना, चांदी, बिरयानी या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहीं की.
8. सामाजिक कार्य: डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों को सुलाने का भी काम करता था. सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सो जाएं. सरकार ने उसपर 50,000 रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था. उस युग में 'कौन बनेगा करोड़पति' ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रात अमीर बनाने का गब्बर का यह सच्चा प्रयास था.
9. महानायकों का निर्माता: अगर गब्बर नहीं होता तो जय और व??रू जैसे लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते. पर यह गब्बर के व्यक्तित्व का प्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.
इसे पढकर एक और मित्र की टिप्पणी:
10. महान अध्यापक : एक कुशल अध्यापक कम शब्दों में ही, अपने छात्रों से बहुत कुछ निकलवा लेता है! गब्बर जी ने तो शब्दों के बिना ही अपने शिष्यों के मुख मंडलों मे ऐसी बहतरीन भावनाओं को ला खड़ा कर दिया था! नृत्य-शास्त्र की नाज़ुक अभिव्यक्तियों के लाजवाब मिसाल मिलते हैं! भय क्या हैं ,जानिए सांभा और उसके दोस्तों से, घृणा की झलक ठाकुर से सीखिए, क्रोध और लाचारी की भावना तो 'बी' ग्रेड की छात्राओं से ही सफलता पूर्वक कर डाला था ! वाह रे गुरुजी...आप का जवाब नही.....


Monday, February 21, 2011

सौ के पौ


सौ में बहुत बडा दम है भैया. शताब्दी, सदी, सेनेटेनरी और पता नहीं क्या क्या! देव लोक में तो सुनते हैं, लोग मरते ही नहीं. अपनी माइथोलॉजी में भी लोग हज़ारो-लाखो साल जीते हैं. पर, आज कलियुग है, सौ भी खेप लिए तो बहुत बडी बात! बडे बुजुर्ग कहते हैं कि पहले खान पान, आबोहवा सब बढिया था, सो लोग जीते थे. हर पीढी को अपना समय हमेशा अच्छा लगता है, इसमें अजगुत क्या? आज की रिपोर्ट कहती है, आज औसत आयु जीने की बढ गई है.
तब लोग सौ की उम्र तक जीने की सोचते थे. अब नहीं सोचते. इतनी मंहगाई है, जितनी जल्दी टें बोलोगे, घरवालों को मंहगाई से उतनी जल्दी राहत दिलाओगे.
दुनिया पहले भी क्षणभंगुर थी, आज भी है. पहिले लोग एक चीज खरीदते थे और पीढी दर पीढी उसका इस्तेमाल करती थी. अब जमाना बदल गया है. पुरानी चीज़ों से मोह पुरातनपंथी की निशानी है. आज इंस्टैंट युग का समय है, यूज एंड थ्रो का ज़माना है, इसलिए लोग अब पुराना कुछ भी नहीं रखते, न मां-बाप, ना सरो सामान.
फिर भी सौ की महिमा बडी न्यारी है भैया. इस सौ के आंकडे पर शून्य पर शून्य बिठाते जाइए और मर्ज़ी के रईस बनते रहिए. पहिले का समय था कि सिनेमा सिनेमाघरों में हफ्ते के हिसाब से चलता था, 25 तो रजत जयंती, पचास तो स्वर्ण, साठ तो हीरक और सौ तो शतक. अब वह दिनों में चलता है. सौ दिन चल गया सिनेमाघरों में तो ट्रेड मार्केट की बडी खबर बन जाती है. क्रिकेट में भी शतक की बडी महिमा थी. अब तो खेल ही 10 ओवर तक हैं. सरकार भले पांच साल के लिए बनती है, लेकिन 100 दिन चलने पर भर भर पन्ने के समाचार छपते हैं. हनुमान चालीसा है- यह सतबार पाठ कर जोई, छूटही बंदी महासुख होई. हनुमान जी के लिए भी सौ का पहाडा बन गया. इसलिए हनुमान भक्तों के लिए भी सौ बार का पाठ है.छम्मकछल्लो को लगता है कि अब दिन में नहीं, घंटे और मिनट और सेकेंड मे सौ का हिसाब होना चाहिए. सौ मिनट की नौकरी, सौ सेकेंड का राज्य.  
आप भी सौ का पाठ कीजिए, धन से हनुमान तक, जमीन से आसमान तक, सत्ता से सम्मान तक, सौ की उम्र या सौ की गिनती तक पहुंचकर छम्मकछल्लो को बताइयेगा शतबार की महिमा. 

Sunday, February 20, 2011

पचासे में पैदा करो, बुढारी मे छेडखानी नहीं होगी!


छम्मकछल्लो बहुते खुश है. उमिर के इस पडाव पर. उमिर की वसंत की मार झेल आई बहुत पहिले. उस नई उमिर में सपना क्या देखती, सपना भरमानेवाले सबसे देह बचाती रही. अपने देश मे त देहे पर दुनिया टिका है ना. सब पाप मन से करते रहिए, देह एकदम शुद्ध रहना चाहिए. सो, चलती सडक पर तो नज़र झुका के, देह निहुरा के, बोली बानी बचा के चलती थी,  तैयो टोकारा पडिए जाता था, देह छुआइये जाता था, टिहकारी-पिहकारी पडिए जाता था. देह देखाइये जाता था. मनचलवा सब कुकुर लेखा भोंकबे करता था, आन्हर लेखा टो टो के देखने का कोशिश करता था. बुढबा लोक पोल खोलने पर बाप बन जाता था और जवान लोग भाई. भले केसव बाबा कह गए अपना उमिर के बुढियाने पर कि
      केसव असि करी का कहुं, असि करी कह्यो न जाई
      चंद्र बदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाए.
ई सभ जवान, बुढबा सबका दुख है. सबको लगता है कि जवानी का उमिर जवानी का खेल खेलने के लिए है. ईहे एगो जनम मिला है, खेल लो भाई लोगिन. सो लोग खेलते हैं. अब उससे छम्मकछल्लो सहित सभी लडकी औरत डेराई डेराई रहती हैं, असुरक्षित रहती हैं तो रहें. हम उसका ठेका लिए हैं? बल्कि बढिये है, हमारा धौंस बना रहेगा. अरे, अपना आतमा देखें, अपना मनोरंजन देखें कि सबको बहीने, भौजी कहते रहें?
लडकी सभ बहुते पिरीसान रहती है. छम्मकछल्लो भी जब उस उमिर मे थी, बहुते पिरीसान रही. बादो मे शंका संदेह जोंक लेखा चिपका ही रहा- किसी से बतिया लिए तो आफत, मुस्कुरा लिए तो मुसीबत, डीयर डार्लिंग बोल के पुकार लिए तब तो सांसत में सांसत. कोई गंगा में पैसके भी दावा करे कि उसके संगे कोनो बदसलूकीनहीं हुआ है, छम्मकछल्लो नहीं पतियाएगी.
लडकी माल मसाला शुरुए से रही है. अंग्रेजी बोलने से कोई बहुत बडका आ आधुनिक थोडे न हो जाता है. लोक कहते हैं कि जबतक भाव नहीं रहता, शब्द नहीं बनते. राक्षस की अंग्रेजी मिल जाती है, मगर कोई तनिक ब्रह्मराक्षस की अंग्रेजी बता कर बतावे. अंग्रेजी में जनी जात के लिए ऑर्गैज्म है, पर कोई तनिक हिंदी में बतावे. भाव है त शब्द है, इसलिए टिहकारी-पिहकारी से ले के छेडखानी तक बहुते पर्यायवाची शब्द है. अंग्रेजीयो मे है ईव टीजिंग’. तो जब अंग्रेजीयो पढ के ईवे टीजिंग करेंगे त काहे के आधुनिक हुए भाई?
छम्मकछल्लो खुश है कि अब उसके संगे ई सब नहीं है. 50 के पार की छम्मकछल्लो या उस जैसी उमिर की मेहरारू, जनी जात छेड छाड से बच जाती है. मेहरारू सभ भी न! उमिर बढ जाता है त सबको बेटवा, बचवा कहने लगती है. त कहिए, कोनो कैसे कुछो औरो बोले. जनी जात सभ बाबा केसव तो है नहीं कि अपनी उमिर का धक्का खा के सोग मनाए आउर हाय हाय करे. उल्टा ऊ त लोग सबको समझाने बुझाने लग जाती है, दवाई बीरो करने लग जाती है, चिंता से माथा सहलाने लग जाती है.
जनी जात की बढती उमिर का ईहे एगो फायदा है. ए बहिनी लोगिन. इसका सुख उठाइए. छम्मकछल्लो तो ईहो दरयाफ्त करती है ऊपरवाले से कि ऊ हम औरत लोग को सीधे 50 की उमिर में ही पैदा करे. बच्चे से छेडखानी, बलात्कार, संदेह, ताने सबसे बच तो जाएंगे ना.    

Friday, February 11, 2011

थिएटर की भाषा में प्रस्तुत नाटक “मैं कृष्णा कृष्ण की”


पिछले दिनों विभा रानी लिखित व अभिनीत एकपात्रीय नाटक मैं कृष्णा कृष्ण कीका मंचन मुंबई के सुप्रसिद्ध काला घोडा आर्ट फेस्टिवल, 2011 के तहत नैशनल गैलरी ऑफ्र मॉडर्न आर्ट के सभागार में किया गया. मिथक और मिथकीय पात्र अपने समय के साथ साथ आज भी प्रासंगिक हैं. यही कारण है कि आज भी मिथकीय चरित्रों को लेखक, कलाकार आदि अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते रहे हैं. इन चरित्रों की वर्तमान प्रासंगिकता कहती है कि भले ही आज हम अपने आपको आधुनिक कहलाने का दम्भ भर लें, सच तो यह है कि हम आज भी अपनी पुरानी सोच की जंजीरों से जकडे हुए हैं.
मैं कृष्णा कृष्ण कीद्रौपदी और कृष्ण के सखा भाव पर आधारित नाटक है. महाभारत की पात्र द्रौपदी जीवन भर अनेक तरह के उथल पुथल का शिकार रही. उसे तथाकथित धर्म के नाम पर बार बार बलि होना पडा, अपनी इच्छा के विरुद्ध सभी काम करने पडे. द्रौपदी को उसके सांवले रंग के कारण कृष्णा की संज्ञा दी गई. वह कृष्ण से प्रेम करती है और उससे विवाह करना चाहती है. परंतु धर्म का वास्ता दे कर कृष्ण उसे अर्जुन से विवाह करने को कहते हैं. विधि के वशात उसे अर्जुन सहित अन्य चारो भाइयों से भी विवाह करना पडता है जो उसे जीवन भर सालता है. धर्म के नाम पर अपने साथ हो रहे विविध व्यवहार से व्यथित वह नाना प्रश्न कृष्ण के सम्मुख रखती है. अंतिम प्रयाण पर कृष्णा अपने पतियों के साथ है. जिन पतियों के लिए उसने जीवन भर तरह तरह के दुख झेले, वे ही उस पर विभिन्न आरोप लगाकर उसे वहीं छोड आगे निकल जाते हैं.
अपनेअस्तित्व व व्यक्तित्व के लिए साकांक्ष द्रौपदी सीता की तरह मूक भाव से धरती में नहीं समाती, बल्कि नारी सशक्तिकरण का दृढ स्वर बनकर उभरती है. नाटक आज भी स्त्रियों को एक उपभोग की वस्तु के रूप में दिखाए जाने को रेखांकित करता है. स्त्री और पुरुष के बीच की मित्रता को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है. आज भी स्त्री को भोग्या या वस्तु, कमज़ोर और कमतर समझा जाता है और दूसरी ओर उसे अपमानित करके अपनी विजय का पर्व भी मनाया जाता है. बदला लेने और अपनी वासना मिटाने के लिए आज भी उसे बलात्कृत और निर्वस्त्र किया जाता है.

एकपात्रीय नाटक की प्रस्तुति अत्यंत चुनौती और जोखिम से भरी होती है. पूरे समय पर मंच पर अकेले स्वयं को प्रस्तुत करना और नाटक में आए सभी चरित्रों को उसके स्वरूप, स्वर व प्रस्तुति से साकार करना और इससे भी बढकर दर्शकों को पूरे समय बांधे रखना बहुत कठिन होता है. विभा ने इस कठिनतम चुनौती को स्वीकार किया और द्रौपदी के मूल चरित्र के अतिरिक्त आए अन्य स्त्री पात्रों सहित पुरुष पात्रों, यथा द्रुपद, युधिष्ठिर, अर्जुन और कृष्ण के रूप को अपने अभिनय, भाव भंगिमा, मुद्राओं तथा स्वर के साथ साकार किया. सम्वाद अदायगी में विभा ने अपना लोहा मनवा लिया. कमर्शियल नाटकों के बोझ से कराहती मुंबई में इस तरह के नाटक तपती रेत पर पानी की धार हैं.
नरेंद्र रावल की प्रकाश व्यवस्था मंच, नाटक और कृष्णा के विभिन्न मूड्स को दर्शाने में सफल रहा. क्रोध, प्रेम, घृणा, भय, वीभत्सता के सभी भाव के साथ प्रकाश संयोजन नाटक को प्रभावी बनाता रहा. संगीत के रूप में मुख्यत: बांसुरी का प्रयोग किया गया व सहायक के रूप में वीणा और ढोल का, जो कृष्णा के मूड्स को उजागर करने में सफल हुए.
हिंदी और मैथिली की लेखक व नाट्यकार विभा विगत 24 सालों से थिएटर से जुडी हुई हैं. दुलारीबाई,’, सावधान पुरुरवा’, पोस्टर’, मि. जिन्ना उनके अभिनीत कुछ नाटक हैं. मि. जिन्ना में वे सचमुच जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना का अहसास दिलाती हैं. एकपात्रीय नाटकों के लेखन व अभिनय में विभा ने अपनी क्षमता दर्शाई है. उनके अन्य लिखित व अभिनीत एकपात्रीय नाटक हैं- लाइफ इज नॉट ए ड्रीम, बालचंदा’, बिम्ब-प्रतिबिम्ब और अब मैं कृष्णा कृष्ण की”. “रंग जीवनके दर्शन के साथ विभा ने थिएटर को वंचित तबके के बीच अभिव्यक्ति के माध्यम के साथ साथ कॉर्पोरेट प्रशिक्षण से जोडा है. थिएटर के माध्यम से वे जेल बंदियों के साथ थिएटर कार्यशालाएं नियमित रूप से करती हैं. मिथिला के लोक गीतों व लोक कथाओं पर उनके नाटक हैं.
मैं कृष्णा कृष्ण कीनाटक का निर्देशन किया है बॉम्बे कण्णन ने. तमिल थिएटर व टीवी से पिछले 30 से भी अधिक सालों से जुडे बॉम्बे कण्णन का यह पहला हिंदी नाटक है. बॉम्बे कण्णन का हिंदी और विभा का तमिल न जानते हुए भी थिएटर की भाषा पर विश्वास ने चेन्नै, तमिलनाडु  की धरती से इस अद्भुत प्रस्तुति को जन्म दिया. कहा जा सकता है कि यह उनका और विभा का उत्तर और दक्षिण के रंगमंच को संगमित करने का प्रयास है. तमिल क्लासिक साहित्य व तमिल लोक कथा व लोक कला को समर्पित बॉम्बे कण्णन तमिल क्लासिक साहित्य को ऑडियो विजुअल के माध्यम से लोगों के समक्ष ला रहे हैं. 
प्रस्तुति: नरेंद्र  

Thursday, February 3, 2011

मां

आज मां की बहुत याद आ रही है. उनके लिए बहुत पहले लिखी थीं कुछ पंक्तियां.
निष्ठा, ममता, दृढता, समता
अपनेपन की मूरत से
जीवन में भर गई उजाला
शक्ति, प्रेरणा, करुणा से

मां होती जब पास किसी के
शक्ति स्वरूप बन जाती है
देकर मन की सारी पूंजी
जीवन ज्योति जगा जाती है.

Thursday, January 27, 2011

धर्म ही ना हुआ तो जियेंगे कैसे साल के 365 दिन ?


मांगिए मांगिए, साल के 365 दिन को राष्ट्रीय पर्व घोषित करने की मांग कीजिए. मांगने में क्या जाता है? मांगने का मतलब यह थोडे ना है कि मिल ही गया. हमारे पास मुद्दे हैं नहीं. मुद्दे तो वैसे देश में बहुत हैं, भूख, गरीबी, गुंडागर्दी से लेकर बेरोजगारी, भाषा, संस्कृति, नीति, ईमानदारी और पता नहीं क्या क्या? मगर ये सब स्थाई मुद्दे हैं, इतने कि मुद्दे बदल कर मुर्दे हो गए हैं. मुर्दे से एक दिन का प्रचार मिल सकता है, स्थाई नहीं. संत भाव से काम करनेवाले पर प्रेस और मीडिया कभी कभार मेहरबानी करते हुए उस पर दो चार लाइन लिख देता है. मगर देखिए, अगर कोई किसी को मार दे, छेड दे, हत्या कर दे, नंगा कर दे, रेप कर दे तो कितने कितने दिन तक वह खबरों के केंद्र में रहता है. महसूस कर रहे हैं न?
एक नेता जी ने कहा कि उनके यहां का एक स्थानीय पर्व अब राष्ट्रीय पर्व का रूप लेता जा रहा है, क्योंकि स्थानीय लोग देश भर में रहते हैं. पहले पर्व अपने मन, भाव, घर की शुद्धि और बाल बच्चों के कल्याण के भाव से किया जाता था. अब वह माइलेज के लिए किया जाता है. नेताओं को पता होता है कि उनकी बात लोग सुने ना सुने, प्रेस और मीडिया ज़रूर सुनता है, इसलिए वे सुनाते हैं. प्रेस और मीडिया सुनता है,.
छम्मकछल्लो आनंद में आ गई. पर्व त्योहार प्रधान देश में ये सब मांगें बिलकुल जायज हैं. धर्म ही ना हुआ तो जियेंगे कैसे? धर्म अफीम है और इसकी पिनक में रहना ज़रूरी है. राज, व्यवस्था, जनता चाहे भाड में जाए.
छम्मकछल्लो को दुख है कि साल में 365 दिन ही क्यों हैं? 730 दिन क्यों नहीं? 365 दिन तो कम पड गए हैं दिवस मनाते मनाते. दिन की तंगी के कारण एक दिन में कई-कई पर्व, त्योहार, समारोह मनाने पडते हैं. दिन की महत्ता एक दूसरे के ऊपर चढ बैठती है. ताकतवर की बात ऊपर आ जाती है. कितने लोगों को याद रहता है कि 2 अक्तूबर को शास्त्री जी भी पैदा हुए थे? . छम्मकछल्लो को दिन की कमी पर दया आती है. वह सभी को सलाह देना चाहती है कि मांगना ही है तो 365 से कम से कम दूना 730 दिनों का साल मांगिए, ताकि अपने सभी राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, घरेलू, मोहल्ले और घर विशेष के भी सभी पर्व त्योहारों को राष्ट्रीय पर्व मान लिया जाए. जितने पर्व, उतने अवकाश. काश कि साल के सभी 365 दिन अवकाश रहते. कितना मज़ा आता, घर बैठे ही तनख्वाह मिलती रहती. दफ्तर आने जाने की किच किच से छुट्टी. इसलिए हर दिन एक त्योहार घोषित कीजिए सार्वजनिक अवकाश की मांग भी कीजिए. अवकाश मिले ना मिले, नाम तो मिलेगा न!

Monday, January 24, 2011

50 पैसे के नीचे का सपना खाक खाक़!

डॉलर प्राइस की तरह हरेक माल साढे छह आना. दुकानदार का गाना-रिझाना- “हरेक माल साढे छह आना, बच्चा के खिलौना साढे छह आना, घरनी की कडाही साढे छह आना, झूम झूम के ले जाना, बहिया हमरे, भूल न जाना, ओ भौजी मोरी याद दिलाना.” एक रुपया में दस सेर दूध. एक रुपैया में बीस सेर बैगन. पांच पैसा में भर पेट मूढी कचरी, दस पैसा में चांद जैसा नारियल का टुकडा. चार आना में भर पेट पूरी जिलेबी. दस रुपैया में बढिया सूती साडी. सोना डेढ सौ रुपए में 1तोला, सौ रुपए में ब्याह में चढाने  लायक बनारसी साडी. आपको क्या लगता है? कोनो मजाक? नहीं भाई, छम्मकछल्लो ई सब अपने बचपन की बात बता रही है. बहुत बूढी भी नहीं हुई है.
तीसरी क्लास में स्कॉलरशिप मिला था उसको. 6 रुपिया महीना के हिसाब से 72 रुपिया. छात्र का दस्तखत ज़रूरी था. छम्मकछल्लो को बुलाया गया. छम्मकछल्लो ने अपनी प्रिंसिपल मां से पूछा, “हमको पैसा मिल रहा है ना?” मां हंस पडी. छम्मकछल्लो लाड लडाती बोली-“हमको भी इसमें से चाहिये. आखिर ई हमारा पैसा है.”
मां को भी हंसी सूझी- “बोलो, कितने चाहिये?”
छम्मकछल्लो मुश्किल में पड गई. हिसाब लगाया, 3 पैसे में भर फ्रॉक मूढी और एक कचरी (दाल वडा). 5 पैसे में उससे भी अधिक मूढी और दो कचरी. 10 पैसे में मूढी कचरी के साथ दो झिल्ली भी. 25 पैसे में तो इन सबके साथ कच भी या दाल भर की दो पूरियां और आलू दम. उसके साथ एक जिलेबी भी. वह सब मन ना हो तो 25 पैसे में चार रसगुल्ले. या एक समोसा और एक रसगुल्ला या एक खीर कदम. या 10 पैसे में नारियल का एक बडा सा टुकडा और एक ठोंगा मूंगफली. इतनी सारी चीज़ें तो 25 पैसे में ही आ जाती हैं. तो वह मां से कित्ते पैसे मांगे. उसकी कल्पना का विस्तार इतना हो गया कि वह अकसक हो गई. अगर इतना सब केवल 25 पैसे यानी चार आने में मिल जाता है तो आठ आने में? छम्मकछल्लो की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. उसने बडे सहमते और घुटकते हुए मां से कहा, ”आठ आना”. मां फिर हंस पडी.
छम्मकछल्लो उस अठन्नी को बहुत दिन तक सहेज कर रखे रही. उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह इत्ते सारे पैसे का करे क्या?
हाल में छम्मकछल्लो ने अखबार में पढा कि 50 पैसे के नीचे के सिक्कों की वैधता अब रद्द कर दी जाएगी. छम्मकछल्लो को गहरा धक्का लगा. इन पैसों की वैधता रद्द होने से नहीं, अपने जिए हुए पलों की ज़िंदगी खतम हो जाने से. आगे आनेवाली पीढी क्या समझ पाएगी एक पैसे, दो पैसे, तीन, पांच और दस पैसों का मोल? चार आने में पूरा मेला घूम आने का उत्साह! क्या करें! मंहगाई तो जान मार ही रही है, व्यवस्था भी हम आम आदमी के आम सपनों और यादों को जीवित नहीं रहने दे रही. "मोरे सैयां तो खूब ही कमात है, मंहगाई डायन खाए जात है."