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Monday, June 30, 2014

उपन्‍यास और शीर्षक का संबंध!

छम्मकछल्लो ने एक व्यंग्य 'बिंदिया' को भेजा। जुलाई, 2014 के अंक मे छप गया। देखिये तो इसकी संपादक का कमाल!। झेल लिया व्यंग्य हँसते-हँसते! आप भी झेलिए। क्या कीजिएगा! मन हो तो कहिएगा। व्यंग्य की एकाध धार आप पर भी छोड़ दी जाएगी।
उपन्‍यास और शीर्षक का संबंध- एक-दूजे के लिए!

हे मेरे मन की गीतिके! हे मेरे दिल की प्रीतिके। हे विचारों की रंजिके! हे रिवाजों की भंजिके!
तुम्‍हारे लिए मेरे मन में बड़ा मीत-भाव है! दिल में बड़ा प्रीत भाव है। ऊपर की पंक्तियों से साफ हो  गया होगा। सो, नो रिपीटीशन।
       सुना है, तुम उपन्‍यास लिख रही हो! वह भी एक नहीं, दो-दो। गज्जब्ब यार, गज्जब्ब! अरे, हमको ये तो पता है कि तुम जगजगाती, चिलचिलाती धाकड़ लेखिका हो। आग उगलती हो आग- कहानी से लेकर किसी की किर्रकिरी खींचने तक, साहित्‍य से लेकर फेसबुक तक, स्‍त्री से लेकर दलित तक, मजदूर से लेकर सिनेमा तारक और तारिकाओं तक –तुम सब पर लिखती हो – बिंदास, बेधड़क, बेबाक!

तुम्‍हारे ढेरों प्रशंसक हैं, हे प्रशंसिके! तुम्‍हारी एक-एक रचना और एक-एक बात और विचार से तुम्हारे  प्रशंसकों की प्रशंसा के बरगद झूम जाते हैं, हे झूमिके! तुम्‍हारे एक फेसबुक स्‍टेटस पर लाइकों और कमेंटों की सूनामी, कोसी, उत्‍तराखंड सभी आ जाते हैं, हे सुनामिके!
हे नीति नियामके! कहते हैं, तुम्हारे माप-डंडों की अपनी रीति-नीति हैं और इस नीति के तहत तुम अपने आलोचकों का मुंह साम, दाम, दंड, भेद, नेग, नाद सभी से बंद कर देती हो।
      फिर भी इसमें दो राय नहीं है हे मेरे मन की मीतिके, कि तुम लिखती खूब हो! इतना कि मेरे मन में तुम्हारे लेखन के लिए एक गीत की पैरोडी बन गई। सभी की अपनी अपनी औकात है- तुम्हारी वह, मेरी यह!  
                        क्‍या खूब लिखती हो,
                        बड़ी सुंदर लिखती हो।
मुझे पता है, तुम इस पर कहोगी हे सुंदरिके!  
                        ‘फिर से कहो, कहती रहो
                              अच्‍छा लगता है,
                              जीवन का हर सपना
                              अब सच्‍चा लगता है।
इसी सपने को सुना, तुम फिर हकीकत में बदल रही हो हे स्‍वप्निके! सपने मुझे भी आते हैं। इसी सपने में एक दिन, हाँ, आजकल मैं रात में सो नहीं पाती, सो दिन में ही....! दिवास्वप्न! हाँ, देखा कि तुम उपन्‍यास लिख रही हो, वह भी एक नहीं, दो-दो। बाप रे बाप! मेरा तो गला बैठ गया, हलक सूख गया, पसीना छलक आया, बुखार चढ़ आया- एक साथ दो-दो उपन्यास! क्या खा-पी के या पी-खा के तुम लिखती हो, हे पेयकी! 
      तुम बहुत व्‍यस्‍त रहती हो, क्योंकि तुम औरत हो! मैं ये नहीं कहती कि मर्द व्यस्त नहीं होते। वे तो ज़्यादा व्यस्त रहते हैं। अब उनकी व्यस्तता न गिनवाओ! ऐसे ही वे सब कहते हैं कि हम औरतें उनकी कमियाँ निकालती रहती हैं। बस, जान लो कि वे व्यस्त रहते हैं! व्यस्तता की डिटेल्स कभी उन्हीं से मिल-बैठकर ले लेंगे। न हुआ तो कोई इंटरव्यू ही कर लेंगे हे, साक्षात्कार-कारिके!
तुम औरत हो, इसलिए, औरतों के साथ उसका घर, परिवार, बाल-बच्‍चे त्‍वचा में रोम की तरह बसे  रहते हैं। इन पर कभी वैक्सिंग करा लो तो भी क्‍या! वैक्सिंग है तो अननैचुरल और टेम्‍पररी ही न! फिर नौकरी है, लेखन है, लोगों और लेखन बिरादरी से मेल-जोल, राग-द्वेष, उठा-पटक है।
फिर भी, इन व्‍यस्‍तताओं के बीच भी तुम उपन्‍यास लिख रही हो, हे व्‍यस्तिके! तुम्हीं क्या, सभी लिख रहे और रही हैं। कहते हैं कि हिन्दी में उपन्यास लिखे बिना आप हिन्दी के साहित्यकार कहला ही नहीं सकते/ती। सब लिख रहे हैं और मेरी सरस्वती पर मंथरा बैठी हुई है। या हो सकता है, यह मेरा खयाली पुलाव हो! सरस्वती ही नहींहै, तो मंथरा हो या पूतना, कौन आएगी और कौन बैठेगी! इसलिए, मेरा मन-मयूर चैन-बेचैन है। वह नाचना चाहता है – पंख पसार-पसार कर कहना चाहता है कि हां, मैं भी उपन्‍यास लिखने की सोच रही हूं। आखिर मैं भी हिन्दी की अमर साहित्यकार कहलाना चाहती हूँ! आप सब यकीन कीजिये! सब तैयार है- प्‍लॉट भी, शैली भी, ट्रीटमेंट भी! ‘साकी भी है, शाम भी, उल्फत का जाम भी’ की तरह! यहां तक कि शीर्षक तो पहले से ही तैयार है। वह भी, एक नहीं, दो-दो उपन्‍यासों के। आप मानें या न मानें, मेरा वैसे मानना है कि चूंकि शीर्षक मेरे पास है, सो उपन्‍यास मेरे पास है। कोई मामूली बात है शीर्षक लिखना! आप बड़े धाकड़ लेखक होंगे, लेकिन बिना कथा, उपन्यास के शीर्षक लिखकर दिखाओ! हम अपनी शीर्षक लिखने की परंपरा ही तज देंगे।
मुझे पूरा यकीन है, हे यकीनिके कि तुम्‍हारे पास अभी तक अपने उपन्‍यासों के शीर्षक नहीं होंगे। समझीं न हे शीर्षके! तुम तो अभी उपन्‍यास लिखने में व्‍यस्‍त हो। दरअसल, मजदूर और रईस में यही तो फर्क होता है। मजदूर रुके बिना काम करता जाता है, रईस पलक के एक बाल भर से काम निकाल लेता है। निस्‍संदेह तुम मेहनतकश वर्ग से खुद को कहलाना पसंद करोगी हे, मजूरिके! हिंदी के लेखक अमीर होने की नहीं सोचते। सोचते ही गिल्‍ट में मरने लगते हैं। किसी को तनिक रॉयल्टी मिल गई तो सभी उसे पूंजीवादी मान कर उसकी सीवान-बखिया उधेड़ने लगते हैं। इसलिए पिछले पचासों बरस से हिंदी लेखक कलम के मजदूर बने रहते हैं। हल-फाल, ईंट-पत्‍थर के मजूरों को दिन-भर मजूरी के बाद दिहाड़ी मिलती है। हिंदी के कलम के मजूरों को अभी तक तथाकथित भविष्यकालीन मजूरी का झुनझुना भर दिखाया जाता है। प्रकाशकों और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशकों सम्‍पादकों की कोठियां बन जाती हैं। सेकेंड क्‍लास के बदले वे हवाई यात्रा करने लगते हैं, धर्मशालाओं के बदले पांचताराओं में ठहरने लगते हैं, लेकिन लेखकों को असली रॉयल्‍टी या सही पारिश्रमिक देते समय वे सदा बजट का रोना रोने लगते हैं। यह बात कला के हर क्षेत्र में है। लेखन के साथ रंगकर्म भी इसी का रोना रो रहे हैं। रोने के लिए भी ताकत चाहिए और ताकत के लिए दो रोटी, जिसे देने में सभी अपने रोटी और ताकत का रोना रोने लगते हैं।
अपन तनिक रईस किस्‍म के लेखक हैं, इसलिए बहुत ज्‍यादा काम नहीं करते। तुम्‍हें बता दें कि उपन्‍यास तो हम भी लिख रहे हैं। आखिर, कई पंचवर्षीय योजनाओं के बीच में हमने अपने दोनों उपन्‍यासों के शीर्षक लिख ही लिए हैं न!
अब चलो, कुछ काम की बातें कर लें। मैं तुम्‍हें एक शीर्षक दे देती हूं, और तुम एक उपन्‍यास मुझे दे दो। कितना अच्‍छा है, बैठे-बिठाए तुम्‍हें शीर्षक मिल गया! कोई मेहनत नहीं, कुछ मगजमारी नहीं। शीर्षक तो ताज है, कोहिनूर है, हिमालय है, हर किसी के बस का नहीं लिखने से पहले शीर्षक सोच लेना। मजूर लोग लिखते पहले और शीर्षक बाद में खोजते हैं जो बाबा जी के बेल में कांटों की तरह उगता है। हम जैसा साध्‍य लेखक शीर्षक पहले सोचते ही नहीं, रजिस्‍टर्ड करा लेते हैं। यह गुप्‍त ज्ञान है और गुप्‍त धन भी!

तुम मेरे भाव की भाविके हो, इसलिए हम अपनी सहायता के मोती का राजहंस बिन मांगे तुम्‍हें देने को तैयार हैं- अपना यह गुप्‍त ज्ञान और गुप्‍त धन दोनों, क्‍योंकि तुम्‍हारी कलम- मजूरी पर हमें नाज है हे नाजिनी! इसलिए, आओ और एक शीर्षक ले लो। मेरा दावा है, इस शीर्षक से तुम उपन्‍यास जगत की शीर्षस्‍थ बन जाओगी! नहीं बनी तो मेरे नाम पर कुत्‍ता.... नहीं, कोई चिडि़या पोस लेना! दिन रात चहचहाकर वह तुम्‍हारा मन खुश करेगी और इसके आगे भी कई उपन्‍यास लिखने, उन्‍हें छपाने, उन्‍हें प्रचारित करने, उनपर समीक्षाएं लिखवाने, चर्चाएँ करवाने की प्रेरणा देती रहेगी। मेरा भी वादा है कि तुम्‍हारे हर दो उपन्‍यास के लिए मेरे पास दो शीर्षक रहेंगे। लेन-देन जारी रहे, इसलिए, तुम लिखती जाओ और खुश होती जाओ कि तुम्‍हारे पास बिना मेहनत के शीर्षक आते जाएंगे – हे खुशिके! हे शीर्षके! हे उपन्‍यासिके! रूकोगी नहीं न साधिके!!! ###

Wednesday, June 26, 2013

जो तेरा है वो मेरा है

बहुत दिन बाद मुखातिब हो रही हूँ। "बिंदिया" के जून 9, 2013 के अंक में छापे व्यंग्य के साथ। देखें और विचार दें। लिंक और लेख है- http://bindiya.net.in/story/95/8

जो तेरा है वो मेरा है

जो तेरा है वो मेरा है
विज्ञापन बड़ा जानदार, शानदार, वजनदार, दमदार होता है और मददगार भी। नेता लोग विज्ञापन करते हैं, जीत जाते हैं। अभिनेता लोग जिसका विज्ञापन करते हैं, लोग उसी का इस्तेमाल करने लगते हैं। चाहे साबुन हो कि बनियान, पोलियो ड्रॉप हो कि आधार कार्ड, विज्ञापन की मदद और विज्ञापन के मददगार। मान गए ना हमारे गुलफाम। पर दुनिया ऐसी हरजाई है कि सभी लोग विज्ञापन की सभी बातें नहीं मानते। वे तुरंत कहते हैं - मेरे लिए सोचने वाले आप कौन? इसलिए टैक्स भरने, धूम्रपान न करने, सड़क को शौचालय न समझने जैसे समझदार विज्ञापन पर सभी अपनी-अपनी समझदारी दिखाते हुए उसे अपने दिल-दिमाग से चलता कर देते हैं। मतवारी नार मस्त-मस्त हुई जाती है अपनों की ऐसी अपनत्व भरी समझदारी पर। सही है, हमारे पास अपना दिमाग है कि नहीं?

अभी कुछ दिनों से विज्ञापन चल रहा है- ‘जो तेरा है वो मेरा है, जो मेरा है वो तेरा है’। नई उम्र के बच्चे- नाचते-गाते-झूमते। दुनिया और दुनियादारी की चिंताओं से बेफिक्र- इतने कि मतवारी नार का भी जी लपलपाने लगता है- ‘ना पैसों की चिंता, ना फिकर है चावल-दाल की।’ (विज्ञापनवाले बच्चे खाते-पीते घर के हैं ना!) सच पूछिए तो मतवारी नार खो जाती है इनमें। इतना कि उसके मन में उठ रहे सवालों के बगूले भी बगुले बनकर उड़ जाते हैं- दूर गगन की छांव में- पइयां-पइयां करते, गाड़ी में नाचते, एक-दूसरे को चिढ़ाते! मतवारी नार की मूढ़मति में नहीं आता कि देश भले ‘वसुधैवकुटुंबकम’ वाला हो, पर इस देश में ‘जो तेरा है वो मेरा है’ कैसे हो सकता है भाई, पागल हो गए हैं क्या सब? नहीं समझे? मतवारी नार भी तो नहीं समझ पा रही है इस गूढ़ प्रश्न को। इसलिए वह ‘जो तेरा है वो मेरा है’ पर अपनी लिस्ट बनाकर आपसे मदद मांग रही है- ‘आप हां या ना की टिक लगाते जाएं।’

♦ये सारे कपड़े, गहने, जूते-चप्पल और अपने साजो सामान, जो बड़ी पसंद से तूने खरीदे हैं, मेरे हुए ना यार!
♦ ये तेरे सन-ग्लासेस, आई पॉड, नया मोबाइल, लैपटॉप, ब्ला-ब्ला-ब्ला- सारे गैजेट्स - आज से तेरे नहीं, अभी से ये मेरे हुए। है ना?

♦ यह घर तेरा है, इसलिए मेरा है। सो लिख अपना घर- मेरे नाम!

♦ तेरी मां- मेरी मां! ठीक? तो बोल इस मां से कि अपने प्यार भरे ममता का सारा जेब-खर्च मेरे हवाले कर दे।

♦ तेरा बाप- मेरा बाप! ठीक? तो बोल इस बाप से कि मेरी पढ़ाई का बोझ उठा ले- सारा का सारा।

♦तेरी बहन- मेरी बहन! ठीक? तो बोल बहन से कि मेरे पर भी तेरे जित्ता ही प्यार का स्वेटर बनाए।

♦ तेरा भाई- मेरा भाई! ठीक? तो बोल ना भाई से कि अपनी संपत्ति में से मुझे भी हिस्सा दे दे यार!

♦ तेरे बच्चे- मेरे बच्चे! ठीक? तो बोल उनसे कि मुझे भी वह अंकल-आंटी के बदले मम्मी-पापा बुलाएं।

♦ तेरी बीबी- मेरी बीबी! ठीक? तो बोल कि मुझे भी वह अपना स्वामी मान मुझ पर अपनी जान निछावर करे।
♦ तेरा मियां- मेरा मियां! ठीक? तो बोल कि ‘हमें तुमसे प्यार कितना’- सुनाए। वैसे गारंटी है कि तुझे भी नहीं सुनाया होगा।

आईला! वो देखो! खिंच गई तलवार! हो गए सब धार-धार! बह रहा है उसमें ‘जो तेरा है वो मेरा है’ का भावनात्मक ज्वार! मतवारी नार के पास ये सब कुछ नहीं है। उसके पास तो एक ही चीज है, बड़ी धांसू सी - वही वह देगी आपको, जब आप उससे कहेंगे- ‘जो तेरा है वो मेरा है।’ वह चीज है - इंकार! इंकार!! इंकार!!! आइला! यकीन नहीं हुआ? जरा मांग के तो देख! बड़ा आया बोलनेवाला- ‘जो तेरा है वो मेरा है।’

Wednesday, March 23, 2011

गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण

छम्मकछल्लो के एक मित्र ने गब्बर सिंह का चरित्र चित्रण कुछ इस तरह से किया है. आप भी देखें. आपके मन में भी कुछ विचार आ रहे हों तो बताएं.


1.. सादा जीवन, उच्च विचार: उसके जीने का ढंग बड़ा सरल था. पुराने और मैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, महीनों से जंग खाते दांत और पहाड़ों पर खानाबदोश जीवन. जैसे मध्यकालीन भारत का फकीर हो. जीवन में अपने लक्ष्य की ओर इतना समर्पित कि ऐशो-आराम और विलासिता के लिए एक पल की भी फुर्सत नहीं. और विचारों में उत्कृष्टता के क्या कहने! 'जो डर गया, सो मर गया' जैसे संवादों से उसने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला था.
२. दयालु प्रवृत्ति: ठाकुर ने उसे अपने हाथों से पकड़ा था. इसलिए उसने ठाकुर के सिर्फ हाथों को सज़ा दी. अगर वो चाहता तो गर्दन भी काट सकता था. पर उसके ममतापूर्ण और करुणामय ह्रदय ने उसे ऐसा करने से रोक दिया.
3. नृत्य-संगीत का शौकीन: 'महबूबा ओये महबूबा' गीत के समय उसके कलाकार ह्रदय का परिचय मिलता है. अन्य डाकुओं की तरह उसका ह्रदय शुष्क नहीं था. वह जीवन में नृत्य-संगीत एवंकला के महत्त्व को समझता था. बसन्ती को पकड़ने के बाद उसके मन का नृत्यप्रेमी फिर से जाग उठा था. उसने बसन्ती के अन्दर छुपी नर्तकी को एक पल में पहचान लिया था. गौरतलब यह कि कला के प्रति अपने प्रेम को अभिव्यक्त करने का वह कोई अवसर नहीं छोड़ता था.
4. अनुशासनप्रिय नायक: जब कालिया और उसके दोस्त अपने प्रोजेक्ट से नाकाम होकर लौटे तो उसने कतई ढीलाई नहीं बरती. अनुशासन के प्रति अपने अगाध समर्पण को दर्शाते हुए उसने उन्हें तुरंत सज़ा दी.
5.. हास्य-रस का प्रेमी: उसमें गज़ब का सेन्स ऑफ ह्यूमर था. कालिया और उसके दो दोस्तों को मारने से पहले उसने उन तीनों को खूब हंसाया था. ताकि वो हंसते-हंसते दुनिया को अलविदा कह सकें. वह आधुनिक यु का 'लाफिंग बुद्धा' था.
6. नारी के प्रति सम्मान: बसन्ती जैसी सुन्दर नारी का अपहरण करने के बाद उसने उससे एक नृत्य का निवेदन किया. आज-कल का खलनायक होता तो शायद कुछ और करता.
7. भिक्षुक जीवन: उसने हिन्दू धर्म और महात्मा बुद्ध द्वारा दिखाए गए भिक्षुक जीवन के रास्ते को अपनाया था. रामपुर और अन्य गाँवों से उसे जो भी सूखा-कच्चा अनाज मिलता था, वो उसी से अपनी गुजर-बसर करता था. सोना, चांदी, बिरयानी या चिकन मलाई टिक्का की उसने कभी इच्छा ज़ाहिर नहीं की.
8. सामाजिक कार्य: डकैती के पेशे के अलावा वो छोटे बच्चों को सुलाने का भी काम करता था. सैकड़ों माताएं उसका नाम लेती थीं ताकि बच्चे बिना कलह किए सो जाएं. सरकार ने उसपर 50,000 रुपयों का इनाम घोषित कर रखा था. उस युग में 'कौन बनेगा करोड़पति' ना होने के बावजूद लोगों को रातों-रात अमीर बनाने का गब्बर का यह सच्चा प्रयास था.
9. महानायकों का निर्माता: अगर गब्बर नहीं होता तो जय और व??रू जैसे लुच्चे-लफंगे छोटी-मोटी चोरियां करते हुए स्वर्ग सिधार जाते. पर यह गब्बर के व्यक्तित्व का प्रताप था कि उन लफंगों में भी महानायक बनने की क्षमता जागी.
इसे पढकर एक और मित्र की टिप्पणी:
10. महान अध्यापक : एक कुशल अध्यापक कम शब्दों में ही, अपने छात्रों से बहुत कुछ निकलवा लेता है! गब्बर जी ने तो शब्दों के बिना ही अपने शिष्यों के मुख मंडलों मे ऐसी बहतरीन भावनाओं को ला खड़ा कर दिया था! नृत्य-शास्त्र की नाज़ुक अभिव्यक्तियों के लाजवाब मिसाल मिलते हैं! भय क्या हैं ,जानिए सांभा और उसके दोस्तों से, घृणा की झलक ठाकुर से सीखिए, क्रोध और लाचारी की भावना तो 'बी' ग्रेड की छात्राओं से ही सफलता पूर्वक कर डाला था ! वाह रे गुरुजी...आप का जवाब नही.....


Monday, October 19, 2009

'आ'एम हैप्पी'

http://rachanakar.blogspot.com/2009/09/blog-post_30.html
'आ'एम हैप्पी' किसी भी भाषण की बड़ी अच्छी शुरूआत है। हर समारोह में अतिथि वक्ता यह जरूर कहते हैं कि 'आ'एम हैप्पी' । आय एम हैप्पी कि मुझे आप लोगों ने यहाँ बुलाया। आए एम हैप्पी कि मुझे आप सबसे मिलने का मौका मिला। आएम हैप्पी कि मुझे आप सबसे बातें करने का, आप सबको जानने समझने का मौका मिला।
आयोजक भी हैप्पी कि वे इतने हैप्पी थे। हैप्पी होकर बोले। हैप्पी होकर खाया, हैप्पी होकर पिया. हैप्पी हो कर आयोजक की गाड़ी से विदा हुए. समारोह खतम होने के बाद किसी ने आयोजक से पूछा कि भई, वे हैप्पी थे, यह तो दिखा ही नहीं। आयोजक बोले – “ हैप्पी दिखने के लिए नहीं, बोलने के लिए बोला जाता है। “
हैप्पी होने के कई कारण हैं। भारत समारोहों वाला देश है। भारतीय तिथि में हर दिन दो-चार अवसर के, पावन-त्यौहार के होते हैं. कैलेंडर देखें तो हर दिवस एक न एक दिवस। इन दिवसों का सरकारी दफ्तरों में बड़ा महत्व है। सभी दिवसों पर समारोह होते हैं, महत्वपूर्ण व्यक्ति बुलाए जाते हैं। वे आते हैं और कहते हैं, 'आ'एम हैप्पी'। सुरक्षा दिवस, संरक्षा दिवस, उत्पादकता दिवस, हिंदी दिवस, यह दिवस, वह दिवस. सभी दिवसों पर शपथें भी ली जाती हैं। सच्चे भारतीय की तरह हम सभी दिवस पर शपथ लेते हैं और लेने के बाद तिलांजलि की तरह उसे त्याग भी देते हैं. शपथ खाने और खाकर भूल जाने के लिए होता है. यह मिठाई नहीं है कि उसका स्वाद लोग बरसों याद रखे.
उस दिन भी सुरक्षा दिवस पर सबने शपथ ली, समारोह के बाद मिले समोसे, बर्फी खाई। यह सब करते करते घर जाने का समय हो गया। सबने अपनी-अपनी दुकान जल्दी-जल्दी समेटी और फूट लिए। कुछ ने बिजली जलती छोडी, कुछ ने कम्प्यूटर। बिजली रानी भी उतनी ही नटखट और शैतान। निगोड़ी शोडषी नायिका की तरह इठलाकर बाहर निकली, बाहर निकल कर इधर उधर झांका, फिर लाँग से शार्ट हुई. शॉर्ट कुछ भी हो, निकर कि स्कर्ट, लोगों को ऐसे ही झटके देती है। सो, शॉर्ट होकर उसने भी झटका दिया और अपने सर्किट से बाहर निकल गई। जान का नुकसान तो नहीं हुआ, क्योंकि सभी सुरक्षा की शपथ को समोसे-बर्फी के स्वाद में मिला कर समय से पहले अपने अपने ठिकाने को पहुंचा कर उसे उपकृत कर रहे थे। बस माल में कुछ कम्प्यूटर जले, कुछ फाइलें। तो उससे लोगों को तकलीफ नहीं हुई. आखिर दफ्तर के नुक्सान के लिए कोई क्यों सोग मनाए? कंप्यूटर दफ्तर का, फाइलें दफ्तर की। बल्कि फाइलें जलने से सभी को बड़ी तसल्ली मिली. कोई भी फाइल मांगने पर कह दिया जाता- “ साब जी, अमुक फाइल? तमुक फाइल? वो फाइल तो आग में... ” यहां तक कि आग लगने के बाद की तारीख वाली फाइलें न मिलने पर भी कह दिया जाता – “ सर जी, याद है न वो जो आग लगी थी, उसमें... ” हां, कुर्सी जल जाने से लोगों को बडी तकलीफ हुई थी. आखिर को सारा खेल तो कुर्सी का ही है ना. कुर्सी नहीं रही तो बैठें कहां? चाय सुडकते हुए राजनीति और महंगाई जैसी सदाबहार और मुफतिया बातों पर अपने अपने अमूल्य विचारों के चंदोबे कैसे ताने जाएं? कैंटीन का नुकसान तो सबसे ज़्यादा दुखदाई था. हाय, समय पर चाय नहीं, नाश्ता नहीं. घरवाली एक बार के लिए रोटी का डब्बा पकडा देती है. उससे अधिक के लिए मांगने पर कटखनी बिल्ली की तरह कूदती है.
इन सबके बावजूद आ’ एम हैप्पी कि मुझे आपने सदभावना दिवस कि सांप्रदायिक एकता दिवस कि इस दिवस कि उस दिवस पर बुलाया। उस दफ्तरवाले को देखिए. वे तो कम्बख़्त हमें बुलाते ही नहीं। राजनीति करते हैं सब! साले, चोर, उचक्के। यहां के लिए वे हैप्पी हैं कि दूसरी जगहों जैसी राजनीति यहाँ नहीं खेली गई. इसका सुखद परिणाम यह रहा कि यहां के समारोह के लिए उन्हें यहाँ बुला लिया गया। इससे यह भी पक्का हो गया कि अगली बार वे उन्हें अपने यहाँ बुलाएंगे। और ये भी पक्का ही पक्का जानिए कि वहाँ जाने पर ये भी कहेंगे - 'आ'एम हैप्पी' कि आपने मुझे बुलाया।
सभी हैप्पी हैं। वे इसलिए हैप्पी हैं कि आपने उन्हें बुलाया, अपने लोगों से मिलने का मौका दिया, जिसमें वे केवल मंच पर बैठे लोगों से मिले। बाकियों के लिए मंच की माइक ही और उनके सद्ववाक्य कि आ एम हैप्पी कि मुझे आपसे मिलने का मौका मिला। पूरे समारोह में दर्शक दीर्घा में बैठे किसी से भी उनकी बात नहीं होती। किसी की शकल पर नजर भी नहीं जाती, किसी का नाम भी नहीं मालूम होता, मगर वे कहते हैं कि 'आ'एम हैप्पी' कि मुझे आप सबसे बात करने का, आप सबको जानने-समझने का मौका मिला।
वे बोलते तो हैं कि 'आ'एम हैप्पी', मगर बोलते वक्त ऐसा लगता है, जैसे बोलने से पहले उन्हें कैस्टर ऑयल पिलाया गया है या बोलने के बाद उन्हें सप्रेम नीम के जूस का भरा ग्लास पिलाया जानेवाला है। वे नहीं जानना या समझना चाहते कि हैप्पी या खुश महज शब्द नहीं, भावना की वीणा और अभिव्यक्ति की जलतरंग है। देह की भाषा, यानी बॉडी लैंग्वैज बोलने वाली भाषा से ज्यादा जानदार और प्रामाणिक होती है। इसलिए बोलने में आप कहते हैं, 'आ'एम हैप्पी', और देह बताती है, जैसे शोक-सभा में आए हैं।
वैसे हर अवसर पर 'आ'एम हैप्पी' बोलने वाले भी कम नहीं हैं। एक बड़े साहित्यकार दिवंगत हो गए। उनके लिए एक शोक सभा आयोजित हुई। यही एक ऐसा सम्मान है जिसे हम लेखक एक दूसरे को देना सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं. मगर दिक्कत तो यह है कि हिंदी के लेखक और प्रकाशक में ऐसा छत्तीस का आंकडा रहता है कि प्रकाशक से मिली रायल्टी से वे शोक सभा स्थल तक भी नहीं जा सकते. बाकी का इन्तज़ाम कहां से और कैसे हो? लिहाज़ा, एक बड़े ही रसूख वाले व्यक्ति को वहाँ बुलाया गया, ताकि आयोजन का खर्चा निकल सके । जो धन देगा, वह बोलेगा भी. सो बोलने के वक़्त उन्होंने कहा – “ आ’ एम हैप्पी कि इस शोक सभा की अध्यक्षता करने के लिए मुझे बुलाया गया। “
एक अधिकारी की बॉस से खटपट हो गई, दफ्तर के एक आयोजन को लेकर। बॉस नाराज कि उन्हें 'वेल इन एडवांस' क्यों न बताया गया। छोटा अधिकारी मिमियाया - 'सर, आप नहीं थे सर, इसलिए सर ... ।' 'व्हाट आप नहीं थे? दफ्तर में फोन नहीं था कि मैं नहीं था?' इसी पर छोटे अधिकारी की पूरी लानत-मलामत हुई। बस, जी चार्जशीट नहीं मिली, मगर फर्मान मिला कि बॉस समारोह में शरीक नहीं होंगे। छोटे अधिकारी के काफी मिन्नत-चिरौरी के बाद वे गए। जाना ही था. आखिर उनकी भी तो गोपनीय रिपोर्ट लिखी जानी थी. बॉस मंच पर पहुंचे - तना चेहरा, जुड़ी भौंहें, कड़ी और रूखी निगाहें, मगर माइक थामते ही बोले -'आ एम हैपी टू बी हेयर।'
हैप्पी कहना उनकी नियति है। सचमुच की खुशी जब चेहरे पर आती है, तब शब्द भावनाओं के मुंहताज नहीं रहते। देह की भाषा उन शब्दों की पुष्टि करती हैं। हैप्पी कहने या दिखने से जरूरी है हैप्पी होना। यह हैप्पी होना अपने अंदर से आता है।
बहरहाल, कल फिर एक समारोह है.- मुझे मालूम है, वक्ता पूरी भीड़ को यही कहेंगे -'आ’ एम हैप्पी'. 'हैप्पी हैप्पी' का दौर यूँ ही चलता रहेगा, हर कोई जुमलेबाजी करते रहेंगे, इसलिए मैं भी बता दूं कि 'आ’ एम हैप्पी।'