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Saturday, December 29, 2012

पैदा करना बेटियों को है रेयरेस्ट ऑफ रेयर जुर्म!


आज भी लोग बलात्कार के लिए ठहरा रहे हैं लड़कियों को दोषी।
कोई उनकी नज़रों को
कोई छोटे, खुले, तंग कपड़ों को
कोई घूँघट को,
कोई पर्दे को,
कोई साड़ी को,
कोई बिकनी को,
कोई दोस्ती को,
कोई प्यार को,
कोई उनके खुले व्यवहार को,
कोई उनके बंद जकड़न को,
कोई मोबाइल को
कोई नेट को।
अब हम थक गए हैं अपने लिए बचाव करते-कराते।
अब हम भी मानते हैं, हम हैं सबसे दोषी।
हे इस समाज के इतने महान विचारक,
नियामक
एक ही उपाय कर दें आपलोग,
निकाल दें ऐसा कानून,
जुर्म है बेटियों का पैदा होना,
उससे भी बड़ा जुर्म है उसके माँ-बाप का
उसे धरती पर लाने का दुस्साहस करना
आप हे हमारे माई-बाप!
घोषित कर दें पैदा करना बेटियों को
है रेयरेस्ट ऑफ रेयर जुर्म!
हम अभी गला घोंट आते हैं अपनी बेटियों का
साथ-साथ अपना भी।
क्या करेंगे हम जीवित रहकर,
जब हमारी बेटियाँ ही नहीं रहेंगी इस धरती पर।
रहो साफ, पाक, पवित्र बेटी-विहीन धरा पर,
लेकिन, यह धरती भी तो है बेटी ही,
कैसे रहोगे इस पर,
इसलिए बसेरा बनाओ कही और, किसी और खगोलीय दुनिया में,
चाँद, मंगल, शनि, बुध, सूरज- कहीं भी
बस, अब छोड़ दो हमें और हमें धारण करनेवाली धरा को।

Wednesday, December 19, 2012

देवी और बलात्कार


लड़की,
मत निकलो घर से बाहर।
देवियों की पूजावाला है यह देश।
हम बनाते है बड़ी-बड़ी मूर्तिया, देवी की-
सुंदर मुंह,
बड़े- बड़े वक्ष
मटर के दाने से उनके निप्पल,
भरे-भरे नितंब
जांघों के मध्य सुडौल चिकनाई।
उसके बाद ओढा देते हैं लाल-पीली साड़ी।
गाते हैं भजन- सिर हिला के, देह झूमा के।
लड़की,
तुम भी बड़ी होती हो इनही आकार-प्रकारों के बीच।
दिल्ली हो कि  बे- दिल
तुम हो महज एक मूर्ति।
गढ़ते हुए देखेंगे तुम्हारी एक-एक रेघ
फिर नोचेंगे, खाएँगे,
रोओगी, तुम्ही दागी जाओगी-
क्यों निकली थी बाहर?
क्यों पहने तंग कपड़े?
क्यों रखा मोबाइल?
लड़की!
बनी रहो देवी की मूर्ति भर
मूर्ति कभी आवाज नही करती,
बस होती रहती है दग्ध-विदग्ध!
नहीं कह पाती कि आ रही है उसे शर्म,
हो रही है वह असहज
अपने वक्ष और नितंब पर उनकी उँगलियाँ फिरते-पाते।
सुघड़ता के नाम पर यह कैसा बलात्कार?
लड़की- तुम भी देवी हो-
जीएमटी हो कंचक,
पूजी जाती हो सप्तमी से नवमी तक
लड़की-
कभी बन पाओगी मनुष्य?




Sunday, December 9, 2012

हम हमेशा शिवरानी - वे हमेशा प्रेमचंद


हे भगवान! आज मैं बहुत खुश हूँ कि मैं महुआ माजी की तरह खूबसूरत नही। हिन्दी जगत में खूबसूरत लेखिका होना मतलब- उसके चरित्र की धज्जियों का उड़ जाना है।  हिन्दी जगत में स्त्री का होना ही फांसी पर चढ़ा जानेवाला अपराध है। खूबसूरत लेखिका होना भयंकरतम अपराध है। इसकी सज़ा उसके चरित्र की खील -बखिया उधेड़ कर दी जा सकती है। ऐ औरत! एक तो तू हव्वा!। सारे फसादात की जड़! दूसरा फसाद- कि तू सुंदर भी है। यह ऊपरवाला भी- बहुत हरामी है। उसकी कमीनगी देखिये कि वह इस दो टके की औरत को दिमाग नाम की चीज़ भी दे देता है। अब भला कहिए तो! रूप दे दिया तो दे दिया। उससे हमारा मन सकूँ पाता है। आँखों को ठंढक पहुँचती है। दिल को राहत मिलती है। अगर वह पट गई तो देह की पोर-पोर खिल जाती है। नहीं भी पाती तो उसे गाली देकर, बदनाम करके हमारी जीभ और रूह सकून पाती है। ए कम अक्लों ! कितने खुश हैं हम यह स्थापित करते हुए कि ऐसों-ऐसों की अक्कल घुटने में होती है। घुटने पर साड़ी अच्छी लगती है। दिमाग को भी हमने घुटने पर देकर हमने उनकी इज्ज़त ही बढाई है। असल में उनके पास दिमाग तो होता ही नही! और ज़रूरत भी क्या है भला! वे रूपसी है, कामिनी हैं, दामिनी हैं, मतवारी हैं, छममकछल्लो हैं, छमिया हैं। ये सब हमारे रस-रंजन के लिए हैं। उनकी खुशकिस्मती कि हम उन्हें अपने साथ होने-सोने-खोने के लिए रख लेते हैं। अब इनकी यह मजाल कि लिखने भी लगें, बोलने भी लगें, हुंकारने भी लगें। दुर्गा-काली कैलेंडरों और शास्त्रों में अच्छी लगती हैं। जीवन में नही। महुआ हो कि कमलेश, गीता हो कि विभा- जो बोलेगी, भाड़ में जाएगी। यह भाड़ हमने बनाया है, इसमें हिंसा, कामुकता, रासलीला की आग हम सदा जला के रखते हैं। हम एक छींटे से अपने ही अन्य लोगों का भी खात्मा करने की ताकत रखते हैं, जिनकी नज़र में स्त्री सम्माननीय है। अरी ऐ औरत!  संभाल जा! तू मादा है, मादा रहेगी। मादा बनकर हमारे साथ रहेगी तो तेरे रूप पर तनिक दिमाग का दान भी कर देंगे।
इसलिए हे भगवान! अबतक अपनी कुरूपता से दुखी आज मैं बहुत खुश हूँ। पर, क्या सचमुच खुश हूँ? नहीं। रूप तो एक और विशेषण है। हमारे लिए तो औरत का होना ही अपराध है। हम औरत बनकर सेवाभाव से दासी बने रहें, तो किसी को कोई आपत्ति नही होगी, न किसी गोस्वामी जी की आत्मा में किसी प्रकाश का पुंज लहराएगा, न किसी के मन में किसी के प्रति राग-रंजन का अनिल या अनल बहराएगा। न किसी रण का बांका छलिया रूप अंधेरगर्दी मचाएगा। हमें कहा जाता है कि ना, ना, ना! हमारे विमर्श को नारीवादी रूप मत दीजिए। हम भी कहते हैं कि ना जी ना, हम तो अपने को रूप-अरूप से अलग-विलग रखकर सिर्फ और सिर्फ अपने कर्म और अपने लेखन और अपने प्रोफेशन पर ध्यान देते हैं। तब भी पेट में मरोड़ होने लगती है।
हे भगवान! अब हम तुमको गरिया रहे हैं। क्यों, तूने हमें बनाया? दिन-रात की इस इज़्ज़तपोशी के लिए! एक बार इन इज़्ज़तदानों को भी औरत बना दे और ऐसे ही विभूषणों से विभूषित कर दे। हमारी साड़ी, हमारी देह, हमारी नाक, हमारी आँख, हमारी चितवन, हमारी गढ़न! सब उनमें भर दे! सुनने दे उन्हें भी ये सब कुछ! फिर हम भी पूछें कि 'आब कहू, मोन  केहेन लगइए।"
वैसे हिन्दी में किसी की किसी भी उपलब्धि पर पड़ोसी के पेट में दर्द उठाना स्वाभाविक है। हमारी भिखारी और लोलुप प्रवृत्ति किसी को खुश, और परवान चढ़ा नही देख सकती। उसे यह रोने में अच्छा लगता है कि हिन्दी में पैसा नही, नाम नहीं, और जैसे ही किसी को यह मिलता है, हम उसके खिलाफ लामबंद होने लगते हैं। मतलब साफ है कि उसकी साड़ी कि उसकी कमीज मेरे से सफ़ेद कैसे? वह चाहे महुआ माजी हो या सुरेन्द्र वर्मा। हमें कभी भी अपने नाम, दाम, काम का चाँद नही चाहिए। न न न! हमें तो चाहिए, किसी महुआ को या किसी सुरेन्द्र वर्मा को नहीं। हमें मिले तो हमी सबसे लायक, कोई और है तो घनघोर नालायक!
महुआ का उपन्यास अच्छा नही है, तो उसे अपनी मौत मर जाने दीजिये। चोरी का है तो चोरी का इलज़ाम लगाये। उपन्यास के लिखने, घटिया या बढ़िया होने का उसके रूप या उसकी साड़ी -शृंगार से क्या वास्ता! वैसे हम भी ना! हम हिंदीवालों को सजने-सँवरने से भी बहुत परहेज है। एक मंत्री जी भी चार बार कपड़े बदलते हैं तो सुर्खियों में आ जाते हैं। टीवी उनके काम पर नही, उनके कपड़ों पर उतर आता है। हमारी यह फितरत है। महुआ कि कमलेश कि गीता कि विभा कि मैत्रेयी कि शीला कि मुन्नी कि इमरती कि जलेबी- हमारे काम पर नहीं, हमारे रूप पर जाइए। अगर हमने कुछ कर लिया तो हम शिवरानी हो जाएंगे, जिनकी कहानी प्रेमचंद ही लिखते थे। हमारे तो घर के मर्दों में भी इतनी ताब नही कि वे कहें कि हाँ जी हाँ! उनकी पत्नी एक शख्स नहीं, एक शख्सियत है। मन के भीतर इतना डर और कहने को इतने रणबांकुरे!

Saturday, December 8, 2012

मंडी- रंडी, देह -दुकान....!


कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!

सबकी मौत का एक मुअईन है
लेकिन मैं.....
मरती हूँ हर रात... (प्रतिमा सिन्हा)
(इसमें अपनी बात जोड़ रही हूँ- )

घर -बाहर, दुकान दफ्तर-चौराहा-पार्क
हर जगह हम हैं केवल मंडी- रंडी, देह -दुकान....!
हम कहते रहें की हमने उन्हें देखा
मित्रवत, पुत्रवत, भतृवत, मनुष्यवत....
लेकिन, जिन्हें हम ये सब कहते हैं, वे ही हमें बताते हैं-
कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!
अब हम भी कह रहे हैं, कि आओ और उपयोग करो- हमारा-
कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!
आँसू बहते हों तो पी जाओ।
दर्द होता हो तो निगल जाओ।
सर भिन्नाता हो तो उगल आओ अपने देह का दर्द, जहर, क्रोध -
अपनी ही माँद में।
कहीं और जाओगी तो सुनेगा नहीं कोई
अनहीन, नहीं, सुनहेगे सभी,
फिर हँसेंगे, तिरिछियाएंगे और
फिर फिर छेड़ेंगे धुन  की जंग-
कि हम हैं केवल और केवल-
मंडी- रंडी, देह -दुकान....!

Monday, December 3, 2012

राजेन्द्र बाबू का पत्र- पत्नी के नाम


राजेन्द्र बाबू का पत्र- पत्नी के नाम -साभार- पुन्य स्मरण- समर्पण- उनके जन्म दिन पर- तेरा तुझको सौंपत, क्या लागे है मोय?एक बार फिर से अपने ही इसी ब्लॉग से।

इस पत्र से पता चलता है कि तब के नेता देश के लिए कितने प्रतिबद्ध रहते थे। घर-परिवार , पैसे उनके लिए बाद की बातें होती थी। मूल भोजपुएरी में लिखा पत्र यहाँ प्रस्तुत है-
आशीरबाद,
आजकल हमनी का अच्छी तरह से बानी। उहाँ के खैर सलाह चाहीं, जे खुसी रहे। आगे एह तरह के हाल ना मिलला, एह से तबीयत अंदेसा में बातें। आगे फिर। पहले कुछ अपना मन के हाल खुलकर लीखे के चाहत बानीं। चाहीं कि तू मन दे के पढी के एह पर खूब बिचार करिह' और हमारा पास जवाब लिखिह''। सब केहू जाने ला कि हम बहुत पढली,  बहुत नाम भेल, एह से हम बहुत पैसा कमाएब। से केहू के इहे उमेद रहेला कि हमार पढ़ल-लिखल सब रुपया कमाय वास्ते बातें। तोहार का मन हवे से लीखिह्तू हमारा के सिरिफ रुपया कमाए वास्ते चाहेलू और कुनीओ काम वास्ते? लड़कपन से हमार मन रुपया कमाय से फिरि गेल बाटे और जब हमार पढे मे नाम भेलत' हम कबहीं ना उमेद कैनीं कि इ सब पैसा  कमाए वास्ते होत बाटे। एही से हम अब ऐसन बात तोहरा से पूछत बानी कि जे हम रुपया ना कमाईं, त' तू गरीबी से हमारा साथ गुजर कर लेबू ना? हमार- तोहार सम्बन्ध जिनगी भर वास्ते बातें। जे हम रुपया कमाईं तबो तू हमारे साथ रहबू, ना कमाईं, तबो तू हमारे साथ रहबू। बाक़ी हमरा ई पूछे के हवे कि जो ना हम रुपया कमाईं त' तोहरा कवनो तरह के तकलीफ होई कि नाहीं। हमार तबीयत रुपया कमाए से फ़िर गेल बातें। हम रुपया कमाए के नैखीं चाहत। तोहरा से एह बात के पूछत बानीं, कि ई बात तोहरा कइसन लागी? जो हम ना कमैब त' हमारा साथ गरीब का नाही रहे के होई- गरीबी खाना, गरीबी पहिनना, गरीब मन कर के रहे के होई। हम अपना मन मी सोचले बानीं कि हमारा कवनो तकलीफ ना होई। बाक़ी तोहरो मन के हाल जान लेवे के चाहीं। हमारा पूरा विश्वास बातें कि हमार इस्त्री सीताजी का नाही जवना हाल मे हम रहब, ओही हल में रहिहें- दुःख में, सुख में- हमारा साथ ही रहला के आपण धरम, आपण सुख, आपण खुसी जनिःहें । एह दुनिया में रुपया के लालच में लोग मराल जात बाते, जे गरीब बाटे सेहू मरत बाटे, जे धनी बाटे, सेहू मारत बाटे- फेर काहे के तकलीफ उठावे। जेकरा सबूर बाटे, से ही सुख से दिन काटत बाटे। सुख-दुःख केहू का रुपया कमैले और ना कमैले ना होला। करम में जे लिखल होला, से ही सब हो ला।
अब हम लीखे के चाहत बानी कि हम जे रुपया ना कमैब त' का करब। पहीले त' हम वकालत करे के खेयाल छोड़ देब, इमातेहान ना देब, वकालत ना करब, हम देस का काम करे में सब समय लगाइब। देस वास्ते रहना, देस वास्ते सोचना, देस वास्ते काम करना- ईहे हमार काम रही। अपना वास्ते ना सोचना, ना काम करना- पूरा साधू ऐसन रहे के। तोहरा से चाहे महतारी से चाहे और केहू से हम फरक ना रहब- घर ही रहब, बाक़ी रुपया ना कमैब। सन्यासी ना होखब, बाक़ी घरे रही के जे तरह से हो सकी, देस के सेवा करब। हम थोड़े दिन में घर आइब,त' सब बात कहब। ई चीठी और केहू से मत देखिह', बाक़ी बीचार के जवाब जहाँ तक जल्दी हो सके, लीखिह'। हम जवाब वास्ते बहुत फिकिर में रहब।
अधिक एह समय ना लीक्हब।
राजेन्द्र
आगे ई चीठी दस-बारह दीन से लीखले रहली हवे, बाक़ी भेजत ना रहली हवे। आज भेज देत बानी। हम जल्दीये घर आइब। हो सके टी' जवाब लीखिः', नाहीं टी' घर एल पर बात होई। चीठी केहू से देखिः' मत। - राजेन्द्र
पाता- राजेन्द्र प्रसाद, १८, मीरजापुर स्ट्रीट, कलकत्ता
(अब आप सोचें कि ऐसे पत्र को पाकर उनकी पत्नी के क्या विचार रहे होंगे और देश को पहला राष्ट्रपति देने में उनकी क्या भुमिका रही होगी?)

Monday, October 8, 2012

ई देस है वीर बलात्कारियों का, इस देश का यारो किया कहेना!


हे लो। फिर हिंदुस्तान के वीर बहादुर लोग सब अपने देश की महान संस्कृति का पालन करते हुए एगो इज्जत लूट गिया। फिर एगो इज्जत लुट गिया। फिर एगो जान चला गिया। फिर टीवी अखबार का मौसम आ गिया। फिर माई-बाप लोग के गरीब के घर आने-जाने का दिन आ गिया। गाँव में मेला लगेगा। ठेला लगेगा। कुछ ठेलाएंगे, कुछ बिकाएंगे, कुछ सेरांगे, कुछ गरमाएंगे। फिर ताबतक में कौनों आउर बात आ जाएगा, फिर सब उसको भुतिया जाएंगे। फिर कोनो एगो माई-बाप के पच्छ में बोल गिया। फिर कोनो चार गो उसके खिलाफ उगिल गिया।
माई-बाप तो माई-बाप है। लोग और को सरमो नहीं आता है उसको उछन्नर करते हुए। आपलोग कहियो अपना बूढ़ा गए माय-बाप को एतना तंग करेंगे? ईहो तहमरे माए-बाप सब है न। एकके गो तो मौका मिलता है अपना माय-बाप भोट दे के अपने से चुनने का। भगवान तो देता नही है। बस, डिक्टेटर जैसा अपना टेंट में से माई-बाप निकालता है आ बाल-बच्चा सबको पकड़ा देता है। ले रे अभगवा, ले!
ई माई-बाप आजकल बहुते - बहुते रूप मे बदल गिया है। मुनसी, मोकदमा, लाट, खाप, बाप। हे, सुने, एगो बाप कह रहा था- लडिका-लड़िकी का बियाह का ऊमीर कम कर दो। हे, हे हे हे...! छम्मकछल्लो का तो खुसी से दमे फूल गिया। कम क्या! जनमते ही कर दो। जनमते ही उसको बता दो, देखो रे बबुआ, तुम्हारा जनम पढ़ने-लिखने, कुछ करने के लिए नही हुआ है। उसके लिए देश-बिदेश में बहुत पगला लोग सब बैठा हुआ है। तुम तो जनमते बियाह रचाओ, आ डूब जाओ रंग-रभस में, जिससे कि तुम्हारे जीसीम की आग सेराती रहे आ आगे तुम किसी के इज्ज़त लूटने जैसा काम मत करना। जैसे एक बेर कोनो एगो बाप बोले थे कि गाँव में सबको टीवी दे दो। लोग देर तक टीवी देखेंगे तो देर से सोएँगे। देर से सोएँगे तो उत्पादन के काम में नहीं लगेंगे। आ देश की जनसंख्या में इजाफा नही होगा। बिदियार्थी सबको जनसंख्या रोकने में टीवी का महत योगदान जैसा बिसय देना चाहिए, निबंध लिखने के लिए।
छम्मकछल्लो को तो अभिए से बियाह का सब गीत मोन पड़ने लगा- बेटा का है तो गाओ- साजहु हो, बाबा मोर बरियतिया। बेटी का है तो पाया के ओटे गे बेटी, क्यों गे खड़ी, अपना बाबा के मुंह देखि, रोने लगी।
बेटी सब का मुंह ऐसे ही बनरचोथ जैसा होता है। जिसको देखती है, रोने लगती है। बाप को भी आ बलात्कारी को भी। एक बाप बनकर बोलता है, लड़की पर सिक्कड़ कस दो। फिलिम में ताला मार दो। छम्मकछल्लो ताला, सिक्कड़ लेकर हाजिर। हो हमारे बाप-भाई। हम सब तो तुम्हारे ही बाग की चिड़िया हैं। मार दो, काट दो। तनिको न कुछ बोलेंगे। बेटी जनम मुफ़त में थोड़े न लिए हैं।
लबरघोघवा सब जीभ लपलपाता कहता है- लड़की है रे! छम्मकछल्लो हुआं भी कहती है- हाँ रे, हैं ना। अब जो करना है, कर लो। इज्ज़त लूट लो, नंगा नचा दो, कसम धरा लो जो हम कुच्छो बोले तो! हम कुच्छो बोले न तो चाहे जलती चिता में से, चाहे गाड़े गए कबर में से हमरी लाश निकाल कर उसका फिर से इज्ज़त लूट लेना। कमाल है भाई। ऊ सब बड़का लोग सब होता है। हम लड़की सबका औकाते कौन जो कुछो बोलें? ऊ लोग का लूटने का काम- ऊ लोग करे। हमारा लुटने का धंधा- हम करें। मामिला एकदम फरीच्छ! बूझे कि नहीं? धुर रे बुड़बक। लगता है तू भी किसी का इज्ज़त उतारिए के आवेगा अभागा नहितन!  
एगो बोलता है- साजिश है। छम्मकछल्लो कहती है, जी माई-बाप, एकदम है। एगो बोलता है, राजा को गद्दी से उतार दो। छम्मकछल्लो कहती है, ना माई-बाप। क्या फायदा? आप गेरन्टी दोगे कि आप राजा बनकर आओगे तो हमारी इज्ज़त हिफाजत से रहेगी। अपने लिए तो तुलसी बाबा कहिए गए हैं- कोऊ नृप होही, हमें का हानी, चेरी छांड़ि की होयब रानी?
लेकिन, ई इज्ज़त का भी ग्रेडेसन होता है, छम्मकछल्लो को पता चलता है। इसलिए, जब –जब इज्ज़त लूटने का बात आता है वो लड़की का बिशेषन लगाना नाही भूलता- मुसलमान लड़की, दलित लड़की। छम्मकछल्लो को अककिल तो है नहीं। उसको लगता है, ज़रूर इज्ज़त उतारने का तरीका या इज्ज़त जाने का तरीका ई सब बिशेषन लगाने से बदल जाता है। औरत का इज्ज़त तो आइयसे जाता है सो तो जाता अही है, ई सब बिशेषन लगा के और क्या मिलता है, छम्मकछल्लो यही पूछना चाहती है- इज्ज़त उतारनेवाले से भी और उस इज्ज़त का चीर-फाड़ करवाले से भी।   

Saturday, October 6, 2012

विचारों के चरित्र पर वीर्य का शीलहरण!

      शास्त्रों में दान की बड़ी महिमा है- स्वर्णदान, जीवनदान, गुप्तदान, कन्यादान से लेकर देह और अस्थिदान तक। अस्थिदान से ऋषि दधीचि महान बन गए और शूरवीर कर्ण दानवीर कहलाने लगे। शास्त्रों की दान- महिमा को मेडिकल साइंस ने भी तरह –तरह से  गाया- नेत्रदान, रक्तदान, गुर्दादान, देहदान। भाई लोगों की नज़र में ये सभी दान महाधर्म और महाकर्म हैं, मानवीयता के क्षेत्र में एक महान कार्य! लेकिन एक दान पर आते ही भाई लोग नैतिकता के भंवर में डोलने लगे। दान-धर्म पर फिल्में भी बनती रही हैं। लेकिन ये फिल्ल्मवाले भी ना! हरदम विषय के भुक्खड़! हर समय सबजेक्ट का टोटा। दान-धर्म पर दर्द का रिश्ता से लेकर आनंद और जय संतोषी माता तक। टीवी तो बताकर ही रहेगा कि भारत का धर्म कितना महान है।
      तो लीजिये, इससे क्या हो गया? पागल फिल्ल्मवाले! उसी पागलपन में बना डाली- विकी डोनर। हिंदुस्तान में धर्म, सिनेमा, देह, रज और वीर्य जैसे विषयों पर सभी भाइयों की सरस्वती चरम जाग्रत हो जाती है। ऊपर लिखे सभी दान- महादान! मगर वीर्यदान- अनैतिक, महापाप। भूल जाइए अपने शास्त्रों की तथाकथित नियोग पद्धति। उससे उत्पन्न अपने महान मिथकीय चरित्र- महामुनि वेदव्यास से लेकर धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर तक। पसीने से वीर्य तक की वीर यात्रा और उस वीर्य से मीन तक के गर्भ धारण की बात। धर्म में केवल भाव होता है, तर्क नहीं। छम्मकछल्लो भी कहाँ तर्क कर रही है। वह तो यही कह रही है कि जो धर्म इतने साल पहले इन सबका प्रयोग कर इन्हें तार्किक, उन्नत और आधुनिक बना गया, उसी को लेकर भाई लोग इतने संकुचित क्यों?
      विकी डोनर के वीर्यदान से सभी की नैतिकता छनछनाने लगी। मरदवादी अहं ठाठ मारने लगा। ज़ोर दे-देकर लिखा जाने लगा- सोचिए, आपकी आँखों के सामने आपकी बीबी किसी गैर मर्द का वीर्य अपने पेट में लेकर घूमती रहेगी और आप उसे लेकर डॉक्टरों के चक्कर लगा रहे होंगे। उसकी इच्छा-अनिच्छा का ख्याल रख रहे होंगे। माने, आप एक ऐसे बच्चे के महज केयरटेकर हैं, जो दूसरे का है। वह बच्चा जनम लेकर जीवन भर आपकी छाती पर मूंग दलता रहेगा। आप उसे अपना बच्चा कहने पर मजबूर होते रहेंगे। बोलिए, कैसे बर्दाश्त करेंगे आप?”
      सचमुच जी, कैसे बर्दाश्त करेंगे हम? बच्चा तो केवल मर्द का ही होता है। औरत की तो कोई भूमिका होती ही नही। वह तो महज केयरटेकर है, अपने मर्द के वीर्य की। वह उसे नौ महीने तक पेट में पाले, फिर उसे जनम देकर जीवन भर उसकी देखरेख करती रहे। बदले में कभी कुछ बुरा हो तो सुनती भी रहे- कैसी माँ हो?” बस जी, इसके आगे कुछ नहीं। बीबी के बदन में दूसरे का रक्त या गुर्दा या नेत्र हो, कोई बात नही। मगर उसकी कोख में किसी दूसरे का वीर्य- पापं शान्तम!  
      भाई साहब ने लगे हाथो समाधान भी दे दिया- “मर्द अगर बंजर है और औरत उर्वर तो औरत बंजर मर्द को तलाक देकर उर्वर मर्द से ब्याह रचा ले।“
      छम्मकछल्लो वारी-वारी गई इतनी महान सोच पर। आखिर औरत को इतनी आज़ादी दे दी कि वह भी मर्द की तरह तुरंत ऐलान कर दे कि देख लो जी, तुम तो ठहरे बंजर। सो ये लो, मैं तो चली उर्वर की तलाश में। भाड़ में जाए शास्त्र-वास्त्र का कहना कि पति-पत्नी का संबंध जन्म-जन्मांतर का होता है। वे एक-दूसरे के सुख-दुख के अनंत साझीदार हैं। ना जी। भाई साहब की बात से तो छम्मकछल्लो की ज़ात कमोडिटी में तब्दील हो गई- जबतक फायदे का सौदा है, साथ रहो, भोगो। बच्चे जन या जनवा सकते हो तो जनो या जनवाओ, वरना भैया! नही, ओ बहना! अपना रास्ता नापो।“
      कूढ़मगज छम्मकछल्लो की समझ में ही नही आता कि क्या पत्नी अपने पति को इस बिना पर छोड़ दे कि उससे उसके बच्चा नहीं हो रहा? वह उसके प्रेम को बच्चे की तराजू पर तोलकर उसे वजन में कम पाकर छोड़ दे? उसकी बायालोजिकल अक्षमता का सिला पति-पत्नी के रिश्ते को खतम करके दे? फिर तो ऐसे हर माँ-बाप को भी खतम कर दिया जाना चाहिए, जो दूसरे के बच्चों को गोद लेते हैं। ऐसी हर माँ को निकाल दिया जाना चाहिए, जो अपने पति या यूं कह लें कि अपनी सौत की संतान को अपना मानकर उसपर अपना प्रेम लुटाती है। भाई साहब! ऐसी औरतों को भी नसीहत दें कि तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारी कोख के जाए का हक़ तुम्हारी सौत की औलाद हड़प रही है। लेकिन, वे नहीं कहेंगे। यह औरत-मर्द और उनकी मरदवादी सोच का फर्क है, जिसमें औरत महज एक सामान है। घर देखने के लिए भी और गर्भ धारण के लिए भी। औरत महज एक देह है, जिसपर केवल उसके अपने मर्द का ही हक़ है। वह माँ बनना चाहती है, तो पहले अपने पति को छोड़े, चाहे वह पति उससे कितना भी प्रेम क्यों ना करता हो? आखिर, कोई तो ऐसी वजह बताएं, जिससे यह तर्क छम्मकछल्लो के गले उतर सके कि ऊपर लिखे सभी दान नैतिक और धार्मिक हैं और वीर्यदान अनैतिक, अधर्म? माँ -बाप बनने की चाहत पर ऐसी नपुंसक सोच?