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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Thursday, September 17, 2009

एक पहेली- वे हमारा छुआ खाते है, मगर हम नहीं तो कौन बडा, कौन बडा?

mohallalive।com पर पढ़े छम्मक्छल्लो का यह लेख। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/09/17/vibha-rani-on-social-distance/

छम्मकछल्लो बचपन से कुछ बातों को ले कर हैरान है, परेशान है। बचपन से उसने कई लोगों से इस बाबत पूछा, मगर कहीं से ऐसा कोई जवाब नहीं मिला जो उसे संतुष्ट कर जाता। “बावरा मन अहेरी खोजे पिऊ कहां, पिऊ कहां?” आप सबके सामने भी वह अपनी परेशानी रख रही है।
छम्मकछल्लो के घर में शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां आते थे। ये सब जब आते थे, तब उन्हें अलग से रखे चीनी-मिट्टी के कप-प्लेट में चाय-नाश्ता दिया जाता था। उनके जाने के बाद उसे फिर से धो कर अलग से रख दिया जाता। कभी अगर भूले से उस कप-प्लेट को उठा लेता घर के या अन्य लोगों के प्रयोग के लिए, तो बड़े चौकन्ने भाव से “हां-हां, हां-हां” कह कर मनाही की जाती।
छम्मकछल्लो के शहर में एक घीवाला था। उसका भी नाम शकूर या रहमान या कुछ ऐसा ही था। पूजा-पाठ हो या सामान्य दिन- पूरे मोहल्ले में घी उसी के यहां से आता था, क्योंकि उसके यहां के घी की क्वालिटी अच्छी होती थी। वजन भी अच्छा होता था। उधार भी दे देता था। तगादा भी कम करता था।
हमारे यहां जलेश्वरी भी आती थी। उसका काम होता था- पर्व-त्योहार के आने पर पूरे घर को गोबर-मिट्टी से लीपना। उसके यहां गाय थी, इसलिए वह गोबर भी अपने यहां से ले आती थी। उसे या हमारे घर के शौचालय को साफ करनेवाली को जब रोटी या कुछ भी दिया जाता था, तो देनेवाला अपना हाथ उससे कम से कम दो से तीन फीट की दूरी पर रखता।
शहर में एक मजिस्ट्रेट साहब आये। सभी उन्हें तो मजिस्ट्रेट साहब कहते, मगर उनकी पत्नी को चाची। पूरे परिवार की पढाई-लिखाई, रहने सहने के तौर-तरीके से सभी प्रभावित। मोहल्ले की चाचियां अपनी-अपनी बेटियों को स्वेटर बुनने, कढाई-सिलाई सीखने के लिए उनके पास भेजने लगीं। चाची भी बड़े प्रेम से यह सब सिखातीं। वे जब घर पर आतीं तो उनके लिए भी वही चीनी-मिट्टीवाला कप-प्लेट निकाला जाता। सभी महिलाएं उनके यहां उसी दिन जातीं, जिस दिन उनका कोई व्रत होता, ताकि उनके हाथ का खाना-पीना खाने से बचा जा सके। क्रिस्मस में वे खास तौर पर बिना अंडे का रोज केक बनाती, सभी के यहां भेजतीं, मगर उसे भी किसी शकूर, किसी जलेश्वरी, किसी हरखू को दे दिया जाता।
एक बार शहर में कोई बहुत बड़े हाकिम आये। नाम था ए राम। सभी ने घृणा से कहा – “ए राम? अब उसके साथ उठना-बैठना पड़ेगा? खाना-पीना पड़ेगा?” सभी आपस में ही खुसुर-फुसुर कर रहे थे। हिम्मत तो किसी में थी नहीं कि कोई उनके सामने यह कहता। फिर यही श्री ए राम घर पर आये। तब फूल की थाली में खाना परोसा जाता था। खाना परोसा गया और उनके जाने के बाद उस थाली-ग्लास आदि को आग में जला कर पवित्र किया गया।
ये सभी शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह छम्मकछल्लो या अन्यों के घरों का सब कुछ खाते-पीते। न खाना किसी क्रांति जैसी घटना होती और उस शहर में ऐसी कोई क्रांति आई नहीं। सब इसी में मगन थे कि ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उनके हाथ का नहीं खाए? हमने भी खुद को बड़ा मान लिया और खाने से मना कर दिया।हमने भी खुद को बड़ा मान लिया और खाने से मना कर दिया।हमने भी खुद को बड़ा मान लिया और खाने से मना कर दिया। मगर यही शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह जब ईद या शबे बरात में सेवई, बर्फी आदि भेजते तो उसे कोई नहीं खाता था। उसे जलेश्वरी, फुलेसरी, सोमीदास या ऐसे ही किसी को दे दिया जाता। खुद जलेश्वरी के यहां से कोई प्रसाद या पकवान आता तो उसे किसी और जलेश्वरी या फुलेसरी या चनिया के हवाले कर दिया जाता।
चलते-चलते एक और ताज्जुब की बात कि शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान मियां के यहां से खजूर आता, तो उसे सब खा लेते। उसी तरह जलेश्वरी के घर से आम, केले, ताड़ के फल आते तो उसे सब खा लते। तब यह कह दिया जाता कि फल में छूत नहीं होती, जैसे शकूर या रहमान मियां के यहां के घी में कोई छूत नहीं होती। छम्मकछल्लो को एक वाकया और भी याद आता है कि घर में पूजा-पाठ के समय महिलाओं के लिए हमेशा नयी साड़ी आती। अगर किसी वजह से नयी साड़ी नहीं है तो कह दिया जाता कि बनारसी साड़ी पहन लो, उसमें नये-पुराने का भेद-भाव नहीं रहता। छम्मकछल्लो की मंद बुद्धि में यही आया कि मंहगी चीज़ों में छूत नहीं लगती, चाहे वह फल हो या साड़ी।

आप छम्मकछल्लो को कह सकते हैं कि यह तब की बात होगी। आज ऐसा नहीं है। तो छम्मकछल्लो का शिद्दत से ये मानना है कि आज भी इस भाव में कमी नहीं आयी है। छम्मकछल्लो की ही अपनी बहन उसके घर पूरे 15 दिन रही और खुद रोटी बना कर खाती रही, क्योंकि छम्मकछल्लो की खाना बनानेवाली का नाम फातिमा है। वैसे फातिमा पर छम्मकछल्लो का सारा घर फिदा है, क्योंकि वह बहुत अच्छा खाना बनाती है।
तो पहेली यह कि शब्बीर मास्टर, उस्तानी जी, यूसुफ मियां, शकूर या रहमान, मजिस्ट्रेट साहब, ए राम साहब वगैरह छम्मकछल्लो या अन्यों के घरों का सब कुछ खाते-पीते रहे तो बड़ा या दिलदार कौन? हमने नहीं खाया तो छोटा या संकीर्ण कौन? बूझो तो जानें।

Tuesday, September 15, 2009

यह लेडीगिरी छोडिए छम्मकछल्लो जी!

रिपोर्टर्स पेज पर देखिए छम्मक्छल्लो का यह आलेख। लिंक है- http://reporterspage.com/inhuman/701
छम्मकछल्लो फिर से मुदित है. उसके सपने में कल रात एक पति आये. पति तो पति होते हैं. वे किसी के भी सपने में आ सकते हैं, चाहे वह अपनी पत्नी के सपने में आये या दूसरे की पत्नी के सपने में. पति सभी एक जैसे हों या नहीं, कम्बख्त सारी पत्नियां एक जैसी होती हैं. उनकी चाहत के पोर पोर में बसी होती हैं इच्छाओं की अतल गहराई कि उनके पति केवल उनके बने रहें, उनकी हर बात मानें, उन्हें टूट टूट कर प्यार करे. उन्हें फूल से भी न छुएं. एक लडकी थी. उसने शादी के दो महीने बाद ही यह कह कर पति को छोड दिया कि आज तक उसने नहीं जाना कि पति का प्यार क्या होता है? छम्मक्छल्लो ने उसे समझाने की हर चन्द कोशिश की कि उसे जब 26 साल में नहीं पता चल पाया कि पति का प्यार क्या होता है, तो वह तो अभी अभी ब्याह कर आई ही आई है. पर ना जी, उसे नहीं मानना था. सो नहीं मानी. बाद में फिर पता नहीं कैसे उसे यह पता चल गया कि उसके पति का प्यार कैसा होता है और वह एक दिन अपने-आप बिना किसी शर्त के पति के घर लौट आई.
मगर सभी पति ऐसे नहीं होते. हर पति की अपनी-अपनी क्वालिटी होती है. एक पति को उसकी पत्नी ने उस पर नपुँसकता का आरोप लगाते हुए उसे छोड दिया और एक दूसरे विवाहित पुरुष से शादी भी कर ली. उस विवाहित पुरुष की पत्नी और घरवालों की काफी चिरौरी के बाद उस महिला ने उसके पति को छोड दिया और दुबारा अपने पति के घर आ गई. पति ने बडी दिलदारी दिखाते हुए उसे रख लिया. इस बात के करीबन 15-16 साल हो गए होंगे. वे दोनों बडा सुखी जीवन जी रहे हैं.
लेकिन सभी पति ऐसे नहीं होते और ऐसे न हो कर वे इन पतियों के लिए बडी सांसत खडी कर देते हैं. अभी दो तीन पहले छम्मकछल्लो ने अखबार में पढा कि एक पति ने पत्नी द्वारा पैसे ना देने पर ना केवल अपनी गर्भवती पत्नी की लातों से पिटाई की, बल्कि उसे बिजली के शॉक लगा कर उसे घायल कर दिया. अब वह अस्पताल में पडी है और पति जेल में. छम्मकछल्लो के सपने में यही पति आ गया. छम्मकछल्लो ने उससे पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उत्तर में उसने अपने ही जैसे एक और पति को खडा कर दिया. उस दूसरे पति ने कहा कि "मैडम जी, बीबी को मारना तो कॉमन बात है. इसके लिए हमको हमारे नींद से जगा कर अपने सपने में काहे को बुलाया? मैं अपनी बीबी को मारता हूं, मेरा भाई मारता है. ये देखो." उसने एक और पति को छम्मकछल्लो के सामने ला खडा कर दिया और बोला, "ये मेरा बाप है, मगर मेरी मां का मरद है. यह भी मेरी माँ को मारता है."
छम्मकछल्लो की समझ में आया कि बीबी को मारना पति का जन्मसिद्ध अधिकार है. वह पति ही क्या, जो बीबी की ठुकाई ना करे. छम्मकछल्लो का जी फिर भी नहीँ माना. उसने सपने में आये पहले पति से पूछा कि तुमलोग तो कहते हो कि बीबी कम अक्ल की होती है, कमज़ोर होती है तो कमज़ोरों से मुकाबला करके या उस पर ज़ोर दिखा कर तुम्हें क्या मिलता है. पति बहुत बडे ज्ञानी संत की तरह मुस्कुराया और फिर बोला, "यह तो हमारी परम्परा है. बीबी तो बीबी, हम तो माँ को भी मारते हैं." "कैसे?" छम्मकछल्लो ने पूछा. पति बडी हिकारत भरी नज़रों से छम्मकछल्लो को देखते हुए बोला, "लगता है, आप शाश्त्र-वास्त्र नहीं पढतीं. नास्तिक हैं या कम्यूनिस्ट? अरे भगवान परशुराम ने अपने पिता के कहने पर अपनी माता का सर अपने फरसे से काटा था कि नहीं?" पति आगे बोला, "हमने तो अपनी बीबी को मारा ही हैं ना, ‘मारा’ तो नहीं है ना." छम्मकछल्लो ने इस पंक्ति का अर्थ पूछा. पति छम्मकछल्लो के मूढ मगज पर हँसते हुए बोला- "पहले मारने का मतलब पिटाई करना है और दूसरे मारने का मतलब जान से मारना है." छम्मकछल्लो ने पूछा "तो क्या तुम उसकी जान लेना चाहते थे? वह भी तब, जब वह तुम्हारे बच्चे की माँ बननेवाली है?" पति बोला, "शुक्र कीजिए कि मारा ही, राजा रामचन्द्र की तरह घर से तो नहीं निकाला अपनी हामिला बीबी को? वह बडा कि मैं? राम ने तो सीता को आग में ही झोंक दिया. मगर मैंने तो केवल बिजली के झटके ही लगाए. वह बडा कि मैं? अब मारने से बीबी को थोडी चोट कग गई, बिजली के झटके लगाने से थोडी बहुत घायल हो गई तो क्या हुआ? रसोई में काम करते समय जल जाती है कि नहीं? पानी भरते समय फिसल जाती है कि नहीं? सब्ज़ी काटते समय उंगली कट जाती है कि नहीं? मैडम, बहुत लेडिगिरी कर ली. दूसरे की बीबी हो, यह जान कर छोड रहा हूं. अपने सपने से मुझे विदा करो. देखना है कि बीबी के पास पैसे आये कि नहीं. बहुत सारे काम करने हैं. इनको (अपने साथ लाए अन्य पतियों को दिखाते हुए) भी यहां से विदा करो.
छम्मकछल्लो की नींद खुल गई. वह उन पतियों के प्रति श्रद्धा से भर उठी जो अपनी या दूसरों की बीबियों को इंसान समझते हैं, उसके सुख-दुख के साझीदार बनते हैं. छम्मकछल्लो की पडोसन आंटी का अभी दो दिन पहले निधन हुआ है. उसने देखा अँकल को उनके लिए रोते हुए. इन अच्छे-अच्छे पतियों के लिए छम्मकछल्लो का मन से आभार. मगर क्या कीजियेगा सपने में आए हुए इन पतियों का, जो अपनी करतूत से दूसरे पतियों की छवि भी खराब करते हैं. छम्मकछल्लो इन अच्छे पतियों को देख कर मुदित है. आप हैं कि नहीं, बताइयेगा.

Monday, September 14, 2009

आप करते रहें हिंदी हिंदी, हिंदी हमारे ठेंगे पे

mohallalive.com पर पढ़े छम्मक्छल्लो का यह लेख। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/09/14/vibha-rani-writeup-on-hindi/
हमारे साहित्यकार बंधु लोग हिंदी के रूपों के लिए बहुत चिंतित और परेशान हैं। वे हिंदी के स्वरूप निर्धारण की बात करते हैं, हिंदी की घटती लोकप्रियता का रोना रोते हैं, युवाओं में हिंदी के प्रति घटते जा रहे आकर्षण पर सर पीटते हैं, किताबों के न बिकने की हाय-तोबा मचाते हैं, पुरस्कारों पर राजनीति को कोसते हैं, कोई लेखक-पत्रकार कुछ कह दे तो उसके आज तक के सारे रचना कर्म को टॉयलेट तक में डाल आने की बात करते हैं, मगर यह नहीं सोचते कि यह सब क्यों हो रहा है? आखिर सोचें भी क्यों? वे साहित्यकार हो गये, यही क्या कम एहसान कर दिया हिंदीवालों पर कि अब इन सब वाहियात बातों पर सोच-सोच कर अपनी सृजनात्मकता का घोटाला करें? वे सब परम संत हैं, संतों की तरह जो लिख देते हैं, वह अखंड और अक्षर ब्रह्म बन जाता है। अब उस पर कोई अपनी कुदीठ डाले तो वह तो जल कर भस्म होगा ही न उनकी क्रोधाग्नि में?
वे हिंदी की बात करते हैं, मगर राजभाषा हिंदी, बाज़ार की हिंदी, हिंदी के साहित्येतर रूपों से अभी भी बेज़ार हैं। वे सोचते हैं कि उन्होंने साहित्य लिख दिया तो सबको साहित्यानुरागी हो ही जाना चाहिए और उनके लेखन को तो घोल घोल कर पीना ही चाहिए। वे साहित्य और साहित्यिक हिंदी के लोभ से उबर नहीं सके हैं। वे यह जानने समझने की कोशिश ही नहीं करते कि दुनिया कितनी बदल गयी है, लोग कहां से कहां तक पहुंच गये हैं, लोगों की प्राथमिकताएं कितनी बदल गयी हैं। वे तो बस यह चाहते हैं कि लोग देश और भाषा के गर्व में डूब कर हिंदी को गले से लगाये फिरते रहें। इसका सबसे बड़ा घातक परिणाम तो यह सामने आ रहा है कि आज के बच्चे और युवा हिंदी से कटे जा रहे हैं। वे अंग्रेजी में पढ़ते हैं और अपने कोर्स के अलावा भी पढ़ने के लिए अंग्रेजी में इतनी सामग्री है कि हिंदी में उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आप दलील भले ही दें दें, मगर जो साहित्य हिंदी में है, वह आज के बच्चों के काम का नहीं है। खास तौर पर शहर में और अंग्रेजी माध्यम से पढ़नेवाले बच्चों के लिए। और युवाओं और बच्चों से उपेक्षित भाषा के विकास की कल्पना उतनी ही बेमानी है, जितनी बगैर पानी के बीज के अंकुरने की सोचना। वैसे भी हिंदी और इसकी विधाओं को इन महान लोगों ने इतने खानों और खांचों में बांट दिया है कि हिंदी की सर्वांगीण तस्वीर सामने आ ही नहीं पाती। अंग्रेजी की तो छोड़‍िए, अपनी ही भाषाओं, बांग्ला, मराठी, मलयाली, उर्दू आदि को देखिए। सत्यजित रे ने फिल्में भी बनायी और बाल साहित्य भी लिखे और दोनों ही क्षेत्र में उतने ही आदरणीय रहे। उर्दू के साहिर लुधियानवी, क़ैफी आज़मी, मज़रूह सुलतानपुरी आदि ने उर्दू अदब भी लिखा और फिल्मी गाने भी। मगर फिल्मी गाने लिखने के कारण उनका अदबी रूप उर्दू ने बर्खास्त नही कर दिया। हिंदी में ऐसा नहीं हो पाता। यहां साहित्य की मुख्यधारा में वही शामिल हो पाता है, जो लोकप्रियता के तराज़ू पर कठिनता से उतरे। नीरज साहित्यकार नही बन पाये, वीरेंद्र मिश्र गीतकार होने के कारण साहित्यिक कवि नहीं बन पाये। गुलज़ार फिल्म के ग्लैमर के कारण तनिक पूछ भले लिये जाते हैं, मगर साहित्यकार की पंगत उन्हें भी नसीब नहीं। बाल साहित्य जिसने लिख दिया, उसकी साहित्य में कोई पूछ ही नहीं। नाटक लिखनेवाला साहित्यकार नहीं होता। वह बिचारा तो कवि-कथाकार से भी अधिक दुर्गत झेलता है। कवि-कथाकारों की रचनाएं यहां तक कि उपन्यास भी पत्र-पत्रिकाओं में छप जाते हैं, मगर नाटक के छपने की बात पर सभी इसके आकार का रोना ले कर बैठ जाते हैं और नहीं छापते।
हिंदी के साहित्यकारों द्वारा कहा जाता है कि मीडिया और बाजार द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिंदी मीडिया और बाज़ार के ही लाभ के लिए होती है। तो भैया, जो चीज़ आज बाज़ार से जुड़ी नहीं रहेगी, वह मांग से दूर हो जाएगी। अब हाथ कंगन को आरसी क्या? अखबारों में एक समय साहित्य होता था, अब वहां से वह दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल दिया गया है। सिनेमा पर एक पृष्ठ, खेल पर तीन-तीन पन्ने होते हैं, मगर साहित्‍य के लिए एक कोना तक नहीं।
बच्चे आखिर कौन सा साहित्य पढ़ें? अंग्रेजी में पढ़े बच्चे हिंदी की किताबों में कोई नवीनता वैसे ही नहीं देखते, जैसे हिंदी फिल्मों में वे नहीं पाते। फिर उनके लिए यह समय पहले के समय से कई कई गुना अधिक चुनौतियों से भरा है। पहले तो लोगों को सरकारी नौकरी मिल जाती थी। पढ़ाई, कैरियर का इतना बड़ा दवाब है उन पर कि वे अव्वल तो कोर्स के अलावे कुछ पढ़ ही नहीं पाते, जब पढ़ने का वक़्त मिलता भी है तो उस समय में वे अधिक से अधिक जानकारी हासिल कर लेना चाहते हैं। फिर सोशल नेटवर्किंग भी है। अपने यार-दोस्त भी हैं। और इन सबसे ऊपर तो यह है कि वे क्या पढ़ें ऐसा कि पढ़ कर उन्हें लगे कि हां, नहीं पढ़ता तो कुछ छूट सा जाता। आपसी झगडे, एक दूसरे की छीछालेदर, एक दूसरे पर प्रहार और अपने को श्रेष्ठतम दिखाने की होड़। ये सभी आज के लोगों के लिए अनुत्पादक तत्व हैं और अनुत्पादक बातों में अपना समय जाया करने का न तो वक़्त है और न ही मंशा। कोई बता दे कि इन सबसे क्या किसी को कोई रोज़गार मिल सकता है, किसी का पेट एक शाम भर सकता है? मानसिक जुगाली है और यह मानसिक जुगाली भरे पेट का शगल होता है।
अंग्रेजी से बाज़ार है, इसलिए उसकी मांग है कि एक गरीब मजूर भी अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाना चाहता है। जिस दिन लोगों को यह भरोसा हो जाएगा कि केवल अंग्रेजी की तरह केवल हिंदी पढ़ लेने से भी काम, नाम, दाम, सम्मान मिल जाएगा, लोग अपने-आप हिंदी की ओर मुड जाएंगे। ऐसी हिंदी को लाने का जिम्मा क्या उन साहित्यकारों का नहीं, जो अपने-आप को हिंदी का सबसे बड़ा सेवक मानते हैं? पत्रिकाओं में पता नहीं, किन-किन विषयों पर बहसें चलाते रहते हैं। दुखद सच्चाई है कि पढ़े-लिखे अहिंदीभाषियों के घरों में अंग्रेजी के साथ-साथ उनकी मातृभाषा के भी अखबार व पत्रिकाएं आती हैं, जबकि हिंदीभाषी शिक्षित होने के बाद सबसे पहले हिंदी का अखबार, पत्रिका लेना बंद कर देते हैं।
हिंदी में हम केवल कविता, कहानी, उपन्यास लिख कर साहित्य की खानापूरी करते रहते हैं। विषय विविध हैं, मगर उस पर लिखने का वक़्त नहीं है। वक़्त से ज़्यादा उन पर लिखने-काम करनेवालों का सम्‍मान नहीं है। शब्दकोश, विकासात्मक, विज्ञान, समाज, रहस्य-रोमांच जैसे विषयों पर मौलिक किताबें नहीं हैं। हैरी पॉटर जैसी किताबें किशोरों के लिए आज कहां हैं? नर्सरी राइम्स जैसी किताबें भी हिंदी में बमुश्किल मिलती हैं। अभी भी लेखकों की लंबी क़तार है, जो नेट और उसके फायदे से कोई साबका नहीं रखते।
राजभाषा हिंदी से तो साहित्यकारों का खासा बैर भाव है ही। सरकार के बड़े-बड़े पदों पर रहे स्वनामधन्य लेखक भी यही कहते रहे कि राजभाषा हिंदी तो केवल हिंदी अधिकारी ही समझ सकता है। मैं यही पूछना चाहती हूं कि जब वे ऐसे बड़े बड़े पदों पर थे, तब उन्होंने ही राजभाषा हिंदी के स्वरूप में कोई रचनात्मक परिवर्तन क्यों नहीं किये कि राजभाषा हिंदी सरल और सहज हो जाती। कोसने से ही अगर सब कुछ हो जाता तब तो कोई समस्या ही नहीं रहती जीवन में।
हमारे साहित्यकार यह कह रहे हैं कि हिंदी गरीबों, वंचितों की भाषा रही है। यह जनपथ की ज़बान है। तो क्या मेरे भाई, इस जनपथ को राजपथ पर जाने और उससे मिलने का कोई हक़ नहीं? सत्ता जिनके हाथ में रहती है, जो नीति-निर्णायक हैं, हिंदी को उनके पास जाने दीजिए। हिंदी को अपने हिसाब से फलने-फूलने दें। हिंदी के पाठकों का रोना तब रोएं, जब उन्हें वैसी चीज़ दें। मगर सारा दोष साहित्यकार बंधुओं का ही नहीं है। हमारी अपनी मानसिकता भी है। आज हर सामान्य या अति असाधारण गैरहिंदीभाषी अंग्रेजी के साथ-साथ अपनी भाषा क एक अखबार, एक पत्रिका ज़रूर खरीदता है। हिंदी वाले सबसे पहले इसे ही बंद करते हैं। फिर आप दूसरी भाषाओं के अखबार देखें, इतनी सामग्री, इतने कलेवर होते हैं कि पूछें मत। हिंदी के अखबारों को देखें। कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।
लेकिन क्या है न कि कहने के लिए हमारे पास कुछ नहीं होता तो हम इस-उस देशी-विदेशी भाषाओं का उदाहरण देने लग जाते हैं। आज सबसे बडी ज़रूरत आत्ममंथन की है। मगर इस आत्ममंथन, आत्मचिंतन के लिए वक़्त कहां है। और अगर कुछ वक़्त है तो चलें, उस वक़्त में किसी को गरिया आएं, किसी की खाल उतार आएं, प्रगतिशीलता के नाम पर किसी की धज्जियां उतार आएं। हिंदी का क्या है! वह अमेरिका के माध्यम से, बिल गेट्स के माध्‍यम से, गूगल के माध्‍यम से, इंटरनेट के माध्यम से आ ही रही है, आएगी ही। हमारे लिए तो अभी भी साहित्य के भावों के जंगल में अहेरी बन भटकता बावरा मन है, जो अभी भी पिऊ कहां, पिऊ कहां रटता रहता है।

Sunday, September 13, 2009

आखिर हिंदी वंचितों और शोषितों की भाषा ही क्यों रहे, शासन की क्यों नहीं?

रिपोर्टर्स पेज पर पढें छम्मक्छल्लो का यह लेख. लिंक है- http://reporterspage.com/glimpse/23-22#more-687

छम्मक्छल्लो हैरान-परेशान है कि आखिर क्यों कहा जाता है कि हिन्दी वंचितों और शोषितों की भाषा है? आखिर क्यों "राजभाषा” हिंदी का प्रयोग नहीं किया जा सकता? क्यों मान लिया गया है कि "राजभाषा” हिंदी दुरूह और ना समझ में आनेवाली भाषा है? इसके सीधे-सीधे कारण हैं. सबसे पहला तो यह कि जबरन यह मान लिया गया है कि हिन्दी गरीबों, निचले तबके और अनपढ नसमझ लोगों की भाषा है. हिन्दी को इसी गरीब की भाषा मान लिये जाने के कारण इसे ऊपरी वर्ग तक जाने का मौका नहीं मिल पा रहा है. दूसरे, अगर हिन्दी में यह ऊपरी वर्ग का काम भी होने लगे तो ऊपरी वर्ग का वर्चस्व खत्म हो जायेगा, जिसे यह वर्ग क़तई नहीं चाहेगा. कौन अपनी गद्दी छोडना चाहता है? तीसरे, हिन्दी के अलग- अलग रूपों की चर्चा कर-कर के यह साबित करने के कोशिश की जाती रही है कि हिन्दी गम्भीर विषयों के लिए नहीं है. आप कहानी-कविता, नाटक, फिल्म तो हिन्दी में लिख-बना सकते हैं, मगर इन पर चर्चा करनी हो तो वह हिन्दी में नहीं हो सकती. मतलब, मनोरंजन हिन्दी में, मगर विचार अंग्रेजी में.

सवाल है कि राजभाषा हिन्दी का प्रयोग क्यों नहीं होना चाहिये? क्यों इसे भी हिन्दी का एक सामान्य स्वरूप मानकर स्वीकार नहीं किया जाता? क्यों यह तर्क दिया जाता है कि राजभाषा हिन्दी बहुत कठिन होती है और यह सभी के सर के ऊपर से निकल जाती है. दर असल, हिन्दी को स्वीकार न करनेवाले कुछ लोगों ने हिन्दी को चन्द मज़ाकिया जुमले में ढाल कर यह कहने की कोशिश की कि देख लो, अगर हिन्दी में काम करना पडा तो ऐसी हिन्दी बोलनी पडेगी. ज़ाहिर है कि ऐसी हिन्दी से सभी बिदक गये. जो हिन्दी नहीं चाहते थे, उनकी बन आई. हम वैसे भी कुछ करने से पहले सोचते कम हैं, सो कुछ ने कोई फतवा दे दैया तो ले उदे, जैसे कोई कहे कि कौआ कान ले उड तो बगैर अपने कान जांचने के, कौए के पीछे भाग चले. कहीं भी आप जाये, कोई भी भाषा बोलें, वह अपने व्याकरण और विन्यास में एक ही होती है, सिर्फ उसके प्रयोग के स्थल अलग-अलग होने से उसके स्वरूप में परिवर्तन होते रहते हैं. सोचिए कि एक सब्ज़ीवाले और एक कॉलेजवाले से एक ही तरीके से बात की जा सकती है क्या? क्या आवेदन पत्र और प्रेम पत्र की एक ही भाषा हो सकती है?

राजभाषा हिन्दी के लिए यह भी कुतर्क दिया जाता रहा है कि इसके शब्द बहुत कठिन होते हैं, जबकि शब्दों के ज्ञाता जानते हैं कि प्रयोग से ही शब्दों से अजनबियत मिटती है. सुनामी या कटरीना के आने से पहले किसी ने इसका नाम भी नहीं सुना था, मगर आज सभी इसे जानते हैं. गूगल, ऑर्कुट, याहू, रेडिफ से क्या आज हम परिचित नहीं हुए हैं? 20 साल पहले ये सब शब्द बडे डरावने लगते थे. लोग तो तब ऑफिस के कम्प्यूटर तक नहीं छूते थे. शब्द हमारी ज़रूरत के मुताबिक बनते हैं, गढे जाते हैं, प्रयोग में लाए जाते हैं. आज़ादी के बाद हमें अपनी भाषा गढनी थी, हमने गढी, मगर उसे स्वीकार करने के बजाय हम उसे मज़ाक में लेते रहे. इस बात पर बल देते रहे कि सरल हिन्दी का प्रयोग करें. इस सरलता की तह में जाने पर पता चलता था कि अंग्रेजी के शब्दों को जस के तस बोलते चले जाओ. सरक हिन्दी हो जायेगी. नतीजा यह हुआ कि हम बोलते तो हैं हिन्दी, मगर इस्तेमाल करते हैं मैनेजर, डायरेक्टर, ऑफिस, प्रिंसिपल, न कि प्रबँधक, निदेशक, कार्यालय, प्राचार्य. ध्यान दें कि ये सभी शब्द हिन्दी में पहले से ही हैं, फिर भी इनका प्रयोग करने से हमें हिन्दी के कठिन होने का भय दिखाया जाता रहा.

राजभाषा हिन्दी के लिए भी सारे कुतर्क गढने में माफ करें, हमारे हिन्दीभाषियों ने ही अधिक भूमिका निभाई है. हिन्दी उनकी भाषा रही है और इसका खामियाज़ा यह कह कर उन्होंने दिया कि हिन्दी-विन्दी पढने से क्या होत है? हिन्दी में काम करना बकवास है. राजभाषा हिन्दी के क्षेत्र में काम करते हुए यह मेरा अनुभव रहा है कि अहिन्दीभाषी हिन्दी को जितना अधिक महत्व देते हैं, हिन्दीभाषियों को मैने हिन्दी की उपेक्षा करते या उसका मज़ाक उडाते ही अधिक देखा. जब कभी हिन्दीभाषी अफसरों से सामना हुआ, वे निखालिस अंग्रेजी में बोलते रहे और साथ ही साथ यह भी जताते रहे कि उन्हें अंग्रेजी आती है और यह कि हिन्दी में काम करना? "बुलशिट." लेकिन जब कभी अहिन्दी भाषी अफसरों से सामना हुआ. वे अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में न केवल बतियाते रहे, बल्कि यह भी बताया कि कब-कब, कहां-कहां वे हिन्दी का प्रयोग कर लेते हैं.

हिन्दी कबतक दुख-दर्द और नाटक मनोरंजन का माध्यम बनी रहेगी? कबतक यह केवल वंचितों की ज़बान बनी रहेगी? ध्यान रहे कि जबतक यह केवल वंचितों की ज़बान बनी रहेगी, कोई इस पर गम्भीरता से नहीं सोचेगा. राजभाषा हिन्दी के प्रयोग में दिक्कत क्या है? दफ्तरों में एक तयशुदा तरीके से काम होता है. सभी तरह के पत्रों के तय प्रारूप होते हैं. आप अंग्रेजी में लिखें या हिन्दी में, प्रारूपों को कोई फर्क़ नहीं पडनेवाला. महज 200-300 अंग्रेजी शब्दों में सारा काम होता है. हिन्दी में भी लगभग इतने ही शब्द रहते हैं. जब हम अंग्रेजी सीख सकते हैं तो क्या इतनी हिन्दी नहीं सीख सकते? दूसरी बात कि भारत में अंग्रेजी का एक सीखा सिखाया रूप ही प्रयुक्त होता है, जबकि हिन्दी अपनी भाषा होने के कारण इसकी व्यापकता बडी हो जाती है. अलग अलग तरीके से लोग एक ही शब्द का प्रयोग करते हैं. आखिर सीखी हुई सीमित अंग्रेजी और स्वाभाविक रूप से फैली-पसरी हिन्दी का यह भेद तो उसकी सम्रृद्धि का दस्तावेज़ है, जिस पर गर्व करने के बदले उस पर शर्म करने जैसी स्थिति बना दी गई है. तीसरी बात, कोई भी भाषा सुनने से अधिक प्रचलन में आती है. हम आज कहने को तो हिन्दी बोलते हैं, मगर उसके वाक्य विन्यास ही केवल हिन्दी की प्रकृति के अनुसार होते हैं, पूरे वाक्य में जितना मुमकिन हो सकता है, अंग्रेजी के शब्द घुसा दिए जाते हैं. हम यह कहते हैं कि "आज एमडी ने अर्जेंट मीटिंग कॉल की है." यह नही कहते कि "प्रबंध निदेशक ने आवश्यक या अत्यावश्यक बैठक बुलाई है." कोई यह बताए कि इसमें ऐसा कौन सा शब्द है, जो लोगों की समझ में नहीं आता? मगर इस्तेमाल न करने की वज़ह से यह सुनने में अटपटा लगता है और तब हम सीधा-सीधा फतवा दे देते हैं कि राजभाषा हिन्दी है ही ऐसी. कोई बोले तो उसका इस कदर मजक उडाया जाने लगता है कि वह बोलने से तौबा कर ले और फिर हम दुन्दुभी बजा-बजा कर कहने लगते हैं कि राजभाषा हिन्दी- बाबा रे बाबा!
यह सोचिए कि ऐसा कह कर हम हिन्दी के ही एक स्वरूप को नष्ट करते आये हैं और अभी तक कर रहे हैं. राजभाषा हिन्दी का प्रयोग राज-काज के लिए है तो उसका प्रयोग भी राज-काज में ही होगा. कानून की भाषा का प्रयोग घर में सब्ज़ी बनाते समय या पार्टी मनाते समय् तो नही किया जा सकता है, जैसे बनारसी साडी पहन कर बाजार-हाट नहीं जाया जाता. लेकिन शादी-ब्याह पर भी अगर इसे नहीं पहना जाय तो घर में ऐसे कपडों के होने का मतलब क्या है? राज-काज में हिन्दी का प्रयोग होगा तो हिन्दी का वर्चस्व बढेगा और तब शासन की ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुकमरान इसकी ज़रूरत को समझने पर बाध्य होंगे और झक मार कर इसका प्रयोग करेंगे. वैसे कहनेवाले जितना भी कहें, हिन्दी बडी जीवट भाषा है और तमाम बाधाओं के बाद भी अपनी मंज़िल तय करती ही आ रही है. जिस तरह से वह सम्पर्क भाषा के रूप में अपनी पहचान बनाती जा रही है, उसी तरह से वह राजभाषा हिन्दी के क्षेत्र में भी आगे बढती आ रही है. आज से 20-25 साल पहले तक अफसरान हिन्दी बोलना पसन्द तक नहीं करते थे, आज दफ्तरों में देखिए, अंग्रेजी से कब वे हिन्दी में उतर आते हैं, उन्हें भी पता नहीं चलता. पहले हिंन्दी के नाम पर सभी कडुआ मुंह बनाते थे. हिन्दी में पत्र लिख दिया तो उसका अनुवाद मांगा जाता था, लिखनेवाले से यह तक कह दिया जाता था कि अंग्रेजी में पत्र लिख कर लाओ. आज यह जागरुकता अधिकारियों के बीच बढी है और अब वे ऐसी मांग नहीं करते. राजभाषा नियम और नीति से भी वे पहले से अधिक परिचित हुए हैं. कम्प्यूटर पर हिन्दी अने से और इंग्लिश फोनेटिक में हिन्दी में टाइप करने की सुविधा के कारण अब उनकी निर्भरता अपने स्टाफ पर से खत्म हुई है. अब वे ख़ुद भी हिन्दी में काम कर लेते हैं. हिन्दी के शब्दों से उनकी परिचिति बढी है और वे खुद भी (ख़ासकर अहिन्दीभाषी) खिचडी भाषा के बदले शुद्ध हिन्दी के प्रयोग को असधिक वरीयता देते हैं. अब यह हम पर है कि हम अब भी राजभाषा हिन्दी कठिन है का रोना रोते रहें या उसे सत्ता के ऊंचे और ऊंचे पायदान पर ले जाने की कोशिश करें. राजभाषा हिन्दी कोई लाल कपडा नहीं है और ना ही हम भैंस. फिर भी उसे देख कर हम बिदकते हैं तो यह हमारी ही ख़ामी है.

Friday, September 4, 2009

हम बहुत धार्मिक हैं. इसलिये हम कुछ नहीं करेंगे.

हम बहुत धार्मिक हैं. इतने कि जब-तब हमारी धार्मिक भावना आहत होती रहती है. ज़ाहिर है कि यह आहत करने का काम कोई दूसरा ही करेगा. हम कभी भी अपने -आप से आहत नहीं होते. कोई अपने पैरों पर खुद से कुल्हाडी मारता है क्या?
देश धार्मिक है, हम धार्मिक हैं तो सारे समय देश में धर्म की धज फहराती रहती है. श्रावण मास के आते ही पूजा-पाठ, व्रत-उपवास के अम्बार लग जाते हैं. जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसी भक्ति. आखिरकार यह धर्म और उससे उपजी श्रद्धा का मामला है.
मुँबई में ग़नपति यानी गणेश चतुर्थी का बहुत महत्व है. इसकी महिमा तो अब इतनी है कि अब मुंबईकर या महाराष्ट्रीयन से अधिक गैर मुंबईकर या ग़ैर महाराष्ट्रीयन इसे मनाते हैं. चलिये, इससे कोई फर्क़ नहीं पडता कि कौन सा पर्व कौन मना रहा है. छम्मक्छल्लो को अपना कलकता-प्रवास याद आता है, जब उत्तर भारतीयों का एक दल अष्टयाम के लिए चन्दा मांगने पहुंचा था और इस बिना पर अधिक चन्दा चाह रहा था, क्योंकि यह "अपनी" पूजा है. गैर की पूजा कौन सी हुई, यह पूछने पर तपाक से उत्तर भी मिला था कि वही, जो बंगाली लोग सब करता है, यानी कि दुर्गा पूजा. छम्मक्छल्लो को हंसी आ गई थी यह सुनकर कि अब दुर्गा पूजा खालिस बंगालियों की पूजा हो गई.
पूजा कोई भी हो, कोई भी करे, श्रद्धा जैसा तत्व सभी में एक समान रहता है. सभी अपनी अपनी श्रद्धा, आस्था से पूजा करते हैं, मगर बस पूजा तक. सभी पूजा में विसर्जन की भी प्रथा है. विसर्जन के बाद देवी-देवता का आसन हिला दिया जाता है, कह दिया हाता है-"स्वस्थानम गच्छतु:" यानी," हे देव, आप जहां से आये थे, वहीं के लिए पुन: प्रस्थान कीजिये". टपोरी ज़बान में कहें तो " जा रे बाबा, अपने घर जा, बहुत किया तेरा, खाली-पीली अब ज्यास्ती मुंडी पर बैठने का नहीं". और फिर देव प्रतिमा जा कर पानी में डाल आइये. पानी में डालने तक तो खूब जय-जय, खूब-खूब श्रद्धा का प्रदर्शन, और पानी में डालने के बाद पीठ फेरते ही देव, तू जा खड्डे में.
गणपति का विसर्जन दूसरे दिन, पांचवे दिन, सातवें दिन और दसवें दिन यानी कि अनंत चतुर्दशी के दिन होता है. हर दिन के विसर्जन के दूसरे दिन समुद्र का किनारा छम्मक्छल्लो ने देखा - फूल, पत्ते, माला, के अलावे अंग-भंग हुई प्रतिमा. सिर कहीं तो हाथ कहीं तो सूंढ कहीं. समुद्र तो अपनी लहरों में कुछ बहा कर ले जाता नहीं. वह दूसरे दिन "त्वदीयं वस्तु गोविन्दे, तुभ्यमेव समर्पिते" की तरह किनारे पर सबकुछ छोड देता है. भक्तों की श्रद्धा यहां काम नहीं करती. वह इन सबसे भी दूर रहती है कि इन मूर्तियों के बनने या उनके सजावट में कितने केमिकल्स का इस्तेमाल हुआ? इन केमिकल्स से समुद्रे जीव का कितना नुकसान होगा? आस-पास कितनी गन्दगी फैलेगी, उससे कितनी बीमारियां होंगी? यह सब होता है, होने दो. ग्लोबल वार्मिंग बढ रही है, बढने दो. देश भर में बारिश कम हुई, होने दो, पर्यावरणवादी लाख प्रदूषण -प्रदूषण चिल्लाते रहें, चिल्लाने दो. अपन का क्या? अपन इन सबले लिए थोडे ना बने हैं. इन सबके लिए एनजीओ और पागल लोग हैं जो कुछ ना कुछ करते रहते हैं. आखिर उनको भी तो काम-नाम मिलना चाहिये कि नहीं?
एक ने कहा कि पूजा-पाठ पर इतना खर्च ना करके ये सार्वजनिक वले इन पैसों से स्कूल-कॉलेज, अस्पताल क्यों नहीं खुलवाते? असमर्थ बच्चों की फीस क्यों नहीं भर देते? गरीबों का इलाज क्यों नहीं करा देते? फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया कि तब लोग उनके बारे में जानेंगे कैसे? या फिर इन सब पचडे में कौन पडे? अपन का काम तो बस मस्ती करने का है, सो करेंगे. बाकी दुनिया जहन्नुम में जाये. एक ने कह, सरकार को फिक्स कर देना चाहिये कि इतनी संख्या से और इतनी ऊंचाई से ज़्यादा की मूर्ति नहीं बनेगी. फिर खुद ही उत्तर भी दे दिया- " धर्म के मामले में तो सरकार भी नहीं बोलेगी"
छम्मक्छल्लो को एक लतीफा याद आ गया. अलग-अलग धर्मों के कुछ आदमी एक नाव पर सवार थे. नाव में छेद हो गया. पानी भर गया. नाव डूबने लगी. सभी ने अपने-अपने धर्म के भगवानों को याद किया और सभी धर्म के देवता आ कर उनकी जान बचा गये. एक ने गणपति को पुकारा. गणपति आये और नाचने लगे. आदमी ने गुस्से से कहा, "मेरी जान जा रही है, मैने अपनी जान बचाने के लिए आपको पुकारा औअर आप हैं कि जान बचाने के बदले नाच रहे हैं? गणपति ने कहा, "याद करो, जब मैं डूब रहा होता हूं तब तुमलोग भी इसी तरहे से नाच रहे होते हो." और गणपति वहां से अंतर्ध्यान हो गये. हम भी उनके विसर्जन के बाद वहां से अंतर्ध्यान हो जाते हैं. अपनी-अपनी श्रद्धा है. कोई कचरा लगाता है, भगवान के नाम पर तो कोई उसकी साफ-सफाई करता है, भगवान के ही नाम पर.

Thursday, August 27, 2009

छम्मक्छल्लो के ब्लॉग पर रविश कुमार जी ने दैनिक हिन्दुस्तान (२६ अगस्त, २००९) में लिखा है। उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद। लिंक यहाँ है।

http://mail.google.com/mail/?ui=1&view=att&th=12355391c8a4825b&attid=0.1&disp=inline&realattid=f_fytmxdl00&जव

Saturday, August 22, 2009

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

तो अब बारी है प्रभाष जोशी की. लोग कह रहे हैं कि वे ब्राहमण्वाद पर पिल गये हैं. क्यों भई, आपलोगों को नहीं पता कि इस हिन्दुस्तान से ज़ातिवाद नहीं जानेवाला. और इसके पहरुए वे ही होते हैं जो ऊपर से धर्म- निरपेक्षता के बडे-बडे दावे करते हैं मगर बेटी की शादी की बात आने पर कट्टर हिन्दू बन जाते हैं.
छ्ammakछ्allo ko समझ नहीं आता कि ऐसे लोगों पर बहस चला कर हम क्यों अपना और दूसरों का समय ज़ाया करते हैं?
सुना है कि इश्क़ में लोगों की चर्चाएं बडी होती हैं. यह भी कहा जाता है कि इश्क़िया माहौल बडा सूफियाना होता है और इश्क़ की लौ जब ख़ुदा से लग जाए तब इश्क़ आध्यात्मिक हो जाता है.
हमारे समाज में सेलेब्रेटी के नाम से जो एक कौम उभरी है, वे इसी इश्क़ की गिरफ्त में हैं. समाज का यह सेलेब्रेटी पहले फिल्म उद्योग से निकल कर आता था. मगर अब समाज का दायरा बढा है तो हर क्षेत्र का भी दायरा बढा है. लोग अब प्रसिद्धि को सेलेब्रेशन की संग्या देते हैं और प्रसिद्ध को सेलेब्रेटी कहते हैं.
तो अब समाज सेलेब्रेटी का है, जो जितना ज़्यादा मशहूर, वह उतना ही बडा सेलेब्रेटी. लेखक, पत्रकार सभी सेलेब्रेटी हैं. सेलेब्रेटी की सबसे बडी ख़ासियत यह होती है कि वह हमेशा ख़बरों में बने रहना चाहता है और ख़बरों में बने रहने के लिए वह कोई भी चाल चलता रहता है. हम जैसे पागल और सनकी लोग उन्हें अपनी ख़बरों में लेने को आतुर बने रहते हैं. शायद अपने सेलेब्रेटी न बन पाने की खाज इसी बहाने खुजला लेना चाहते हैं.
प्रभाष जोशी आज सती प्रथा के पक्ष में बोल रहे हैं तो कोई गलत बोल रहे हैं क्या? लोग तो मूड और मिजाज की तरह पल-पल अपने वक्तव्य बदलते रहते हैं. मगर आपको दाद देनी चाहिये कि उम्र, अनुभव, प्रसिद्धि के इस पडाव पर भी वे अपनी बात भूले नही हैं और न ही अपने वक्तव्य बदले ही हैं. आप सबको याद होगा ही कि रूप कुंअर के सती होने पर इन्हीं प्रभाष जोशी ने इसका समर्थन किया था. तब ये शायद जनसत्ता के सम्पादक थे. बडी मात्रा में लोगों ने उनकी इस बात का विरोध किया था. एक्सप्रेस कार्यालय के सामने उनके ख़िलाफ नारे लगाए थे, नुक्कड नाटक खेले थे. अब इतने बरसों बाद भी अगर वे सती प्रथा के समर्थन में बोलते हैं तो आपको तो खुश होना चाहिये कि वे अपनी बात भूले नहीं हैं. उम्र के इस मोड पर भी, जब लोग इस उम्रवाले को बुड्ढा, कूढ मगज और जाने क्या-क्या कहने लगते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि प्रभाष जोशी अब उम्र के इसी मुकाम पर पहुंच गये हैं जहां तिष्यरक्षिता के बूढे सम्राट अशोक की नाईं उनके प्रति सहानुभूति ही जताई जा सकती है.
सरकार भी साठ साल की उम्र के बाद लोगों को सेवा से निवृत्त कर देती है. मगर हम हैं कि प्रभाष जोशी जैसे लोगों की उम्र पर रहम ही नहीं करना चाहते हैं. क्या हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में नये लोग आज के आइकन बनने की कूवत नहीं रखते या हमारे भीतर ही इतनी भी अक्ल नहीं है कि ऐसे लोगों की बातों को एक बूढे का प्रलाप मान कर उसे या तो उपेक्षित कर दें या उसे भूल जायें. याद रखें कि ये सब सेलेब्रेटी हैं और इन्हें अपने को ख़बर में बनाए रखना आता है और इसके लिए ये हर चाल चलेंगे ही चलेंगे. हम क्यों ऐसे शिकारियों के जाल में फंसते हैं यह रटते हुए कि "शिकारी आयेगा, जाल बिछयेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं."
प्रभाष जोशी जी सीता को सती बना गये. अपने देश की हर महान नारी सती ही होती है, भले ही वह पति द्वारा लगाई गई आग में जले या ना जले. सती तो कुंती भी रही जिसने पति की आग्या से अन्य पुरुषों के साथ संसर्ग करके अपने पति को अपने बच्चों का पिता बनाया. सती तो द्रौपदी भी हुई, जिसे एक को चाहने के एवज में पांच-पांच पतियों की पत्नी बनना पडा. आज का समय होता तो शायद कह दिया जाता कि "अरे वाह! एक पर चार फ्री?" सती तो भारती मिश्र भी हुई, जिसने पराजित होते अपने पति मँडन मिश्र के बदले शंकराचार्य से शास्त्रार्थ कर के पति को जिता दिया था और सती तो भंवरी देवी भी है, जो समाज के कल्याण की खातिर जाने कितनों की वासना के दंश झेल आई. मगर हमारा समाज सती इसे नहीं मानता. वह सती उसे मानता है, जो अपने मृत पति की चिता में रूप कुंअर की तरह जीवित जल जाती या जला दी जाती है. तो प्रभाष जोशी जी से पहले पूछें कि जब से वे वयस्क हुए हैं, तब से उनके घर में कोई तो विधवा हुई होगी? तो सती प्रथा के समर्थक के रूप में क्या उसे उन्होंने समाज की मान्यता के अनुसार सती बनाया, क्योंकि कहा भी गया है- "चैरिटी बिगिंस एट होम." ऊपरवाला प्रभाष जोशी जी को लम्बी उम्र दें, मगर फिर भी एक बार यह सोचने में आ जाता है कि उनके न रहने पर (धृष्टता के लिए माफी) वे यह वसीयत करके जायेंगे कि उनकी पत्नी उनके साथ सती हो जायें? या क्या वे यह गारंटी दे सकते हैं कि उनकी धर्म पत्नी उनकी इस वसीयत को पूरा-पूरा सम्मान देते हुए सती हो ही जायेंगी या उनके घरवाले उन्हें ऐसा कर ही लेने देंगे? प्रभाष जोशी जी की मति भ्रष्ट हो जाने से क्या उनके पूरे परिवार का माथा फिर जाएगा? नहीं ना. तो फिर उनकी भ्रष्ट मति पर आप क्यों माथा पीट रहे हैं?