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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Saturday, April 30, 2011

चंदा – स्विस बैंक की खातिर.



छम्मकछल्लो नाम नहीं
, काम की बात कर रही है- चंदा रे, चंदा रे, कहीं से जमीं पर आ, बैठेंगे, बातें करेंगे...! गीत गाने के लिए नहीं और न ही किसी चंदा नाम की किसी लडकी पर मरने के लिए. भाई असांजे ने जब से यह कहा है कि भारतीयों के खाते भी स्विस बैंक में है, तब से छम्मकछल्लो की भी महत्वाकांक्षा को पंख लग गए हैं. अपने पंख के बलबूते तो वह आसमान के चंदा तक तो पहुंच सकती है, मगर धरती पर बसे स्विस बैंक में खाता खोलने के लिए धरती का चंदा जरूरी है.
छम्मकछल्लो को इस देश के लोगों की नादानी पर बडी हैरानी होती है कि बाहर से कुछ आने पर ही हम उसे गम्भीरता से लेते हैं, सबकुछ शीशे की तरह साफ होने के बावज़ूद. सभी जानते हैं, भ्रष्टाचार क्या है. माननीय सुप्रीम कोर्ट तक इसपर अपने विचार जब तब देती रही है. फिर भी, इसकी सुनामी आने तक लोग अपने शब्दकोश में भ्रष्टाचार का दाखिला ही नहीं मान पा रहे थे. अचानक भ्रष्टाचार की हवा चली. सभी उसमें उड लिए. लगा कि एक ही आंदोलन में भ्रष्टाचार की जड में ऐसा मट्ठा पड जाएगा कि आगे कभी यह अंकुराएगा ही नहीं. फलने-फूलने की बात ही जाने दीजिए.
एक विकीलीक्स ने देश के बारे में कुछ खुलासा कर दिया. सभी ऐसे उछले, मानो इसे कभी जानते ही नहीं थे. अभी असांजे भाई साब ने खुलासा कर दिया कि भारतीय पैसे भी स्विस बैंक में हैं. सभी ऐसे चौंके, जैसे यह जापान के सुनामी की तरह एकदम नई बात हो. देश भर में मोबाइल मेसेज के तहत खबर चल रही है कि अगर सभी भारतीय के जमा पैसे भारत में वापस आ जाएं,तो देश गरीब रहेगा ही नहीं.
छम्मकछल्लो की समझ में एक ही बात आ रही है कि अब बुढापे की ओर बढती उसकी उम्र में पैसे की बहुत ज़रूरत पडेगी. अबतक जो कमाया, उसे घर, गृहस्थी में लगा दिया. काश कि कुछ पैसे यहां भी डाले होते. लेकिन उसके लिए तो इतनी आमदनी चाहिए ना कि वह अपनी जरूरत से ऊपर हो.
छम्मकछल्लो को बडा बनने का भी बडा शौक है. यहां पैसे हमारे जैसे भुक्खड तो डालते नहीं होंगे. वह नाम, दाम दोनों चाहती है. इसलिए, सभी से निवेदन कर रही है कि सभी उसकी कामना के हवन में धन की समिधा भेजें, ताकि वह भी हवन का प्रसाद स्विस बैंक में रख सके और अपने आपको बडे लोगों की गिनती में शुमार कर सके, साथ ही, अपने बुढापे में होनेवाले अतिशय खर्च के भय से भी मुक्त हो जाए. अभी दो दिन पहले ही उसने अपने साध्वी बनने की घोषणा अपने ब्लॉग पर, फेसबुक पर  कर दी है. तो माते छम्मकछल्लेश्वरी के लिए अपनी संचित निधि का दान करो. माया तो महाठगिनी है, यूं ही आनी है जानी है, उसका क्या!  अब क्या माया रखना और उसके लिए क्या लोभ करना. दान से इहलोक और परलोक दोनों सुधरते हैं. इसलिए, ओ ब्लॉगिए, ओ ई-मेलिए, ओ वेबसाइटिए, ओ फेसबुकिये फ्रेंडस! जल्दी से भेजो, जल्दी जल्दी सुधरो और सुधारो, क्योंकि स्विस बैंक की लूट है, लूट सके से लूट, अंत काल पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट.

Saturday, August 22, 2009

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे

तो अब बारी है प्रभाष जोशी की. लोग कह रहे हैं कि वे ब्राहमण्वाद पर पिल गये हैं. क्यों भई, आपलोगों को नहीं पता कि इस हिन्दुस्तान से ज़ातिवाद नहीं जानेवाला. और इसके पहरुए वे ही होते हैं जो ऊपर से धर्म- निरपेक्षता के बडे-बडे दावे करते हैं मगर बेटी की शादी की बात आने पर कट्टर हिन्दू बन जाते हैं.
छ्ammakछ्allo ko समझ नहीं आता कि ऐसे लोगों पर बहस चला कर हम क्यों अपना और दूसरों का समय ज़ाया करते हैं?
सुना है कि इश्क़ में लोगों की चर्चाएं बडी होती हैं. यह भी कहा जाता है कि इश्क़िया माहौल बडा सूफियाना होता है और इश्क़ की लौ जब ख़ुदा से लग जाए तब इश्क़ आध्यात्मिक हो जाता है.
हमारे समाज में सेलेब्रेटी के नाम से जो एक कौम उभरी है, वे इसी इश्क़ की गिरफ्त में हैं. समाज का यह सेलेब्रेटी पहले फिल्म उद्योग से निकल कर आता था. मगर अब समाज का दायरा बढा है तो हर क्षेत्र का भी दायरा बढा है. लोग अब प्रसिद्धि को सेलेब्रेशन की संग्या देते हैं और प्रसिद्ध को सेलेब्रेटी कहते हैं.
तो अब समाज सेलेब्रेटी का है, जो जितना ज़्यादा मशहूर, वह उतना ही बडा सेलेब्रेटी. लेखक, पत्रकार सभी सेलेब्रेटी हैं. सेलेब्रेटी की सबसे बडी ख़ासियत यह होती है कि वह हमेशा ख़बरों में बने रहना चाहता है और ख़बरों में बने रहने के लिए वह कोई भी चाल चलता रहता है. हम जैसे पागल और सनकी लोग उन्हें अपनी ख़बरों में लेने को आतुर बने रहते हैं. शायद अपने सेलेब्रेटी न बन पाने की खाज इसी बहाने खुजला लेना चाहते हैं.
प्रभाष जोशी आज सती प्रथा के पक्ष में बोल रहे हैं तो कोई गलत बोल रहे हैं क्या? लोग तो मूड और मिजाज की तरह पल-पल अपने वक्तव्य बदलते रहते हैं. मगर आपको दाद देनी चाहिये कि उम्र, अनुभव, प्रसिद्धि के इस पडाव पर भी वे अपनी बात भूले नही हैं और न ही अपने वक्तव्य बदले ही हैं. आप सबको याद होगा ही कि रूप कुंअर के सती होने पर इन्हीं प्रभाष जोशी ने इसका समर्थन किया था. तब ये शायद जनसत्ता के सम्पादक थे. बडी मात्रा में लोगों ने उनकी इस बात का विरोध किया था. एक्सप्रेस कार्यालय के सामने उनके ख़िलाफ नारे लगाए थे, नुक्कड नाटक खेले थे. अब इतने बरसों बाद भी अगर वे सती प्रथा के समर्थन में बोलते हैं तो आपको तो खुश होना चाहिये कि वे अपनी बात भूले नहीं हैं. उम्र के इस मोड पर भी, जब लोग इस उम्रवाले को बुड्ढा, कूढ मगज और जाने क्या-क्या कहने लगते हैं. क्या आपको नहीं लगता कि प्रभाष जोशी अब उम्र के इसी मुकाम पर पहुंच गये हैं जहां तिष्यरक्षिता के बूढे सम्राट अशोक की नाईं उनके प्रति सहानुभूति ही जताई जा सकती है.
सरकार भी साठ साल की उम्र के बाद लोगों को सेवा से निवृत्त कर देती है. मगर हम हैं कि प्रभाष जोशी जैसे लोगों की उम्र पर रहम ही नहीं करना चाहते हैं. क्या हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में नये लोग आज के आइकन बनने की कूवत नहीं रखते या हमारे भीतर ही इतनी भी अक्ल नहीं है कि ऐसे लोगों की बातों को एक बूढे का प्रलाप मान कर उसे या तो उपेक्षित कर दें या उसे भूल जायें. याद रखें कि ये सब सेलेब्रेटी हैं और इन्हें अपने को ख़बर में बनाए रखना आता है और इसके लिए ये हर चाल चलेंगे ही चलेंगे. हम क्यों ऐसे शिकारियों के जाल में फंसते हैं यह रटते हुए कि "शिकारी आयेगा, जाल बिछयेगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं."
प्रभाष जोशी जी सीता को सती बना गये. अपने देश की हर महान नारी सती ही होती है, भले ही वह पति द्वारा लगाई गई आग में जले या ना जले. सती तो कुंती भी रही जिसने पति की आग्या से अन्य पुरुषों के साथ संसर्ग करके अपने पति को अपने बच्चों का पिता बनाया. सती तो द्रौपदी भी हुई, जिसे एक को चाहने के एवज में पांच-पांच पतियों की पत्नी बनना पडा. आज का समय होता तो शायद कह दिया जाता कि "अरे वाह! एक पर चार फ्री?" सती तो भारती मिश्र भी हुई, जिसने पराजित होते अपने पति मँडन मिश्र के बदले शंकराचार्य से शास्त्रार्थ कर के पति को जिता दिया था और सती तो भंवरी देवी भी है, जो समाज के कल्याण की खातिर जाने कितनों की वासना के दंश झेल आई. मगर हमारा समाज सती इसे नहीं मानता. वह सती उसे मानता है, जो अपने मृत पति की चिता में रूप कुंअर की तरह जीवित जल जाती या जला दी जाती है. तो प्रभाष जोशी जी से पहले पूछें कि जब से वे वयस्क हुए हैं, तब से उनके घर में कोई तो विधवा हुई होगी? तो सती प्रथा के समर्थक के रूप में क्या उसे उन्होंने समाज की मान्यता के अनुसार सती बनाया, क्योंकि कहा भी गया है- "चैरिटी बिगिंस एट होम." ऊपरवाला प्रभाष जोशी जी को लम्बी उम्र दें, मगर फिर भी एक बार यह सोचने में आ जाता है कि उनके न रहने पर (धृष्टता के लिए माफी) वे यह वसीयत करके जायेंगे कि उनकी पत्नी उनके साथ सती हो जायें? या क्या वे यह गारंटी दे सकते हैं कि उनकी धर्म पत्नी उनकी इस वसीयत को पूरा-पूरा सम्मान देते हुए सती हो ही जायेंगी या उनके घरवाले उन्हें ऐसा कर ही लेने देंगे? प्रभाष जोशी जी की मति भ्रष्ट हो जाने से क्या उनके पूरे परिवार का माथा फिर जाएगा? नहीं ना. तो फिर उनकी भ्रष्ट मति पर आप क्यों माथा पीट रहे हैं?

Tuesday, August 18, 2009

आप पति-पत्नी हैं? न, न, ऐसा मत पूछें.

बात लगभग २० साल पुरानी है. विभा रानी मुंबई आई ही आई थी. १९८९ का साल. १९९० में अजय ब्रह्मात्मज भी आ गए. विभा रानी साहित्य लिखती हैं, अजय ब्रह्मात्मज तब साहित्यानुरागी भी थे. मुंबई के वे संघर्ष के दिन थे. विभा रानी दफ्तर के अलावा लेखन में संघर्ष कर रही थी, अजय ब्रह्मात्मज पत्रकारिता में. तब साहित्य से इतना वैर न हुआ था. साहित्यिक कार्यक्रमों की वे शोभा में वे चार चाँद लगा दिया करते थे. 
पहल पत्रिकाऔर  उसके सम्पादक ज्ञानरंजन जी. विभा रानी उन दोनों को बहुत सम्मान देती रही है, अजय ब्रह्मात्मज भी. विभा रानी ज्ञानरंजन जी को पात्र लिखा करती थी, अजय ब्रह्मात्मज भी . ज्ञानरंजन जी विभा रानी के पत्रों के उत्तर भी देते थे और अजय ब्रह्मात्मज के भी. विभा रानी तो उनके पात्र पा कर गदगद हो जाया करती थी,  अजय ब्रह्मात्मज दुनिया के उन चाँद शख्सियतों में से हैं, जिन्हें लोग पात्र लिखा करते हैं. लोग उनसे संपर्क साधते हैं. यह पता तब चला जब एक पात्र में विभा रानी को ज्ञ्नारंजन जी ने लिखा-" आपके पड़ोस में अजय ब्रह्मात्मज जी रहते हैं. मैंने उन्हें कई पात्र लिखे हैं, मगर वे मेरे पत्रों के जवाब नहीं दे रहे. आप उनसे कहें कि वे मेरे पत्रों के जवाब दें." विभा रानी ने लिखा- "अजय ब्रह्मात्मज जी मेरे पड़ोस में नहीं, मेरे घर में रहते हैं और मेरे पति कहलाते हैं." द्न्यन्रंजन जी का छूटते ही दूसरा पात्र आया- "मैं अपनी मूर्खता पर बड़ी देर तक हंसता रहा. दरअसल, मैंने केवल लोखंडवाला याद रखा, घर का नंबर नहीं. पर चलिए, इसी बहाने आप दोनों के रिश्ते का पता तो चल गया."
विभा रानी व् अजय ब्रह्मात्मज - मुम्बई में भी बहुत दिनों तक लोग अँधेरे में रहे. कई बार किसी समारोह में साथ-साथ देख कर लोग थोडा सोचते, फिर किसी से फुस्फुसाक आर पूछते और फिर तस्दीक हो जाने पर विभा रानी या अजय ब्रह्मात्मज  से कहते-"अरे, आपने यह बताया ही नहीं कि आप दोनों क्या हैं?" 
तब से प्रश्न का यह ब्रह्म राक्षस विभा रानी और अजय ब्रह्मात्मज के पीछे पडा है.  अजय ब्रह्मात्मज के कितने पीछे है, यह तो पता नहीं, मगर विभा रानी के पीछे तो अभी तक यह पडा है. इस ब्रह्म राक्षस की यह खासियत है कि वह आमने-सामने कोई सवाल नहीं करता. सीधे-सीधे नहीं पूछता, बल्कि लक्षणा -व्यंजना के माध्यम से सवाल आते रहते हैं. किसी को अजय ब्रह्मात्मज से कोई काम है और वह विभा रानी को जानता है तो वह सबसे पहले यह पूछेगा कि "क्या आप अजय ब्रह्मात्मज को जानती हैं?" विभा रानी पहले सहज मासूमियत में, कि शायद उन्हें उनके बारे में पता ना हो, झट से सचसच बता देती थी. मगर एक दिन अचानक विभा रानी के ज्ञ्नान चक्षु खुले, जब एक दिन उसकी एक मित्र ने पहले विभा रानी से अजय ब्रह्मात्मज के बारे में पूछ कर फिर बाद में कहा कि उसे पता था कि तुम दोनों क्या हो?" उसके कहने से ऐसा लग रहा था जैसे उसे पता हो कि वे दोनों चोर-उचक्के, भगोडे, गुंडे-बदमाश हों. इतना होने के बाद विभा रानी कीमित्र ने अपनी बात-चीत काम उद्देश्य बताया. 
अभी हाल में ही एक और मित्र ने यही सवाल किया. विभा रानी ने पूछा कि आप सीधे-सीधे सवाल करें कि आप क्या जानना चाहते हैं? मित्र ने बताया कि कैसे मैं एक महिला से किसी पुरुष के बारे में यह पूछ लूं कि वह कहीं उसका पति तो नहीं?" विभा रानी ने कहा कि "इसमें असमंजस क्या है? अगर रिश्ता नहीं हुआ तो महिला नकार देगी, हुआ तो स्वीकार कर लेगी." पति-पत्नी का रिश्ता कोई नाजायज तो नहीं कि किसी को कहने में कोई दुविधा हो. मगर पूछानेवालों को होती है. माँ-बाप के, भाई-बहनों के, बेटे-बेटी के रिश्ते पूछने में किसी को कोई दिक्कत नहीं होती, मगर पति-पत्नी के रिश्ते पूछने में लोगों की जान पता नहीं क्यों कहीं खिसकाने लगाती हैं. आखिर ऐसा क्या है इस रिशेते में? सिर्फ एकाधिकार की ही बात ना? कि सारी दुनिया सारी दुनिया को माँ-बाप, भाई-बहन, बेटी-बेटा कहती रहे तो कुछ नहीं, बल्कि सब स्वीकार्य, मगर कोई किसी को किसी की पत्नी बोल दे, गलत या सही, तो भूचाल? धन्य है प्रभु! प्रभु तेरी लीला अपरमपार.
वैसे अब बता दें, पूरे होशो-हवास में कि विभा रानी व्  अजय ब्रह्मात्मज पिछले २६ साल से पति-पत्नी हैं और अभी तक हैं. आगे का भगवान मालिक या वे दोनों खुद ही. अब आप सबसे मेहरबानी है कि यह सवाल पूछ-पुछा कर विभा रानी व अजय ब्रह्मात्मज को बोर ना करें. वैसे भी २६ साल से एक ही रिश्ता बताते- बताते मन बोर हो चला है. अब बार-बार वही सवाल कुछ नया नहीं पैदा करता है. इस ब्लॉग पर यह एक पूरा लेख इसी बोरियत को मिटाने के लिए लिखा गया है कि बस, और नहीं, बस और नहीं, गम के प्याले और नहीं, दिल में जगह नहीं बाक़ी, रोक नज़र अपनी साकी." फिर भी नही मानेंगे तो विभा रानी -अजय ब्रह्मात्मज लिख-लिख कर यह कहते रहेंगे. अब आप अगर बोर नहीं होना चाहते तो बस, आप अब मत पूछियेगा.  पूरे होशो-हवास में और गीता, कुरान, बाइबिल, गुरु ग्रन्थ साहब और अन्य जितने भी धार्मिक ग्रत्न होते हों, जिन्हें छू कर कसम खाई जाती है, उसी को छू कर यह कसम खाई जा रही है कि विभा रानी अजय ब्रह्मात्मज वाकई पति-पत्नी हैं. और हाँ, आप सबसे यह गुजारिश कि यह सवाल सीधे-सीधे पूछ लिया करें.  उन दोनों से ही नहीं, किसी से भी. यकीन रखें, कोई भी भड़केगा नहीं, अगर उसे आपके सवाल में ईमादारी दिखती है. यह लेख इसी के लिए . बोर करने के लिए माफ़ी. मगर पढाई और परीक्षा अच्छी थोड़े ना लगती है.