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Monday, July 14, 2008

हर बार की शूली- टुकडा आसमान भी उनके लिए नहींं?

बचना चाहती रही हूँ, अब इस तरह के विषय पर लिखने से, मगर हर बार कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है की लिखना पड़ जाता है। समाज में समानता की बात गोहरानेवालों को भी यह शायद नागवार गुजरे, मगर सोच के स्तर पर जबतक बात नहीं आयेगी, कुछ भी समाधान नहीं निकलेगा। हम केवल लकीर पीटते रहेंगे और एक दूसरे पर इल्जाम लगारे रहेंगे।
हाल ही में एक अखबार ने यह सर्वे किया की हिंद्स्तान में तलाक की डर क्यों बढ़ रही है? इसके सामान्य उत्तर के रूप में कह दिया गया की महिलाएं ही इसके मूल में हैं। उनकी शिक्षा, उनकी आर्थिक आत्म निर्भरता उन्हें तलाक की ओर प्रेरित कर रही है।
सुनने में यह बहुत सरल, सहज और सच सा जान पङता है। मगर इसके मूल में बातें कुछ और भी हैं। महिलायें अगर आज पढ़ लिख रही हैं, आर्थिक रूप से सक्षम हो रही हैं तो इसलिए नहीं, कि वे घर, परिवार या रिश्ते, सम्बन्ध को नहीं मानना चाहतीं। ऐसा होता तो वे शादी करना ही नहीं चाहतीं। करतीं भी नहीं, परिवार, बच्चे कुछ भी नहीं चाहतीं। बीएस आजाद पंछी की तरह घर और दफ्तर और उसके बाद यहाँ- वहाँ डोलती रहतीं। मगर ऐसा नहीं होता। लड़कियां शुरू से ही घर में रहना पसंद करती रही हैं, आज भी करती हैं। हाँ, अपनी चाहत के नाना रूपों को वह निखारना चाहती हैं, अपनी प्रतिभा को नए -नए आयाम देना चाहती हैं और इस देश का नागरिक होने के नाते यह उनका मौलिक अधिकार है। अपने को एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखने के बाद अगर उन पर तोअहामत लगाए जाएँ तो यह मेरा भी कहना होगा कि ऐसे में उनका अपना वह तथाकथित घर छोड़ देना उनके लिए ज़्यादा मायने वाला होगा। महिला या लड़की से पहले एक इंसान हैं, और उन्हें इसी रूप में देखे जाने की ज़रूरत है। ऐसा न होने पर वे घर छोड़ती हैं या रिश्तों को तिलांजलि देती हैं तो यह सोचने वाली बात है कि इतने के बावजूद हम और हमारा समाज अपनी सोच में बदलाव क्यों नहींं लाता? क्यों उसे घर की लाज, घर की सबसे जिम्मेदार सदस्य, घर चलानेवाली और ये-वो से अभिहित किया जाने लगता है? वह सब करने को वह तैयार है, पर उसके लिए भी तो सोचें कि उसे एक व्यक्ति के रूप में अभी भी हम क्या दे रहे है? आज सवाल स्त्री-पुरूष के बीच भेद बढ़ाने का नहीं, दोनों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करने का है और इसके लिए हर पक्ष को बराबर- बराबर की साझेदारी निभानी ही होगी। महिलाओं पर हर बार की तरह दोषारोपण कराने की आदत से अब बाज़ आने की ज़रूरत है।

Thursday, May 15, 2008

घर-घर देख, एक ही लेखा

दो दिन पहले अखबार में ख़बर थी कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर की पत्नी चेरी ब्लेयर ने अपने पति पर आरोप लगाया कि उसके गर्भपात की संवेदनशील ख़बर को पति ने अपनी राज नीति के लिए इस्तेमाल किया। छाम्माक्छाल्लो खुश हो गई क्योंकि उसने अपनी किसी रचना में यह लिखा था कि अत्याचार या ज़ुल्म दिखाने के लिए पेट -पीठ पर जले का, हाथों के कटे-फटे का दिखाना ज़रूरी नही है। मन की मार बड़ी मारक होती है। इसे किसी को दिखाया भी नहिंजा सकता। इसके पहले अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की khabarein आपको पाता ही है। अपने देश मेंयः सब saamaany है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि वहां की पत्नियों में यह साहस है कि वे अपने पतियों के ख़िलाफ़ बोल सकें। यहाँ यह्दुर्लभ है। पति-पत्नी या किसी के प्रेम प्रसंग बाहर आ ही नहीं सकते, अगर वह राजनीति में हो। खूब सारे हंगामे, खूब सारे लोगों की जान कि बलि और जिनके बारे में लिखा जाए , वे तेल लगे चमड़े पर पानी की बूँद की तरह फिसला कर निकल लें।

छाम्माक्छाल्लो सोच रही है कि आख़िर पत्नियां होती किसलिए हैं? माना कि पति के हर सुख-दुःख में उसके कंधे से कंधा मिला कर चलने के लिए, मगर इसका मतालाब्यः तो नहीं कि उसे अपने काम केलिए इस्तेमाल कर लिया जाए। उसे समझाया जाए कि यह करना पति के हक के लिए कितना ज़रूरी है। चेरी लिखती हैं कि वे दर्द और रक्त स्राव से छातापता रही थीं, और टोनी उन्हें इस बात के लिए राजी कर रहे थे कि उअके गर्भपात कीखाबर का ज़ाहिर होना देश की राजनीति के किए कितना ज़रूरी है। उम्र के मध्य में पहुंचकर उनका गर्भ ध्हरण करना टोनी को एक फीकी सी टिप्पणी करवाता है- 'मैं निश्चित नहीं हूँ कि ५० साल की उम्र में मेंएन बाप बनाना चाहता हूँ कि नहीं।

छाम्माकछ्क्ल्लो एअसे में सोचने लग जाती है कि स्त्रियाँ कितनी मज़बूर हो जाती हैं पति का साथ देने के लिए,सिर्फ़ इस कारण से कि आखिरकार यह पति का मामला है और 'भला है, बुरा है, मेरा पति मेरा देवता है।' मान कर। अगर पश्चिम में सरी और हिलेरी भी ऐसा कराने ओइरउर सोचने के लिए मज़बूर हैं तो हम हिन्दुस्तानियों की तो बात ही और है। उन्हें तो घुट्टी में मिलाती है नसीहत और यह कि यही तुम्हारी नियति है। चेरी और हिलेरी, चाम्माक्छाल्लो क्या कहे आपसे और अपनी जैसी अन्यों से।

आपको कुछ लगता है तो बताएं.