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Sunday, December 22, 2019

प्यार का मज़हब क्या कहता है!

अपने शहर के लिए लिखना और अपने शहर में छपना हमेशा आह्लादकारी होता है। एक लंबे अरसे बाद नवभारत टाइम्स मुंबई में छपी हूं। #नवभारतटाइम्स और हरि मृदुल का बहुत-बहुत आभार।
आपकी सुविधा के लिए या लेख यहां प्रस्तुत है पढ़ें और आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी इसे मेरे कथेतर गद्य “अही ठैयाँ टिकुली हेराय गेलै” से लिया गया है।

"प्यार का मज़हब क्या कहता है!

अक्सर करवा चौथ, हरतालिका, वट सावित्री आदि के समय इस प्रश्न की बाढ़ आ जाती है कि क्या पुरुष भी अपनी पत्नियों के लिए व्रत करते हैं या कोई ऐसा व्रत है जो पुरुष अपनी पत्नी के लिए करें?  सभी कहते हैं- नहीं। मुझे भी जितना मालूम है, उसमें यही है उत्तर है- नहीं। इस प्रसंग में यशपाल की एक बड़ी प्रसिद्ध कहानी है- ‘करवा का व्रत।‘

कईयों को ये व्रत पुरुष की दासता लगते हैं, कइयों को दिखावा। हर साल फेसबुक पर यह आंधी आती है। यह आंधी होली या दीवाली पर कभी नहीं आती कि हम व्रत ही क्यों करें? त्यौहार ही क्यों मनाएँ?

मैं व्रत-त्यौहार की पक्षधर हूँ, मगर इसकी रूढ़ियों पर मेरा विश्वास नहीं। लेकिन, उत्सव मनाना, नाचना, गाना, हँसना मुझे संस्कृति से जुड़ाव, नई स्फूर्ति और सकारात्मकता देते हैं। जहां तक मेरा सवाल है, मैं हरतालिका अपनी सास के लिए करती हूँ। अत्यंत विषम हालात में हुई हमारी शादी को जिस सहजता से स्वीकार कर मुझे जितना मान-सम्मान या प्यार दिया, उसके एवज में उन्होने दो ही चीजें मांगी थी- 1) इतना ज्यादा (दिन के 20-22 कप) चाय मत पियो और 2) जबतक और जैसे भी पार लगे, तीज कर लेना।

लेकिन मन के भाव कभी-कभी कहां ले जाते हैं, पति-पत्नी कब कितने समर्पित हो जाते हैं, एक-दूसरे के लिए, पता नहीं चलता। चमत्कार होता है या नहीं, पता नहीं। लेकिन जिंदगी में कभी कभी कुछ ऐसा घट जाता है, जिसका कोई सार समझ में नहीं आता।

मेरी बुआ थीं चंद्रकला- नाम के अनुरूप ही खूबसूरत और राम-सीता की भक्त । फूफा जी भी परम भक्त । दोनों कंठीधारी। अपने घर में ही उन्होंने एक मंदिर बनवा लिया था। बुआ मुझे जितनी अच्छी लगती, फूफा जी मुझे उतने ही नापसंद थे, क्योंकि उनकी नजरों में हमारे शिक्षक माता पिता की कोई अहमियत नहीं थी।

मेरी बड़ी दीदी शादी के योग्य थी और वे जो रिश्ता लेकर आते, वह हम सबकी कल्पना से भी परे होता। मसलन, लड़का कपड़े की दुकान पर काम करता है, डेढ़ सौ रुपए पाता है। लड़का गुड़ की आढ़त में काम करता है, ढाई सौ रुपए पाता है । लड़के की पान की दुकान है और इसतरह उसका अपना धंधा है। हमलोग कटकर रह जाते। ना बोलनेवाली मां फिर कुछ नहीं बोल पाती थी। बाबूजी दामाद का लिहाज करके चुप रह जाते थे।

बुआ और फूफा अपनी उम्र के हिसाब से जीते रहे । भक्त दंपति के रूप में उनका बहुत नाम था। मंदिर में हमेशा भजन कीर्तन होता रहता। दोनो में बड़ा प्रेम था। दोनो एक दूसरे को 'रघुनाथ' के नाम से संबोधित करते।

उम्र के अपने पड़ाव पर बुआ बीमार पड़ीं। जब उन्हें लगा कि उनका अंतिम समय आ गया है तो इशारे से उन्होंने घर के सदस्यों को तुलसी चौरा के पास ले चलने को कहा। उन्हें आंगन में तुलसी चौरे के पास लिटाया गया । उनकी बहुओं ने उनके मुख में तुलसी-गंगाजल डाला और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

छोटा पोता बाहर की ओर भागा और फूफा जी से बोला- "दादा दादा, दादी मर गेलै।"

फूफा जी कुछ नहीं बोले। पोते का हाथ थामे धीरे-धीरे भीतर आंगन में आए। बुआ के पास बैठे। बुआ का हाथ पकड़कर बोले- "रघुनाथ! हमरा छोड़ के चल गेल'।" और इतना कहते हुए वे बुआ के ऊपर झुक गए । तत्क्षण उनका भी प्राणांत हो गया।

शहर भर में शोर मच गया। आसपास के गांव-कस्बों से लोग आने लगे। दोनो की अर्थी एक साथ उठी। दोनों की चिंताए अगल बगल सजीं। बुआ के शहरवालों को अब यह घटना याद है या नहीं, पता नहीं, लेकिन हमसब कई कई सालों तक बुआ फूफा के इस अटूट प्रेम से बंधे रहे। वैसे समाज में, जहां साठ पार के बूढ़ों के लिए भी दूसरी शादी की तरजीह समाज देता है, वहां इन दोनों के भीतर प्रेम का कौन सा गहरा समंदर छुपा हुआ था, जिसकी तरंग में दोनो दो जिस्म एक जान बने हुए थे, आजतक नहीं समझ पाई। हर बार की तरह मैंने माँ से इसके बाबत पूछा। माँ भाव भरे स्वर में इतना ही बोल पाईं - "गहरा प्रेम।"

मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि जान न देनेवाले दंपति के बीच प्रेम नहीं होता। मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि धर्म में पति द्वारा किए जानेवाले व्रत उपवास के किस्से हो या न हों, अपने जीवन में भी कई किस्से प्रेम-धर्म के हिमालय पर जा ठहरते हैं।"

Thursday, March 23, 2017

मेरे प्रेम का पहला पाठ- राम और रोमियो !

 मुझे भारतीय संस्कृति से बड़ा गहरा प्रेम है। रामायण से तो और भी। आखिर को, सीता हमारे प्रदेश मिथिला से थीं। सीता हमारी बेटी थीं और बेटी हो या बेटा, समय के अनुसार सभी की उम्र बढ़ती ही है। उम्र हो जाती है तो ब्याह की चिंता भी हमारी भारतीय संस्कृति का अमिट हिस्सा है। लिहाजा, सीता की बढ़ती उम्र ने राजा जनक को भी चिंता से सराबोर कर दिया-
            “जिनका घरे आहो रामा, बेटी होय कुमारी,
            सेहो कैसे सुतले निचिंत!”

सो नींद राजा जनक की भी गुम हो गई। माता सुनयना की भी हुई ही होगी। स्त्रियॉं को तो ठोक-पीटकर उन सभी तरह की चिंताओं के लिए जिम्मेदार बना दिया जाता है, जिससे उनकी छवि प्रतिकूल हो तो हो, औरों की अनुकूल बनी रहे।

सीता ने न जाने कैसे धनुष उठा लिया और राजा जनक को एक बहाना मिल गया- सीता से बेहतर वर खोजने का। आखिर, वधू कैसे वर से श्रेष्ठ हो सकती है! हुई तो भी उसे अपनी श्रेष्ठता छुपानी या मारनी पड़ती है। राजा जनक से शस्त्र-शास्त्र की शिक्षा और माता सुनयना से घर-गृहस्थी की शिक्षा लेकर भी सीता राम से बड़ी नहीं हो सकती। इसलिए, अब तो वर वो हो, जो धनुष नहीं उठाए, बल्कि धनुष तोड़े।

विश्वामित्र जी भी राम को लेकर पहुँच गए। राम भाई के संग घूमते-घामते सीता वाटिका भी पहुँच गए। अब, ये न पूछिएगा कि लड़कियों के बाग में लड़कों का क्या काम! वे भगवान हैं। कोई रोमियो या मजनू या राँझा नहीं। वहाँ दोनों के नैन से नैन मिले, दिल धड़के, होठों पर मुस्कान आई, मन में कोमल भावना ने जन्म लिया और सलज्ज रेख दोनों के चेहरे पर खींच गई। यह तो बहुत ही स्वाभाविक है भाई। कुछ भी अच्छा लगने पर दिल में खुशी और चेहरे पर मुस्कान आती ही है।

मिथिला में राम –सीता के ब्याह से बढ़कर दूसरा ब्याह कोई नहीं। और सीता वाटिका में राम –सीता का मिलन प्रेम का पहला पुष्प तो नहीं था न-
            “ये मेरे पहले प्यार की खुशबू....!”
मन्नत मनाने की भी परंपरा हम यहीं से मान लें? गोसाई जी मानस में लिख भी गए हैं कि वाटिका में राम के दर्शन के बाद सीता जी गौरी पूजने जाती हैं। सीता जी मन्नत मानती हैं कि ये ही मुझे पति के रूप में मिलें और गौरी जी प्रकट होकर कहती हैं-
            “सुनू सिय सत्य असीस हमारी, पूजही मन-कामना तुम्हारी!”

कामना फलीभूत हुई और यही कामना मय-सूद सोलह सोमवार के रूप में फलीभूत हुआ। हर सीता को राम जैसा पति चाहिए, इसलिए, सोलह सोमवार, सोलह शुक्रवार, महाशिवरात्रि आदि सब उसे ही करने चाहिए। मगर हर राम को? शायद कोई भी चलेगी? नहीं, नहीं! कोई भी नही चलेगी। जो चलेगी, वह उनकी पसंद की होनी चाहिए और उसके लिए उन्हें सोलह सोमवार, सोलह शुक्रवार, महाशिवरात्रि आदि करने की कोई ज़रूरत नहीं।

तो भैया! प्रेम की परिभाषा यहीं से गढ़ी गई। अब वाटिका में मिले राम को कोई लैला-मजनू, सीरी-फरहाद या रोमियो-जूलियट कहने लगे तो अपन को दोष मत दीजिएगा। वैसे भी राम और रोमियो नाम में उतना ही साम्य है, जितना लोग हनुमान और हैनिमन में मानते हैं। मुझे अपने मिथक और इतिहास का ज्ञान नहीं है- इसलिए कालीदास जैसे “शेक्सपियर ऑफ संस्कृत” कहलाते हैं, वैसे ही मेरे लिए ये दोनों लैला-मजनू, सीरी-फरहाद या रोमियो-जूलियट! अपने को तो प्रेम की दुनिया में फैलाव दिखाई दे रहा है। राम और सीता हमारे आदर्श हैं और हम उन्हीं के आदर्शों का पालन करेंगे। उन्होने प्रेम किया, हम भी करेंगे। शादी से पहले नजरें- दो-चार हुईं, हम भी करेंगे। शादी के लिए मन्नत मांगी, हम भी मांगेंगे। शादी के लिए स्वयंवर हुआ, हम भी स्वयंवर करेंगे। हम अपनी महान भारतीय संस्कृति की परंपरा के अनुसार ही कर रहे हैं। इसलिए, विश्व और देश के समस्त गुरु, योगी, भोगी! हमें आशीर्वाद दीजिये कि प्रेम के इस पाठ में हम भी सफल हों! बाद में भले राम को सीता का त्याग करना पड़े या सीता को धरती में समाना पड़े। लेकिन अभी तो हम प्रेम के सागर में गोता लगाने जा रहे हैं। गोता लगाने दीजिये-
                  “मेरे पिय में साईं बसत हैं, हिय में बसत है सपना
                  जाए छूट जो घर, मात-पितु, छूटे ना प्रेम का गहना!” 

Monday, May 16, 2016

पत्नियो, तुम जियो!


पत्नियां
केवल पत्नियां होती हैं।
उनका न नाम होता है, न काम। उ
नके कमाए का कोई दाम भी नहीं।
नाम, दाम और काम उनका अगर है भी तो इससे पतियों को क्या!
उनके लिए पत्नियां उनके खूंटे की रस्सी होती है।
बंधी रहेगी।
छूटने या टूटने की कोशिश करेगी तो छान पगहा तुड़ानेवाली कही जाएगी,
जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं।
आधुनिकतम विचारोंवाले पति हैं ऐसे।
बाकियों के तो भगवान ही मालिक!
हे पत्नियां!
तुम्हे तो फिर भी जीवन के सभी तरह घूंट पीते हुए जीना है।
इसलिए, जियो, पति के नाम।
जियो, पति के काम के नाम।
जियो, पति के सम्मान के नाम।
जियो, उनकी मुस्कान में होठ फ़ैलाने के लिए।
जियो, उनके क्रोध में थरथराने के लिए।
जियो, उनके संग साथ से सुहागवती बनी रहने के लिए।
जियो, उनके हर लिखे, अलिखे पर अपनी सहमति देने के लिए।
जियो, यह खोजने के लिए कि तुम पतियों की दुनिया में कहाँ हो?
इन सारे सवालों को मथने के लिए और जवाब में केवल छाछ पाने के लिए
हे पत्नियां, तुम जियो।
अनंत अनंत काल तक तुम जियो,
केवल पत्नी और पत्नी बने रहने के लिए।
तुम मनुष्य हो, यह सवाल केवल और केवल तुम्हारे लिए है।
इस सवाल को बनाए रखने के लिए भी अंतत: तुम जियो!

Sunday, May 24, 2009

बन सकता है ताज महल फ़िर, चाहनेवाले अब भी बहुत हैं.

छाम्मक्छाल्लो की एक बुआ थी. खूब पूजा-पाठ वाली. शादी हुई. संयोग ऐसा कि फूफा भी उतने ही धार्मिक विचारोंवाले थे. बुआ की निभ गई. खूब निभी. ऐसी कि बस पूछें मत.
फूफा अक्सर छाम्मक्छाल्लो के घर आते. घर के वे दामाद कहलाते. सो उसी तरह से उनकी आव-भगत छाम्मक्छाल्लो के माता-पिता करते. बुआ भी जब जब मायके आती, छाम्मक्छाल्लो के घर ज़रूर आती. उनका चन्दन टीका,, गले में कंठी छाम्मक्छाल्लो व् उसकी अन्य बहनों को बड़ा आकर्षित करता. बुआ तब शायद लहसुन-प्याज खाती थीं. बाद में वह भी छोड़ दिया. फूफा ने भी. उनकी भक्ति के किस्से शहर भर में ही नहीं, शहर के बाहर भी मशहूर थे. बाद में उन दोनों ने मिल कर अपने शहर में एक मंदिर भी बनवाया- राम-सीता का.
बुआ के पास पैसे खूब थे, मगर छाम्मक्छाल्लो को याद नहीं आता की वे बच्चों के लिए कही कुछ ले कर आई हों. सो जब वे आतीं, सभी बच्चे उन्हें प्रणाम करते और अपने-अपने धंधे पर निकल जाते. छाम्मक्छाल्लो माँ के पास देर तक बैठी रहती और उनके किस्से सुनती रहती.
छाम्मक्छाल्लो को बुआ तो अच्छी लगती मगर फूफा नहीं. इसकी वज़ह थी. छाम्मक्छाल्लो की बड़ी बहन शादी करने लायक हो गई थी. छाम्मक्छाल्लो का परिवार पढा-लिखाथा. माँ-बाउजी दोनों शिक्षक थे, लिहाजा, बच्चे भी पढ़ रहे थे. माँ-बाउजी के पास पैसे नहीं थे, मगर शिक्षा थी. फूफा के पास पैसे थे, नाम था, मंदिर के कारण, सो माँ-बाउजी जब तब उनसे बहन के लिए किसी लडके को खोज देने की बात करते. फूफा माँ- बाउजी की हैसियत आंकते और कहते- "फलानी जगह पर एक लड़का है. मिडल पास है, कपडे की दूकान पर बैठता है." या फलाने जगह पर एक लड़का है, गुड की आधात में काम करता अहै, चार सौ कमाता है. छाम्मक्छाल्लो सुन कर इतना चिढ जाती कि बाद में कहती माँ से कि वह बुआ-फूफा की आव-भगत क्यों करती है? खैर, बाद में दीदी का ब्याह प्रोफेसर से हुआ.
यही बुआ- फूफा की अपनी प्रेम कथा है. दोनों में अगाध प्रेम था. अपने बुढापे में बुआ बीमार रहने लगी. जीवन के अंतिम समय में वे बहुत बीमार थीं. जब उनके जाने का समय आया तब उनहोंने खुद बेटे से कहा कि वे उन्हें कमरे से निकाल कर आँगन में तुलसी चौरे के पास सुला दें. जब तक यह इंतजाम किया गया और बुआ को आँगन में लाया गया, तबतक वे अचेत हो चुकी थीं. किसी तरह बहुओं ने उन्हें गंगाजल पिलाया. उनहोंने अंतिम सांस ली. घर में कुहराम मच गया.
बुआ का एक छोटा सा पोता था. वह बाहर भागा अपने दादा को दादी की खबर सुनाने. वह दौडा उनके पास और बोला- "दादा, दादा, दादी मर गईं" फूफा बाहर से भीतर आये. आँगन में तुलसी चौरे के पास बुआ का पार्थिव शरीर रखा था. बहुएँ व् अन्य सभी रो रही थीं. फूफा चुपचाप बुआ तक चल कर आये, उनके पास बैठे, और उनका हाथ पाकर कर बोले- "मुझे छोड़ कर जा रही हो?" और यह कहा कर वहीं लुढ़क गए. पूरे शहर में शोर हो गया. शहर की तो छोड़ ही दे, किन-किन गाँवों और शहरों से लोग उनके दरसन के लिए आये. बड़ी धूम-धाम से दोनों कि शवयात्रा एक साथ निकाली गई, अगल-बगल चिता जली. बाद में उनके बेटों ने उनके नाम से एक और मंदिर बनवाया- फिर से राम-सीता. का.
छाम्मक्छाल्लो के साथ-साथ आप भी कह सकते हैं कि प्रेम कि यह अद्भुत मिसाल है. ताज महल यहाँ भी बना, मगर प्रेम के शिवाले के रूप में नहीं, भक्ति के रूप में. प्रेम भी अपने अनंतिम रूप में भक्ति ही हो जाता है. छाम्मक्छाल्लो को आज भी यह वाक़या एक मिथ के रूप में लगता है. उसे सिर्फ लगता है तो यही कि मंदिर तो बुआ-फूफा ने बनवाया ही था. उनके नाम पर बाद में मंदिर के बदले कोई स्कूल या अस्पताल बनता तो उनके प्रेम को और भी विस्तार मिलता. वह सब तो नहीं बना, मगर प्रेम का ताज महल तो बन ही गया-भले मंदिर के रूप में ही सही.

Wednesday, May 20, 2009

हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते

नया ज्ञानोदय के अप्रैल 2009 अंक में प्रकाशित सुप्रसिद्ध मलयाली कवि के सच्चिदानंद की एक कविता उद्धृत है- "मैं एक अच्छा हिन्दू हूं /खजुराहो और कोणार्क के बारे में मैं कुछ नहीं जानता / कामसूत्र लो मैंने हाथ से छुआ तक नहीं दुर्गा और सरस्वती को नंगे रूप में देखूं तो मुझे स्वप्नदोष की परेशानी होगी हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते जो भी थे उन्हें हमने काशी और कामाख्या में प्रतिष्ठित कियाकबीर के राम को हमने अयोध्या में बंदी बनाया गांधी के राम को हमने गांधी के जन्मस्थान में ही जला दिया आत्मा को बेच कर इस गेरुए झंडे को खरीदने के बाद और किसी भी रंग को देखूं तो मैं आग-बबूला हो जाऊंगा मेरे पतलून के भीतर छुरी हैसर चूमने के लिए नहीं, काट-काट कर नीचे गिराने के लिए..."

यह मात्र संयोग ही नहीं है की हम कही भी कभी भी प्यार की बातें करते सहज महसूस नहीं करते। यहाँ प्यार से आशय छाम्माक्छाल्लो का उस प्यार से है जो सितार के तार की तरह हमारी नसों में बजता है, जिसकी तरंग से हम तरंगित होते हैं, हमें अपनी दुनिया में एक अर्थ महसूस होने लगता है, हमें अपने जीवन में एक रस का संचार मिलाने लगता है. मगर नहीं, इस प्यार की चर्चा करना गुनाह है, अश्लीलता है, पाप है और पाता नहीं, क्या-क्या है. हमारे बच्चों के बच्चे हो जाते हैं, मगर हम यह सहजता से नहीं ले पाते कि हमारे बच्चे अपने साथी के प्रति प्यार का इज़हार करें या अपने मन और काम की बातें बताएं. और यह सब हिंदुत्व और भारतीय संस्कृति के नाम पर किया जाता है.
अभी- अभी छाम्माक्छाल्लो एक अखबार में पढ़ रही थी फिल्म निर्माता राकेश रोशन का इंटरव्यू, उनकी फिल्म काईट के बारे में, जिसमें उनके अभिनेता बेटे ने चुम्बन का दृश्य दिया है. साक्षात्कार लेनेवाले की परेशानी यह थी कि यह चुम्बन का दृश्य हृतिक रोशन ने किया कैसे, और एक पिता होने के नाते राकेश रोशन ने यह फिल्माया कैसे और उसे देखा कैसे? बहुत अच्छा जवाब दिया राकेश रोशन ने कि अब इस फिल्म में मैं प्रेम के लिए चुम्बन नहीं दिखाता तो क्या हीरो- हीरोइन को पेड़ के पीछे नाचता- गाता दिखाता? जान लें कि इस फिल्म कि नायिका भारतीय नहीं है. राकेश रोशन ने कहा कि एक अभिनेता के नाते उसने काम किया है, वैसे ही ,जैसे उसने कृष में लम्बी-लम्बी छलांगें लगाईं थीं.
जिस प्रेम से हमारी उत्पत्ति है, उसी के प्रति इतने निषेध भाव कभी-कभी मन में बड़ी वितृष्णा जगाते हैं. आखिर क्यों हम प्रेम और सेक्स पर बातें करने से हिचकते या डरते हैं? ऐसे में सच्छिदानंदन जी की बातें सच्ची लगती हैं कि हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते, और अब उन्हीं के अनुकरण में हमारे भी नही होते. आखिर को हम उन्हीं की संतान हैं ना. भले वेदों में उनके शारीरिक सौष्ठव का जी खोल कर वर्णन किया गया है और वर्णन के बाद देवियों को माता की संज्ञा दे दी जाती है, मानो माता कह देने से फिर से उनका शरीर, उनके शरीर के आकार-प्रकार छुप जायेंगे. वे सिर्फ एक भाव बनाकर रह जायेंगी. यक्ष को दिया गया युधिष्ठिर का जवाब बड़ा मायने रखता है कि अगर मेरी माता माद्री मेरे सामने नग्नावस्था में आ जाएँ तो मेरे मन में पहले वही भाव आयेंगे, जो एक युवा के मन में किसी युवती को देख कर आते हैं. फिर भाव पर मस्तिषक का नियंत्रण होगा और तब मैं कहूंगा कि यह मेरी माता हैं.
समय बदला है, हम नहीं बदले हैं. आज भी सेक्स की शिक्षा बच्चों को देना एक बवाल बना हुआ है, भले सेक्स के नाम पर हमारे मासूम तरह-तरह के अपराध के शिकार होते रहें. आज भी परिवारों में इतनी पर्दा प्रथा है कि पति-पत्नी एक साथ बैठ जाएँ तो आलोचना के शिकार हो जाएँ. अपने बहुचर्चित नाटक "वेजाइना मोनोलाग" के चेन्नई में प्रदर्शन पर बैन लगा दिए जाने पर बानो मोदी कोतवाल ने बड़े व्यंग्यात्मक तरीके से कहा था की इससे एक बात तो साबित हो जाती है की मद्रास में वेजाइना नहीं होते.
देवी देवता की मूर्ती गढ़ते समय तो हम उनके अंग-प्रत्यंग को तराशते हैं, मगर देवी देवता के शरीर की काट कोई अपनी तूलिका से कर दे तो वह हमारे लिए अपमान का विषय हो जाता है. छाम्माक्छाल्लो की समझ में यह नही आता कि इस दोहरी मानसिकता के साथ जी कर हम सब अपने ही समाज का कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं. देवी-देवता को हम भोग तो लगाते हैं, देवी देवता का मंदिरों में स्नान- श्रृंगार, शयन सबकुछ कराते हैं, मगर देवी देवता अगर देवी-देवता के जेंडर में हैं तो हम उनके लिंग पर बात क्यों नहीं कर सकते? आज भी सेक्स पर बात करना बहुत ही अश्लील मना जाता है. और यह सब इसलिए है की हम सब इसके लिए माहौल ही नहीं बना पाए हैं. एक छुपी-छुपी सी चीज़ छुपी-छुपी सी ही रहे, हर कोई इसे मन में तो जाने मगर इस पर बात ना करे, इस पर चर्चा ना करे. ऐसे में छाम्माकछाल्लो के साथ-साथ आप सबको भी यकीन करना होगा की हमारे देवी-देवताओं के जननेंद्रिय नहीं होते और उनके अनुसरण में हमारे भी.