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Monday, November 2, 2009

सकुबाई से सफाई घर की भी, दिल की भी

http://mohallalive.com/2009/11/01/review-of-drama-sakubai/

नाटक में आप जितने भी प्रयोग कर लें, पीरियड ड्रामा ले आएं, ड्रामे के माध्यम से आप राग रंग, नट भाव, उपमा, उपमान की बातें बताएं, सच तो यह है कि आम आदमी नाटक के उन्हीं हिस्सों से जुड़ पाता है, जिसके साथ वह अपना जीवन देख पाता है। पौराणिक आख्यानों में भी वह वहीं तक पहुंचता है, जहां उसे आज का अपना समाज, परिवेश दिखाई देता है। ऐसे में सामजिक या यों कहें कि घरेलू पृष्ठभूमि पर खेले गये नाटक से दर्शक तुरंत अपना नाता जोड़ लेते हैं। एकजुट थिएटर ग्रुप प्रस्तुत नादिरा ज़हीर बब्बर लिखित व निर्देशित नाटक “सकुबाई” नाटक एक ऐसी ही रचना है, जिसमें घर-घर काम करनेवाली बाई सकुबाई के माध्यम से समाज में एक साथ ही जी रहे नाना वर्गों के नाना जीवन को देखे जाने की कोशिश है। साथ ही साथ खुद उसके अपने जीवन की भी। एक आम मध्य या उच्च वर्ग और तथाकथित निम्न वर्ग में कोई फर्क़ नहीं रह जाता, जब मामला प्रेम, सेक्स, घरेलू हिंसा, बलात्कार, आपसी जलन आदि पर आता है, बल्कि कई बार तो ये तथाकथित निम्न वर्ग के लोग इन संभ्रांत लोगों पर भारी पड़ जाते हैं। क्या फर्क़ रह जाता है सकुबाई या उसकी मालकिन में कि दोनों के ही पति के विवाहेतर संबंध हैं। विरोध करने पर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर मालकिन भी पति के हाथों बुरी तरह पिटती है, मगर बच्चों की खातिर घर नहीं छोड़ पाती। मगर, फर्क़ है। सकुबाई के पति के संबंध जग जाहिर हैं। मालकिन के पति के संबंध सामाजिकता की खोल में छुपा। नौकरानी हो कर भी सकुबाई इतनी ईमानदार है कि मालकिन अपना पूरा घर उसके ऊपर छोड़ देती है, जबकि उसी मालकिन की करोड़पति सहेली मालकिन के पर्स से उसके हीरे की अंगूठी चुरा लेती है। मुंबई में आपको ऐसी ईमानदार बाइयों की फौज़ मिलेगी। बल्कि यूं कहें कि जिस तरह हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है, उसी तरह हर सफल औरत के पीछे उसकी बाई का हाथ होता है।
एकपात्रीय नाटक को कुशलतापूर्वक डेढ़ घंटे तक खींच ले जाना किसी समर्थ कलाकार की ही खासियत है और यह विशेषता निस्संदेह सकुबाई की भूमिका में सरिता जोशी की है। सरिता जोशी गुजराती थिएटर और फिल्म की मशहूर और बड़ी कुशल, इसलिए सफल अभिनेत्री हैं। वे लगभग 45 सालों से भी अधिक समय से अभिनय के क्षेत्र में हैं। एकपात्रीय अभिनय में सब कुछ उसी पात्र को दर्शाना होता है और सरिता जोशी ने मालिक से लेकर अपने पति और बूढ़ी मां की भी भूमिका बड़ी कुशलता से निभायी है। तदनुसार आवाज़, शारीरिक भंगिमा, चेहरे पर भाव। हालांकि उम्र अपनी छाप उन पर छोड़ने लगी है। बीच-बीच में वे हांफ जाती रहीं, संवाद भी लगा कि कुछ भूलती सी रहीं। मगर यह उनकी नाट्यकुशलता ही थी कि इसे उन्होंने ज़ाहिर नहीं होने दिया।
यह नाटक 1999 में पृथ्वी फेस्टिवल में ओपन हुआ था। तब से इस नाटक के कई शो हो चुके हैं। नादिरा बब्बर के यह भी पुराने नाटकों मे से एक है, जिसमें उनकी पुरानी मेहनत व प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है। सेट प्रभार, स्टेज और प्रोडक्शन सभी में हनीफ पटनी ने अपनी कुशलता दिखायी है। फिर भी, नाटक के दस साल हो जाने के कारण सेट अब पुराने हो चुके हैं, जो स्टेज पर भी दिखते हैं। प्रकाश व्यवस्था नाटक के अनुरूप थी और संगीत संचालन एक्टर को अभिनय के साथ-साथ डांस करने व अन्य हाव-भाव के लिए पर्याप्त स्पेस देता है। “दयाशंकर की डायरी” की तरह ही यह नाटक आपको अपने से जोड़ कर रखता है, बल्कि कुछ अधिक ही, क्योंकि आखिरकार यह एक महिला की लिखी, महिला की ज़ुबानी, महिला की गाथा है, और महिला की कहानी में प्रताड़णा के भाव तनिक अधिक तो रहते ही हैं, जिसमें व्यक्ति और परिवेश दोनों की ही भूमिका रहती है। इसलिए यह नाटक हो सकता है आपको “दयाशंकर की डायरी” से अधिक अपील करे, जैसा कि इसने यहां के दर्शकों को किया था।

Saturday, October 17, 2009

दास्‍तानगोई उर्फ हम कहें आप सुनें

http://mohallalive.com/2009/10/17/daastangoi-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में नाटक की अलग अलग प्रस्तुतियों के बाद इस बार दास्‍तानगोई पर एक प्रस्तुति "हम कहें आप सुनें" नादिरा ज़हीर बब्बर ने अपने "एकजुट थिएटर ग्रुप" की तरफ से की. लिलेट दुबे के 'ब्रीफ कैंडल' के बाद यह दूसरा नाटक रहा, जो किसी महिला निर्देशक का था. नादिरा बब्बर सज्जाद ज़हीर और रज़िया सज्जाद ज़हीर की बेटी, राज बब्बर की पत्नी, जुही और आर्य बब्बर की मां हैं. यह एक लाइन उन लोगों के लिए, जो नादिरा बब्बर का नाम आते ही तरह तरह से ये सवाल पूछने लगते हैं, जिनके जवाब पहले ही दे दिए गए.
सामान्यत: होता यह है कि लोग कहते हैं, आप कहें, हम सुनें, मगर चूंकि यह नाटक था, जिसमें नाट्यकर्मियों को अपनी बात कहनी होती है, इसलिए वे कहते हैं, दर्शकगण सुनते हैं. यह नाटक भी दर्शकता से ऊपर उठकर श्रोता के स्तर पर पहुंचकर अपनी बात कहता है, क्योंकि यह् नाटक है ही दास्तानगोई यानी किस्सागोई अर्थात स्टोरी टेलिंग पर. नादिरा बब्बर आज के युवाओं के प्रति और उनकी अपनी संस्कृति के प्रति की विमुखता से चिंतित हैं. दास्तानगोई भी हमारी एक परम्परा है, जो खतम सी हो रही है. यह इसलिए खतम हो रही है, क्योंकि इसके लिए अब लोगों के पास वक़्त नहीं. दास्तानगोई की इस परम्परा से जोडने के लिए तीन अलग अलग इलाके के किस्सों को तीन अलग अलग पात्र के द्वारा कहानी कथन के माध्यम से कहने की कोशिश की गई है. ये तीन कलाकार हैं- युद्धवीर दहिया, अनंत महादेवन और स्वयं नादिरा बब्बर. नाना हाव भाव के ज़रिये कहानी कही गई. इस कहानी कथन के लिए एक कहानी गढी गई कि किस तरह एक युवा खुर्रम (युद्दवीर दहिया) को उसका अभिभावक चाचा (अनंत महादेवन) एक पुरानी किस्सागो फनकारा (नादिरा बब्बर) के पास उसका गंडा बन्धवाने ले जाता है. युवा खुर्रम की अनिच्छा के बावज़ूद उसे वहां जाना पडता है, जा कर अपनी कहानीगोई की बानगी पेश करनी होती है. किस्सागो फनकारा उसमें से किस्सागोई के झोल निकालती हैं. चाचा भी एक कहानी कहते हैं और अंत में किस्सागो फनकारा अपनी दास्तानगोई करती है और युवा खुर्रम उनकी किस्सागोई से प्रभावित हो कर उन्हें अपना गुरु मान लेता है.
किस्सागोई आज बेशक किसी पेशे के रूप में उतनी मुखरित न हो, मगर आज भी दादी, नानी और अब एकल परिवार के कारण मां बच्चों को किस्से सुनाती ही हैं. आज के भारतीय युवाओं की अपनी अपनी समस्याएं हैं. फिर भी, कई युवा हैं जो आज भी अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला, रीति रिवाज़ से जुडे हुए हैं. किस्सागो फनकारा आज के युवाओं को खूब लानतें मलामतें भेजती हैं. अचानक से वे एकदम से आज की ज़बान भी बोलने लग जाती हैं.
नादिरा बब्बर भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्नातक और इब्राहिम अलकाजी की शिष्या हैं. वे उन चन्द एनएसडीयनों में से एक हैं, जो बम्बई या मुंबई में रहकर फिल्मों के ग्लैमर से बचते हुए अपने को थिएटर कर्म में लगाए रखा. उनका एकजुट अब 28 साल का हो गया है. उनके पास रंगकर्म के उत्सुक बच्चे आते रहते हैं और उनका रंगकर्म का कारवां चलता रहता है.
व्यक्ति जब व्यक्ति से ऊपर उठ कर संस्थान में तब्दील हो जाता है, तब उससे लोगों की अपेक्षाएं बढ जाती हैं. नादिरा बब्बर अब एक ब्रांड नेम बन चुकी हैं तो ज़ाहिर है कि लोगों की उनसे उम्मीदें भी बढी हैं. वे प्रयोगधर्मा हैं, इस लिहाज़ से उनसे यह अनुरोध किया जा सकता है कि किस्सागोई बचपन से ही डाली गई एक आदत है. इसलिए "हम कहें आप सुनें" को बडी उम्र के कलाकारों से न करवा कर बच्चों से करवाया जाए तो न केवल बच्चों के मुख से इस किस्सागोई का आनन्द दुगुना होगा, बल्कि हमारे किशोर और युवा अपनी उम्र के लोगों से और भी ज्यादा प्रभावित होंगे.
अभिषेक नारायण का प्रकाश सन्योजन अच्छा है. खुर्रम आज का युवा है, और किस्सागो फनकारा भी आज की ज़बान बोलती हैं. ऐसे में उनके सेवक एकदम पीरियड कॉस्ट्यूम में समझ में नहीं आते. वे आम गंवई वेश भूषा में भी रह सकते थे. (पुन: मुंबई में नाटक पर भी ग्लैमर हावी हय, यह इस शो में भी देखने को मिला. एक दर्शक ने कहा कि वे यह शो केवल नादिरा बब्बर को देखने के लिए आए हैं, क्योंकि वे राज बब्बर की वाइफ हैं. मेरे पीछे बैठी महिलाओं की फौज़ सारे समय इस बात को ले कर बहस करती रहीं कि स्टेज के पास खडी लडकी नादिरा बब्बर की बेटी जुही बब्बर है या नहीं. गनीमत हुई कि जुही नातक का परिचय देने के लिए मंच पर आईं, तब वे तसल्लीशुदा हुईं. कुछ मराठीभाषी दर्शक सह थिएटरदां ने कहा कि यह तो बस केवल कहानी कहना था, कह दिया, अब इसपर क्या बोलना? जुही की घोषणा "हम कहें आप सुनें" पर एक पीछे से बोलीं, "वही करने तो आए हैं" सोमवार का कार्य दिवस होने के बावज़ूद हॉल भरा हुआ था, क्योंकि नाटक हिन्दी में था.)