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Friday, October 16, 2009

“अजिंठा” में कब्र से निकल आई “पारो”

http://mohallalive।com/2009/10/16/ajintha-in-nehru-theatre-festival/

http://www.artnewsweekly.com/substory.aspx?MSectionId=1&left=1&SectionId=31&storyID=९६

http://janatantra.com/2009/10/16/ajintha-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में इस बार मुंबई विश्वविद्यालय के अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट की प्रस्तुति "अजिंठा" रही. विश्वविख्यात अजंता की पृष्ठभूमि पर एक आदिवासी प्रेम कथा इस नाटक का उत्स है. नाटक मराठी के सुप्रसिद्ध कवि ना धो महानोर के दीर्घ काव्य पर अधारित है. चूंकि नाटक अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट की प्रस्तुति थी, इसलिए इसे एक अकादमिक रूप से तैयार किया गया. नाटक के निर्देशक मिलिन्द इनामदार बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने बच्चों के साथ स्टडी टूर किया. अजंता तो वे गए ही, वहां के आदिवासी समाज से भी मिले. उनके उठने, बैठने, बात करने आदि के तौर तरीकों को देखा. साथ ही, वे सब ना धो महानोर के गांव पलसखेर भी गए. ना धो महानोर कहते हैं कि यह काव्य सत्य घटना पर अधारित है और मिलिन्द इनामदार बताते हैं कि नाटक की मुख्य पात्र पारो की उपेक्षित कब्र उन सबको मिली. रॉबर्ट गिल, जो अजंता के भित्तिचित्रों की पेंटिंग करने आए थे, वहां 10-12 साल रहे और इसके भी प्रमाण हैं. शायद अपने चित्रों में वे वह भारतीय भाव नहीं ला पा रहे थे, इसलिए पारो के प्रेम के रूप में उन्हें वह भाव मिला. यह नाटक एक नाटक से अधिक एक अनुभव के रूप में अधिक है.
सत्य घटना पर आधारित इस दीर्घ काव्य में भी आवश्यकतानुसार कल्पना का सहारा लिया गया है और नाटक में भी. तकरीबन डेढ सौ साल पहले की घटना पर आधारित इस प्रेम गाथा में आदिवासी चरित्र होने के कारण अहिरानी बोली का प्रयोग किया गया है. अहिरानी बोली का प्रयोग 1980 में मराठी के सुप्रसिद्ध नाटककार भालचन्द्र झा ने अपनी एकांकी "चित्रकथी" में भी किया था. संयोग की बात है कि "अजिंठा" की तरह "चित्रकथी" भी मनोहर वाकोडे के काव्य पर आधारित है. अहीरानी का प्रयोग आज की आधुनिक भाषा बोल रहे लोगों के लिए एक चुनौती भरा काम होता है. मराठी सम्वाद के लिए तो अहीरानी का प्रयोग किया गया, मगर हिन्दी गंवई ज़बान के लिए बम्बैया हिन्दी फिल्मोंवाली ज़बान इस्तेमाल कर ली गई, जो मखमल में टाट के पैबन्द की तरह लगती रही.
'अजिंठा' के निर्देशक मिलिन्द इनामदार भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1993 के स्नातक हैं. इस नाटक के पहले उन्होंने "खेल" नाटक किया था और उसके पहले असगर वज़ाहत के सुपर्सिद्ध नाटक "जिन लाहौर नई वेख्या समझो जम्याई नहीं" को लेकर लाहौर भी गए थे. वे क्रिएटिव हैं और नाटकों में प्रयोग करना उन्हें पसन्द है. यह नाटक फ्री स्टाइल में था, जिसमें रीयलिज्म के साथ स्टाइलाइजेशन को ले कर चलना था. साथ ही, रीयलाइजेशन को तोडने के लिए उन्होंने सेलोरामा का भी प्रयोग किया. हालंकि नाटक में सेलोरामा का प्रयोग नाटक की एकाग्रता और उसके स्वाद को तोडता है.
नाटक में पात्रों द्वारा मां-बहन की गाली का भरपूर प्रयोग बुरी तरह से खटका. मिलिन्द बताते हैं कि डेढ सौ साल पहले भी ये गालियां थीं तो अब लगता है, जब से मां बहन की अवधारणा बनी होगी, तब से गाली भी अस्तित्व में आ गई होगी. यथार्थ के नाम पर इसका प्रयोग करना सही माना जा सकता है, मगर इसके प्रयोग से बचने पर भी नाटक के असर में कोई कमी नहीं आती. 'अजिंठा' को बहुभाषी नाटक का दर्ज़ा दिया गया, क्योंकि रॉबर्ट गिल अंग्रेजी बोलते हैं और नाटक के आदिवासी पात्र कभी कभी अचानक से हिन्दी फिल्म वाली गंवई ज़बान बोलने लग जाते हैं. चूंकि पूरा नाटक मराठी मे चल रहा होता है, इसलिए दर्शक मानसिक रूप से तैयार रहते हैं कि वे मराठी सुन रहे हैं, ऐसे में अचानक हिन्दी पहले तो समझ में ही नहीं आती. जबतक समझ में आती है, तबतक पात्र हिन्दी की सीढी से उतरकर मराठी के दरिया में गोते लगाने लगते थे.
'अजिंठा' में कई गीत आदिवासी समाज से लिए गए हैं, जिसके कारण लोक का स्वाद और लचक मिलता है. नृत्य अभिरामी थे. सभी पात्र चूंकि अकादमी के छात्र ही थे, इसलिए युवा एनर्जी से नाटक सराबोर था. मराठी नाटक की एक खासियत होती है, कम शब्दों में अधिक से अधिक कहना, 'अजिंठा' में भी यह दिखा. रंग, कला, शिल्प, मंच आदि के माध्यम से अपनी बात कहना रंगमंचीय नाटक को बहुत अच्छी अभिव्यक्ति देता है. संजय गीते का संगीत नाटक के साथ दर्शक को जोड कर रखता था.
सूत्रधार के रूप में वामन केन्द्रे का नाम लिया गया. वामन भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक हैं और वर्तमान में अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट के निदेशक भी हैं. उनके बारे में कहा जा सकता है कि वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के उन चन्द लोगों में से हैं, जिनके पास थिएट्रिकल सेंस जबर्दस्त है. शायद इसकी एक वज़ह रतन थियम जैसे गुरु का मिलना हो. उनका विजुअल सेंस बहुत समृद्ध है. देवदासी प्रथा पर आधारित चेतन दातार के 'झुलवा' से वामन को जबर्दस्त प्रसिद्धि मिली. अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट से वे इस कदर जुडे हुए हैं कि अकादमी का नाम आते ही लोग यह पूछते हैं-"वामन केन्द्रे वाला?" किसी संस्था की किसी व्यक्ति के साथ इस तरह से परिचिति व्यक्ति को मज़बूत करता है तो संस्था को कहीं से प्रभावित भी करता है. (पुन: नाटक देखने के लिए पूरा हॉल भरा हुआ था. वामन केन्द्रे अकादमी के निर्देशक और इस नाते सूत्रधार के रूप में संस्था और नाटक पर बात कर सजकते थे. मगर अनुरोध के बावज़ूद बात करने पर रुचि नहीं दिखाई. नाटक अकादमी के बच्चों ने किया था और अच्छा किया था, इसलिए उसे कर पाने का आनन्द सभी के चेहरों पर दिख रहा था. यही संतोष दर्शकों के चेहरों पर भी दिख रहा था. मलयाली नाटक 'आयुस्संति पुस्तकम" के बाद थिएटर की भाषा में यह दूसरा नाटक था, जिसे नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल की एक और उपलब्धि कही जा सकती है.)