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Friday, October 31, 2008

छाम्माक्छाल्लो की एक और मैथिली कहानी- आओ तनिक प्रेम करें.

इस कहानी के आधार पर इसी नाम से एक नाटक लिखा गया हिन्दी में।

आऊ कनेक प्रेम करी माने बुझौअल जिनगीक
'हे ये..., कत' गेलहुँ? आऊ ने एम्हर।'
'की कहै छी? एम्हरे त' छलहुँ तखनी स'। कहू, की बात?'
'किछु नञि! मोन होइय' जे अहाँ अईठाँ बैसल रही।'
'धुर जाऊ! अहूँ के त' ... एह! एतेक काज सभ पसरल छै। बरखा-बुन्नीक समय छै। दिन मे अन्हार भ' जाइ छै। तइयो अहाँ कहलहुँ त' बैसि गेलहुँ आ देखियौ जे लग मे बैसल-बैसल अनेरे कएक पहर निकलि गेलै। ताबतिमे त' हम कतेको काज छिनगा नेने रहितह।ँ!'
'आहि रे बतहिया ! सदिखन काजे-काज, काजे-काज ! यै, आब के अछि, जकरा लेल एतेक काज करै छी। सभ किओ त' चलि गेल हमरा-अहाँ के छोड़ि के, जेना घर स' बाहर जाएत काल लोग घरक आगू ताला लटका दै छै। हे बूझल अछि ने ई कहबी जे सभ किओ चलि गेल आ बुढ़बा लटकि गेल। तहिना हम दुनू लटकि गेल छी अई घर मे।'
'एह! छोड़ू आब ओ गप्प सभ। आ हे, अपना धिया-पुता लेल एहेन अधलाह नञि बाजबाक चाही। आखिर हुनको आओरक अपना-अपना जिनगी छै। बेटी के त' अहां ओहुनो नञि रोकि क' राखि सकै छी। आनक अमानति जे भेलै। बाकी बचल दुनू बेटा त' बूझले अछि जे जामुन तडकुन खेबाक आब हुनकर उमिर नञि रहलन्हि। एहेन-एहेन गप्प पर त' ओ सभ भभा क' हँसि पड़तियैक।'
'नञि! से हम अधलाह कत' सोचलहुँ आ कियैक सोचब। एतेक बूड़ि हम थोड़बे छी। मुदा, जे मोनक पीड़ा अहूँक संगे नञि बाँटब त' कहू, जे हम कोम्हर जाइ।'
'कतहु नञि! अहि ठाँ बैसल रहू। हम अहाँ लेल चाय बना क' आनै छी। अहाँ जाबति चाय पियब, ताबति हम भन्सा-भात निबटा लेब।'
'ठीक छै, जाऊ! अहाँ आओर के त' चूल्हि-चौकी आ भन्सा भात स' ततेक ने फैसिनेशन अछि जे किओ किछु कहैत रहय, अहाँसभ स' ओ छूटि नञि सकैय'।
'से नञि कहू। आई कोनो लड़की कि जनीजात चूल्हि मे सन्हियाय नञि चाहै छै। मुदा ओकरा आओर के त' जन्मे स' पाठ पढ़ाओल जाइ छै जे गै बाउ, बेटी भ' क' जनमल छें त' चूल्हि स' नाता त' निभाबहि पड़तौ। कतबो पढ़ि-लिखि जेबें, हाकिम-कलक्टर भ' जेबें, मुदा भात त' उसीनही पड़तौक। आब हमरे देखि लिय'। हम की पढ़ल-लिखल नञि छी कि नौकरी मे नञि छी। माय-बाउजी भने पाइ स' कने कमजोर छलाह, मुदा मोन स' बहुत समृद्घ। तैं त' पढ़ौलन्हि-लिखौलन्हि। नौकरी लेल अप्लाई केलहुँ त' नीके संयोगे सेहो भेंटि गेल। आर नीक कही अपन तकदीर के जे अहाँ सन जीवन साथी सेहो भेटल जे डेगे-डेग हमर संग रहलाह। मुदा तइयो देखियौ जे बेसिक फर्क जे छै, से अहूँ की बिसरि सकलहुँ? आइ धरि कहियो कहलहुँ जे सपना, रह' दियऊ अहाँ भानस-भात । हम क' लेब कि घर ठीक क' लेब कि धिया-पुता के पढ़ा लेब।'
'आब लगलहुँ अहूँ रार ठान'। ताइ स' नीक त' सएह रहितियैक जे अहाँ किचन मे जा क' अपन काज करू। हँ, चाय सेहो द' दिय'।'
'से त' अहाँ कहबे कहब। बात लागल जे छनाक स'। अहिना त' अहाँ आओर हमरा आओरक अबाज के बंद करैत एलहुँए।'
'सपना, अहाँ एना जुनि सोचू। आई तीस बरख स' हम दुनू एक संगे छी। पूर्ण भरोस स', संपूर्ण आत्मसमर्पण, विश्र्वास आ सहयोग स'। हमरा बुते जे भ' सकल, कहियो छोड़लहुँ नञि। ठीक छै जे हम कहियो एक कप चायोटा नञि बनेलहुँ, मुदा आदमी आओरक सहयोग देबाक माने की खाली भन्से मे घुसनाई होई छै? अहाँ मोन पाडू, हम कहियो कोनो बात पर टोकारा देलहुँ? अहाँ जे पकाबी, जे खुआबी, जे पहिराबी, जेना अहाँ राखी। कहियो कोनो आपत्ति कएल की।'
'हमरा हँसी आबि रहलए अपन एहेन समर्पित पति पर।'
'मुदा हमरा नञि आबि रहलए। हमरा गर्व अछि अपन एहेन सहयोगी पत्नी पर जे हमर कन्हा स' कान्हा मिला क' हमरा संगे-संगे चललीह। मुदा, आई ई सभ उगटा-पुरान कियैक?'
'टाइम पास कर' लेल आ अहाँ जे कहलहुँ, अई ठाँ बैस' लेल, त' बैसि के अहाँक मुंह त' नञि निरखैत रहि सकै छी ने।'
'निरेखू ने, किओ रोकलकए अहाँ के कि टोकलकए अहाँके।'
'धुर जाऊ, अहूँ त...! आब ओ सभ संभव छै की? अरे, जहिया उमिर छल, जहिया समय छल, तहिया त' कहियो हमर मुंह निरेखबे नञि कएलहँु आ नहिए निरखही देलहुं। चाहे हम किछुओ पहिरि-ओढ़ि ली, चाहे बाहर स' हमरा कतेको प्रशंसा भेटि जाए, अहाँक मुंह स' तारीफक एकटा बोल सुन' लेल तरसि गेलहुँ। बोल त' बोल, एकटा प्रशंसात्मक नजरियो लेल सिहन्ता लागले रहि गेल। आ तहिना अहांक पहिरल ओढ.ल पर कहियो एपी्रशिएट कएलहुँ, तइयो मुंह एकदम एके रस - शून्य, भावहीन ...'
'एह! एना जुनि कहू। अहाँक सज-धज देखिक' हमरा जे प्रसन्नता होइत छल, से हम कहियो ­नञि शेयर कएलहुँ अहाँ स', से कोना कहि सकै छी। दिनभर अहाँक रूप आँखिक सोझा नचैत रहैत छल आ राति मे ओ सभटा प्रशंसा रूपाकार लेइत छल। तहिना अहांक मुंह स' अपन, प्रशंसाक बोल भरि दिन चानीक घंटी जकाँ मोन मे टुनटुन बाजत रहैत छल आ मोन के उत्फुल्ल बनौले रहै छल। मुदा, अहाँ कहियो ओहि समय कोनो सहयोगे नञि देलहुँ या कहियो संग देबो केलहुँ त' बड्ड बेमोन से'। हम कहियो पूछलहुँ जे अएं यै, एना कियैक करै छी अहाँ? अहींक मर्जी मुताबिक हम ओहूठाँ चलैत रहलहुँ।'
'हे! सरासर इल्जाम नञि लगाबी। देखियौ, हमरा लेल जेना अहाँ महत्वपूर्ण छी, तहिना अहाँक प्रत्येक बात हमरा लेल महत्वपूर्ण अछि। हम अहाँक संग नञि देलहुँ अथवा बेमोन स' देलहुँ त' कियैक ने अहाँ पूछलहुँ कहियो, अथवा हम झँपले-तोपले किछु कहबो केलहुँ त' कियैक ने तकरा पर बिचार केलहुँ, कहियो खुलिक' चर्च केलहुँ.। ... हे लिय'..., चाय लिय'... अपनो लेल बना लेलहुँ। भन्साघर स' चिकरि चिकरि क' बाज पड़ै छल। किओ सुनितियैक त' कहतियैक जे बतहिया जकाँ एकालाप क' रहल छै कि ककरो संगे झगड़ि रहल छै।'
'चाय त' बड्ड दीब बनलए।'
'एह! याहि टा गप्प पहिनहुँ कहियो कहने रहितहुँ। अई तीस बरख में आइए नीक चाय बनलैय' की?'
'छोड़ू ने पुरना गप्प सभ! आब धीया-पुताक घर में ई सभ कथा-पेहानी नीक लागतियैक की?'
'कियैक ने नीक लागतियैक? ई सभ त' जीवनदायी धारा सभ छै जाहि स' जीवनरूपी वृक्षक डाल-पात सभके भिन्न भिन्न स्रोत स' जीवनशक्ति भेटैत रहै छै। अरे, धिया-पुताक सोझा अहाँ कहिये दितहुँ त' अई मे कोनो ऐहन अधलाह कर्म त' नञि भ' जइतियैक जाहि स' ओकरा आओरक आगाँ हमरा आओर के शर्म कि झेंप महसूस होयतियैक!'
'अहाँ बात के तूल द' रहल छी।'
'नञ! स्थितिक मीमांसा क' रहल छी। चीज के रैशनलाइज क' रहल छी।'
'हमरो दुनूक जिनगी केहेन रहलए। नेना छलहुँ त' पढ़ाई, पढ़ाई, पढ़ाई! माय-बाउजी कहैत छलाह जे बाउ रौ, इएह त' समय छौक तपस्याक। एखनि तपस्या क' लेबें त' आगाँ एकर मधुर फल भेटतौ। पढ़ बाउ, खूब मोन लगाक' पढ़ ! आ हम पढ़ैत गेलहुँ - फर्स्ट अबैत गेलहुँ। नीक नोकरीयो लागि गेल। बाउजी सत्यनारायण भगवानक कथा आ अष्टयाम सेहो करौलन्हि। हुनका बड्ड सौख छलै जे हुनकर पुतौहु पढ.ल-लिखल, समझदार आ मैच्योर्ड हुअए। तकदीरक बात कहियौ जे हुनकर ईहो सेहन्ता पूर्ण भ' गेलै। हुनका अहॉँ सन पुतौहु भेटलै, रूप आ व्यवहारक गरिमा स' परिपूर्ण।
'चाय त' सठि गेल। आओरो ल' आबी की?'
'नञि! हमरो जिनगी सोगारथ भेल अहाँ के पाबि क'। कतेको परेशानी भेल, अहाँ सभस' निबटैत गेलहुँ, एकदम स' धीर थिर भ' क'।'
'त' की करितहुँ! जहन हम दुनू प्राणी एकटा बंधन में बंधा गेलहुँ त' तकर मान मरजाद त' निभाबही पड़तियैक ने! आ कथा खाली हमरे आ अहाँटाक संबंध धरि त' सीमित नञि रहै छै। एकर विस्तार अहाँक परिवार, हमर परिवार आ फेर अपन बाल-बच्चा धरि होइत छै, आ हे, एहेन नञि छै जे हम सीता-सावित्री जकाँ मुंह सीने सबकुछ टॉलरेट करैत गेलहुँ। कएक बेर हम अपन टेम्पर लूज केलहुँ। मुदा अहाँक तारीफ, अहाँ अपन टेम्पर कहियो नञि लूज केलहुँ।'
'महाभारत स' बच' लेल। आह! पत्नीक आघात स' कोन एहेन मनुष्य अछि जे बाँचि सकलए।'
'मजाक जुनि करू! अहँू सीरियस छी त' हमहूँ सीरियस छी। हमर अपन इच्छा छल नान्हिटा स' जे पढ़ब-लिखब। पढ़ि लिखिक' अपना पएर पर ठाढ़ होएब। आर्थिक परतंत्रता अस्वीकार्य छल। हमरा अई बात पर पूर्ण संतोख अई जे हमर ई इच्छाक पूर्ण आदर आ सम्मान भेटल अहां स'। हमर नौकरी पर हमरा स' बेसी प्रसन्नता अहाँक बाउजी के भेल छल। हमर एकगोट संगी हमरा चेतौने छल जे देखब, बुढ़बाक खुशी अहाँक पगार ओसुलबा स' त' नञि अछि। हमरो लागल छल। मुदा धन्न कही हुनका, नञि कहियो पुछलन्हि जे हमरा की आ कतेक दरमाहा भेटैय' आ नञि कहियो ओकरा मादे कोनो खोजे-पुछारी कएलन्हि। सएह अहँू संगे भेल। अहँू कहियो नञि पूछलहुँ जे हम की सभ करै छी। अपन पगार के कोना खर्चै दी॥ हमरा त' कएक बेर इएह होइत रहल जे अहाँ पूछै छी कियैक ने? तहन ने हम अपन आमदनी आ आमद स' बढ़ल खर्चाक हिसाब अहाँ के दितहुँ। नतीजा, आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कएलो सन्ता कहियो आर्थिक रूपे स्वतंत्र नहिं भ' सकलहुँ। कहियो अपना मोने अपना ऊपर किछु खर्च नञि क' सकलहुँ। अहाँ संगे ई नञि छल। अहाँ त' 'ईट, ड्रिंक आ बी मेरी' मे यकीन करैत एलहुँ आ एखनो करै छी।'
'अई मे अधलाहे की छै? मनुक्खक अई जिनगी मे अछिए की? खाई, पीबि, मस्त रही।'
'भने ओहि मे सभ किओ सफर करी।'
'से कोना? कहियो अहाँके हम कोनो कष्ट देलहुँए?'
'किऐक ने? कोनो समय एहेन नञि भेल जे कोनो खास खास बेर पर हमर नोर नञि खसल हुअए। कहियो कोनो काज-परोजन भेल, कि तीज तेवहार कि ककरो बर्थ डे कि वेडिंग, सभठाँ त' पल्ला झाड़ि लेइत अएलहुँ जे पाई नञि अछि।! तहन हम की लोकक ओहिठाँ खाली हाथे पहुँचतहुं आ कहितहुं जे हमर हस्बैंड कहै छथि जे हुनका लग पाइ नञि छै तैं हम आओर हाथ झुलबैत चलि ऐलहुँए। किओ पतियैतियैक।'
'अहाँ लग त' रहै छल ने।'
'हँ, कियैक ने कहब। ई बुझलहुँ जे ई 'छल' के मेंनटेन करबा लेल हम कतेक बेर अपन मोन के मारि-मारि के राखलहुँ।'
'एह छोड़ू ई सभ गप्प। खाएक लेल की बनाएब?'
'जे कही अहाँ? हमरा आओर के त' ईहो कहियो स्वतंत्रता नञि रहल जे अपना मोने, अपन पसीनक खाना बनाबी।'
'फेर ब्लेम! आइ अहाँ के भ' की गेलए?'
'अहाँ संग लड़ियाएबक खगता। जिनगी भर जकरा लेल अहां पलखतियो भरि समय नञि देल।'
'हम अहाँके संतुष्ट नञि क' सकलहुँ कहियो, अहाँ से कह' चाहै छी?'
'हँ, सएह कह' चाहै छी?'
'बाई एवरी पॉसिबल वे?'
'यस, बाइ एवरी पॉसिबल वे?'
'फिजिकली, मेंटली, मौनेटरली, सेक्सुअली।'
'हँ, सभतरहें।'
'अहाँ हमरा कमजोर बना रहल छी।'
'अहसास करा रहल छी।'
'अपन परिस्थिति पर गौर नञि क' रहल छी। हम बिजी, अहां बिजी। हमर अएबाक-जेबाक कोनो निश्चित समय नञि। अहाँके ऑफिसक संगे-संगे घरक, धिया-पुताक जिम्मेवारी। बखत कत' छल जे प्रेम-मुहब्बतक मादे सोचितहुँ।'
'तैं त' जीवन झरना सुखा गेल ने? व्यस्तता त' जिनगीक अभिन्न अंग छियै। तैं, अई व्यस्तताक कारणे हम आओर कहियो की नहाएब-धोएब आ कि कपड़ा पहिरब छोड़ि देलियै, वा बिसार गेलियै?'
'धिया-पुताक घर मे, आई कुंड बी सो फ्रैंक ...'
'व्यर्थ इल्जाम द' रहल छी। फ्रैंकनेसक माने ई नञि जे अहाँ हमरा कोरा मे बैसेने रहू सभ समय। फ्रैंकनेस माने छै फुल व्यवहारक, फुल अप्रोचक फ्रैंकनेस। अहाँ से फ्रैंक नञि भेलहुँ, नतीजा हम नञि भ' सकलहुँ, नतीजा धिया-पुता सभ नञि भ' सकल।'
'धिया-पुता के त' बड्ड नीक जकाँ राखलहुँ। बेटीयो जीन्स आ मिनी पहिरि क' घूमल, फ्रेंड्स सभक संगे सिनेमा गेल, पार्टी कएल, कहियो टोकारा नञि केल।'
'मुदा, कहियो फ्रैंक भ' क', खुलिक' गप्प-सप्प सेहो त' नञि कएल। एकदम फॉर्मल फैमिली बनिक' रहि गेल अपन परिवार। ई हमर कहबा नञि, अहाँक बेटीयेक कहब अछि।'
'अही स' सभ किओ सभ किछु कियैक कहैत अछि। हमरा स' त' आइ धरि किओ किछु नञि कहलक?'
'अहाँ से मोके कोम्हर देलियै? तैं त' कहलहुँ, बेहद फॉर्मल फैमिली।'
'चलू छोड़ू, आब फेर स' शुरू करब जिनगी - सभटा शौख पूरा क' देब।'
'जिनगीक ओ बीति चुकल 30 साल आ तीस वर्षक पल-पल पहिने घुरा दिय'।'
'जे भ' सकै छै से कहू।'
'त' कहू जे भन्सा की बनाबी? छीमीक खिचड़ी कि छीमीक परोठा।'
'आब जे अहाँ खुआबी। बजला पर कहब जे हम अहाँ के मौके नञि देइ छी।'
'से त' कहबे करब। अपरोक्ष रूप स' अहाँक पसीन-नापसीन पूरा घर पर हावी रहलै।'
'से कोना?'
'चलू, भन्से से शुरू करी। अहाँ के सौंफ देल मलपुआ पसीन नञि, इलाइची देल खीर, सेवई पसीन नञि। आ हमरा आओर के ओ सभ बड्ड पसीन। हमरा बिन सौंफक पुआ आ बिनु इलाइचीक खीर सेवई बनेबाक आदत पार' पड़ल।'
'त' ई त' नञि कहलहुँ जे अहाँ आओर नञि खाई।'
'ईहो त' नञि कहल जे ठीक छै, कहियो-कहियो हमहूं सौंफ-इलायचीबला पुआ, खीर, सेवई खा लेब, तहन ने बुझितहुं? आ अपना स्वादक अनुसारे अलग स' चीज बनाबी, ई कोनो जनीजात स' पार लागलैये जे हमरा स' लागितियैक।'
'अच्छा, आगां बढू।'
'बढ़ब, पहिने भन्सा चढ़ाइए आबी।'
'आइ उपासे पड़ि जाइ त' केहेन रहत। तखनि स' अहाँक मुंह स' भानस-भानस सुनि क' कान पथरा गेल आ पेट अफरि गेल।'
'उहूँ! एखनि त' डिनर गोल क' देब आ अधरतिया के हाँक पाड़ब जे हमरा भूख लागलए। उठू, किछु अछि बनल त' दिय'। किछु नञि अछि त' ऑमलेटे ब्रेड सही।'
'जाऊ तहन, जे मर्जी हुअए, करू।'
'हे, हम एखने गेलहुँ आ एखने एलहुँ। ताबति अहाँ बउआक ई मेल पढ़िक' ओकरा जवाब पठा दियऊ।'
'हँ, ओहो लिखलकए जे बड्ड नीक लागि रहलए। अपन देश स' एकदम अलग, सभकिछु एकदम व्यवस्थित। मर्यादित, संतुलित। आखिर अमेरिका छियई ने। धन्न कही आईटी बूम के जे बच्चा सभक रोजगारक नव अवसर भेंटि रहल छै। भारतीय कंप्यूटर इंजीनियर्स के कतेक डिमांड छै फॉरेन कंट्री मे। देखबै जे दस मे स' तीन टा इंजीनियर अमेरिका त' आन आन देशक रूख क' रहल अछि।'
'प्रतिभाक पलायन थिकै ई। इंर्पोटेस ऑफ टेक्नॉलाजी संगे इंपोटेंसी ऑफ अवर टैलेंट छै। बाहरी टेक्नॉलॉजी पर बिढ़नी जकाँ लूझै छी। ओ सभ रोटी देखबैत अछि, हम सभ कुकुर जकाँ बढ़ि जाइ छी।'
'अहाँक बेटो बढ़ल अछि, से जुनि बिसरी।'
'हम इन जेनरल कहि रहल छी। अपन देशक त' ई स्वभावे बनि गेल छै, घरक जोगी जोगड़ा, आन गामक सिद्घ। इंटर्नल टैलेंट के पहिचान' लेल, रिकग्नाइज कर' लेल पहिने कोनो बुकर प्राइज, ऑस्कर अवॉर्ड, नोबल प्राइज चाही, नञि त' सभ किओ फ्रॉड, धोखेबाज ...' अपने ओहिठां त' लोक आओर एतेक तरहक एक्सपेरिमेंट करैत अछि। लोक कतेक महत्व दइत छै।'
'से सभ त' छै। ई नियति हमही आओर बनाक' राखल अछि। तैं त' आइ अनिमेष हमरा आओर लग नञि अछि। अमेरिका मे अछि। पता नञि कहिया घुरत?
'आ जौं नञि घुरलै आ ओम्हरेक मेम ल' आनलक तहन?'
'तहन की? अहाँ सासु पुतौहु रार मचाएब। हमर काज त' आशीर्वाद देबाक धरि अछि। से भूमिका हम निबाहि लेब।'
'त' सभटा सासु अपना पुतौहु स' रारे मचबै छै? हमही दुनू सासु-पुतौहु मे ई देखलहुँ कहियो? आब अनिमेष जकरा स' विवाह करौ, हमरा लेल धन सन! हमरा कोना आपत्ति नञि!'
'भन्सा भ' गेल त' दइए दिय'। खाअक' सूतब।'
'एतेक जल्दी?
'थकान लागि रहल अछि।'
'पहिल बेर एतेक बतियौलहुँए ने? हरारति त' लागबे करत। घरवाली संग एतेक बेसी गपियेनाइ कोनो मजाक बात छै!'
'हे, एके प्लेट मे निकालू ने।'
'आई एतेक प्रेम कथी लेल ढरकि रहल अछि?'
'सभटा पिछला हिसाब रफा-दफा कर' लेल।'
'त' पुरनका तीस बरख पहिने घुराऊ!'
'से त' नञि भ' सकैय', मुदा पुरना तीस बरख के अगिला तीस बरख मे मिलाक' जिनगीक ताग के आओर मजबूत करबै। आऊ! बैसू एम्हर। हे, लिय। हमरा हाथे खाऊ!'
'हमरा डर होइयै जे हमर हार्ट फेल नञि भ' जाए।'
'नञि होएत। आ हेएबो करत त' हमहूँ संगे-संगे चलि जाएब। हे, लिय' ने। खाऊ ने। अहींक हाथक बनाओल त' भोजन अछि।'
'हम अपने हाथे खाएब। दोसराक हाथे खएला स' पेट नञि भरत।'
'मोन भरत। आई पेट भर' लेल नञि', मोन भर' लेल खाऊ।'
'तहन त' आओरो नञि खाएब। मोन जहन भरिए जाएत त' जीबि क' की करब? मोनक अतृिप्त त' जिनगी जिबाक बहाना होइ छै।'
'ई सभ फिलॉसफी छोडू आ खाना खाऊ। अरे, अरे, दाँति कियैक काटलहुँ।'
'भोजन में चटनी नञि छल नें, तैैं...' हे, भ' गेल। आब नञि खाएल जाइत हमरा स'।'
'ठीक छै। चलू तहन।'
'कत'।'
'चलू त' पहिने। आई चलू, हमर कन्हा थाम्हि क' चलू। अइ्‌ दुनू बाँहक घेरा मे चलू।'
'व्हाई हैव यू बीकम सो रोमांटिक?'
'कहलहुँ ने जे पछिला तीस बरख के अगिला तीस बरख मे शामिल कर' जा रहल छी। हे, इमानदारी स' कहब', अहां के नीक लागि रहलए हमर ई स्पर्श!'
'कोनो भावना नञि उमड़ि रहलए। अहाँ ईमानदारीक प्रश्न उठाओल, तैं कहि रहल छी।'
'आब?'
'ऊँहूँ।'
'आब? मोनक दरवज्जा बंद क' क' नञि राखू। कनेक फाँफड़ि छोड़ि दियौक। भावनाक बयार के घुस' दियौक।'
'हमरा रोआई आबि रहलए।'
'त' कानि लिय' अई ठाँ, हमर छाती पर माथ राखिक'। मोन हल्लुक भ' जाएत।'
'बेर-बेर सोचना आबि रहल अछि पुरना दिन। तखन कियैक ने ... एतेक व्यस्तताक की माने भेलै जहन हमही दुनू अपना के अपना दुनू स' अलग ल' गेलहुँ।'
'माने छलै ने? अपन जिनगी बनेबाक। धिया-पुताक जिनगी बनेबाक। ई सभ लक्ष्य छल आ अर्जुन जकाँ हम सभ ओहि लक्ष्यक प्राप्ति लेल चिड़ैक आँखिक पुतली धरि तकैत रहलहुँ।'
'हमर पलक मिझा रहलए।'
'मिझाए दियऊ। बन्द पलक, फुजल अलक। एखनो अहाँक केश ओतबे नरम, आ मोलायम अछि।'
'आब त' सभ टा' झड़ि गेलै।'
'जे छै से बहुत सुंदर छै। आह! मोनक कोन्टा मे ठेलि-ठूलि क' राखल सुषुप्त भावना सभ... जेना छोट-छोट फूँही बनिक' रोम-रोम के भिजा रहल अछि। रोम-रोम भुलुकि रहल अछि। ई की अछि?'
'अहसास। हमहँू अई अहसासक फूंही मे भीजि रहल छी। अहाँक तन स' माटिक सोन्हपनि आबि रहल अछि। थाकल दकचाएल जिनगी मे एकगोट नव संचार आबि रहलए। नस-नस वीणाक तार जकाँ झंकृत भ' रहलए। सृष्टिक ई अमूर्त आनंदक क्षण अछि, दिव्य, भव्य, अलौकिक !'
'एक-एक साँस स' बजैत स्वर्गीय संगीत। आइ धरि कहियो नञि अनुभव कएने छलहुँ। आई अनुभव क' रहल छी।'
'आऊ, अई अनुभव सागर मे डूबि जाइ- गहीर, आओर गहीर, कामनाक सीपी फोली! भावनाक मोती बटोरी। आसक ताग मे ओइ मोती के गँूथि माला बनाबी आ दुनू एकरा पहीरि ली।'
'जिनगी एतेक सुंदर नञि लागल पहिने कहियो।'
'मौने मुखर रहल सदिखन। आई शब्द मौनक देबाल के ढाहि रहल अछि।'
'ढह' दियऊ ! सभटा वर्जना ढह' दियऊ !'
'जिनगीक बदलइत रूप किओ नञि बूझि सकलए। अहाँक रोम-रोम स' झरैत ओस बुन्न ! एक-एक श्र्वास स' अबैत जुही, गुलाब, मौलश्रीक सुगंधि। आऊ, डूबि जाइ अइ मे!'
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'जिनगी पहेली अछि, बुझौअल अछि।'
'ऊँहूँ! जिनगी जिनगी अछि।'
'माने?'
'माने की? एखनि धरि मतलबे बूझ' मे लागल छी? धुर जाऊ! अहाँ बड्ड ओ छी।'
'ओ छी, माने केहेन छी?'
'ओ माने ओ। आओर किछु नञि!'
'अहूँ एकदम नेन्ना जकाँ करै छी।'
'नेन्ना त' बनिये गेलहुँ। अहाँ नञि बनलहुंए की?'
'बनलहुँए ने।'
'तहन?'
'तहन की?'
'तहन माने जिनगीक रूप देखी आ मस्त रही।'

Tuesday, October 14, 2008

राजेन्द्र बाबू की विदेश यात्रा, ज्योतिष और उनके कपडे

राजेन्द्र बाबू पढ़ने में बहुत तेज़ थे, इसलिए उनके बड़े भाई सहित हित-मित्रों की राय बनी की वे इंग्लॅण्ड जाकर वहाँ से आई सी एस की परीक्षा दें। घरवालों से छिपाकर तैयारी हो रही थी, कोट- पैंट सिलाए गए थे, मगर भेद खुल गया और उनकी दादी उन्हें घर पकड़कर ले आईं, क्योंकि तब विदेश जाना बहुत ग़लत माना जाता था। तब राजेन्द्र बाबू ने अपने लिए इंतज़ाम किए गए सभी कपडे व् पैसे अपने एक दूसरे मित्र को, जिनकी ऎसी कोई योजना नहीं थी, उन्हें दे दिए। वे मित्र आगे चलाकर पटना हाई कोर्ट के जज बने। वे थे- श्री सुखदेव प्रसाद वर्मा।
उन्हीं दिनों की एक मनोइरंजक घटना है। जब विदेश यात्रा की गुप-चुप तैयारी चल रही थी, तब राजेन्द्र बाबू अपने दो अन्य मित्रों के साथ कलकत्ता में घूमते-घामते किसी वृद्ध बंगाली ज्योतिषी के यहाँ पहुंचे। वे एक से बोले- "तुम्हारे भाग्य में विदेश यात्रा नही लिखा है।" सब हंस परे, क्योंकि वह मित्र धनी भी था और पारिवारिक विरोध भी नही था। राजेन्द्र बाबू से कहा की तुम्हारा जाना बही नहीं, २० साल बाद होगा और तीसरे को, जिसकी कुछ तैयारी नहीं थी, कहा की तुम्हें जल्द जाना होगा। तीनों ने इसे बकवास माना। मगर संयोग कहें की पहला मित्र वाकई नहीं जा सका। वह बंबई गया और वहा के समुद्र को dekh kar घबरा गया। (तब विदेश यात्रा समुद्र से होती थी) राजेन्द्र बाबू के बारे में कहा ही जा चुका है। लेकिन उस तीसरे का कार्यक्रम आनन्-फानन में बन गया। राजेन्द्र बाबू ने कभी उस व्यक्ति का नाम नहीं बताया। राजेन्द्र बाबू का जाना १९०७ के बदले १९२८ में हुआ, वकालत के सिलसिले में। १९२० में उन्होंने वकालत छोड़ दी थी, मगर अपने बुजुर्ग मित्र व् मुवक्किल हरिहर प्रसाद सिंह के कहने पर केवल उसी केस के लिए लादे। इसके बाद आजीवन कूई अन्य केस नहीं लिया।
१९२८ में इंग्लैंड जाने के लिए गर्म ऊनी कपडे के बंद गले के लंबे कोट, पतलून व् टोपियाँ सिलवाई गईं। कुछ ऊनी कपडे वे विलायत साथ ले गए सिलवाने के लिए। मगर विलायती दर्जी हिन्दुस्तानी कैसा तो सिल पाता। उसने जैसे सिले, राजेन्द्र बाबू ने पहन लिए। बटन टेढी लाइन में तनके थे, काज भी बन गए थे। राजेन्द्र बाबू ने मान लिया की इन्हें ही पहनना है। साथ के मित्रों, वकीलों ने आपत्ति की तो हंसते हुए बोले, " अंग्रेजों को देशी कोट में क्या पाता चलेगा की क्या टेढा है, क्या सीधा है। किसी ने अगर टोक भी दिया तो कहूंगा की यह भी नया फैशन है।

Friday, October 10, 2008

कपडे और राजेन्द्र बाबू

कपडों के मामले में राजेन्द्र बाबू का सदा से यही विचार रहा की कपडे स्वच्छ, आरामदेह व् शरीर की रक्षा करनेवाले हों। इससे अधिक ध्यान देने की ज़रूरत नहीं। इसलिये स्कूल कॉलेज जाते समय पाजामा और शेरावानी जैसा कुछ पहनते थे और घर पर धोती -कुर्ता। वकालत के समय भी यही ढर्रा रहा। खुले गले का कोट -पतलून कलकत्ता या पटना हाई कोर्ट में नहीं पहना। वकालत के लिए तय बेंड बांधते और गाउन पहनते। ताई का तो सवाल ही नहीं था। सरदी से बचाव के लिए बंद गले के लंबे कोट का व्यवहार करते रहे।
उदार तो इतने की कपडे ख़राब सिलने पर भी दर्जी से कुछ नहीं कहते, चुपचाप पहन लेते। सन १९४० से भी पहले की बात है। पटना खादी भंडार में रामदास प्रधान नाम के दर्जी काम करते थे। उनकी ज़बान जितनी तेज़ चलती, केंची की धार उससे भी अधिक तेज़ और बेलगाम रहती। नतीजा साफ़ था। कई बार ऐसा हुआ की कुरते की दोनों बाँहें न तो एक सी और न ही बराबर बनीं। किसी ने कहा की इनसे कपडे बिगाड़ने के पेसे वसूलने चाहिए। राजेन्द्र बाबू ने हंस कर कहा की "दूसरे तो इनका बनाया कपडा पहनते नहीं, अब अगर हम भी ना पहनें, तो यह दरजी क्या करेगा? चलो, लम्बी बांह को एक अधिक मोड़ देकर पहन लूंगा।"

Wednesday, October 8, 2008

राष्ट्रपति भवन का शाही भोज और राजेन्द्र बाबू

कायस्थों में मांसाहार सदा से मान्य रहा है, मगर बचपन के बाद राजेन्द्र बाबू शाकाहारी ही बने रहे। शाकाहारी भोजन में भी सदा, तेल, घी, मिर्च मसाले से दूर। दूध इन्हे अति प्रिय था। गो सेवा संघ की स्थापना के बाद केवल गाय का दूध, दही, घी लेने का नियम बना लिया था। प्रायः शाम या तीसरे पहर नाश्ते में चने का भूंजा बहुत दिनों तक पसंद करते रहे, जो राष्ट्रपति भवन में भी चलता रहा- कभी कभार।
इन आदतों के कारण राष्ट्रपति भवन की बड़ी- बड़ी पार्टियों में भी उनका भोजन वही रहा। उनके लिए उनके निजी चौके से एक ही बार थाली आती। यानी वे दावत में शामिल तो होते थे, मगर दावत की कोई भी चीज़ नहीं खाते। केवल कभी-कभार अतिथि के सम्मान के लिए भोजन के अंत में कॉफी की प्याली मुंह से लगा लेते।
एक बार किसी देश के राजदूत का पत्र स्वीकार कर उन्हें मान्यता देन के लिए परम्परानुसार आयोजित होनेवाले छोटे से समारोह का अवसर था। परिचय पत्र प्रस्तुत करने के बाद, रिवाज़ के मुर्ताबिक, दरबार हॉल से राजदूत को कमरे में अपने साथ लिअवा कर राष्ट्रपति उनके साथ बातें करते और उन्हें चाय-नाश्ता कराते। चाय-पान कराके, राजदूत को विदा कराने के बाद राजेन्द्र बाबू आए और हंसते हुए कहा की आज वे अच्छी मुसीबत में फंस गए। कायदे के मुताबिक, अंत में पान की तश्तरी आई। राजदूत ने पान उठा लिया। उनके सम्मान के लिए उन्हें भी पान लेना पडा। पान चूंकि कोई विदेशी लेता नही, और वे भी नहीं लेते, इसलिए उगलदान रखने का ख्याल कभी आया नहीं। पान की पीक फेंकने की कोई सुविधा न देख, उन्हें उसे निगल जाना परा। बिचारे राजदूत को भी यही करना पडा। शायद वह यह जानता ही न हो की पान की पीक निकाल कर फेंक दी जाती है।

Monday, October 6, 2008

अनोखी स्मरण शक्ति- राजेन्द्र बाबू की

बट १९३९-४० की है। नेता जी के कांग्रेस से त्यागपत्र देने के बाद राजेन्द्र बाबू सभापति चुने गए थे। कई कारणों से उन्हें यह पद स्वीकार्य न था। फ़िर भी, इस पद पर उन्हें काम करना पडा। तब वे पटना के सदाकत आश्रम में थे। एक दिन दोपहर के भोजन के बाद आधा घंटा के विश्राम के बाद वे अपाने तत्कालीन सचिव श्री चक्रधर शरण के छोटे से कमरे में गए और आलमारी खोल कर कुछ खोजने लगे। पूछने पर पाता चला कि जिन्ना का पत्र किसी फाइअल में होना चाहिए। आज के समाचार पत्रों में उनका एक बयान आया है, जिसका उत्तर देना आवश्यक है। चक्रधर जी के लौटने तक नही रुका जा सकता। इसलिए राजेन्द्र बाबू ने अपनी स्मृति पर भरोसा करते हुए पत्र देखे बिना ही उत्तर लिखने का निरणय किया।
उन दिनों सदाकत आश्रम में बिजली नहीं थी। लहभग १ घंटे में दैनिक समाचार पत्र के डेढ़-दो कॉलम के आकार का उत्तर तैयार हुआ। पटना के पत्रकार- संवाददाता बुलाए गए और उन्हें प्रेस की प्रतिलिपि दी गई। jinnaa
साब के यहाँ दफ्तर बहुत ही कुशलता से काम करता था। सभी कागजात बहुत संभालकर रखे जाते थे। इसलिए जिस पात्र की ज़रूरत परती, मानत क्या, सेकेंड में हाज़िर हो जता। ऐसे व्यक्ति को उत्तर देने में सबसे बड़ा काम होता है पिछले पत्रों को बार बार पढ़ लेना, ताकि उत्तर देने में कोई छिद्र न निकल सके। परन्तु राजेन्द्र बाबू ने अपनी स्मरण शक्ति के भरोसे जिन्ना साब को जवाब दिया था। पर उस पात्र को पढ़ने के बाद जिन्ना साब को ऐसा कुछ भी कहने का मौका न मिला की उस पात्र में अमुक विषय को छोर दिया गया है या अपने मन से कुछ जोर दिया गया है।

Thursday, August 21, 2008

छाम्माक्छाल्लो की एक मैथिली कहानी- 'माउगि' यानी 'औरतें'



विभा रानी (लेखक- एक्टर- सामाजिक कार्यकर्ता)
बहुआयामी प्रतिभाक धनी विभा रानी राष्ट्रीय स्तरक हिन्दी व मैथिलीक लेखिका, अनुवादक, थिएटर एक्टर, पत्रकार छथि, जिनक दर्ज़न भरि से बेसी किताब प्रकाशित छन्हि आ कएकटा रचना हिन्दी आ र्मैथिलीक कएकटा किताबमे संकलित छन्हि। मैथिली के 3 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखकक 4 गोट किताब "कन्यादान" (हरिमोहन झा), "राजा पोखरे में कितनी मछलियां" (प्रभास कुमार चाऊधरी), "बिल टेलर की डायरी" व "पटाक्षेप" (लिली रे) हिन्दीमे अनूदित छन्हि। समकालीन विषय, फ़िल्म, महिला व बाल विषय पर गंभीर लेखन हिनक प्रकृति छन्हि। रेडियोक स्वीकृत आवाज़क संग ई फ़िल्म्स डिविजन लेल डॉक्यूमेंटरी फ़िल्म, टीवी चैनल्स लेल सीरियल्स लिखल व वॉयस ओवरक काज केलन्हि। मिथिलाक 'लोक' पर गहराई स काज करैत 2 गोट लोककथाक पुस्तक "मिथिला की लोक कथाएं" व "गोनू झा के किस्से" के प्रकाशनक संगहि संग मिथिलाक रीति-रिवाज, लोक गीत, खान-पान आदिक वृहत खज़ाना हिनका लग अछि। हिन्दीमे हिनक 2 गोट कथा संग्रह "बन्द कमरे का कोरस" व "चल खुसरो घर आपने" तथा मैथिली में एक गोट कथा संग्रह "खोह स' निकसइत" छन्हि। हिनक लिखल नाटक 'दूसरा आदमी, दूसरी औरत' राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य समारोह भारंगममे प्रस्तुत कएल जा चुकल अछि। नाटक 'पीर पराई'क मंचन, 'विवेचना', जबलपुर द्वारा देश भरमे भ रहल अछि। अन्य नाटक 'ऐ प्रिये तेरे लिए' के मंचन मुंबई व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' के मंचन फ़िनलैंडमे भेलाक बाद मुंबई, रायपुरमे कएल गेल अछि। 'आओ तनिक प्रेम करें' के 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित तथा मंचन श्रीराम सेंटर, नई दिल्लीमे कएल गेल। "अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो" सेहो 'मोहन राकेश सम्मान' से सम्मानित अछि। दुनु नाटक पुस्तक रूप में प्रकाशित सेहो अछि। मैथिलीमे लिखल नाटक "भाग रौ" आ "मदद करू संतोषी माता" अछि। हिनक नव मैथिली नाटक -प्रस्तुति छन्हि- बलचन्दा।
विभा 'दुलारीबाई', 'सावधान पुरुरवा', 'पोस्टर', 'कसाईबाड़ा', सनक नाटक के संग-संग फ़िल्म 'धधक' व टेली -फ़िल्म 'चिट्ठी'मे अभिनय केलन्हि अछि। नाटक 'मि. जिन्ना' व 'लाइफ़ इज नॉट अ ड्रीम' (एकपात्रीय नाटक) हिनक टटका प्रस्तुति छन्हि।
'एक बेहतर विश्र्व-- कल के लिए' के परिकल्पनाक संगे विभा 'अवितोको' नामक बहुउद्देश्यीय संस्था संग जुड़ल छथि, जिनक अटूट विश्र्वास 'थिएटर व आर्ट-- सभी के लिए' पर अछि। 'रंग जीवन' के दर्शनक साथ कला, रंगमंच, साहित्य व संस्कृति के माध्यम से समाज के 'विशेष' वर्ग, यथा, जेल- बन्दी, वृद्ध्राश्रम, अनाथालय, 'विशेष' बच्चा सभके बालगृहक संगहि संग समाजक मुख्य धाराल लोकक बीच सार्थक हस्तक्षेप करैत छथि। एतय हिनकर नियमित रूप से थिएटर व आर्ट वर्कशॉप चलति छन्हि। करती हैं। अहि सभक अतिरिक्त कॉर्पोरेट जगत सहित आम जीवनक सभटा लोक आओर लेल कला व रंगमंचक माध्यम से विविध विकासात्मक प्रशिक्षण कार्यक्रम सेहो आयोजित करैत छथि।

माउगि
- विभा रानी.

माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि, बुझै छैं कि नञि गै!
हँ यो! तैं त' हम भेलहुँ माउगि - माने ओकलाइन, डाक्टराइन, मास्टराइन - आ हड़ही-सुड़ही सभ भेल मौगी, जनी जाति, हमरा आओर स' हीन। नञि बुझलियै। धुर्र जाऊ! हमरा आओर स' ऊपर भेलीह स्त्रीसभ, जेना किरण बेदी, मेधा पाटकर, फ्‌लेविया एग्नेस त' ई सभ, त' ओ सभ आ सभ स' ऊपर नारी - आदरणीया, परमादरणीया; जेना सीता, जेना सावित्री, जेना गांधारी, जेना कुंती, जेना द्रौपदी ... उँह! द्रौपदीक नाम नञि ली। हे! बड़ खेलायल मौगी छली। ओकरा नारीक पद पर प्रतिष्ठित केनाई! सत्तरि मूस गीड़ि के बिलड़ो रानी चललीह गंगा नहाए। ऋषि-मुनि आओर के कोन कथा - एतेक ताप-तेजबला साधु महातमा सभ आ माउगि के देखतही वीर्य चूबि जाइ छै; घैल में त' पात पर त' माछक पेट मे त' कहाँ दनि, कोम्हर दनि दान द' देइत छथि जेना हुनक वीर्य-वीर्य नञि भेलै कोनो रत्नक खान भ' गेलै।
छोडू ई सभ कथा-पेहानी। आऊ असली बात पर - माने माउगि पर। की कहू, कतबो ई नारी, स्त्री, माउगि, मौगीक वर्गीकरण भ' गेल हुअए, मुदा वास्तविकता त' ई छै जे मूलत: हम सभ माउगे छी - माउगि।
अहिना दू गोट माउगि छली, माने मध्यवर्गीय परिवारक दू गोट माउगि। अहाँ चाही त' सुभीता लेल हुनक नाम राखि सकै छी - दीपा आ रेशमा। दुनू पड़ोसिया। एकदम दूध मे चीनी जकाँ बहिनपा, दुनू के एक-दोसराक घरक हींग हरदिक पता, ई दुनूक घर में एक एकटा मौगी छल, कहि लिय' जे ओकर दुनूक नाम छल भगवती आ जोहरा आ ओ दुनू ई दुनूक ओहिठाम चौका बासन करैत छली। संयोग छल, जोहरा दीपा ओहिठाम काज करै छलै आ भगवती रेशमा ओहिठाम. हौजी, बड़का शहर मे ई सभ चलै छै। ओहिना, जेना आइ काल्हि शहर मे दंगा आ खून-खराबा फटाखा जकाँ फुटैत रहै छै आ लोक आओर तीमन-तरकारी जकाँ कटाएत रहै छै। की कहू जे जाहि शहर मे ई चारू माउगि रहै छली, ओहि शहर मे दंगा संठीक आगि जकाँ धधकि उठलै। आ सभ माउगि एके जकाँ भ' गेलै - मांगि आ कोखिक चिन्ता स' लहालोट।
आब जेना दीपे के देखियौ। शहर मे तनाव छलै। तइयो लोग अपन-अपन ड्यूटी पर निकलि गेल छलै। मुदा बेरहटिया होबैत-होबैत पता लागलै जे शहरक स्थिति आओर खराब भ' गेलै त' सभ किओ 'जइसे उडि जहाज कौ पंछी, पुनि जहाज पै आयौ' बनि बनि अपन अपन जहाज दिस पडाए लागल। रेशमा स' दीपा के ई समाचार भेटलै, ओम्हर ठीक दू बजेक बेरहटिया मे मनोज बाबू घर स' बहिरा गेलाह। दीपा टोकबो कएलकै - 'शौकत भाइक फोन आएल छलै रेशमा कत' जे शहरक हालति आओर खराब भ' गेल छै। लोग-बाग घर घुरि रहल अछि आ अहाँ सभ किछु जानि-बुझिक' तहयो बाहरि निकलि रहल छी। जुनि जाऊ।'
आब ओ मरद मरदे की जे अपना घरवालीक कहल राखि लियए। आ दीपा त' माउगि स' एक कदम आगां छली - स्त्री छली - पढ़ल-लिखल, सुंदर, स्मार्ट आ अपन बिजनेस सेहो चलब' बाली, जकरा मे सभटा आभिजात्य भरल रहनाइ अपेक्षिते नयिं, परम आवश्यक अछि। मुदा बावजूद एकटा सफल स्त्रीक, ओ छली त' माउगे।
सत्ते, कहियो कहियो के मायक कहल ई कथा मोन पडिये जाइत अछि जे माउगि कतबो पढ़ल हुअए कि सुंदर कि स्मार्ट कि बिजनेसवुमन, रहत त' माउगे आ तैं चूल्हि त' फूंकैये पडतै आ घर वा घरबलाक चिंता मे सुड्डाहि होबैये पडतै ओकरा। तैं रातुक एगारह बाजि गेलाक बादो मनोज के नहिं घुरलाक कारणे ओ अत्यन्त चिंतित आ परेशान छलै। ओकरा रहि-रहि क' बुझाए जे कॉलबेल बजलै, खने दरबज्जा फोलए त' खने खिड़की पर जा क' ठाढ़ भ' जाए। सांस भांथी जकाँ चलि रहल छलै आ मोनक सभटा परेशानी मुंह पर लिखा गेल छलै। मना कएलो पर जहन मनोज नञि रूकल छलाह त' कहने छलै - जल्दीए आएब। जवाब भेटल छलै -'आइ त' फल्ना डेलीगेशन आएल अछि।'
'माने रातिक एक-डेढ़ बजे धरिक छुट्टी।' दीपाक माउगि ओकर भीतरे-भीतरे बाजलै। तहन कियैक एगारहे बजे स' एतेक बेचैनी छै? ओकरा त' दू बजे रातिक बाद परेशान होएबाक चाही। मनोज बाबू लेल दू बजे रातक घुरनाई कोनो नव कथा त' छलै नञि! मुदा दंगा जे नएं कराबए।
हारि-थाकि क' ओ घर स' निकललै आ अपना बगले बला कॉलबेल दबेलकै। अहू मे एकटा माउगि छलै - रेशमा। परेशानी ओकरो संपूर्ण देह पर अक्षर-अक्षर लिखाएल। ओकरो घरबला घुरल नञि छलै। मुदा फोन कएने छलै -'हालति बड्ड खराब छै। दरबज्जा आदि नीक स' लगाक' राखने रहब। हाथ मे सदिखन एकटा चक्कू वा एहेने कोनो चीज सेहो राखने रहब। पतियाएब नञि ककरो पर चाहे ओ कतबो नजदीकी हुअए।'
दुनू माउगि एक-दोसरा के देखि क' तेना चेहैली जेना एक-दोसरक सोझा मे दूध चीनी सनक संबंधवाली दीपा आ रेशमा नञि, गहुँमन आ बिज्झी हुअए। रेशमा एतेक देर राति मे ओकर आएब पर चेहैली त' दीपा रेशमाक गस्सा मे फंसल चक्कू देखि क'।
माउगि त' माउगे होइत छै - एतेक अविश्र्वास स' काज थोडबे छलै छैक। आ ई स्त्री माने दीपाक त' सौंसे देहे पर परेशानी छपाएल छलै। शौकत त' फोनो क' देने छलाह। मुदा मनोज के त' तकर कोनो परवाहिए नञि छलै। रहितियैक त' एतेक प्रतिकूल परिस्थिति मे ओकरा मना करबाक बादो जयतियन्हि की? आ मानि लिय' जे बड्ड खगता छलैन्हे जेबाक, तें चलि गेलाह। मुदा चलि गेलाक माने ई त' नयिं जे एकदमे स' निश्चिन्त भ' क' बैसि जाइ; बेगर ई महसूस कएने जे दीपा कतेक चिंतित आ परेशान हेतीह। धुर्र? माउगि आओर लेल किओ एतके परेशान हुअए!
दुनक दुनू माउगिक मुंह मे जेना बकार नञि छलै। अंतत: रेशमा सेहे चिनियाबदाम जकाँ एक-एक टा शब्द चिट चिट क' क' तोडैत-भांगैत बाजलै -
'बच्चे सो गए? मेरे तो अभी-अभी सोए हैं।'
'हँ! हुनका आओर के की पता जे दंगा-फसाद की सभ होइ छै। स्कूल नञि गेनाई त' ओकरा आओर लेल पिकनिक भ' गेलै'। भरि दिन ऊधम मचा-मचाक' थाकि-हारिक' एखने सूतल अछि।'
'मनोज भैया लौटे?'
'घुरि गेल रहितियन्हि त' हम की अईठां रहितहुँ?' स्त्री मोने मे बाजलै। प्रत्यक्षत: मूड़ी नयिं मे डोला देलकै।'
'ये भी अभी तक नहीं लौटे हैं। मगर फोन कर दिया है कि लौटेंगे। फिर भी गर हालात ज्यादा खराब हुए तो उधर ही कहीं किसी रिश्तेदार के यहाँ रूक जाएंगे।' माउगि बाजलै।
स्त्री चुपचाप ओकर मुंह तकैत रहि गेलै। ओहि दीपा रूपी स्त्रीक चेहरा पल-पल बदलि रहल छलै। माउगि रेशमा कहलकै - 'उनका फोन नहीं आया है तो तू ही पता कर ले न?'
'कत'? ओ कत छथि, हमरा कहि के जाइ छथि जे कहै छी जे फोन करी आ की दनि करी, कहाँ दनि करी।' स्त्री अपन विवशता मे खौंझैली।'
'हौसला रखो। सब ठीक हो जाएगा।'
मुदा सभ ठीक नञि भेलै। माउगिक मरद आबि गेलै। शौकत भाइ के देखि क' रेशमाक मुंह मुरझाएल फूल पर मारल पानिक छींटा जकाँ तरोताजा भ' उठलै। दीपाक चेहरा पर सेहो आंशिक आश्र्वस्तिक भाव उभरलै। बेस! एक गोट त' सकुशल आबि गेलाह। आब दोसरो आबि जाथि त' आ निश्चिंत भ' जयतियैक। अहिना सबहक सर समांग सकुशल अपना अपना बासा घुरथि जाथु त' सबहक घरक जनी जाति के कतेक आश्र्वस्ति भेंटतैक! ओ शौकत भाइ स' शहरक मूड पर कनेक गप सप कर' चाहै छलै। मोन मे छलै जे आकर परेशानी आ चिंता स' शौकत भाइ सेहो कनेक सरोकार राखति। पूछथि कनेक मनोजक मादे, कहथि कनेक शहरक हालचालि। मुदा शौकत भाइ त' तेहेन ने सख्त नजरि स' घूरि क' रेशमा के देखलनिह कि ओहि नजरिक कठोरता आ बेधकता दीपा सेहो बूझि गेलै आ कहलकै -'चलै छी रेशमा, बच्चा सभ असगरे छै।'
बाहर मे दंगा आ घर मे भूकंप आबि गेलै। मर्द प्रतिवादक गाड़ी पर फर्राटा स' सवार भ' गेलै -'कहा था न कि किसी अपने कहे जानेवाले पर भी भरोसा मत करना। क्या जरूरत थी इतनी रात को इसे बिठाए रखना? इन काफिरों का कोई भरोसा है क्या?'
'रेशमा, ई कोफ्ता शौकत भाइ लेल। दिने मे बनौने छलहुं। हमरा बूझल अछि जे हिनका कोफ्ता बड्ड पसंद छै।' स्त्रीक फेर प्रवेश भेलै। माउगि फेर सहमि गेलै। मर्द फेर तनतना गेलै।ओ अई लल्लो-चप्पो स' प्रसन्न ­नञि भेलै। स्त्रीक गेलाक बाद गरजलै -'फेंक दो इसे डस्टबिन में। क्या ठिकाना, कुछ मिला-विला कर लाई हो।'
माउगिक करेज कनछलै -'अहीं सभ एक-दोसरा लेल दुश्मन भ' सकै छी। माउगि त' माउगे होइत छै। सभटा दुख त' ओकरे माथ पर बजरै छै। ओकर मरद के किछु भ' जेतै त' ओकरा अहिना अपन सगरि जिनगी काट' पड़तै। आ अहाँ आओरक घरवाली मरतै त' कब्र मे देह गललो ­नञि रहतै कि दोसर निकाहक मुबारकबाद बरस' लागतै। यौ - माउगि हिन्दू-मुसलमान आ कि क्र्रिस्तान नञि होई छै। ओ खाली माउगे होइत छै।'
मुदा नञि! माउगि खाली माउगे नञि होइ छै। ओ नारी, स्त्री, माउगि, मौगी सभ भ' जाइ छै। आ सेहो कठपुतरी बनिक'। आब देखियौ ने! शौकत भाइ एम्हर पहिने आगि जकां बररसलन्हि आ फेर कने प्रेमक फूंही खसबैत आस्ते आस्ते क' क' तेना ने बुझेलखिन्ह जे कि रेशमा सेहो पतिया गेलै आ तय क' लेलकै जे ई कोफ्ता काल्हि भिन्सर मे बर्तन मांजयबाली के द' देल जेतै। ओम्हर दू बजे राति मे घुरल मनोज बाबू नामक मरदक फरमान सेहो निकललै जे आओर कतहु जाइ त' जाइ, बगल बला घर मे कथमपि नञि। ठीक पुरना जमानाक राजकुमार बला कथा जकाँ - पूब जाउ, पच्छिम जाउ, उत्तर जाउ मुदा दक्षिण कहियो नञि जाउ आ अहि अतिरिक्त सावधानी मे ओ सभस' पहिल काज कएल जे अपन दरबज्जा पर साटल 'ऊँ' स्टिकर के नोंचि-चोथि क' उजाड़ि देलन्हि।
आबी, कनेक एम्हर ईहो दुनू गोट मौगीक खोज खबरि ल' ली। ई दुनू मौगी ऊपरका दुनू स्त्री आ माउगि स' जुड़ल छली से त' अहां अओर के मोने हएत। ई दुनू छल भगवती आ जोहरा जे दीपा आ रेशमाक घर मे बर्तन चौका करै छल। ईहो एकटा संयोगे छल जे भगवती नामक मौगी रेशमा नामक माउगिक घर मे काज करै छलै आ जोहरा नामक मौगी दीपा नामक स्त्रीक घर मे। ईहो दुनू मौगी उपरकी दुनू माउगे जकां पड़ोसिया छलै।
आइ भगवतीक घर मे भम्ह लोटै छलै। आध सेर आटा बांचल छलै। तकरे रोटी बनाक' अपन चारू धिया-पुता के खुआ देने छलै - भिन्सरे मे। आब बेरहटिया स' ई अधरतिया भ' गेलै। दोकान बंद आ पाइक खूँट खुल्ला। कोनो दिस स' रस्ता नञि! धिया-पुता के ठोक-ठाकि क', एक-दू चमेटा खींचि क' सुता देने छलै। आब जागल-जागल भरि पोख पहिने अपन मरद के गरियौलकै जे ठर्रा आ अढ़ाई सौ रूपैयाक लालचि मे दंगा फोड़'बला लेल काज कर' चलि गेल छलै। ओहि स्त्री दीपे जकाँ ईहो भगवती मौगी अपना मरद के रोकबाक प्रयास कएने छलै आ मनोजे बाबू जकाँ ओकरो मरद ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे रोपैत चलि गेल छलै आ बाद मे चेथड़ी भेल देह ओकर अक्किल के ओकर ठेहुन मे स' निकालि क' माथ मे राखि देलकै। मुदा एखनि त' माथ मे राखल अक्किल सेहो भुतियाएल छलै। हारि थाकि क' ओ धिया-पुता लग ढेर भ' गेलै जे आब त' भिन्सरे मे भ' सकै छै किछु। करफू लागल रहौ कि किछु। पुलिसबला गोली मारौ कि डंडा। मेम साब ओहिठां त' जाइए पड़तै। दू गोट लोभ - पगार भेटबाक आ सदिखन जकाँ अहू बेर ततेक बचल-खुचल भेटि जेबाक आस जाहि स' चारू धिया-पुताक खींचखाचि क' जलखई त' भइये जाइ छै। मुदा भिन्सर त' हुअए पहिने! हे सुरूज महराज! जल्दी बहार आबथु!'
सुरूज महाराज त' प्रकट भेलाह, मगर दोसर मौगी ई मौगीक रस्ता छोपि देलकै -'तुम बच्चावाली औरत! तुम किधर कू जाएगा ये आफत में। मेरे कू जाने दो। अपुन का क्या है? अकेला औरत। पुलिसबाला गोली मार भी दिया तो क्या हो जाएंगा। और जो नहीं मारा तो तेरा मेम साब का भी काम अपुन करके आ जाएंगा आउर तेरा पगार आउर खाने-पीने का जो कुछ भी देंगा वो सब लेके आ जाएंगा। ठीक?' आ अंचरा मे स' गरम-गरम चारि टा भाखरी निकालि क' थम्हा देलकै - एतबे बचल छलै, तैं एतबे ...
जाबथि भगवती किछु सोचय, किछु बाजय, जोहरा नामक ई दोसरकी मौगी चिड़ै जकाँ फुर्र स' उड़ि गेलै। भगवती मौगी थकमकाएले रहि गेलै, जेना जोहराक मरद दंगा बलाक बीच मे फंसल थकमकाएले रहि गेल छलै आ पछाति मे अपन टूटल - भांगल फलक ठेला आ ओहि पर सजाओल सभटा फले जकाँ पिचा-पिचू के थौआ-थौआ भ' गेल छलै। दीन ईमानक पक्का, पाँचो बेरक नमाजी आ सभटा जनानी के दीदीए आ भाभी कहैबला ओकर मरद जोहरा हिरदै में जिनगी भर लेल कांट छोड़ि गेलै - ओकर देह भरि पोख देखबाक साध मोने मे रहि गेलै आ तहिये स' ई काँट कहियो ओकर पूरा देह मे गड़' लागै छै आ कहियो अपन मरदे जकाँ मौगीक अपनो सौंसे मोन आ देह थौआ-थौआ भेल बुझाए लागै छै।
नुका-चोरा क', झटकारि क' जोहरा दुनू स्त्री आ माउगिक घरक काज कर' पहुँचि गेलै। वाह रे पुलिसबलाक चौकस नजरि! अल्लाह! जोहरा शुक्र मनौलकै। जाए बेर सेहो नञि पडए ओह दरिंदा सभक नजरि त' बेस। आएल त' असगरे छलै, जाएत त' भगवतीक दरमाहा आ खाए-पियक समान सेहो रहतै। खेनाइ-पिनाइ त' रोड पर चलि जेतै आ पाइ जानि नञि ककरा पाकिट मे - दंगाबलाक कि पुलिसबलाक।
माउगि आ स्त्री कतेक बेर दुनू मौगी स' ठट्ठा केने छलै - "गै, दुनू अपन-अपन मेमसाब बदलि ले। मियां मियांक घर मे आ हिंदू हिंदूक घर मे। तहियाक मजाक आइ दुनू माउगि आ स्त्री के वास्तविक लागि रहल छलै - दुनू मरद जे झोटैंला पंचक ई मजाक पर कहियो कान नञि देलन्हि, आइ गंभीर फैसलाक तीर, कटार ई दुनू माउगि पर संधानि देलन्हि। फर्मान बंदूक स' गोली जकाँ बहिरा गेल छलै आ ई दुनू के आब ओहि गोली के अपना-अपना करेज मे धँसा क, धँसलाक बाद अपना-अपना के जीवित, चालू पुर्जा राखैत ओहि फर्मान पर अमल करबाक छलै।
जहिया ठेला छलै, फल छलै आ फलक ताजगी जकाँ मुस्की मारैत ओकर मरद छलै, तहिया जोहरा के काजक कोनो दरकार नञि छलै। दीपा ओकर चेहराक मासूमियत आ खबसूरती देखि क' सोचै बेर-बेर - जे कोनो नीक घरक स्त्री रहितियैक त' रूप-रंग झाड़-फानूस जकाँ चमकतियैक। मुदा एखनि त' ओकर उदास मुंह, उड़ल रंग आ बेजान कपड़ा। हठात ओकरा जोहरा मे रेशमाक झलक भेटलै त' बड़ी जो स' ओ चेहा उठलै। मोने मोन अपना के लथाड़लकै। जतेक गारि अबै छल, सभटा अपना मोनक ऊपर खाली क' देलकै। जोहरा काज क' क' रेशमा ओहिठां चलि गेल छलै। मनोज बाबू सुतले छलाह। दीपा फ्रिज मे स' झब-झब समान सभ बाहर कर' लागलै।
फेर कॉलबेल। फेर दीपाक मुंह। फेर रेशमाक बदलैत रंग। रेशमा स' कोनो औपचारिक रिश्ता त' छलै नञि! तै धड़ाधड़ि भन्से मे चलि गेलै -'जोहरा! ई खाए पियक समान सभ छै। भगवती के द' दिहें।'
'लेकिन मैं जो ये सब तुझे दे रही हूँ, ये सब केवल तेरे लिए हैं। किसी काफिर-वाफिर को नहीं देगी तू और सुन! कल से तू उधर नहीं, इधर काम करेगी। दस रूपए ज्यादे ले लेना। चलेगा। वो चाहे तो उधर करले। कल साहब यही कह रहे थे।'
थकमक भेल स्त्री दीपा देखलकै - भन्साघरक स्लैब पर जोहराक देल खाद्य सामग्री मे रतुक्का कोफ्ता। ओम्हर कोफ्ता ओकरा अंगूठा देखा रहल छलै आ एम्हर रेशमाक गप्प ओकर करेज पर आड़ी चला रहल छलै। त', कतेक पतिव्रता स्त्री छै। पति जे कहलकै, तुरंत ओकर ताबेदारी मे लागि गेलै। आ ओ? दू बजे राति मे घुरल मनाज् बाबू स' फिरकापरस्ती पर बहस केलकै आ जोहरा भगवतीक प्रसंग पर मना क' देलकै जे ओ नञि करतै काज कर' बालीक अदला-बदली।
मुदा आब? जौं ई मौगी मानि गेलै त' ओकरा त' डबल फैदा। आ ओम्हर बेचारी भगवतीक काजक नोकसान। तहन त' नीके छै ई अदलाबदली। तैं ओहो दही में सही मिलेलकै। ओना त' ओहो अदला-बदली के व्यावहारिकताक जामा त' पहिराइये देने छलै जहन कि फ्रिज से खाद्य सामग्री निकालि क' ओ भगवती लेल आनने छलै। कहियो ई नञि देखल-सुनल जे काज करए किओ आन आ खाएक पियक भेटै कोनो आन के।
मुदा ई मौगी ! जोहरा मौगी! केहेन खरदार! केहेन जबर्दस्त! केहेन जोरगरि! ओ चकचक करैत दुनू माउगिक मुंह देखलकै। बाजलै किछु नञि। खाली रेशमा स' कहलकै -'करफू लगा हुआ है। भोत मुश्किल से आया मैं। कल आने को होएंगा कि नेई, मालूम नेई। भगवती अपना पगार वास्ते बोला है। आप दे देंगा तो मैं ले जाके उसकू दे देंगा।'
'बोल उसे वो खुद आकर ले जाएगी। जब तू आ सकती है तो वो क्यों नहीं। और अच्छा है न! पुलिस की नजर चढ़ गई तो एक काफिर तो घटेगा कम से कम।'
कि माउगि गै माउगि! हम माउगि, तों माउगि, ई माउगि; ओ माउगि - सभ माउगे-माउगि! इहो चारो माउगे माउगि। मुदा ई मौगी - छोटहा लोग - मसोमात जोहरा त' जेना पुलिसक गोली आ दंगाबलाक ईंट, पत्थर, बोतल घासलेट तकरो सभ स' बेसी आक्रांत भ' उठलै। काली जकाँ, दुर्गा जकाँ, चंडी जकाँ ! 'मेम साब! आप दोनों अपना-अपना सामान रख लो। मेरे कू नेई चाहिए ऐसा खाना, जिसमें शैतानी खून बोलता हो। ई दंगा - आप दोनों का मन मे इतना फरक पैदा किएला है कि आप दोनों एक मिनट में अपना से गैर बना दिया। भगवती तो बच्चा लोग का खातिर आने को तैयार था। मईच रोका उसकू कि मेरा क्या! मइ अकेला माणस। पुलिस गोली मारेंगा तो भी क्या चला जाएंगा मेरा। पण उसकू कुछ होएंगा तो उसका बच्चा लोग यतीम हो जाएंगा, जैसे मइ हो गया अपना मरद का जाने से। आपलोग बड़ा लोग। इसलिए आपलोग का बड़ा बात। बड़ा समझदारी। मेरे कू तो खोपड़ी नेई। आपको भगवती को नेई रखना, मति रखो। उसका पगार नेई देने का, मति दो। लेकिन कल से मइ भी काम पर नेई आने का। लेकिन उसका पहिले अभी आपका घर मे मइ जो काम किया, वो पइसा मेरे कू अब्भी का अब्भी देने का। वो मेरा हक्क है। मइ उसकू लेके जाएंगा आउर जो मर्जी आएंगा, करेंगा। आपका ई भीख नेई चाहिए मेरे कू।'
मौगियो आओर बाजि सकै छै, सोचि-समझि सकै छै! एहेन अजगुत कथा ! बाप रौ बाप! दुनू माउगि के साँप सुंघा गेलै। ई मौगी भ' क' एतेक नाटक! माउगिक सोझा मे एकर एतेक टनटनी छै ने। कनेक साहेबक सोझा मे पड़' दियौक। सभटा बिलाडिपन एके क्षण मे घुसडि जेतै आ ओ फेर केथरी जकां गुड़िया-मुड़िया जेतै। रेशमा सोच लागलै। यदि शौकत मियां उठि क' आबि जाथु त' एकर मुंहक टनटनी एखने बंद भ' सकै छै।
नीक भेलै। शौकत मियां आबि गेलाह! भन्साघरक स' भोरुक्का चाहक गन्धक बदला ई खिच-खिचक गंध बर्दाश्त नञि भेलै आ अधकचरा भेल नीनक खौंझ स' भरल ओ बाहर निकललाह!
'क्या हुआ? सुबह-सुबह चाय देने के बदले घर को कर्बला का मैदान क्यों बना रखा है?' ड्राइंग रूम भड़कलै। रेशमाक चेहरा चमकलै। दीपा शरीर स' एम्हर छलै आ मोन स' मनोज कत'। तैं ओ संभ्रमित सेहो भेलै। मुदा जोहरा ओहीठां छलै - तन आ मोन दुनू स'। कतहु कोनो तरहक बनावटी चमक नञि, मुंह पर कोनो तरहक भ्रमक चेन्हासी नञि। ओ माथ पर ओढ़नी धेलकै आ भन्साघरक खिचखिच के ओतहि छोड़ैत ड्राइंगरूम में पहँुचि गेलै -'साब! मेरे कू बताओ, ये दंगा हम और आप कराया क्या? आओर जो कराया, उसका बदन का एक बाल भी गिरा क्या? भगवती का आदमी गया, मेरा मरद गया। तो क्या ये सब उसका, मेरा या आपका चाहने से हुआ? कल को खुदा न करे, आपको या वो साब को कुछ हो जाता तो वो सब आपका या आपका मेमसाब लोग का चाहने से होता था क्या? आओर ये मारामारी का फरक किसका पर गिरेंगा साब। हम औरत लोग पर। बेवा तो अपुन लोग होता है न साब! और बेवा खाली बेवाइच कहलाता - हिन्दू बेवा आ मुसलमान बेवा नेई। साब, मइ जाता। बस मेरा आज का काम का पइसा दे दो। उस पइसा से मेरे जो मर्जी करेंगा, जिसके लिए मन करेगा सामान खरीदेंगा।'
ड्राइंगरूम गरजलै -'क्या बकवास लगा रखी है। रेशमा, तुम इनलोगों को यहाँ से भगाती क्यों नहीं?
भन्साघर फेर डेराएल चिड़ई भ' गेलै। दीपा स' आब सहन नञि भेलै। ओ जाए लेल डेग उठेलकै। जोहरा एक पल भन्साघर मे मोजद दुनू माउगि के देखलकै। फेर ओकरो डेग उठलै। आ भन्साघर जेना भूकंप स' डोल' लागलै। आब कनेक स्थिर भेलै। स्वरक अरोह-अवरोह मे सेहो स्थिरता अएलै। उठल डेग स्वर स' मिलान कर' लागलै -'जोहरा, ये सब ले जाओ और भगवती की पगार भी। हालात ठीक होने पर ही उसे घर से निकलने देना और तुम भी तभी आना। और दीपा, बैठो न! चाहो तो तबतक शौकत मियां से बात करो या फिर यहीं किचन मे मेरे साथ। मैं तुरंत चाय बनाती हूँ। जोहरा, तुम भी पीकर जाना।'
वाह रे तिरिया चरित्तर वाह! ऋषि मुनि सभ कहिये गेलैन्हिए जे देवो नञि जानि सकलाह त' पुरूषक कथे कोन? किन्तु अईठां एहेन कोनो गुंफित रहस्य नञि छलै, नञि त' काम केलिक कोनो नुका छिपी छलै, ने नैनक कटाक्ष आ बैनक मुस्कान छलै। अईठाँ त' एकेटा चीज पसरल छलै - चाह मे, पत्ती में, चीनी मे, कप मे - माउगे -माउगि। चाह, दूध, चीनी आगिक गरमी स' एके रंग ध' लेइत छै, एकमेक भ' जाएत छै। बनल चाह मे से चाहक रंग, दूध, चीनी के अलग-अलग करब मोश्किल। ईहो माउगि सभ चाहे जकाँ एक मेक भ' गेल छलै।
शौकत साहब ड्राइंगरूम में चाहक चुस्की ल' रहल छलाह। चाहक भाफ ड्राइंगरूम ठरल, बर्फ भेल सर्दपना के तोड़लकै कि नञि, पता नञि; मुदा सौंसे भन्साघर मे भाफक नरम गरमी पसरि गेलै। आ ओहि नरम-गरम माहौल मे देखाई पड़लै जे एकटा मौगी चीज बतुस आ भगवतीक पगार ल' क' झटकल चलल जा रहल छै। एक गोट स्त्री आ दोसर माउगिक आँखिक पानि टघरि क' चाहक प्याली मे खसि रहल छलै। चाह नमकीन भेलै कि मीठे रहलै, सेहो नञि बुझेलै। खाली एक गोट स्वर ओहि भन्साघर मे बरकि गेलै - बरकैत गेलै - 'दीपा हम औरतों के दुख कितने एक समान होते हैं न!'
'भगवान नञि करथु ककरो माँगि आ कोखि उजड़ै।'
'आ श्मशानक मनहूसियत ककरो घर मे पैंसए।'
लोक आओर कहे छै, माउगि-माउगि अलग होई छै - नारी, स्त्री, महिला, माउगि, मौगी, जनी - हौ जी ई एतेक नाम द' देने ओ सभ बदलि जाइ छै की ? कहू त' ! एहनो कतहु भेलैये !

Monday, August 11, 2008

जादू की झप्पी यानी टच थेरेपी

छाम्माक्छाल्लो ने इस बार काफी अरसे बाद फ़िर से फ़िल्म 'मुन्नाभाई एम् बी बी एस ' देखी। देखने के बाद यह उदगार सबसे पहले निकला-"अब 'लगे रहो मुन्ना भाई' देखना चाहिए।' दोनों ही फलमें मानवीयता के पक्ष को उकेरती है। मुन्ना डाक्टर नहीं बन पाता, मगर अपने मानवीय संवेदनशीलता से वह सबका दिल जीत लेता है। एक गुंडे के भी ह्रदय परिवर्तन की यह कहानी है कि प्रेम किसी को किसतरह से नकारात्मक से सकारात्मक में बदल देता है। 'मुन्नाभाई एम् बी बी एस' की एक और दिलफ़रेब बात है- जादू की झप्पी यानी चुम्बन- आलिंगन । यह चुम्बन -आलिंगन दोस्त का, माँ का, बेटे का, पिता का, प्रेमी का, प्रेमिका का - यानी किसी का भी हो सकता है। बात आलिंगन-चुम्बन की नहीं, इसके अहसास की है। भारतीय मूल्यों मेंभी बड़े के चरण स्पर्श कराने का मकसद एक और बड़े के प्रति अपना सम्मान ज़ाहिर करना है तो दूसरी और उस स्पर्श के एवज में मिले सर पर आशीष का परस। यह दिल और भाव से जुडा होता है। इसी को माँ अम्र्तिनान्दमयी सभी को बांटती हैं, इसी एक परस से लोग नया जीवन पा लेते हैं। यही परस का सुख आज के शब्दों में टच थेरेपी कहलाती है। किसी का परस जब अप्पको निराशा के गहरे गर्त से बाहर निकाल ले आए, आपमें जीने की नई उमंग व् हिम्मत, ताक़त पैदा करे, आपको अपने जीवन का रास्ता दिखने लगे, तो समझें, यह परस आपके जीवन में संजीवनी बनाकर आयी है।
छाम्माकछाल्लो आज भी बड़ी मायूस होती है, जब वह देखेआती है कि इतने पावन परस को लोग या तो समझते नहीं हैं, या उसका ग़लत अर्थ लगाते हैं या फ़िर उसे बुरी नज़र से देखते हैं। उसका पूरा विश्वास है कि परस की जादू की झप्पी तासीर अपने संग एक नया सुहावना मौसम लेकर आती है।