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Monday, April 23, 2012

सुजाता की रोटियां


'लमही' के अप्रैल-जून, 2012 के कथा समग्र के तहत पढ़े कहानी- सुजाता की रोटियां। आपकी राय और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।
ऐ सुजाता! चल रोटी पका। तेरा नाम पता, तेरा काम पता, तेरा धाम पता। तेरी जात पता, तेरा मान पता,तेरे कुल खानदान का पता। तो क्‍या मुश्किल है रोटी पकाना!चल सुजाता, रोटी पका।
माना तेरा परिवार बड़ा,माना तेरा खानदान बड़ा, माना तेरी प्रतिष्‍ठा बड़ी। पर इसका यह तो मतलब नहीं कि तेरे घर में आटा हो ही भरपूर!लक्ष्‍मी की नहीं कोई गांरटी,सरस्‍वती कभी-कभी रोटी पकाती नहीं, फिर भी चल सुजाता, रोटी पका।
      मत कर याद कि सैकड़ों साल पहले किसी और सुजाता ने खीर पकाई थी, तपस्‍या में लीन किसी राजकुमार को खीर खिलाई थी,उस खीर के आस्‍वाद से राजकुमार को ज्ञान दृष्टि आई थी। मत पूछ सुजाता उस सुजाता से कि ऐ सुजाता, तू तो जंगलवासिनी, पता नहीं बड़ी जाति की कि आदिवासी भीलनी, किसी पैसेवाले की गर्वीली बेटी कि बस एक गरीबनी। बस सुजाता, तू तो बस एक बात बता कि तब जंगल के लोग खीर पकाना जानते थे क्या?
मगर सुजाता, तू तो आज की पौध है, शहर की नस्‍ल है, नामी खानदान की बेटी है। तुझे तो सब पकाना आता है, रोटी भात से लेकर खीर-बिरियानी तक। आलू दम से लेकर चिकन दो प्याजा और मटन कबाब तक.अब यह दीगर बात है कि आज पैसा नहीं है,तो क्या ज़बान पर लिपटा स्वाद कहीं चला जाता है वनवास को? अरे, बुरे काल का शनि तो राजा हरिश्‍चन्‍द्र पर भी आया था,तुम्‍हारे परिवार पर आया तो क्‍या अघटित हो गया?बुरा वक्‍त अपनी जगह, रोटी की मांग अपनी जगह. इसलिए चल सुजाता, रोटी पका।
तो गई सुजाता रोटी पकाने। स्‍कूल जाती मां ने की थी ताकीद, टिन झाड़ ले, सारा आटा बाहर निकाल ले, जितनी बन सके, रोटियां बना ले, बना-बुनूकर बाउजी समेत तीनों भाइयों को खिला ले, बच जाए तो तू भी एक निगल ले।
      ठुनकी थी सुजाता –‘ना मम्‍मी, मुझसे नहीं होगा यह सब। मुझे भी स्‍कूल जाना है, वार्षिक कार्यक्रम में भाग लेना है, गीत गाना है, नाटक करना है। उसकी आंखों में स्‍कूल का वार्षिक कार्यक्रम, डांस, गाना, नाटक सब नाच गया- छम छमा छम छम! नाटक के सम्वाद नदी में नाव की तरह तैरने लगे- “मैं अपनी झांसी किसी को नहीं दूंगी.” स्‍कूल का सुख कोई सुजाता से पूछे. कितनी बातों, रफ्तारों से निज़ात मिल जाती है सुजाता को- घर में क्‍या पकेगा, झाड़ू कौन लगाएगा, बर्तन कौन धोएगा, घर कौन सहेजेगा, बिस्तर कौन संवारेगा, आने-जाने वालों को चाय-नाश्‍ता कौन कराएगा- जितनी देर स्‍कूल में, उतनी देर इन सबसे छुट्टी!
सुजाता मचल पडी, ना मम्‍मी ना, मैं भी स्‍कूल जाऊंगी।
मम्मी ने घुडकी दी- “स्‍कूल की पढ़ाई नहीं चल रही। सिर्फ गाना-बजाना है। एक दिन नहीं जाएगी, गीत नहीं गाएगी, कमर नहीं मटकाएगी, झांसी की रानी को याद नहीं करेगी तो मर नहीं जाएगी। कोई दूसरी लड़की तुम्‍हारी डमी बन जाएगी। अभी तो पहले रोटी पका। पहले पिता-भाई को खिला, मुझे होगी देर। तकना मत मेरी राह।
फिर आप क्‍या खाएंगी मम्‍मी?
खा लूंगी स्‍कूल में कुछ भी। तू मेरी फिकर मत कर।
कैसे फिकर ना करे सुजाता। पता है उसे कि यह पहला मौका नहीं है। ऐसे वक्‍त में मां के मुंह से खा शब्‍द निकलता तो है, मगर क्रियान्वित पी शब्‍द भर होता है, जो केवल शुद्ध और विशुद्ध पानी के गले जा मिलता है।
चली सुजाता रोटी पकाने। दालान से बाउजी पूछ चुके थे। बड़ा भाई आकर घुड़क चुका था। मंझला आंखें दिखा चुका था.छोटा भाई कई बार ठुनक चुका था। मां कबके स्‍कूल जा चुकी थी। अभी तो सुजाता को पानी भी भरना है। गर्मी बिन चूल्‍हे के ही रोटी बनाने का दावा कर रही थी। देह का पानी निकला जा रहा था, जमीन से पानी निकल नहीं रहा था। नलों में पानी आ नहीं रहा था। जभी मकान मालिक ने तल मंजिला अपने लिए रखा था और ऊपरी मंजिला किराए पर चढ़ाया था। मोटर चलाकर, बोरिंग लगाकर धरती का थोड़ा-बहुत पानी तो निकल ही जाता था।
सहृदय मकान मालकिन कहती, ले सुजाता पानी भर ले। सुजाता के पास दो विकल्‍प थे पानी भर-भरकर बाल्‍टी लेकर खड़ी सीढि़यां चढ़े, पिता, तीन भाई और मां सहित खुद के नहाने-खाने-पीने के लिए, घर की साफ-सफाई के लिए, आने-जानेवालों को पानी पेश करने के लिए पानी भर कर रखे।
पर सांस चढ़ जाती। ओढ़नी इधर-उधर होने लगती। बाउजी खांसते-खखारते, भाई लोग आंखें दिखाते,मां कसकर फटकार बरसाती -देह और कपड़े का कोई ख्‍याल नहीं?सुजाता समझ नहीं पाती कि मां इतनी कठोर क्यों है उसके लिए? क्यों वह बाउजी और भाइयों के लिए इतनी नरम है? मां तो टीचर है,फिर भी इतना भेद भाव क्यों है उसके मन में? बेटे को कुछ और, बेटी को कुछ और? 
अरे रे रे रे रे! ये क्‍या सुजाता? देह और कपड़ों से आजाद होना चाहती है? अपनी नई उमर की नई उड़ान भरना चाहती है? दुपट्टा ढलता है तो ढले. मन भटकता है तो भटके, वह हवा की साज पर झरने की धुन में गुनगुनाने लगती है, “घडी घडी मोरा दिल धडके, हाय धडके, क्यों धडके, आज मिलन की बेला में, सर से चुनरिया क्यों सरके?” यहां सर से क्या, पूरी देह से ही ओढनी फिसलकर किधर चली जाया करती, सुजाता को पता ही नहीं चलता.
मां के थप्‍पड़ सुजाता की उम्र के आड़े कभी नहीं आए। थप्पड अपनी जगह, सुजाता के ख्वाब अपनी जगह. सोचती सुजाता -टीचर बनकर मम्‍मी कभी किसी बच्‍चे को न डांटती है न फटकारती है, वही मम्‍मी बनकर हर बात पर कितनी घुड़की, कितने थप्‍पड़? वह भी केवल मुझे. भाइयों को तो कभी कुछ कहती नहीं.
भाई शेर बन जाते. भाई सिनेमा देख आते. भाई बुक स्टॉलवाली तमाम किताबें पढ लेते. सुजाता को भी किताबों का बडा शौक. रूमानी उपन्यासों का बडा चस्का. भाइयों की लाई किताबों की फिराक़ में लगी रहती.भाई लोग तनिक भी इधर से उधर होते कि वह जल्दी जल्दी उन किताबों को घोंटने लगती. कभी चौथाई तो कभी आधी तो कभी पूरी. 
उम्र के साथ सुजाता की ओढ़नी फरफराने लगती, वह गुनगुनाने लगती -हवा में उड़ता जाए, मोरा लाल दुपट्टा मलमल का। उम्र ओढनी से भी आगे बढ़ चली थी सुजाता की, मगर अक्‍ल में अभी भी बालपन था, चाल में गज़ब का अल्‍हड़पन था, आवाज में तबले की शरारत थी, हंसी में सितार की थरथराहट थी। एक बार बज ही तो उठी, जोबना से चुनरिया खिसक गई रे, दुनिया की नज़रिया बहक गई रे। उसे जोबना के अर्थ का पता नहीं था. बस, सुबह वह गीत रेडियो पर सुना था, गीत की धुन ज़बान पर चढ गई थी. वही गीत एक लाइन बन कर सुजाता के कंठ से फूट पडा था. मंझले भाई ने सुन लिया, अंगार जला आया मां के मन में -मम्‍मी? देखिए सुजाता को, गन्‍दे-गन्‍दे फिल्‍मी गीत गाती है।
अब सभी गीत मैं बन की चिडि़या बन के बन-बन डोलूं रे या “ज्योति कलश छलके” तो नहीं होते ना। मम्‍मी ने पूछा भी नहीं कि कौन सा गन्‍दा गीत? सभ्‍य घर के लोग ये थोड़े पूछते हैं कि बच्‍चे ने कौन सी गाली दी? गाली दी- बच्‍चे की सजा के लिए यही काफी है। एक तो गन्‍दा, उस पर से फिल्‍मी गीत। एक करेला खुद तीता, दूजा चढ़ा नीम पर! सो धुनाई हुई, कसकर हुई।
      पानी कोठे पर चढ़ा-चढ़ाकर सुजाता हांफ जाती। भाई आकर कहते -अभी तक इतना ही पानी भरा है? मकान मालकिन ने दिया दूसरा विकल्‍प सुजाता, ऐसा कर! तू बाल्‍टी में रस्‍सी लगाकर नीचे उतार। मैं भर दिया करूंगी उसमें पानी. फिर खींच लेना ऊपर, जैसे कुएं से खींचते हैं. सुजाता की हथेलियां नारियल की रस्‍सी खींच-खींचकर लाल हो जाती। आधा बाल्‍टी पानी छलक- छलक जाता। डांट का प्‍याला सुजाता के लिए तैयार मिलता -विष का प्‍याला राणा जी ने भेजा, पीबत मीरा हांसी रे! पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे!
अभी तो सुजाता के हाथ टिन खखोड़ रहे हैं। हिसाब से आटा, हिसाब से पानी। कहीं गीला हो गया तो? रोटी कैसे पकेगी? बाउजी, भाई कैसे खाएंगे? आटा गूंथना कभी अच्‍छा नहीं लगा सुजाता को, ना ही रोटी बनाना. कितना तो हाथ में लग जाता है आटा. फिर चारो ओर सूखा आटा बिखर जाता है रोटी बेलने में. फिर भी उसे कहा जाता है, चल सुजाता, रोटी पका!
क्या करे सुजाता! रोटियां बनानी ही थीं, वह भी उस नपे तुले आटे से. लिहाज़ा, जतन से उसने पेपर बिछाया। पेपर पर सारा आटा निकाला। दिमाग में आया, छन्‍नी से छान तो लें? चोकर नहीं, बस कीड़े-पिल्‍लू हों तो निकाल तो लें?
गई सुजाता छन्‍नी लाने। उम्र और गले ने फिर मारी अंगड़ाई। मुंह से फूट पड़ा फिर एक गीत -इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना, इचक दाना... खो गई सुजाता इस पहेली के उत्तर अनार की कल्‍पना में। अनार के लाल-लाल दाने! तब दिन सोने के और रात चांदी की। बाउजी की बडी सी नाटक मंडली थी। साठ सत्तर लोगों की टोली. एक खूब बडे परिवार जैसा. जो सब खाते, बाउजी खाते। सुजाता सभी की गोद में चिडिए की तरह फुदकती रहती. बाउजी उसे अनार के लाल-लाल दाने खिलाते, उसका जूस पिलाते। उसके घर की बगिया में अनार, अमरूद, लीची, आम सभी पेड़. मगर तक़दीर वाम हो जाए तो कोई क्‍या करे। घर बिका, बगिया भी गई. संग-संग अनार, आंवले, करौंदे सब छूट गए।
            भले थे बाउजी, कभी किसी का बुरा न किया, मगर पिछले जनम के करमों का दोष कि क्‍या कि लक्ष्‍मी वेगवती आंधी की तरह उड़ चली। बाउजी ने सभी लोगों से हाथ जोड़ लिए –‘अब आप सब अपना-अपना रास्ता देख लें।
चलाई जब सुलताना डाकू ने अमीरों पर तलवार
छीनकर धन उनके, दिए उसे गरीबों पर वार!
वो लेकर धन अमीरों का न रखता था कभी पास
ऐसे डाकू से कहो तो कौन ना करे फरियाद
      कि अब दर पर आज हमारे साहेब जी पधारे हैं।
      कि बिटिया की चुनर पर नेह का वो नेग धारे हैं।
बाउजी भी तो सुलताना डाकू ही थे. अमीरों को खेल-तमाशा दिखाया, हंसाया, रूलाया और उनसे मिले पैसों को गरीबों पर लुटाया। पत्‍नी की साड़ी कितनी पुरानी पड़ गई कि बिट्टो सुजाता की चुन्‍नी कितनी फट गई, भाईयों के नाम स्‍कूल से कब-कब कट गए, उन्‍हे नहीं पता। वे तो टोली के संग टोलीवाले, बच्‍चों के संग बच्‍चा बन जाते। गृहस्थी तो मम्‍मी की ज़िम्मेदारी थी. तब भले घर की लडकियां या तो टीचर बनती थीं या डॉक्टर. मगर डॉक्टर के लिए तो बचपन से पढना होता है. टीचर के लिए तब इतनी कडाई नहीं थी. लिहाज़ा, मम्मी ने संगीत सीखा, सिलाई-कढाई सीखी, ड्राइंग सीखी, कविता सीखी, उडिया से हिंदी-उर्दू सीखी और भर्ती हो गई स्‍कूल में। जिस विषय की क्लास में भेज दो, मम्मी उसी में रम जाती. गृहस्थी की गाड़ी मम्‍मी से, नाटक की गाड़ी बाउजी से- चलने लगी, जैसे-तैसे.
            मम्‍मी की गृहस्थी में छह जन ही सही, मगर एक भी जन ऐसा नहीं, जिसे निकाला जा सके,जिसके निकालने से या जिसके निकल जाने से कुछ रोटियों का भार हल्का हो सके। नाटक के लोग मगर निकलते गए- धीरे-धीरे । बाउजी ने ही हाथ जोड़े। नाटक बंद, आमद बंद, मगर घर के पेटों की आमदरफ्त कैसे बंद हो? मांस-मछली के शौकीन बाउजी को बस एक टुकड़ा भर ही चाहिए होता, मगर घर में केवल उन्‍ही के लिए तो नहीं बन सकता न? रोज-रोज के लिए पैसे कहां से आए? फ्रिज भी नहीं कि एक दिन बनाकर चार दिन एक-एक टुकड़ा उनकी थाली में देते रहे। ये ना थी हमारी किस्‍मत कि विसाले-यार होता।
तन्‍द्रा टूटी सुजाता की। हड़बड़ाकर छन्‍नी उठाई और चौके में आई तो कलेजा धक्‍क! आटा कहां गया? आटे का पेपर कहां गया? पता चला कि भाई छोटू बाबू अपने कमरे की सफाई करके कूड़ा बाहर फेंकने जा रहे थे। संयोग से हाथ तनिक थरथराए और सारा कूड़ा आटे पर आन गिरा। भय से देखा इधर-उधर। दीदी नहीं आई नजर! सो झट से आटावाला पूरा पेपर ही उठाया और कर दिया उसे कूड़ेदान के हवाले। चल सुजाता, अब रोटी पका?
छोटू? सुजाता ऐसे चीखी, जैसे उसके गले से बीस तोले सोने का सीताहार किसी ने खींच लिया हो। भय और उत्तेजना से आवाज के साथ-साथ देह भी कांपी -कहां रखा आटा?
कूड़ेदान में!
कहां है कूड़ेदान?’
अब तो जी भाई छोटू बाबू के भी होश फाख्‍ता हो गए। अभी तो यहीं था रसोई के पास. कि तभी भाई छोटू बाबू की निगाह पड़ी उस पर -दीदी, वो देखो, किसी ने दरवाज़े के बाहर रख दिया है। जमादार के आने का वक्‍त हो गया है ना!
भाई, तू कूड़ेदान उठा ला!
कूड़ेदान क्‍यों दीदी, मैं आटेवाला अखबार ही उठा लाता हूं. कूड़ेदान लाए और इस बीच कूड़ा उठानेवाला चला गया तो सारा कूड़ा घर में पड़ा रह जाएगा। मम्‍मी चिल्‍लाएंगी।
सुजाता तय नहीं कर पाई कि वह भाई से क्या कहे?तबतक भाई छोटू बाबू दरवाजा खोलकर बाहर निकल गए। शुक्र था,जमादार आया नहीं था, कूड़ेदान में से आटा गया नहीं था। भाई ने आटा निकाला, वहीं फर्श पर डाला! कूड़ेदान एक पत्‍थर की छोटी सी चट्टान पर रखा जाता था। कूड़ेदान की जगह थी, कुत्ते-बिल्लियों का बसेरा था, कौओं, कबूतरों का डेरा था। भले सुजाता रोज वहां झाड़ू लगाती थी,बाउजी के नाटक बन्‍द होने और मां की टीचरवाली आमदनी में कामवाली के लिए गुंजाईश नहीं थी। पढ़-लिखकर और टीचर होकर भी मां के मन में बेटे-बेटी का फर्क बड़ा कूट-कूटकर भरा हुआ था। सो बर्तन मलने,झाड़ू-पोछा करने,पानी भरने से लेकर खाना बनाने की जिम्‍मेदारी सुजाता पर थी। ऊपर से पढ़ाई की भी। भले भाइयों का मन पढ़ने में नहीं लगता था, मगर सुजाता को तो किताबों के सफेद पन्‍ने और उनपर मोती के दानों की तरह तरतीबवार सजे अक्षर और उनसे बने शब्‍द, वाक्‍य, अनुच्‍छेद इतने आकर्षित करते कि वह उनमें डूब जाती,खो जाती। कागद कारे, मनवा गोरे, प्रेम की चितवन लागी रे, पिया बावरे, मैं सांवरी, नैना, मेघा कारे रे!
पर अभी तो सुजाता परेशान थी- छोटू, जल्‍दी आटा लेकर आ। पर यह क्‍या? छोटू ने कूडेदान से आटा निकालकर बाहर रखा कि सामने कटकर आती पतंग पर नजर गई। चार बार रसोई का चक्‍कर लगा चुके छोटू बाबू कटकर गिरती पतंग को देखकर ऐसे सम्‍मोहित हुए कि बस! आटा वाला अखबार वहीं पटका और दौड़ पड़े कटी पतंग की ओर। लात से लगकर अखबार खिसका, अखबार खिसकने से आटा बिखरा, कुछ छोटू के पैरों पर, कुछ उनके पैरों के नीचे। अखबार पर उनके चरण चिह्न राम की पादुका की तरह विराजमान हो गए –‘प्रविसि नगर कीजै सब काजा, हृदय राखी कोसलपुर राजा। 
पर यहां किसी भी मोड़ पर कुछ भी शुभ नहीं हो रहा था। चली सुजाता बाहर को। अखबार के बाहर बिखरा आटा,आटे पर छोटू के चरण चिह्न। पीछे से आती बाउजी की आवाज –‘बिट्टो, खाना बन गया क्‍या?
हड़बड़ाई सुजाता,घबड़ाई सुजाता। दौड़ पड़ी बाउजी की ओर आटा वहीं छोड़ -अभी बन जाता है बाउजी। कहकर फिर लौटी सुजाता आगे का दृश्‍य और भी गतिमान था, पूर्ण मतिमान था जन्‍म-जन्‍म की दुश्‍मनी भूल कालू कुत्ता और भूरी मौसी एक-एक कोने से आटे को अपने पैरों से बिखेरने में मग्न थे। रोटी की आस उनको भी थी, रोटी की जगह मिले आटे का क्रोध उनमें भी था देर इतनी हो गई? नहीं बनी रोटी अभी तक? कालू और भूरी मौसी भी घुडके- चल सुजाता रोटी पका!
सुजाता रोटी कैसे पकाए? उसके पास सवाल तो थे, जवाब नहीं। जवाब उसे खोजना था, रोटी उसे पकानी थी, दुर-दुर! भाग-भाग! हट हट! की हल्‍की ध्‍वनि से कालू भाई और भूरी मौसी को परे किया। आवाज ऊंची करने पर बाउजी पूछते –‘क्‍या हुआ बिट्टो? खाने के इन्‍तजार में रेडियो से दिल बहलाता बड़ा और कर्नल रंजीत के जासूसी पढ़ता मंझला भाई आ जाते। आटे की वह गत देखते। रोटी तो खाते ही नहीं। मम्‍मी से शिकायत भी करते। बाउजी फिर भूखे रह जाते।
धूल से सनी, मक्खियों से भिनभिनाती जगह पर कुत्ते-बिल्‍ली के मुंहों से बचाती, छोटू के चरण-चिह्नों को झाड़ती सुजाता उठ खड़ी हुई बचे-खुचे आटे के साथ। रसोई में आई सुजाता, आंख में पानी भर लाई सुजाता। पानी में आंसूओं का खारापन मिलाकर गूंथा आटा, पर नमकीन ना हुआ आटा। नारियल की रस्‍सी के सहारे खींचे पानी ने सारा स्‍वाद फीका कर दिया तो क्‍या हुआ? तू चल सुजाता, रोटी पका।
और पहली बार दिखाया सुजाता ने अपनी पाक-कला का हुनर। दाल ऐसी कि मकान मालकिन फर्क भूल जाए सुजाता की दाल और अपने पानी का। सब्‍जी में घर के सारे मिर्च-मसाले डाले और रोटियां तो इतनी पतली-इतनी पतली कि नाइलॉन के दुपट्टे की तरह हवा में उड़-उड़ जाए। पूरी के नन्हें आकार की लोई को रोटी के बडे आकार में तब्‍दील करना मामूली बात तो नहीं थी. वैसे मामूली बात तो यह भी नहीं थी कि उस दिन सुजाता ने रोटी पकाई। बाउजी ने पूछा -बिट्टो, इतनी पतली-पतली चपाती?
जल्‍दी हजम होने के लिए बाउजी।
और सब्‍जी इतनी तीखी? अच्‍छा, मटन नहीं बना है क्‍या? एक टुकड़ा भी मिल जाता तो...
पतंग तो मोहल्‍ले के चार बच्‍चों के बीच फट-चिटकर अपनी अंतिम गत में पहुंच चुकी थी, मगर घुटने छिल-छिला कर आ गया था भाई छोटू बाबू। बड़ा भाई किसी भी रेडियो के किसी भी स्‍टेशन से किसी भी तरह के फिल्‍मी गाने की आस में वेव पर वेव बदल रहा था। मंझला कर्नल रंजीत की सोनिया और उसके मद्धम मोटे संतरे के फांक जैसे होठों की मोटाई में डूबा हुआ था।
सुजाता के जीवन का वह ऐतिहासिक क्षण! चार-चार चपातियां सभी को। दो चपाती मां के लिए भी रखी। शाम में जबरन खिला देगी। एक फिर भी बच गई थी। सुजाता ने सोचा, उसे खा ले, मगर चपाती बनने से पूर्व आटे की उस प्रयाग और काशी यात्रा से वह साक्षात मोक्ष की अवस्‍था में आ गई। उसने सबसे नीचेवाली भाप से गीली-गीली हो आई रोटी उठाई और बाहर निकल आई।
बाहर कालू मामा और भूरी मौसी को लग गई गंध। आए वे मैराथन के धावक की तरह। सुजाता ने आधी-आधी रोटी दोनों के सामने डाल दी। दोनों ने आधी-आधी रोटी लपक ली। सुजाता की आंखों के पानी के सालन की उनको जरूरत नहीं थी। बड़ा भाई फिर से रेडियो घुमा रहा था। मंझला फिर से सोनिया के मद्धम मोटाईवाले होठों की कल्‍पना में डूब गया था। छोटू ने निकर उतारकर फुलपैंट पहन ली। मम्‍मी को पता नहीं चलेगा घुटना फूटने का। बाउजी ने पूछा -बिट्टो, तुमने खाना खाया?
बोली सुजाता -आज सुबह से मेरे पेट में बहुत दर्द है बाउजी।
यह बोलते-बोलते सुजाता को चक्‍कर आया,अंदर से हूल उठी। वह लपक कर बाथरूम में भागी। आटे की प्रयाग और काशी यात्रा का सारा दृश्‍य पेट से निकल-निकलकर बाथरूम के फर्श पर बहने लगा।
आंखें फिर नम हो गईं सुजाता की। सांसें सर्द हो गईं, पेट की मरोड़ शांत हो गई।
आंखें फिर नम हो गईं सुजाता की। सांसें सर्द हो गईं, पेट की मरोड़ शांत हो गई।
……..आज सुजाता पचास की है। फिल्मों की सफल अभिनेत्री और निर्देशक है. आज सुजाता का अपना घर है. आज सुजाता की अपनी गाडियां हैं. आज सुजाता की अपनी तीन-तीन कुतिया है. आज सुजाता के अपने कबूतर हैं। उसके पास कौए तक आते हैं.वह उन्हें प्रेम से मलाई पनीर खिलाती है- अपने हाथों से. धोखे से पनीर की जगह भात खिला दे तो अपनी कानी, तिरछी नजरों से सुजाता को ऐसे घूरते हैं कि बस! थिएटर के दिनों के एक मामा हैं, जीवन के अंतिम चरण में पहुंचे. उनकी सेवा के लिए भी दो नौकर हैं. बस, नहीं है तो सुजाता का वैसा कोई, जिसके लिए वह बेकल होकर रोटी पकाए,कचरे में से आटा उठाए। अब न तो है ऐसी निर्धनता ही कि हिलक हिलक कर आंसू बहाए। आज तो उसके चेहरे पर सफलता की भरपूर मुस्‍कान है, होठों पर बचपन का सोज़ भरा गान है- बचपन के दिन भुला न देना। आज का भी गीत उसके होठों पर है- “दिल में जागे धडकन ऐसे, पहला पहला पानी जैसे....”
फिर भी, अटल सत्‍य तो अटल ही है कि पेट पैसेवाला हो या कंगालवाला उसका मुंह तो हमेशा खुला ही रहता है. भूख सभी को लगती है, रोटी सभी को छकाती है। दूसरों के लिए हो या खुद के लिए, रोटी तो चाहिए ही चाहिए! इसलिए ऐ सुजाता, चल रोटी पका।
पर, आज सुजाता रोटी नहीं पकाती। जरूरत ही नहीं. उसकी कुतियाओं की देखरेख के लिए अलग से विष्‍णु है, बर्तन खंगालने के लिए लक्ष्‍मी है, रोटी पकाने के लिए सरस्वती है। बाउजी सिधार गए, मम्‍मी सिधार गई, बड़ा नाटक करता है. मंझला फिल्म और टीवी का जाना-माना कलाकार है, तीन-तीन शादियां कर चुका है. छोटा रेकॉर्डिंग और फिल्म मेकिंग की क्लास और वर्कशॉप में व्यस्त है.मसलन कि सभी अपनी-अपनी दुनिया में मगन-छगन-जगन है। बस, सुजाता का कोई नहीं है,जिसके लिए वह बेकल होकर रोटी पकाए। शादी और तलाक की याद को वह अपने मन के बक्से में और शादी और पति की तस्वीरों को काठ के बक्से में बंद कर चुकी है.ये यादें उसकी आत्मा को छीलती हैं. बचपन की यादें उसे अधिक सुहानी लगती है. जब-तब उसकी आंखें छलका देती है और वह बुदबुदा उठती है -चल सुजाता, रोटी पका।

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Monday, April 9, 2012

महात्मा गांधी राष्ट्रपिता कब बने?

      हे हमारे महात्मा गांधी! अच्छा हुआ जो आप इस नश्वर जगत से विदा हो लिए। जीवित होते तो जो भोग भोगते, उससे तंग आकार या तो आप मर जाते या ख़ुदकुशी कर लेते।
      अच्छा हुआ बापू, जो आपके कई नाम हैं- गांधी जी, महात्मा जी, बापू, राष्ट्रपिता! इतने सारे नामों के होने का एक फायदा यह है कि निबंध लिखते समय बहुत से पर्यायवाची शब्द मिल जाते हैं। नुकसान यह कि इन नामों के कारण लोग असली नाम ही भूल जाते हैं। सर्वे करा लें बापू कि कितने लोगों को आपका असली नाम पूरा याद है? देश भी न। आपके नाम पर हर शहर में रास्ते बना दिए- महात्मा गांधी मार्ग! एम जी रोड!! मगर कोई बता दे छम्मकछल्लो को कि किसी रास्ते का नाम मोहनदास करमचंद गांधी है?
      एक फायदा भ्रम का भी है। छम्मकछल्लो एक नाटक शोभायात्रा देख रही थी। नेता जी, गांधी जी, झांसी की रानी आदि का किरदार निभा रहे सभी कलाकारों को चाय की तलब लगती है। चायवाले छोकरे से एक किरदार गांधी जी को दिखाकर कहता है, ‘जा, चाय बापू को दे आ। छोकरा कनफ्यूज्ड है, क्योंकि कई लोग तबतक उन्हे महात्मा जी कहकर संबोधित कर चुके हैं। वह चारो ओर देखता है। फिर गांधी जी को दिखाकर वह पात्र से पूछता है-
ये महात्मा है?’
हाँ।
और ये?
नेता जी (सुभाष चंद्र बोस)
तो बापू कौन है?’
      गांधी जी कब महात्मा बने? कब बापू? कब राष्ट्रपिता? कोई दस्तावेज़ है अपने पास? कोई हवाला?? कोई संदर्भ??? आजकल के बच्चे। सनकी! इंटरनेट और इन्फोर्मेशन टेक्नॉलॉजी के मारे सब! लखनऊ की बारह वर्षीया ऐश्वर्या पारसर! गांधी जी को राष्ट्र पिता यानी फादर ऑफ नेशन कब कहा गया, इसे जानने की सनक चढ़ गई। पूछ लिया माँ-बाप से लेकर टीचर तक से। छान मारा नेट-इंटरनेट का संजाल। जवाब नदारद! तो लो जी। आजकल के बच्चे भी ना। इसे ही कहते हैं, युग में छेद करना। उसने भी ले लिया आरटीआई का सहारा और पूछ बैठी प्रधान मंत्री कार्यालय से कि बताइये सर कि महात्मा गांधी राष्ट्रपिता कब बने? सुना कि प्रधान मंत्री कार्यालय ने गृह मंत्रालय को लिख भेजा और गृह मंत्रालय ने नैशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया को। वहाँ से जवाब आया- ऐसी कोई जानकारी दर्ज़ नहीं है।उसने तो यह भी कहा बारह वर्षीया ऐश्वर्या पारसर से कि ऐ इस देश की नाड़ा बच्ची, हमारे पास और कोई काम नहीं है क्या? तुझे इतनी गरज पड़ी है तो आ और छान मार ले सारा रेकॉर्ड!   
      छम्मकछल्लो का दिल खुशी से भर आया- अपनी परंपरा के शिद्दत से पालन पर। यह दूसरी बात है कि उस पालन- अनुपालन में कभी गांधी जी का चश्मा गायब हो जाता है तो कभी घड़ी नीलाम हो जाती है। देश उसे बरामद नहीं कर पाता, खरीद नहीं पाता। उनको गाली देने का रिवाज तो हमने भोर की कुल्ली की तरह बना लिया है। गांधी जी राष्ट्रपिता कब बने कि नेहरू जी को सबसे पहले चाचा नेहरू किसने कहा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल को लौह पुरुष की संज्ञा किसने सबसे पहले दी कि जय प्रकाश नारायण सबसे पहले लोक नायक का और किसके द्वारा कहलाए, हमें इससे क्या!
      हमें वैसे भी दूसरों के चूल्हे पर अपनी रोटी सेंकने की आदत है। अंग्रेज़ी उनकी, गौरव हमारा, औद्योगीकरण उनका, आत्मबल हमारा! कंप्यूटरीकरण उनका, उसपर अपनी दुकान खोलने में आगे हम!!
      छम्मकछल्लो ऐश्वर्या पारसर को सलाह देना चाहती है कि वह अपने लोगों से उम्मीद छोड़ दे। दस्तावेजीकरण की फुर्सत किसको है भला! वह दक्षिण अफ्रीका को लिखे या इंग्लैंड को। उसे संदर्भ जरूर मिलेगा। हमें अपनी परंपरा पर गाल बजाने आता है, उन्हें अपने साथ- साथ हमारी जानकारियों का भी दस्तावेजीकरण आता है। क्यों बापू? आप क्या कहते हैं? ###

Thursday, April 5, 2012

किल्लत

आज एक कविता आप सबके लिए।

किल्लत

हर काम में लगता है समय!
और यह है कि है ही नहीं!
कुछ तो हो उपाय
कर्ज़ा लें या उधार!
इंवेस्टमेंट इन शेयर या कुछ फिक्स्ड डिपॉज़िट
या कुछ कहीं कोई इंश्योरेंस!
कि मिल सके सूद में ही सही, एक टुकडा समय का
नहीं हो समय बैंक या साहूकार के चक्कर काटने का
या उनके प्रतिनिधियों की बात भी सुनने का
तो कर दें बंद थोडे से समय को
घर के टिन या स्टील के बक्से में
या आलमारी के लॉकर में
नहीं मिले सूद, नहीं मिले मियाद
पर अपना समय रहेगा तो बना हुआ अपना
जिसे जब चाहें, कर सकें खर्च!
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Thursday, March 29, 2012

‘द’ = देह, दरद और दिल

'आउटलुक' के अप्रैल, 2012 अंक में प्रकाशित मेरी कहानी. पढें और अपने विचार दें. 
= देह, दरद और दिल

सुरजी सुरुज बेला के साथ नहीं उगती है। वह संझा, परात, दिन-रात कभी भी उग जाती है। उसके उगने की डोर सुरुजदेव बाबू के हाथ में है।
       सुरुजदेव बाबू मातबर लोग हैं। समय भले 21वीं सदी में टहल्‍ला मार कर पूरी दुनिया को अपने जाल-संजाल में समेट रहा है, मगर सुरुजदेव बाबू अभी भी ईस्‍ट इंडिया कंपनी के हिमायती हैं। दूसरे की जमीन अपनी, जोरू अपनी! यह तभी मुमकिन है, जब घरवाली कम-अकल और बेशकल रहे।
सुरुजदेव बाबू अपनी बान में बोले “हमको पढ़ी लिखी घरवाली नहीं चाहिए. रामायण-गीता बांच ले, टीवी सीरियल देख-ले, धोबी-गोभी का हिसाब-किताब रख ले बस!”
गजब कि उनको बीवी की सुंदरता का भी आग्रह नहीं था, जबकि सुंदर कनिया (बहू) की हिरिस तो आदमी लोग शायद बाबा आदम के जमाने से ही पाले हुए हैं। 
सुरजी घर बुहारती गाती रहती –‘मोरो भैया अइले अनबइया हो, सावनमां में ना जइबो ननदी।
किसी को नहीं पता, सुरजी का घरवाला देस-बिदेस के किस कोने में कमा खा रहा है। बाप दो-चार बार गया उसकी ससुराल. ससुर ने उल्‍टे पांव घुरा दिया –‘जाइए समधी! जहिया हमरा बेटा घूर (लौट) आएगा, आपकी बेटी का दुरागमन करा लेंगे।
तब ई गीत? नैहरे में नैहर न जाने की जिद। होता है! ससुराल बसने की आस-प्‍यास और नैहर की नेह भरी सांस गीत बन जाते हैं. ई कोनो अजगुत तो है नहीं।
      मुदा अजगुत जहां हुआ, बड़ी घनघोर हुआ। पहिला अजगुत तो ईहे कि सुरुजदेव बाबू को पढ़ी-लिखी घरवाली मिल गई। इसमें आजकल के छोकरों का पूरमपूर हाथ है। तनिक भी पढ़ने-लिखने में होशियार हुए कि बाहर! यहां तक कि छौंडि़यां भी-  कोई देश की रेलगाड़ी आबाद करते हुए तो कुछ विदेशी विमान में आकाश में उड़ते पखेड़ुओं के साथ होड़ लगाते हुए। खुद पढ़ कर बिलायती बीवी चाहने लगे। तब के समय में डॉक्‍टर, इंजीनियर आ वकील की घरवाली सब गीता-रामायण बांचकर डाक्टराइन, इंजीनियरनी आ ओकिलाइन कहलाती इतराती फिरती। अब ये डॉक्‍टर, इंजीनियर, वकील और एमबीए सीए तो अल्‍ना-फल्‍ना करनेवालों की पहली शर्त होने लगी पढ़ी-लिखी लड़की! वर्किंग हो तो और अच्‍छा। पहिले मां-बाप बेटी को सोना, जमीन और धेनु से लाद देते थे इज्‍जत भी और बखत-कुबखत का सहारा भी। अब झख मारकर पढ़ाने लगे सब ठाठ धरा रह जाएगा, जब छोड़ चलेगा बंजारा! सोना, जमीन आ गाय कौन पूछे, जब लड़कीए पसीन नहीं।
सो बड़ी खोज-बीन के बाद भी सूरुजदेव बाबू को बीए पास से कम बीबी नहीं मिली. और भले बेटा कहे कि हमको सुरसा-ताड़का से कोई ऐतराज नहीं, पर माय-बाप का भी शौक अरमान है कि नहीं! भर शहर की चमचमाती-जगमगाती इजोतिया चांद जैसी बहुओं के बीच अमावस कैसे ला बिठाते?
सो बीए पास गजब की सुंदर बहू को पाकर सुरुजदेव बाबू का मुंह फूला रहता। मन का क्षोभ बहुत गहरा कर सुनीता देवी के बदन पर उतर जाता। होगी सुंदरी! होगी बीए-फीए! मेरे लिए तो तू कानी उंगली के कटे नाखून बराबर भी नहीं। माई से नहीं रहा गया “ऐसी गौरी बहू के तो पैर पूजने चाहिए और ई नालायक पैर से उसे धांगता है।“ दुखी माई एक दिन बोली तो दोपहर बारह बजे का सूरुज बन वे ऐसा धकियाए माई को कि उनके प्रचंड ताप तले झुलसती छह माह में ही सिधार गईं। बाउजी भी उसके छह माह बाद चल बसे, सुनीता बहुत रोई और बाद में मलकीनी नाम से अभिहित हो गई।
सुरजी को इस मलकीनी पर बहुत दया आती. उसे अपनी हालत ज्‍यादा अच्‍छी लगती। नहीं आता है मरद, नहीं आवे। वह घर-घर झाड़ू- बुहारी, कुटिया-पिसिया करती है, माल-मवेशी देखती है, गाय का सानी-पानी करती है, गोबर का गोइठा-गोहरा पाथती-बनाती है। मन-मुताबिक साड़ी-सिंदूर-टिकली भी पहनती है आ शहर का इन्‍दर पूजा मेला भी घूम आती है। झुलुआ भी झूलती है, चूड़ी भी खरीदती है, तमाशे भी देखती है।
सीना तान के, माथा उठा के ठसकती चलती है सुरजी को मइया ने चेताया इतना तान-उघाड़ के मत चल! जमाना खराब है आजकल!
जमाना कहिया बढि़या था माय? बढि़या रहता तो रावण सीता जी को हर ले जाता?
कोई तुमको न हर ले मेरी सीता।
दुहा रहे दूध के फेन जैसा दांत चमका देती सुरजी को खुद ही पता नहीं चला कि वह भी कैसे एक दिन सीता बन हर ली गई।
सूरुजदेव बाबू का कोठरी सुरजीए माई बहारती, पोछती. बाकिर उस दिन जाने कैसे उसकी मत मारी गई, उसने सुरजी को भेज दिया। मलकीनी बोली -ऊ तो फारिग होने गए हैं, घंटा भर से कम नहीं लगता उनको।
झाडू-पोछा लगा के लौटी सुरजी के गाल लाल थे और सीना तनिक बेसी उभरा। एक पल चेहरे पर मुर्दनी छाती, एक पल मुस्‍की. घर लौटकर अपने हाथों से गाल सहलाया। सीने के अतिरिक्‍त उभार को कम किया तो हथेली नोटों से भर गईं।
मलकीनी घरवाली थीं. सुरजी दिलवाली बन गई। रात में मलकीनी के साथ क्‍या होता, सांझ में सुरजी के साथ क्‍या होता, मलकीनी को मालूम था।
मातबर सुरुजदेव बाबू के फटे में टांग तो क्‍या अपना काटकर फेंका नाखून भी लोग अड़ाना नहीं चाहते थे। कनफुसकी, मुसकी, चुसकी में बात होती रही, लोग अपने घर के बेटों, बेटे अपने बापों और मां बहुएं अपने-अपने मरद पर हर संभव चौकसी रखने लगे. सूरजी दिन उगते से सांझ ढलते तक उगती, चमकती, लचकती, मटकती. सूरजदेव बाबू समन्‍दर में डोलते सूरज की तरह आगे पीछे होते।
     उस दिन ज्‍वार उगते सूरज पर कारे मेघ छा गए, मेघ झमाझम बरसे। सूरजी भी बरसी, मलकीनी भी। सुरुजदेव बाबू काले मेघ की तरह गरजते रहे, घन बिजली की नाई चमकते रहे।
सुरजी दरद से बिलबिला रही थी। दरद तो पहले भी होता था, जब जबरन सुरुजदेव बाबू उसकी देह को अपनी मुट्ठी में भर लेते। जबरन उसकी टांगें फैलाकर उसके ऊपर हुमचने लगते। आगे-पीछे, ऊपर-नीचे करके उसे रूई की तरह धुन देते। मगर उसमें आह्लाद की एक टीस होती, प्‍यार भरी कसक और सिसकारी होती।
धुनने का कोई बखत नहीं था। धुनिया धुनकी लेकर तैयार तो सुरजी को रूई की तरह खुद को धुनवाना ही पड़ता। धुन-धनक के ऊपर आती तो कुछ मलकीनी सूनी नजरों और सूखे ओठ से उसे देखती रहती। सुरजी को ग्‍लानि होती। शुरू-शुरू में अंग-अंग की यह पीर अच्‍छी लगती, मादक और वह गा उठती!
रात सैंया मोती के लड़ी तोड़ दियो रे!
मरद का कोई अता-पता नहीं था, पहले भी नहीं, अभी भी नहीं। अब तो शायद पता भी हो तो नहीं आएगा? कौन आंख रहते जीवित माछी निगले? माय-बाबू ने उसका जैसे जिन्‍दा श्राद्ध कर दिया था। सुरजी समझ नहीं पाती कि कैसे वह इस खाई में उतरती चली गई! जवान देह की मांग? आदमी आ गया होता तो...! पैसा? फूले-करारे नोट से भरा सीना...! और अब तो उसका पक्‍का घर भी बन गया है। माय-बाबू ने जो थोड़ा पढ़ाया था, उसके बल पर बैंक में खाता खोल आई। उसे पता था कि बैंक से पैसा कोई नहीं चुरा सकता, भले उसकी देह से जवानी सुरुजदेव बाबू चुराते रहे।
पर अब मन ऊब गया था अपनी कोई मर्जी ही नहीं? एक हुकुम और देह कपड़े की ओट से बाहर!
उस दिन उसका मन नहीं कर रहा था। भरी मेघ से भरी दुपहर भरी सांझ लगने लगी थी। मलकीनी दुख की गगरी बनी भरी बैठी थी. पांच बरस हो गए. एक काना पूत भी गोद में रहता तो उसका मुंह देखकर सारा गम भुलाती रहती। पर पूत होए तो कहां से? सारा रस तो ई सुरजी सोखे ले रही है सुरुजदेव बाबू का!
सुरजी बधाती गाय की तरह डकरी थी। मलकीनी घबड़ाकर नीचे उतरी थी. एक हाथ दोनों जांघों के बीच और एक हाथ से दोनों छाती दबाए सुरजी दर्द से बिलबिला रही थी। जूड़ा खुल गया था. बाल बिखर गए थे। आंखों में कातरता के लाल डोरे खून की नस बनकर बाहर निकलने को बेताब थे। मोटे-मोटे आंसू उसके गोरे, फूले गाल पर धार बन बह रहे थे। मलकीनी को देखकर वह एक बार और डेकरी।
सुरुजदेव बाबू अंगार बने हुए थे - हरामजादी रंडी! नखरा करती है। भाग यहां से, नहीं तो कुट्टी-कुट्टी काटकर डबराही पोखर में फेंकवा देंगे।
मलकीनी सहारा देकर उसे ऊपर ले आई। सुरजी सिर कटी बकरी की तरह छटपटाती रही। मलकीनी की आंखों में सवाल ही सवाल थे। सुरजी की देह में दरद ही दरद था।
     सवालों का कोहरा थोड़ा छंटा, देह का दरद थोड़ा कमा तो दोनों के हाथ में चाय थी मलकीनी का कप और सुरजी का गिलास, जो केवल उसी के लिए था, जिसमें चाय-पानी पीकर वह उसे एक किनारे रख देती। अछोपिन होने का यह जहर चाय-पानी के संग उसे हर दिन पीना पड़ता।
चाय पीती मलकीनी की आंखों में प्रश्‍न था -क्‍या हुआ?
आज मेरा मन नहीं किया मलकीनी। सूरजी के सामने सबकुछ नाच उठा सुरुजदेव बाबू ने उसको खींचा। उसने तनिक इतराकर कहा -मालिक! आज नहीं।
क्‍यों? माहवारी से है?
नहीं मालिक?
तो क्‍या पेट से है?
क्‍या मालिक आप भी? आप तो फुकना लगैबे करते हैं, हमको भी गोली खिलाते हैं।
तो मरद आ गया तुम्‍हारा?
ऊ तो लगता है, पाताल में सन्हिया गया!
तो कोई और मुस्‍टंडा चढ़ गया जी पर?
नहीं मालिक!
तो फिर? सुरुजदेव बाबू की आवाज तेजतर होती गई।
मालिक! आज मन नहीं है। रोज-रोज वही सब! कभियो तो छुट्टी मिले!
छुट्टी चाहिए! रंडी! सूत क्‍या गए तुम्‍हारे संग, तेरी मर्जी चलने लगी? महारानी समझने लगी? गुस्‍से में तिलमिलाते सुरुजदेव बाबू ने जूड़े से पकड़कर खींचा. फिर बेरहमी से उसकी दोनों छातियों को इतनी बुरी तरह दबोचा कि जोर की कराह उसके मुंह से निकल गई। सुरुजदेव बाबू ने पहले पेट पर लात मारकर उसे नीचे गिरा दिया। फिर जबरन उसकी टांगें दोनों ओर खींची और एक भरपूर लात....! 
भय, आतंक और दर्द से सुरजी फिर डेकरा उठी. देह उसके काबू में नहीं रही। बड़ी जोर से झुरझुराई! चाय का ग्‍लास हाथ से छूट गया. चाय फर्श पर फैल गई. ग्‍लास झनझनाकर दूर चला गया. दो घूंट चाय गई थी भीतर! बाकी तो अभी ग्लास में ही...!  सामने बैठी मलकीनी पर चाय का छींटा पड़ा. साड़ी पर भी चाय गिरी।
सुरजी के दुख से संवेदित और सुरुजदेव बाबू की पाशविक कृत्‍य से मलकीनी को चक्‍कर और मतली सी आने लगी. सुरजी की पीर के मर्म तक पहुंच रही मलकीनी की मर्म यात्रा में झटका लगा चाय के ग्‍लास से। उधर ग्‍लास झनझनाता दूर गिरा, इधर मलकीनी झनझनाई –‘रंडी! अछोपिन! कर दी न भरस्‍ट! अब इस बरखा-बुन्‍नी के समय में नहाना पड़ेगा!
सुरजी बीए पास नहीं थी। मगर दुनिया देख रही थी। सुरुजदेव बाबू के इस कृत्‍य ने क्षणांश में मलकीनी को इतना बदल दिया? सुरजी सुरुजदेव बाबू के साथ सोती थी, सोने के बदले पैसे पाती थी। सुरुजदेव बाबू के प्रति उसके मन में स्‍वार्थ था, मलकीनी के लिए भर देह आदर! मलकीनी उसे जितना भी काम अढ़ाती, ना नहीं करती। उसे लगता, शायद वह इसी तरह अपना अपराध कम कर रही है। लेकिन....!
जितनी तेजी से ग्‍लास गिरा, जितनी तेजी से मलकीनी बोली, उतनी ही तेजी से सुरजी भी बमकी –‘मलकीनी! हम क्‍या अपने से रंडी बने? अछोपिन बनकर जनमे? हमरे गिलास से आप का देह भरस्‍ट हो गया आ हमरे देह में देह घुसा के, अपना जीभ हमरे मुंह में डाल के मालिक आपके पास आते हैं, तब आप भरस्‍ट नहीं होती हैं?
मलकीनी की नजर झुक गई। सुरजी की उठ गई। मालिक की मार से देह की नस-नस पिरा रही थी। मलकीनी की बात से मन का मांस तक सींझ गया। लेकिन अपनी बात से तन-मन की पीर पर चन्‍दन लेपा गया। वह उठी। ग्‍लास उठाया, धोया, पोछा लाकर फर्श साफ किया। जमीन पर निहुरकर मलकीनी को प्रणाम किया और बोली -आप लोग बची रहती हैं, क्‍योंकि आपके हिस्‍से का नरक हम ढोते हैं. हम जा रहे हैं. अब अपने हिस्‍से का नरक और सुरग दोनों भोगिए।
लड़खड़ाती सुरजी चल दी। ग्‍लास उठा कर आंचल में खोंस लिया –‘इस अछोप का भी यहां क्‍या काम?
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Tuesday, March 27, 2012

फेयरनेस फॉर मेन!

            हे प्रिय राम! हे सखा कृष्ण!! बढिया क्या है‌? आपका इस युग में ना होना या आपके युग में फेयरनेस फॉर मेन कॉन्सेप्ट का न होना? आपके ही कारण इस देश में यह अवधारणा बनी होगी कि मर्दों की सीरत देखो, सूरत नहीं. शास्त्र में वर्णित धीरोदात्त नायकों की परिकल्पना को भी आपने अपने काले रंग से ध्वस्त कर दिया. कैलेंडरवालों ने काले को नीले में बदल दिया- ब्ल्यू बेबी! बच्चा जब नीले रंग का जनमता है, लोग घबडा जाते हैं. यहां भगवान को ही नीला कर दिया. लगा होगा- काले पर क्या दिखेगा? देवी काली को देखिए- न आंख दिखती है ना नाक! इसलिए नीला! नीलेपन का सौंदर्य भी, कैलेंडर की खूबसूरती भी.
छम्मकछल्लो वारी वारी जाती है- सीता पर भी, शूर्पनखा पर भी. राधा पर भी, गोपियों पर भी. जनक अपने ही धनुष भंग के जाल में फंस गए. धनुर्भंग कर रहे काले राम को देख पता नहीं उन पर क्या बीती होगी? माता सुनैना भी पार्वती की मां की तरह ही जनक से लडी होंगी-
हमु नहिं आज रहब एहि आंगन, जौं कारी होयत जमाय गे माई!
सभी सास लडती हैं अपने पतियों से- काला दामाद पाकर- “अरे आंख थी कि बटन?” सभी लडकियां झमाती हैं, काले पति को पाकर. पुष्पवाटिका में सीता जरूर गोरे लक्ष्मण में राम का तसव्वुर कर बैठी होंगी. धनुर्भंग करते काले राम को देखकर बेहोश होते होते बची होंगी.
धरती पर के काले मर्दों का मनोबल बढाने के लिए राम और कृष्ण के कालेपन की महिमा गाई गई होगी, वरना यह कैसे सम्भव है कि उनके मूल स्वरूप विष्णु तो गोरे हों और ये काले? काले-गोरे की यह लडाई भी उत्तर भारत में है. दक्षिण भारत में हर देवी-देवता काले हैं, इंडोनेशिया के चिपटी नाकवाले राम-सीता की तरह. उत्तर भारत में सुतवां नाक, मछली सी आंख, तिलकोर के फल से ओठ और सोने जैसे रंग की अवधारणा है. छम्मकछल्लो को सोने जैसा रंग है तेराभी नहीं समझ में आता. सोना पीला होता है और चेहरे पर पीलापन हो तो लोग बीमार या पीलिया का मरीज़ समझ लेते हैं.
काले रंग के लोग उत्तर भारत में भी हैं. जरूर उन्हें लडकीवाले छांट देते होंगे. भगवान तर्क से परे हैं. इसलिए राम-कृष्ण काले हो सकते हैं, दूल्हे नहीं. आखिर को उसे मंडप पर चढना है, गांव घर की स्त्रियों के व्यंग्य बाण झेलने हैं, अपनी खूबसूरत पत्नी के बगलगीर होना है. वे चाहे कितने भी काले हों, पत्नी गोरी और सुंदर चाहिए. सीधा तर्क! संतति गोरी होगी, जैसे डॉक्टर ने सर्टीफाई कर दिया हो कि उनकी संतान मां का ही रूप-रंग लेगी.
छम्मकछल्लो रंग के महत्व को देखती-झेलती आ रही है. इस रंग ने कितना बडा रंग हटाऊ बाजार खडा कर दिया! हर कोई एक फेयरनेस क्रीम उठा लाता है. बाजार लडकियों के फेयरनेस क्रीम से भर गया. अब? लडके!! क्योंकि आजकल लडकियां भी बडी डिमांडिंग हो गई हैं, गोया लडकियों के लिए मात्र एक ही क्राइटेरिया हो –लडके का गोरा होना.
जरूर वाल्मीकि या वेदव्यास अवश्य काले रहे होंगे. ज़रूर सौंदर्य प्रसाधन निर्माताओं में से ज़रूर कोई न कोई काला रहा होगा. कालेपन का दंश उन्होंने सहा होगा. ऊपरवाला भी ना! जिस तरह उम्र की छाप छोडता चलता है, उसी तरह एक खास उम्र पर कम से कम सभी को गोरा कर देने का प्रावधान तो रखते.
भगवान की इस गलती को सुधारने का जिम्मा सौंदर्य प्रसाधन निर्माताओं ने लिया और बनाया- फेयरनेस क्रीम फॉर मेन. हे हिंदू हृदय-सम्राटो! राम-कृष्ण की परम्परा को मारो गोली! कौन सा हम उनकी परम्परा और उनकी सीरत को अपना रहे हैं? आप फेयरनेस क्रीम अपनाओ. लडकियों के मां-बाप भी कहते हैं- “लडका मंडवा पर लडका जैसा तो दिखना चाहिए ना!” साफ-साफ कहो ना कि हनुमान नहीं! हालांकि कैलेंडरों में हनुमान का रंग गोरा ही है!