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Wednesday, May 21, 2008

फर्क विकसित और विकासशील देशों का

एक कार्यक्रम में थी छाम्माक्छाल्लो थी - इ-लर्निंग, distant learning and Cross Knowledge पर। फ्रांस के एक प्रेजेंतर अपना प्रेजेंटेशन देनेवाले थे। किन्ही तकनीकी कारणों से उनका प्रेजेंटेशन न हो सका। काफी देर वे इस प्रयास में रहे कि प्रेजेंटेशन ठीक हो जाए और वे अपनी बात कह सकें। मगर उसे आज ठीक न होना था, न हुआ। और इसके अभाव में वे एक लाइन भी अपने प्रोजेक्ट के बारे में न बोल सके। केवल इधर-उधर की बातें करते रहे। एकाध सवाल पूछे जाने पर भी वे उसका समुचित उत्तर न दे सके। अंत में वे बैरंग वापस चले गए।
यही वाक़या कल छाम्माक्छाल्लो और उसके अन्य सहयोगियों के साथ हुआ।देश भर के लोग जमा थे। सभी अपना अपना प्रेजेंटेशन इ-मेल के माध्यम से भेज चुके थे। बावजूद इसके, सभी अपने साथ पेन ड्राइव व सी दी लेकर आए थे। कल भी पी सी में कुछ खराबी होने के कारण सेव किया प्रेजेंटेशन नहीं दिखाया जा सका। अंत में सभी की सी दी व पेन-ड्राइव काम आए। वह भी नहीं चलता तो लिखित डाटा व अपने दिमाग में स्टोर किए डाटा से काम चलाया जाता। हमें कल लगा था कि हिन्दी (अभी भी) के कारण यह तकनीकी बाधा है। मगर आज वह भ्रम दूर हो गया था।
छाम्माक्छाल्लो के सामने यह फर्क साफ हुआ कि विकासशील देश अपनी सुविधाओं और तकनीक पर इतने निर्भर और आश्वस्त रहते हैं कि इस तरह की अवांछित स्थिति आ सकती है, ऐसा वे सोच ही नही पाते, जबकि हम जैसे विकासशील देश के लोग हर तरह की आशंकाओं से जूझते हुए पलते-बढ़ते हैं, इसलिए हर स्थिति केलिए तैयार रहते हैं। और सबसे बड़ी बात कि दिमाग से खाली नहीं होते। जिसपर बात करनी है, उसपर पूरी तरह से मानसिक तैयारी रहती है। अपने लक्ष्य को पाने की हर कोशिश करते हैं। छाम्माक्छाल्लो को लगा कि आज यह स्थिति हमारे किसी भी व्यक्ति, अधिकारी के साथ होती तो वह अपने प्रेजेंस ऑफ माइंड से बगैर पावर प्वायंत प्रेजेंटेशन के भी एक सुंदर प्रस्तुति दे सकता था। यह अपने काम के प्रति की जिजीविषा है। अपने को प्रस्तुत कराने की लगन है। वह इस तरह तो बैरंग नहीं ही लौटता।

Thursday, May 15, 2008

घर-घर देख, एक ही लेखा

दो दिन पहले अखबार में ख़बर थी कि ब्रिटेन के पूर्व प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर की पत्नी चेरी ब्लेयर ने अपने पति पर आरोप लगाया कि उसके गर्भपात की संवेदनशील ख़बर को पति ने अपनी राज नीति के लिए इस्तेमाल किया। छाम्माक्छाल्लो खुश हो गई क्योंकि उसने अपनी किसी रचना में यह लिखा था कि अत्याचार या ज़ुल्म दिखाने के लिए पेट -पीठ पर जले का, हाथों के कटे-फटे का दिखाना ज़रूरी नही है। मन की मार बड़ी मारक होती है। इसे किसी को दिखाया भी नहिंजा सकता। इसके पहले अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की khabarein आपको पाता ही है। अपने देश मेंयः सब saamaany है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि वहां की पत्नियों में यह साहस है कि वे अपने पतियों के ख़िलाफ़ बोल सकें। यहाँ यह्दुर्लभ है। पति-पत्नी या किसी के प्रेम प्रसंग बाहर आ ही नहीं सकते, अगर वह राजनीति में हो। खूब सारे हंगामे, खूब सारे लोगों की जान कि बलि और जिनके बारे में लिखा जाए , वे तेल लगे चमड़े पर पानी की बूँद की तरह फिसला कर निकल लें।

छाम्माक्छाल्लो सोच रही है कि आख़िर पत्नियां होती किसलिए हैं? माना कि पति के हर सुख-दुःख में उसके कंधे से कंधा मिला कर चलने के लिए, मगर इसका मतालाब्यः तो नहीं कि उसे अपने काम केलिए इस्तेमाल कर लिया जाए। उसे समझाया जाए कि यह करना पति के हक के लिए कितना ज़रूरी है। चेरी लिखती हैं कि वे दर्द और रक्त स्राव से छातापता रही थीं, और टोनी उन्हें इस बात के लिए राजी कर रहे थे कि उअके गर्भपात कीखाबर का ज़ाहिर होना देश की राजनीति के किए कितना ज़रूरी है। उम्र के मध्य में पहुंचकर उनका गर्भ ध्हरण करना टोनी को एक फीकी सी टिप्पणी करवाता है- 'मैं निश्चित नहीं हूँ कि ५० साल की उम्र में मेंएन बाप बनाना चाहता हूँ कि नहीं।

छाम्माकछ्क्ल्लो एअसे में सोचने लग जाती है कि स्त्रियाँ कितनी मज़बूर हो जाती हैं पति का साथ देने के लिए,सिर्फ़ इस कारण से कि आखिरकार यह पति का मामला है और 'भला है, बुरा है, मेरा पति मेरा देवता है।' मान कर। अगर पश्चिम में सरी और हिलेरी भी ऐसा कराने ओइरउर सोचने के लिए मज़बूर हैं तो हम हिन्दुस्तानियों की तो बात ही और है। उन्हें तो घुट्टी में मिलाती है नसीहत और यह कि यही तुम्हारी नियति है। चेरी और हिलेरी, चाम्माक्छाल्लो क्या कहे आपसे और अपनी जैसी अन्यों से।

आपको कुछ लगता है तो बताएं.

Saturday, May 10, 2008

पुण्य स्मरण डा राजेन्द्र प्रसाद का.

छाम्माक्छाल्लो के एक मित्र हैं। 'मि जिन्ना' नाटक के दौरान उनसे पहचान हुई। बातों में बातें निकलती रहीं। बिहार और राजनीति की चर्चा होने पर देश के सबसे पहले राष्ट्रपति डाराजेन्द्र प्रसाद का ज़िक्र न हो, यह मुमकिन न था। जिन्ना' के दौरान उस समय कि परिस्थितियों पर चर्चा होतीं। एक आम बिहारी कायस्थ मानसिकता पर भी बात होती कि हर कायस्थ अपने को राजेन्द्र प्रसाद से नातेदारी जोड़ लेता है। नाटक के दौरान मित्र इतनी अन्दरून बातें बताते कि छाम्माकछाल्लो को हैरानी होती। और एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने अपने सम्बन्ध का खुलासा किया कि डाराजेन्द्र प्रसाद उनके परनाना हैं। फ़िर यह अनुरोध आया कि आप इस बात को सार्वजनिक नहीं करेंगी। छाम्माक्छाल्लो को यह अच्छा लगा। उसे याद आया कि किसी कार्यक्रम में नसीरुद्दीन शाह के बेटे इमाद को अपना प्रोग्राम देना था। उसने ख़ास तौर पर गुजारिश की थी कि उसके परिचय में उसके माता-पिटा का नाम न शामिल किया जाए। यह कोई हेकडी नहीं, बल्कि अपनी कूवत अपने बूते बाहर लाने लाने का साहस है।

मित्र के सव्जन्य से हमें डाराजेन्द्र प्रसाद के ऊपर उनके बेटे श्री मृत्युंजय प्रसाद की लिखी किताब मिली- "पुन्य स्मरण" छाम्माकछाल्लो किताब पढ़ने के बाद इसके कुछ हिस्से आप सबके सामने लाने का लोभ रोक नहीं पा रही है। यह इसे लिए भी ज़रूरी है कि हम जाने अपने भूले-बिसरे नेताओं को, जिन्होंने इस देश को आजाद कराने में कितनी अहम् भुमिका निभाई थी। यह केवल उनकी तपस्या नहीं थी, उनके संग उनके पूरे परिवार की आहुति होती थी।

आचार्य शिव पूजन सहाय ने डाराजेन्द्र प्रसाद को बिहारियों का 'गृह देवता' कहा है। डा विश्वनात्न प्रसाद वर्मा ने उन्हें 'हिमालय के उत्तुंग शिखर की भाँती शीर्षस्थ स्थान' दिया है। डा श्रीरंजन सूरिदेव ने कहा है कि 'वे अपने सिद्धांत के लिए ही जिए और उसी के लिए मरे।'

आगे जब कभी छाम्माक्छाल्लो उनके बारे में लिखेगी, आप देखेंगे कि किस तरह यह आदमी अपनी काबिलियत के सहारे इस ऊंचाई तक बढ़ा। देश की सेवा निस्वार्थ भाव से की। राष्ट्रपति पड़ पाकार भी जिन्हें कभी कोई अभिमान न हुआ। नेहरू से सिद्धांत को लेकर हमेशा तनी रही। असल में नेहरू नही चाहते थे कि वे देश के पहले राष्ट्रपति बनें। यहाम तक कि १३ मई, १९६२ को राष्ट्रपति पड़ से अपनी सेवा निवृत्ति के १० माह पहले डाराजेन्द्र प्रसाद सख्त बीमार पड़े। बचने कि कोई उम्मीद न थी। उन्हें एक प्राइवेट नर्सिंग होम मी दाखिल कराया गया। नेहरू जी को लगा कि अब वे शायद बच नहीं पायेंगे। इसलिए उनहोंने एक और उनकी राजकीय सम्मान के स्साथ अंत्येष्टि के लिए आदेश दिए और दूसरी और उनके तात्कालिक उत्तराधिकारी की भी सोचने लगे। इन सबके साथ ही उनके दिमाग में उनके अंत्येष्टि स्थल की भी बात घूम रही थी। "From Curzon to Nehru and after" में लिखा है- " He (Nehru) did not want th e ceremony to be performed next to Rajghat, Gandhi's cremation ground, but he feared that MP's from Bihar, Prasad's home state would insist that this site to be chosen. He accordingly asked Home Minister Shastri to find a place as far from Rajghat as possible. This was a very delicate mossion and had to be performed secretly. Shashtri, accompanied by the Chief Commissioner of Delhi, Bhagwan Sahay, was driven by Dy. Commissioner sushitlal banerji, along the banks of Jamuna and chose a spot a couple of furlongs from Rajghat for the cremation.

Fortunately, Prasad survive the illness. The site, Shashtri selected for the President's cremation was used to cremate Shashtri in 1966 and became known as Vijayghat."

छाम्माक्छाल्लो की कोशिश होगी कि वह इस तरह के प्रसंग इस किताब से व अन्य किताबों से भी दे, ताकि आप देश की इस महान विभूति को और भी अच्छे से जान सकें।

Wednesday, May 7, 2008

क्या हम सचमुच देश प्रेमी हैं?

जुस्सी- फिनलैंड के हेलसिंकी विश्व विद्यालय में हिन्दी का छात्र, लगभग ८० % दृष्ठीनता का शिकार। भारतीय दर्शन व कला, संस्कृति ने उसे हिन्दी पढ़ने की और भेजा। पिछले साल फिनलैंड में मेरी उसके साथ मुलाक़ात हुई थी। हिन्दी ब्रेल की तलाश में वह यहाँ आया है-पत्नी एवा के साथ। मुंबई आने के पहले ही उसका मेल आ गया था। यहाँ आते ही फोन। मिलाने का समय तय हुआ, दोनों आए। सहारे पर मिलाने की खुशी। मगर आते ही अपने अनुभव बयान किए, उससे सदमा लगा। मोबाइल फोन के बहाने किसी दुकानदार ने उन्हें धोखा दिया और जब एवा उनके यहाँ नेट पर काम कर रही थी, उसने अपना पर्स दुकानदार की डेस्क पर रखा था। उम्मीद तो रही ही हिगी कि सब कुछ ठीक रहेगा। पर, दूसरे दिन जब उसने अपना पर्स खोला तो उसने पाया कि उसमें से उसके २०० यूरो गायब हैं। वे पुलिस के पास गए तो उस इलाके की पुलिस ने उन्हें संबंधित पुलिस स्टेशन जाने को कहा। वे पेशोपेश में थे। मुझसे पूछा। बाद में उनकी भी राय बनी कि पैसे तो वापस मिलाने नहीं तो क्यों इस झंझट में पड़ा जाए।

एवा और जुस्सी की बात ने मुझे इस देश का वासी होने के कारन आहात किया। उनके यहाँ कोरी या इस तरह की वारदातें नहीं होतीं। सुखी, संपन्न देश। मगर हम अपने यहाँ आए मेहमानों को थागेम, उनके साथ धोखाधडी करें तो वे क्या इमेज लेकर जायेंगे हमारे देश किहोना तो यह छाहिये कि ऐसा व्यवहार दें कि वे तो ख़ुद आयें ही, साथ-साथ दूसरों को भी ले कर आयें। पर्यटन को बढावा मिलेगा, देश के खजाने में पैसा आयेगा। इसके लिए हमें कुछ भी अपने जेब से खर्च नहीं करना पडेगा। सिर्फ़ अपने आचरण, आदत मं थोडा बदलाव लाना होगा।

एवा ने यह भी बताया कि यह एक हादसा भले उनके साथ हो गया, मगर यहाँ आकर वे बेहद खुश हैं। उन्हें यहाँ कि सबसे अच्छी बात लगी - लोगों के चेहरों पर खुशी देख कर। हर उम्र, तबके के लोग दिल से ह्नासते हैं। इसका कारण उसने जानना चाहा। इस देश कि संस्कृति- धीरज, संतोष, आशावादिता कि, परिवार और रिश्तों कि मज़बूती कि, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हमें प्रभावित करते हैं। उसने इस बात को महसूस किया कि यहाँ पर साथ रहने और अब ७ साल के बाद शादी कराने कू लेकर लोग तनिक चौंकते हैं।

जुस्सी हिन्दी कि ब्रेल सीखा कर हिन्दी ब्रेल में किताब पढ़ना चाहता है। वह हिन्दी बोल लेता है। इसका उसे फायदा मिल रहा है। कहता है- " यह मेरे लिए बहुत सुविधा जनक हो गया कि मुझे हिन्दी आती है। यहाँ बहुत से लोग ऐसे हैं जो अंग्रेजी नहीं जानते, नहीं बोलते।" वह यहाँ के नेशनल असोसिएअशन् फॉर ब्लाइंड गया, जहाँ से लौट कर उसने खुशी महसूस कि। फिनलैंड में मैंने पाया कि लोग भारत के ओप्रती बेहद आकर्षण महसूस करते हैं। यही आकर्षण लाहौर में भी महसूस किया। यहाँ के लिए आज का सबसे बड़ा आकर्षण यहाम कि हिन्दी फिल्में हैं, जिन्हें वे बॉलीवुड फ़िल्म कहते हैं। वहां इन फिल्मों के गीतों कि धुनों पर पागालूँ कि तरह नाचते हुए लोगों को देखा। जुस्सी भी यहाँ कि फिल्मों का आनंद लेना चाहता है, यहाँ कि ढेर सारी बातें जानना चाहता है। हर सैलानी के मन में यह भाव रहता है, मगर, जब उसके साथ धोखा वह अन्य ग़लत हराक़तेम होती हैं तो केवल हमारा नहीं, देश का सर नीचा होता है। क्या हम इअताने लापरवाह या अपने कर्तव्य बोध से रहित हो गए हैं कि देश और देश प्रेम जैसी कोई बात ही ना रह जाए चाँद पैसों के आगे। तो फ़िर काहे को हम देश भक्त यार। काहे को गर्व क्कारें अपनी भारतीय संस्कृति, कला, साहित्य, धरोहर, मूल्यों, आचारों, विचारों पर?

Saturday, May 3, 2008

१ मई को सलाम!

१ मई छाम्माक्छाल्लो के लिए बहुत मायने रखता है। विश्व मज़दूर दिवस और महाराष्ट्र दिवस के अलावे भी यह उसके लिए अहम् है। १ मई,2001 को ही उसने अपनी संस्था 'अवितोको' की आधार शिला रखी. आज अवितोको ७ साल का हो गया। अवितोको का जन्म उसके ३रे बच्चे कि तरह ही है। न कोई शोर- शराबा, न कोई आडम्बर, बस मन ही मन एक संकल्प लिया उअर अवितोको का काम शुरू हो गया। इसके बाद लगातार -काम और काम- सामान्य जन से लेकर विशेष वर्ग के लोगों तक, बच्चों से लेकर वृद्धाश्रम मी रह रहे तक। मानसिक रूप से बाधित बच्चों से लेकर जेल में रह रहे बंदियों और उनके बच्चों तक। कला, थिएटर, साहित्य, संस्कृति के माध्यम से। जेल के बच्चे कहते हैं, वे डाक्टर बनेगे, हीरों बनेगी। जेल के बंदी कविताओं के माध्यम से अपने मन की बातें कहते रहे। उनकी कवितायें, हंस, ज्ञानोदय, कादम्बिनी, वागार्थ आदि में प्रकाशित हुई। उनके बनाए चित्र केवल चित्र नहीं, उंकी अभिव्यक्ति के माध्यम रहे हैं। उनके द्वारा खेले गए नाटक में उनके जीवन की dhadakan रही है। उनकी कला kritiyaan अपने जीवन का सुंदर dastaavez हैं। अवितोको का जीवन दर्शन ही है- रंग जीवन, yaanii aart and थिएटर फार all। और ऐसे में ये sabhii sahabhaagii अपने काम से अवितोको के लिए एक naii cunautii लेकर आते रहे हैं। इसी की एक kadii मी नया जुदा है अवितोको के naatakon का pradarshaan। 'अए priye तेरे लिए' usaka pahala नाटक thaa और अभी doosaraa नाटक चल रहा hay- 'Life is not a Dream'। २००७ में finlainD में isakii pahalii प्रस्तुति के बाद mumbai में इसके manchan हुए और अब २९ aprail को इसे rayapur में खेला गया। aalekh v प्रस्तुति छाम्माक्छाल्लो की है और nirdeshak हैं shrii ar एस vikal। raaypur में lagabhag ७०० लोगों के saamane इसे manchit किया गया और sabhii ने एक स्वर से इसे saraha। यह न केवल chhammakachhallo के लिए, varan थिएटr जगत ke lie utsaah kii baat rahii. yah galat saabit huaa ki log thietar नही देखते या dekhana नही चाहते। achchhi chiizen हर कोई chaahataa है।
अवितोको अब अपने इस नए साल में फ़िर से तैयार है- कला, थिएटर varkshaap, नाटक के प्रदर्शन और जेल के बंदियों के लिए अलग-अलग karyakramon के साथ। isamein, उनके साथ srijanatmak kaaryakram के साथ- साथ उन्हें अपने जीवन koo नए svaroop में देखने के बारे में vichaar kiyaa jaaega। उनकी pratibhaaon को saamane लाने के liee karyakram हैं।
अवितोको हर वर्ग से judate हुए अनेक prashikShan karyakramon के साथ भी है। inamein हैं- "Time Management', Self Exploration', Know yourself Better', 'Guilt Management', राजभाषा Management Through self Management' etc.
छाम्माक्छाल्लो को इस बात का संतोष है कि आप sabakaa साथ और sahayog उसके साथ है। डर असल यह usakii अपनी nahiin, एक samaveta prayaas की yaatra है, padaav- डर- padaav तय कराने के silasile हैं।

Sunday, April 27, 2008

हम खुश हैं कि हमने लाहौर देखा

लाहौर। बचपन से ही मन में बसा एक नाम-बडा मजबूत सा-शायद लोहा से मिलता-जुलता होने के कारण, जैसे बचपन में कराची और रांची मेरे लिए एक ही जगह थी। मां ने जब बताया कि रांची हिन्दुस्तान में और कराची पाकिस्तान में है तो उस समय भी लगा कि इतने एक जैसे नाम दो देशों में क्यों? मोहन जोदाडो और हडप्पा सभ्यता और तक्षशिला के बारे में इतिहास में पढती तो रही, मगर तब यह नहीं समझ में आया था कि यह पाकिस्तान में है, जैसे बचपन में यह कभी समझ में नहीं आया कि टैगोर या बंकिम बांग्ला के लेखक हैं।
बहरहाल
पाकिस्तान देखने, घूमने की तमन्ना अन्य किसी भी देश जाने से ज्यादा थी। बिटिया के पढाई के सिलसिले में वहां जाने से यह इच्छा और बलवती हुई
लोगों की भवें और सिकुडीं -अच्छा। पाकिस्तान में पढाई भी होती है? वहां इंडिया से ज्यादा स्टडी इन्फ्रास्ट्रक्चर है? आज से बीस साल पहले चीन जाते समय भी भवें तनी थीं -और कोई देश नहीं मिला तुम्हें? पाकिस्तान से लौटने पर लोगों ने कहा -शुकर है, जिंदा लौट आई।
कितना कम और कितना गलत जानते हैं हम अपने ही पडोसी और एशियाई मुल्कों के बारे में। पश्चिमी मीडिया को धन्यवाद कि वह हमारे इन भ्रमों को, सन्देहों को बढाने में और भी मदद करता है। लाहौर यात्रा ने हमारे इन भ्रमों को तोडा। वीजा की औपचारिकता निभाने के बाद हम 4 अप्रैल को आखिरकार लाहौर पहुंच ही गए। जिस लाहौर नई देख्या, समझो जन्मयाई नहीं। हमने लाहौर देखा। देखने के बाद इस बात पर यकीन हुआ।
इतनी चौडी-चौडी सडकें-आठ भागों में बंटी-सर्विस रोड ग्रीन बेल्ट-नहर मुख्य सडक-यही दोनों तरफ। ड्राइविंग बाई तरफ की ही है साफ-सफाई के मामले में दिल्ली से भी आगे मुंबई की तो बात ही न की जाए। भीतरी सडकें भी यहां के बडे शहरों की मुख्य सडकों जितनी चौडी। रिहाइशी इमारतों का प्रचलन ही नहीं-शहर क्षैतिजाकार में फैला हुआ-लोगों के अपने-अपने घर-ज्यादा से ज्यादा दो मंजिल तक - घरों के क्षेत्रफल देखने के लिए केवल आंखें नहीं, गर्दन दायें से बांये घुमानी पडती। मुंबई की रिहाइशी इमारतों के बडे-बडे गेट जैसे इन घरों के गेट।
लाहौर कभी पुराना सांस्कृतिक बढ रहा-विभाजन ने इस गढ में भयानक सेंध लगाई और धीरे-धीरे कला की धरोहरें गायब होने लगीं-कभी यहां फिल्मों का गढ था-आज की पुरानी बडी-बडी हस्तियां, प्राण, देवानन्द वगैरह लाहौर से ही थे। भीष्म साहनी और बलराज साहनी यहां के गवर्नमेंट कॉलेज की देन थे। फैज अहमद फैज की बेटी और बीकन हाउस नैशनल यूनीवर्सिटी की डीन सलीमा हाशमी कहती हैं-मेरी बेटी हिंदी जानती है-भीष्म जी के बच्चों के साथ उसने हिन्दी सीखी और बाद में भीष्म जी की चीजें यहां की यूनीवर्सिटी से निकलवाने में बिटिया की हिन्दी बहुत काम आई।
विभाजन के बाद लोगों का इधर से उधर और उधर से इधर का विस्थापन हुआ-मंटो और नूरजहां जैसी हस्तियां उधर चली गई। सियासी मसलों ने एक-दूसरे के प्रति और ज्यादा जहर बोया, काटा, उगला। जानकार कहते हैं कि 1965 तक लाहौर में हिंदी ओर पाक की फिल्में आमने-सामने मुकाबले पे लगती थी। तब कई बार हिंदी फिल्में रोक देनी पडती थीं। 1965 के बाद हिंदी फिल्मों पर बैन लगा और इस्लाम और सियासतदानों के जानिब से फिल्में बनने की संख्या कम होती चली गई। तब ग्यारह स्टूडियो होते थे, जो आज घटकर दो-तीन रह गए हैं। इनमें भी टेलीविजन कार्यक्रमों के शूट होते हैं।
हम भी दिमाग में यह तसव्वर बनाकर चले थे कि लाहौर एक बन्द, घुटा-घुटा सा शहर होगा - गरीबों, मजलूमों से घिरा खातूनों के पर्दो से जकडा, मौलवियों, मुल्लाओं की टोपियों, दाढियों, चोगों से घिरा मगर ऐसा कुछ न था। यहां भी उसी वर्ग की औरतें बुर्का पहनती हैं, जिस वर्ग की अपने यहां। लडकियां जीन्स में, खुले सर इधर से उधर रंग-बिरंगे फूलों और तितलियों की तरह लहराती, बलखाती मिलीं। हां, स्कर्ट अलबत्ता नहीं दिखी और ना ही खुली पोशाक - तंग मोहरी की शलवार और उसके ऊपर कमीज और दुपट्टा दुपट्टा सर पर अपने-अपने पारिवारिक चलन के मुताबिक बीएनयू की ग‌र्ल्स हॉस्टल की वार्डन गजाला बताती हैं - हम जब इंडिया गए, तब हमने सोचा था, सबकुछ अलग होगा, पर हमारी लडकियों ने कहा - हाय अल्ला। यहां की भैंसें तक हमारी भैंसों जैसी ही है।
बाजार, दुकान, लोगों के आपसी हंसी-मजाक, शोहदे और मनचले सभी एक ही जैसे। हमें कभी नहीं लगा कि हम इनसे कुछ अलग हैं। हकीकत तो ये थी कि दिखना भी नहीं चाहते थे। पहले दिन बिन्दी लगाई, दसरे दिन से छोड दी। साडी हमारी राष्ट्रीय पोशाक है, वहां साडियां अब केवल किसी खास मौके पर पहनी जाती है-कमर, पीठ, पेट आदि के दिखने के कारण इसे बहुत अच्छा नहीं माना जाता मगर पसंद सभी को है।
पुरुषों की पोशाक कुर्ता-शलवार (पठान सूट) है और हर तबके के लोग इसे पहनते हैं - पैंट-शर्ट पढा-लिखा तबका ज्यादा पहनता है। पाकिस्तान उच्चायोग में तो यह वर्दी ही थी। एक डेलीगेशन वहां मिलने आया। पूरे ग्रुप ने कुर्ता, शलवार, जैकेट पहन रखा था।
लडकियां पढ रही हैं, मगर ख्वातीनों के अधिक काम करने का चलन कम है। शायद इसीलिए मुझसे किसी ने नहीं पूछा कि मैं क्या करती हूं? लेकिन तथाकथित ऐसे बन्द मुल्क में महिला ट्रैफिक पुलिस और होटल में वेट्रेसेस भी मिलीं। टेलीविजन पर अब खबरें पढनेवाली या एंकरिंग करनेवालियों के सरों पर चादरें नहीं होतीं।
पंजाब होने के कारण लहजा ठेठ पंजाबी है, मगर तलफ्फुज बिल्कुल साफ। मुल्क बनने के बाद उर्दू में तर्जुमा और आम जिन्दी में उनका इस्तेमाल बढा है-एक्सक्यूज मी की जगह बात सुनें और सिग्नल और रेड, यलो, ग्रीन लाइट के बदले इशारा। लाल, पीली और सब्ज बत्तियां, लेफ्ट और राइट के बदले उल्टे और सीधे हाथ कहने का प्रचलन है। बोलने से पहले अस्सलाम वालेकुम बोलना जिन्दगी का हिस्सा है, यहां तक कि फोन पर भी हैलो के बदले अस्सलाम वालेकुम।
मजहब और अल्लाह खून के कतरे की तरह समाया हुआ है - इंशाअल्लह, माशाअल्लाह, अल्लाह की मेहरबानी, अल्लाह का शुक्र वगैरह सहज तरीके से जबान में बस गए हैं। बोलनेवालों को अहसास भी नहीं होता कि वह इन अल्फाजों के इस्तेमाल कर रहा है। मैंने गौर किया कि यहां भी भगवान मालिक है, भगवान की दया से आदि खूब बोला जाता है। बस पढा-लिखा तबका और धर्म से तथाकथित परहेज रखनेवाले इसे नहीं बोलते।
मुल्कों की समानता में एक बडी समानता है - भिखारियों की और धार्मिक स्थलों पर तथाकथित लोगों द्वारा आपको घेर लेने की। हर मोड पर, बाजार में, होटलों के आस-पास-मसलन यहां की तरह वहां भी यह नजारा बेहद उदास करता है-भीख ही मांगनी थी तो अलग ही क्यों हुए? वाघा बॉर्डर पर यह सवाल बार-बार मन को मथता रहा-रोजाना की झंडा उतारने की 25 मिनट की परेड देखने लायक है। जबानों की आवाज से उडते परिन्दों को देखकर यह गीत याद आता रहा -
पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इसे रोके
सरहद इंसानों के लिए है, सोचो तुमने और हमने क्या पाया इंसां होके
परेड के दौरान दोनों ओर के हुजूम के जज्बात से लगे, कि काश-यह गेट हमेशा के लिए खुल जाता-दोनों ओर के लोग एक-दूसरे से मिल जाते, दूरियां खत्म हो जाती। वाघा पर ही हमें इंडियन नेटवर्क भी मिल गया। दिलों के नेटवर्क मिलें और 50 मिनट की हवाई यात्रा की दूरी और अमृतसर से लाहौर की 60 किलोमीटर की दूरी - सबकुछ नामालूम सी, मगर दो मुल्कों के कायदों-कानूनों में फंसकर इतना बडा मसला हो जाता है कि हिम्मत जवाब देने लगती है, यह खत्म हो जाए तो कितना अच्छा हो।

Tuesday, April 1, 2008

घोडे का क्या हुआ????

छाम्माक्छाल्लो आज इसी बस में दफ्तरअमूमन वह सामान्य बस में आती है। लोकल ट्रेन में भी उसने एक बार दो साल तक १स्त् क्लास में सफर किया था। अपने अनुभव के आधार पर वह कह सकती है कि दिल और दिलवाले मिलते हैं तो बस आम जन के बीच ही। ये तमाम पैसे वाले दिल और भावनाएं क्या जानें, क्या समझें? अगर उअनामें से कोई समझ ले तो समझिए कि आप ने आज सचमुच कोई अच्छा काम किया होगा। पैसे का रुतबा उनके से आगे दस कदम होता है और आगे आगे जा जा कर बोलता है।
इसी बस में लगभग तिगुना किराया लगता है। स्फिर भी सुविधाजनक है। मगर इस सुविधा को भोगते हुए लोगों के उपर एक दंभ, एक अंहकार रहता है, वह देखते ही बनता है। १स्त् क्लास में भी यात्रा करते समय दिल की बेदर्दी बारे करीब से देखी और अचानक एक दिन एहसास हुआ कि छाम्माक्छाल्लो में भी उसके कीटाणु आने लगे हैं तो उसने एक झटके में १स्त् क्लास से जाना चूद दिया।
आज इसी बस में बैठी। क्योंकि देर हो रही थी। पीछे से बस कब आती, पाता नही था। सो...
मेरे बगल में एक युवक बैठा। परेशान सा। पहले तो उसने अपने बैग में से खाने का डब्बा निकाला। बिचारे को इतनी भी फुरसत नही मिल पईई थी कि घर में चार कौर पेट में कुछ दल्ला ले। औरतों के साथ तियो यह महत मामूली, रोजाना का किसा सा है। खैर! पेपर पढ़ते हुए और नसता करते हुए के बीच में एक फोन आया। उसके किसी परिचित का एक्सीडेंट हो गया था। बातचीत से लगा कि दुर्घटनाग्रस्त आदमी या तो साईस था या रेस कोर्स का जॉकी या घोडे की शौकिया सवारी करता होगा। वह घोडे से गिर पडा। काफी चोट आई थी, अंदरूनी। पता नहीं, क्या हो, ऎसी आशंका आई। अफसोस के च च च भी निकले। फ़िर तपाक से पूछा, " उसका तो जो होना था, सो तो हुआ, पर तुम ये तो बताओ कि घोडे को कहीं ज़्यादा लगी तो नहीं?" छाम्माक्छाल्लो का मन किया कि तपाक से पशु प्रेमी संस्थान को फोन करे और बता दे कि देखिए, कितना ख्याल है उसे घोडे का।" आपो भी लगता हो तो बताएं॥ इंसान बहुत सस्ता है, एक मांगो, कई मिल जायेंगे। पर ghoDa, पाता है कितना मंहगा है? लाखों लाख रुपये का एक मिलता है। उसे सहेजना, उसकी देख भाल कितना मुश्किल है? और ऐसे में उसे कुछ हो जाए तो ? " आदमी की चिंता वाजिब थी।