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Monday, October 5, 2009

क़ैदियों की ज़िंदगी में “निर्मल धारा सेतु”

http://janatantra.com/2009/10/05/avitako-programme-for-prisoners/

अक्सर यह होता है कि जेल के लिए कोई भी कार्यक्रम करते समय वक्ता, अभिनेता, कलाकार, कविगण इस बात के लिए आशंकित रहते हैं कि जेल के लोग यानी कि क़ैदी उनकी बातें समझेंगे या नहीं. पिछले 6 सालों से जेल में काम कर रही छम्मक्छल्लो के लिए अनुभव एकदम अलग है. उसकी नज़र में सबसे पहले तो जेल में बन्द सभी इंसान हैं. छम्मक्छल्लो को नहीं मालूम कि वे अपराधी हैं भी या नहीं. कोर्ट सबूतों के आधार पर फैसला सुनाती है. छम्मक्छल्लो को यह भी नहीं मालूम कि इन फैसलों के कारण सजा काट रहे लोग वास्तव में अपराधी हैं या नहीं. उन्होंने अपराध खुद से किया या किसी के उकसाने पर किया, या वे उस खेल के नामालूम से मोहरे रहे, जिनके कन्धे पर बन्दूक चला कर सभी अपनी-अपनी गोलियां दागते रहे. दुर्भाग्य से छम्मक्छल्लो को यह कुछ भी नहीं पता. उसे पता है तो सिर्फ़ यह कि जेल में बन्द लोग भी इंसान है, उनके भीतर भी दिल धड़कता है, वे भी अपने किये के लिए पछताते हैं, वे भी वहां से निकल कर सम्मान की ज़िन्दगी बसर करना चाहते हैं. मतभेद हो सकते हैं, मगर ग्लास आधा खाली देखने के बजाय ग्लास आधा भरा हुआ देखे जाने की ज़रूरत है.
छम्मक्छल्लो यही करने का प्रयास करती है. इसी क्रम में ‘अवितोको’ द्वारा गान्धी और शास्त्री जयंती यानी 2 अक्तूबर के ठीक एक दिन बाद यानी, 3 अक्तूबर, 2009 को ठाणे सेंट्रल जेल में भारतीय पीनल कोड की भिन्न भिन्न धाराओं के तहत बन्द 35 बन्दियों के लिए ‘निर्मल आनन्द सेतु’ पर एक दिवसीय कार्यशाला रखी गई. इसका मूल उद्देश्य व्यक्ति के अपने ‘स्व’ का विकास करना था. जेल जैसी विषम जगह में रहकर भी अगर कोई अपने विकास की बात सोचता और समझता है तो यह उसके जीवन की कभी ना भूलनेवाली घटना हो जाती है. रविदत्त गौड़ ने इस कार्यशाला का संचालन किया. रवि भारतीय मिथकों के सहारे आज के जीवन की परतों को तह दर तह खोलने में माहिर हैं. जीवन की जटिलता उनकी प्रवाहमयी भाषा और विचारों के प्रभाव में आ कर अपने आप अपने गिरह खोलने लगती है.
कार्यशाला के सहभागी व्याख्यान के विन्दुओं को अपने जीवन से जोड़ कर देखने का प्रयास कर रहे थे और वे उसमें सफल भी हुए. सहभागियों को एक अभ्यास कराया गया. कागज से उन्हें एक सेतु बनाने को कहा गया, जिसके नीचे से एक जहाज को गुजरना था और जिसके ऊपर सामान को भी टिकाए रखना था. तीन ग्रुपों में यह अभ्यास कराया गया. सभी ग्रुपों को अपने ग्रुप का नाम रखने और अपनी टीम का नेता यानी लीडर चुनने के लिए कहा गया. ग्रुप ने अपने अपने ग्रुप का नाम रखा- ए-1, क्रिएटिव और ईगल. ईगल ग्रुप ने बडा सा सेतु बनाया, मगर उसके नीचे से ना तो जहाज गया और ऊपर ना ही सामान टिक सका. क्रिएटिव ग्रुप के सेतु के साथ भी यही बात हुई. ए-1 ग्रुप के सेतु के नीचे से जहाज तो नहीं गया, मगर उसके ऊपर सामान आ गया. जीवन वही एक सेतु है, जिसके नीचे से हमारे अपने अन्दर के लोगों की भी समाई हो और जिसे अपने ऊपर से बड़े से बड़ा असला भी रख सकने की कूव्वत हो. सहभागियों ने जीवन के इस तत्व को इतनी आसानी से समझा कि वे इस कथन के मर्म तक तुरंत पहुंच गए.
सहभागियों ने इस कार्यशाला के लिए नमित होने से लेकर कार्यशाला स्थल तक आने और यहां आकर उन्हें कैसा लगा और उन्होंने इससे क्या हासिल किया, पर अपने विचार दिए. ये विचार फिर कभी आपको अलग से दिए जाएंगे. ‘अवितोको’ सहभागियों को अपनी भाषा में बात करने देने के लिए स्वतंत्र रखता है. यहां भी सहभागियों ने हिन्दी, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी में अपनी बातें रखीं. सहभागियों का बारम्बार यही अनुरोध रहा कि आप यहां जल्दी जल्दी आएं, ताकि इस कार्यशाला की बातों को और गहराई से सीखा जा सके. और आगे सकारात्मक तरीके से सोचा, समझा और किया जा सके.
आप भी ‘अवितोको’ के इस अभियान से कला, थिएटर, साहित्य य अन्य किसी भी क्रिएटिव और सकारात्मक तरीके से जुडना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. आप हमें avitoko@rediffmail.com या gonujha.jha@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं

Saturday, May 3, 2008

१ मई को सलाम!

१ मई छाम्माक्छाल्लो के लिए बहुत मायने रखता है। विश्व मज़दूर दिवस और महाराष्ट्र दिवस के अलावे भी यह उसके लिए अहम् है। १ मई,2001 को ही उसने अपनी संस्था 'अवितोको' की आधार शिला रखी. आज अवितोको ७ साल का हो गया। अवितोको का जन्म उसके ३रे बच्चे कि तरह ही है। न कोई शोर- शराबा, न कोई आडम्बर, बस मन ही मन एक संकल्प लिया उअर अवितोको का काम शुरू हो गया। इसके बाद लगातार -काम और काम- सामान्य जन से लेकर विशेष वर्ग के लोगों तक, बच्चों से लेकर वृद्धाश्रम मी रह रहे तक। मानसिक रूप से बाधित बच्चों से लेकर जेल में रह रहे बंदियों और उनके बच्चों तक। कला, थिएटर, साहित्य, संस्कृति के माध्यम से। जेल के बच्चे कहते हैं, वे डाक्टर बनेगे, हीरों बनेगी। जेल के बंदी कविताओं के माध्यम से अपने मन की बातें कहते रहे। उनकी कवितायें, हंस, ज्ञानोदय, कादम्बिनी, वागार्थ आदि में प्रकाशित हुई। उनके बनाए चित्र केवल चित्र नहीं, उंकी अभिव्यक्ति के माध्यम रहे हैं। उनके द्वारा खेले गए नाटक में उनके जीवन की dhadakan रही है। उनकी कला kritiyaan अपने जीवन का सुंदर dastaavez हैं। अवितोको का जीवन दर्शन ही है- रंग जीवन, yaanii aart and थिएटर फार all। और ऐसे में ये sabhii sahabhaagii अपने काम से अवितोको के लिए एक naii cunautii लेकर आते रहे हैं। इसी की एक kadii मी नया जुदा है अवितोको के naatakon का pradarshaan। 'अए priye तेरे लिए' usaka pahala नाटक thaa और अभी doosaraa नाटक चल रहा hay- 'Life is not a Dream'। २००७ में finlainD में isakii pahalii प्रस्तुति के बाद mumbai में इसके manchan हुए और अब २९ aprail को इसे rayapur में खेला गया। aalekh v प्रस्तुति छाम्माक्छाल्लो की है और nirdeshak हैं shrii ar एस vikal। raaypur में lagabhag ७०० लोगों के saamane इसे manchit किया गया और sabhii ने एक स्वर से इसे saraha। यह न केवल chhammakachhallo के लिए, varan थिएटr जगत ke lie utsaah kii baat rahii. yah galat saabit huaa ki log thietar नही देखते या dekhana नही चाहते। achchhi chiizen हर कोई chaahataa है।
अवितोको अब अपने इस नए साल में फ़िर से तैयार है- कला, थिएटर varkshaap, नाटक के प्रदर्शन और जेल के बंदियों के लिए अलग-अलग karyakramon के साथ। isamein, उनके साथ srijanatmak kaaryakram के साथ- साथ उन्हें अपने जीवन koo नए svaroop में देखने के बारे में vichaar kiyaa jaaega। उनकी pratibhaaon को saamane लाने के liee karyakram हैं।
अवितोको हर वर्ग से judate हुए अनेक prashikShan karyakramon के साथ भी है। inamein हैं- "Time Management', Self Exploration', Know yourself Better', 'Guilt Management', राजभाषा Management Through self Management' etc.
छाम्माक्छाल्लो को इस बात का संतोष है कि आप sabakaa साथ और sahayog उसके साथ है। डर असल यह usakii अपनी nahiin, एक samaveta prayaas की yaatra है, padaav- डर- padaav तय कराने के silasile हैं।