१ मई छाम्माक्छाल्लो के लिए बहुत मायने रखता है। विश्व मज़दूर दिवस और महाराष्ट्र दिवस के अलावे भी यह उसके लिए अहम् है। १ मई,2001 को ही उसने अपनी संस्था 'अवितोको' की आधार शिला रखी. आज अवितोको ७ साल का हो गया। अवितोको का जन्म उसके ३रे बच्चे कि तरह ही है। न कोई शोर- शराबा, न कोई आडम्बर, बस मन ही मन एक संकल्प लिया उअर अवितोको का काम शुरू हो गया। इसके बाद लगातार -काम और काम- सामान्य जन से लेकर विशेष वर्ग के लोगों तक, बच्चों से लेकर वृद्धाश्रम मी रह रहे तक। मानसिक रूप से बाधित बच्चों से लेकर जेल में रह रहे बंदियों और उनके बच्चों तक। कला, थिएटर, साहित्य, संस्कृति के माध्यम से। जेल के बच्चे कहते हैं, वे डाक्टर बनेगे, हीरों बनेगी। जेल के बंदी कविताओं के माध्यम से अपने मन की बातें कहते रहे। उनकी कवितायें, हंस, ज्ञानोदय, कादम्बिनी, वागार्थ आदि में प्रकाशित हुई। उनके बनाए चित्र केवल चित्र नहीं, उंकी अभिव्यक्ति के माध्यम रहे हैं। उनके द्वारा खेले गए नाटक में उनके जीवन की dhadakan रही है। उनकी कला kritiyaan अपने जीवन का सुंदर dastaavez हैं। अवितोको का जीवन दर्शन ही है- रंग जीवन, yaanii aart and थिएटर फार all। और ऐसे में ये sabhii sahabhaagii अपने काम से अवितोको के लिए एक naii cunautii लेकर आते रहे हैं। इसी की एक kadii मी नया जुदा है अवितोको के naatakon का pradarshaan। 'अए priye तेरे लिए' usaka pahala नाटक thaa और अभी doosaraa नाटक चल रहा hay- 'Life is not a Dream'। २००७ में finlainD में isakii pahalii प्रस्तुति के बाद mumbai में इसके manchan हुए और अब २९ aprail को इसे rayapur में खेला गया। aalekh v प्रस्तुति छाम्माक्छाल्लो की है और nirdeshak हैं shrii ar एस vikal। raaypur में lagabhag ७०० लोगों के saamane इसे manchit किया गया और sabhii ने एक स्वर से इसे saraha। यह न केवल chhammakachhallo के लिए, varan थिएटr जगत ke lie utsaah kii baat rahii. yah galat saabit huaa ki log thietar नही देखते या dekhana नही चाहते। achchhi chiizen हर कोई chaahataa है।
अवितोको अब अपने इस नए साल में फ़िर से तैयार है- कला, थिएटर varkshaap, नाटक के प्रदर्शन और जेल के बंदियों के लिए अलग-अलग karyakramon के साथ। isamein, उनके साथ srijanatmak kaaryakram के साथ- साथ उन्हें अपने जीवन koo नए svaroop में देखने के बारे में vichaar kiyaa jaaega। उनकी pratibhaaon को saamane लाने के liee karyakram हैं।
अवितोको हर वर्ग से judate हुए अनेक prashikShan karyakramon के साथ भी है। inamein हैं- "Time Management', Self Exploration', Know yourself Better', 'Guilt Management', राजभाषा Management Through self Management' etc.
छाम्माक्छाल्लो को इस बात का संतोष है कि आप sabakaa साथ और sahayog उसके साथ है। डर असल यह usakii अपनी nahiin, एक samaveta prayaas की yaatra है, padaav- डर- padaav तय कराने के silasile हैं।
Tensions in life leap our peace. Chhammakchhallo gives a comic relief through its satire, stories, poems and other relevance. Leave your pain somewhere aside and be happy with me, via chhammakchhallokahis.
Saturday, May 3, 2008
Sunday, April 27, 2008
हम खुश हैं कि हमने लाहौर देखा
लाहौर। बचपन से ही मन में बसा एक नाम-बडा मजबूत सा-शायद लोहा से मिलता-जुलता होने के कारण, जैसे बचपन में कराची और रांची मेरे लिए एक ही जगह थी। मां ने जब बताया कि रांची हिन्दुस्तान में और कराची पाकिस्तान में है तो उस समय भी लगा कि इतने एक जैसे नाम दो देशों में क्यों? मोहन जोदाडो और हडप्पा सभ्यता और तक्षशिला के बारे में इतिहास में पढती तो रही, मगर तब यह नहीं समझ में आया था कि यह पाकिस्तान में है, जैसे बचपन में यह कभी समझ में नहीं आया कि टैगोर या बंकिम बांग्ला के लेखक हैं।
बहरहाल
पाकिस्तान देखने, घूमने की तमन्ना अन्य किसी भी देश जाने से ज्यादा थी। बिटिया के पढाई के सिलसिले में वहां जाने से यह इच्छा और बलवती हुई
लोगों की भवें और सिकुडीं -अच्छा। पाकिस्तान में पढाई भी होती है? वहां इंडिया से ज्यादा स्टडी इन्फ्रास्ट्रक्चर है? आज से बीस साल पहले चीन जाते समय भी भवें तनी थीं -और कोई देश नहीं मिला तुम्हें? पाकिस्तान से लौटने पर लोगों ने कहा -शुकर है, जिंदा लौट आई।
कितना कम और कितना गलत जानते हैं हम अपने ही पडोसी और एशियाई मुल्कों के बारे में। पश्चिमी मीडिया को धन्यवाद कि वह हमारे इन भ्रमों को, सन्देहों को बढाने में और भी मदद करता है। लाहौर यात्रा ने हमारे इन भ्रमों को तोडा। वीजा की औपचारिकता निभाने के बाद हम 4 अप्रैल को आखिरकार लाहौर पहुंच ही गए। जिस लाहौर नई देख्या, समझो जन्मयाई नहीं। हमने लाहौर देखा। देखने के बाद इस बात पर यकीन हुआ।
इतनी चौडी-चौडी सडकें-आठ भागों में बंटी-सर्विस रोड ग्रीन बेल्ट-नहर मुख्य सडक-यही दोनों तरफ। ड्राइविंग बाई तरफ की ही है साफ-सफाई के मामले में दिल्ली से भी आगे मुंबई की तो बात ही न की जाए। भीतरी सडकें भी यहां के बडे शहरों की मुख्य सडकों जितनी चौडी। रिहाइशी इमारतों का प्रचलन ही नहीं-शहर क्षैतिजाकार में फैला हुआ-लोगों के अपने-अपने घर-ज्यादा से ज्यादा दो मंजिल तक - घरों के क्षेत्रफल देखने के लिए केवल आंखें नहीं, गर्दन दायें से बांये घुमानी पडती। मुंबई की रिहाइशी इमारतों के बडे-बडे गेट जैसे इन घरों के गेट।
लाहौर कभी पुराना सांस्कृतिक बढ रहा-विभाजन ने इस गढ में भयानक सेंध लगाई और धीरे-धीरे कला की धरोहरें गायब होने लगीं-कभी यहां फिल्मों का गढ था-आज की पुरानी बडी-बडी हस्तियां, प्राण, देवानन्द वगैरह लाहौर से ही थे। भीष्म साहनी और बलराज साहनी यहां के गवर्नमेंट कॉलेज की देन थे। फैज अहमद फैज की बेटी और बीकन हाउस नैशनल यूनीवर्सिटी की डीन सलीमा हाशमी कहती हैं-मेरी बेटी हिंदी जानती है-भीष्म जी के बच्चों के साथ उसने हिन्दी सीखी और बाद में भीष्म जी की चीजें यहां की यूनीवर्सिटी से निकलवाने में बिटिया की हिन्दी बहुत काम आई।
विभाजन के बाद लोगों का इधर से उधर और उधर से इधर का विस्थापन हुआ-मंटो और नूरजहां जैसी हस्तियां उधर चली गई। सियासी मसलों ने एक-दूसरे के प्रति और ज्यादा जहर बोया, काटा, उगला। जानकार कहते हैं कि 1965 तक लाहौर में हिंदी ओर पाक की फिल्में आमने-सामने मुकाबले पे लगती थी। तब कई बार हिंदी फिल्में रोक देनी पडती थीं। 1965 के बाद हिंदी फिल्मों पर बैन लगा और इस्लाम और सियासतदानों के जानिब से फिल्में बनने की संख्या कम होती चली गई। तब ग्यारह स्टूडियो होते थे, जो आज घटकर दो-तीन रह गए हैं। इनमें भी टेलीविजन कार्यक्रमों के शूट होते हैं।
हम भी दिमाग में यह तसव्वर बनाकर चले थे कि लाहौर एक बन्द, घुटा-घुटा सा शहर होगा - गरीबों, मजलूमों से घिरा खातूनों के पर्दो से जकडा, मौलवियों, मुल्लाओं की टोपियों, दाढियों, चोगों से घिरा मगर ऐसा कुछ न था। यहां भी उसी वर्ग की औरतें बुर्का पहनती हैं, जिस वर्ग की अपने यहां। लडकियां जीन्स में, खुले सर इधर से उधर रंग-बिरंगे फूलों और तितलियों की तरह लहराती, बलखाती मिलीं। हां, स्कर्ट अलबत्ता नहीं दिखी और ना ही खुली पोशाक - तंग मोहरी की शलवार और उसके ऊपर कमीज और दुपट्टा दुपट्टा सर पर अपने-अपने पारिवारिक चलन के मुताबिक बीएनयू की गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन गजाला बताती हैं - हम जब इंडिया गए, तब हमने सोचा था, सबकुछ अलग होगा, पर हमारी लडकियों ने कहा - हाय अल्ला। यहां की भैंसें तक हमारी भैंसों जैसी ही है।
बाजार, दुकान, लोगों के आपसी हंसी-मजाक, शोहदे और मनचले सभी एक ही जैसे। हमें कभी नहीं लगा कि हम इनसे कुछ अलग हैं। हकीकत तो ये थी कि दिखना भी नहीं चाहते थे। पहले दिन बिन्दी लगाई, दसरे दिन से छोड दी। साडी हमारी राष्ट्रीय पोशाक है, वहां साडियां अब केवल किसी खास मौके पर पहनी जाती है-कमर, पीठ, पेट आदि के दिखने के कारण इसे बहुत अच्छा नहीं माना जाता मगर पसंद सभी को है।
पुरुषों की पोशाक कुर्ता-शलवार (पठान सूट) है और हर तबके के लोग इसे पहनते हैं - पैंट-शर्ट पढा-लिखा तबका ज्यादा पहनता है। पाकिस्तान उच्चायोग में तो यह वर्दी ही थी। एक डेलीगेशन वहां मिलने आया। पूरे ग्रुप ने कुर्ता, शलवार, जैकेट पहन रखा था।
लडकियां पढ रही हैं, मगर ख्वातीनों के अधिक काम करने का चलन कम है। शायद इसीलिए मुझसे किसी ने नहीं पूछा कि मैं क्या करती हूं? लेकिन तथाकथित ऐसे बन्द मुल्क में महिला ट्रैफिक पुलिस और होटल में वेट्रेसेस भी मिलीं। टेलीविजन पर अब खबरें पढनेवाली या एंकरिंग करनेवालियों के सरों पर चादरें नहीं होतीं।
पंजाब होने के कारण लहजा ठेठ पंजाबी है, मगर तलफ्फुज बिल्कुल साफ। मुल्क बनने के बाद उर्दू में तर्जुमा और आम जिन्दी में उनका इस्तेमाल बढा है-एक्सक्यूज मी की जगह बात सुनें और सिग्नल और रेड, यलो, ग्रीन लाइट के बदले इशारा। लाल, पीली और सब्ज बत्तियां, लेफ्ट और राइट के बदले उल्टे और सीधे हाथ कहने का प्रचलन है। बोलने से पहले अस्सलाम वालेकुम बोलना जिन्दगी का हिस्सा है, यहां तक कि फोन पर भी हैलो के बदले अस्सलाम वालेकुम।
मजहब और अल्लाह खून के कतरे की तरह समाया हुआ है - इंशाअल्लह, माशाअल्लाह, अल्लाह की मेहरबानी, अल्लाह का शुक्र वगैरह सहज तरीके से जबान में बस गए हैं। बोलनेवालों को अहसास भी नहीं होता कि वह इन अल्फाजों के इस्तेमाल कर रहा है। मैंने गौर किया कि यहां भी भगवान मालिक है, भगवान की दया से आदि खूब बोला जाता है। बस पढा-लिखा तबका और धर्म से तथाकथित परहेज रखनेवाले इसे नहीं बोलते।
मुल्कों की समानता में एक बडी समानता है - भिखारियों की और धार्मिक स्थलों पर तथाकथित लोगों द्वारा आपको घेर लेने की। हर मोड पर, बाजार में, होटलों के आस-पास-मसलन यहां की तरह वहां भी यह नजारा बेहद उदास करता है-भीख ही मांगनी थी तो अलग ही क्यों हुए? वाघा बॉर्डर पर यह सवाल बार-बार मन को मथता रहा-रोजाना की झंडा उतारने की 25 मिनट की परेड देखने लायक है। जबानों की आवाज से उडते परिन्दों को देखकर यह गीत याद आता रहा -
पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इसे रोके
सरहद इंसानों के लिए है, सोचो तुमने और हमने क्या पाया इंसां होके
परेड के दौरान दोनों ओर के हुजूम के जज्बात से लगे, कि काश-यह गेट हमेशा के लिए खुल जाता-दोनों ओर के लोग एक-दूसरे से मिल जाते, दूरियां खत्म हो जाती। वाघा पर ही हमें इंडियन नेटवर्क भी मिल गया। दिलों के नेटवर्क मिलें और 50 मिनट की हवाई यात्रा की दूरी और अमृतसर से लाहौर की 60 किलोमीटर की दूरी - सबकुछ नामालूम सी, मगर दो मुल्कों के कायदों-कानूनों में फंसकर इतना बडा मसला हो जाता है कि हिम्मत जवाब देने लगती है, यह खत्म हो जाए तो कितना अच्छा हो।
बहरहाल
पाकिस्तान देखने, घूमने की तमन्ना अन्य किसी भी देश जाने से ज्यादा थी। बिटिया के पढाई के सिलसिले में वहां जाने से यह इच्छा और बलवती हुई
लोगों की भवें और सिकुडीं -अच्छा। पाकिस्तान में पढाई भी होती है? वहां इंडिया से ज्यादा स्टडी इन्फ्रास्ट्रक्चर है? आज से बीस साल पहले चीन जाते समय भी भवें तनी थीं -और कोई देश नहीं मिला तुम्हें? पाकिस्तान से लौटने पर लोगों ने कहा -शुकर है, जिंदा लौट आई।
कितना कम और कितना गलत जानते हैं हम अपने ही पडोसी और एशियाई मुल्कों के बारे में। पश्चिमी मीडिया को धन्यवाद कि वह हमारे इन भ्रमों को, सन्देहों को बढाने में और भी मदद करता है। लाहौर यात्रा ने हमारे इन भ्रमों को तोडा। वीजा की औपचारिकता निभाने के बाद हम 4 अप्रैल को आखिरकार लाहौर पहुंच ही गए। जिस लाहौर नई देख्या, समझो जन्मयाई नहीं। हमने लाहौर देखा। देखने के बाद इस बात पर यकीन हुआ।
इतनी चौडी-चौडी सडकें-आठ भागों में बंटी-सर्विस रोड ग्रीन बेल्ट-नहर मुख्य सडक-यही दोनों तरफ। ड्राइविंग बाई तरफ की ही है साफ-सफाई के मामले में दिल्ली से भी आगे मुंबई की तो बात ही न की जाए। भीतरी सडकें भी यहां के बडे शहरों की मुख्य सडकों जितनी चौडी। रिहाइशी इमारतों का प्रचलन ही नहीं-शहर क्षैतिजाकार में फैला हुआ-लोगों के अपने-अपने घर-ज्यादा से ज्यादा दो मंजिल तक - घरों के क्षेत्रफल देखने के लिए केवल आंखें नहीं, गर्दन दायें से बांये घुमानी पडती। मुंबई की रिहाइशी इमारतों के बडे-बडे गेट जैसे इन घरों के गेट।
लाहौर कभी पुराना सांस्कृतिक बढ रहा-विभाजन ने इस गढ में भयानक सेंध लगाई और धीरे-धीरे कला की धरोहरें गायब होने लगीं-कभी यहां फिल्मों का गढ था-आज की पुरानी बडी-बडी हस्तियां, प्राण, देवानन्द वगैरह लाहौर से ही थे। भीष्म साहनी और बलराज साहनी यहां के गवर्नमेंट कॉलेज की देन थे। फैज अहमद फैज की बेटी और बीकन हाउस नैशनल यूनीवर्सिटी की डीन सलीमा हाशमी कहती हैं-मेरी बेटी हिंदी जानती है-भीष्म जी के बच्चों के साथ उसने हिन्दी सीखी और बाद में भीष्म जी की चीजें यहां की यूनीवर्सिटी से निकलवाने में बिटिया की हिन्दी बहुत काम आई।
विभाजन के बाद लोगों का इधर से उधर और उधर से इधर का विस्थापन हुआ-मंटो और नूरजहां जैसी हस्तियां उधर चली गई। सियासी मसलों ने एक-दूसरे के प्रति और ज्यादा जहर बोया, काटा, उगला। जानकार कहते हैं कि 1965 तक लाहौर में हिंदी ओर पाक की फिल्में आमने-सामने मुकाबले पे लगती थी। तब कई बार हिंदी फिल्में रोक देनी पडती थीं। 1965 के बाद हिंदी फिल्मों पर बैन लगा और इस्लाम और सियासतदानों के जानिब से फिल्में बनने की संख्या कम होती चली गई। तब ग्यारह स्टूडियो होते थे, जो आज घटकर दो-तीन रह गए हैं। इनमें भी टेलीविजन कार्यक्रमों के शूट होते हैं।
हम भी दिमाग में यह तसव्वर बनाकर चले थे कि लाहौर एक बन्द, घुटा-घुटा सा शहर होगा - गरीबों, मजलूमों से घिरा खातूनों के पर्दो से जकडा, मौलवियों, मुल्लाओं की टोपियों, दाढियों, चोगों से घिरा मगर ऐसा कुछ न था। यहां भी उसी वर्ग की औरतें बुर्का पहनती हैं, जिस वर्ग की अपने यहां। लडकियां जीन्स में, खुले सर इधर से उधर रंग-बिरंगे फूलों और तितलियों की तरह लहराती, बलखाती मिलीं। हां, स्कर्ट अलबत्ता नहीं दिखी और ना ही खुली पोशाक - तंग मोहरी की शलवार और उसके ऊपर कमीज और दुपट्टा दुपट्टा सर पर अपने-अपने पारिवारिक चलन के मुताबिक बीएनयू की गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन गजाला बताती हैं - हम जब इंडिया गए, तब हमने सोचा था, सबकुछ अलग होगा, पर हमारी लडकियों ने कहा - हाय अल्ला। यहां की भैंसें तक हमारी भैंसों जैसी ही है।
बाजार, दुकान, लोगों के आपसी हंसी-मजाक, शोहदे और मनचले सभी एक ही जैसे। हमें कभी नहीं लगा कि हम इनसे कुछ अलग हैं। हकीकत तो ये थी कि दिखना भी नहीं चाहते थे। पहले दिन बिन्दी लगाई, दसरे दिन से छोड दी। साडी हमारी राष्ट्रीय पोशाक है, वहां साडियां अब केवल किसी खास मौके पर पहनी जाती है-कमर, पीठ, पेट आदि के दिखने के कारण इसे बहुत अच्छा नहीं माना जाता मगर पसंद सभी को है।
पुरुषों की पोशाक कुर्ता-शलवार (पठान सूट) है और हर तबके के लोग इसे पहनते हैं - पैंट-शर्ट पढा-लिखा तबका ज्यादा पहनता है। पाकिस्तान उच्चायोग में तो यह वर्दी ही थी। एक डेलीगेशन वहां मिलने आया। पूरे ग्रुप ने कुर्ता, शलवार, जैकेट पहन रखा था।
लडकियां पढ रही हैं, मगर ख्वातीनों के अधिक काम करने का चलन कम है। शायद इसीलिए मुझसे किसी ने नहीं पूछा कि मैं क्या करती हूं? लेकिन तथाकथित ऐसे बन्द मुल्क में महिला ट्रैफिक पुलिस और होटल में वेट्रेसेस भी मिलीं। टेलीविजन पर अब खबरें पढनेवाली या एंकरिंग करनेवालियों के सरों पर चादरें नहीं होतीं।
पंजाब होने के कारण लहजा ठेठ पंजाबी है, मगर तलफ्फुज बिल्कुल साफ। मुल्क बनने के बाद उर्दू में तर्जुमा और आम जिन्दी में उनका इस्तेमाल बढा है-एक्सक्यूज मी की जगह बात सुनें और सिग्नल और रेड, यलो, ग्रीन लाइट के बदले इशारा। लाल, पीली और सब्ज बत्तियां, लेफ्ट और राइट के बदले उल्टे और सीधे हाथ कहने का प्रचलन है। बोलने से पहले अस्सलाम वालेकुम बोलना जिन्दगी का हिस्सा है, यहां तक कि फोन पर भी हैलो के बदले अस्सलाम वालेकुम।
मजहब और अल्लाह खून के कतरे की तरह समाया हुआ है - इंशाअल्लह, माशाअल्लाह, अल्लाह की मेहरबानी, अल्लाह का शुक्र वगैरह सहज तरीके से जबान में बस गए हैं। बोलनेवालों को अहसास भी नहीं होता कि वह इन अल्फाजों के इस्तेमाल कर रहा है। मैंने गौर किया कि यहां भी भगवान मालिक है, भगवान की दया से आदि खूब बोला जाता है। बस पढा-लिखा तबका और धर्म से तथाकथित परहेज रखनेवाले इसे नहीं बोलते।
मुल्कों की समानता में एक बडी समानता है - भिखारियों की और धार्मिक स्थलों पर तथाकथित लोगों द्वारा आपको घेर लेने की। हर मोड पर, बाजार में, होटलों के आस-पास-मसलन यहां की तरह वहां भी यह नजारा बेहद उदास करता है-भीख ही मांगनी थी तो अलग ही क्यों हुए? वाघा बॉर्डर पर यह सवाल बार-बार मन को मथता रहा-रोजाना की झंडा उतारने की 25 मिनट की परेड देखने लायक है। जबानों की आवाज से उडते परिन्दों को देखकर यह गीत याद आता रहा -
पंछी, नदिया, पवन के झोंके, कोई सरहद ना इसे रोके
सरहद इंसानों के लिए है, सोचो तुमने और हमने क्या पाया इंसां होके
परेड के दौरान दोनों ओर के हुजूम के जज्बात से लगे, कि काश-यह गेट हमेशा के लिए खुल जाता-दोनों ओर के लोग एक-दूसरे से मिल जाते, दूरियां खत्म हो जाती। वाघा पर ही हमें इंडियन नेटवर्क भी मिल गया। दिलों के नेटवर्क मिलें और 50 मिनट की हवाई यात्रा की दूरी और अमृतसर से लाहौर की 60 किलोमीटर की दूरी - सबकुछ नामालूम सी, मगर दो मुल्कों के कायदों-कानूनों में फंसकर इतना बडा मसला हो जाता है कि हिम्मत जवाब देने लगती है, यह खत्म हो जाए तो कितना अच्छा हो।
Tuesday, April 1, 2008
घोडे का क्या हुआ????
छाम्माक्छाल्लो आज इसी बस में दफ्तरअमूमन वह सामान्य बस में आती है। लोकल ट्रेन में भी उसने एक बार दो साल तक १स्त् क्लास में सफर किया था। अपने अनुभव के आधार पर वह कह सकती है कि दिल और दिलवाले मिलते हैं तो बस आम जन के बीच ही। ये तमाम पैसे वाले दिल और भावनाएं क्या जानें, क्या समझें? अगर उअनामें से कोई समझ ले तो समझिए कि आप ने आज सचमुच कोई अच्छा काम किया होगा। पैसे का रुतबा उनके से आगे दस कदम होता है और आगे आगे जा जा कर बोलता है।
इसी बस में लगभग तिगुना किराया लगता है। स्फिर भी सुविधाजनक है। मगर इस सुविधा को भोगते हुए लोगों के उपर एक दंभ, एक अंहकार रहता है, वह देखते ही बनता है। १स्त् क्लास में भी यात्रा करते समय दिल की बेदर्दी बारे करीब से देखी और अचानक एक दिन एहसास हुआ कि छाम्माक्छाल्लो में भी उसके कीटाणु आने लगे हैं तो उसने एक झटके में १स्त् क्लास से जाना चूद दिया।
आज इसी बस में बैठी। क्योंकि देर हो रही थी। पीछे से बस कब आती, पाता नही था। सो...
मेरे बगल में एक युवक बैठा। परेशान सा। पहले तो उसने अपने बैग में से खाने का डब्बा निकाला। बिचारे को इतनी भी फुरसत नही मिल पईई थी कि घर में चार कौर पेट में कुछ दल्ला ले। औरतों के साथ तियो यह महत मामूली, रोजाना का किसा सा है। खैर! पेपर पढ़ते हुए और नसता करते हुए के बीच में एक फोन आया। उसके किसी परिचित का एक्सीडेंट हो गया था। बातचीत से लगा कि दुर्घटनाग्रस्त आदमी या तो साईस था या रेस कोर्स का जॉकी या घोडे की शौकिया सवारी करता होगा। वह घोडे से गिर पडा। काफी चोट आई थी, अंदरूनी। पता नहीं, क्या हो, ऎसी आशंका आई। अफसोस के च च च भी निकले। फ़िर तपाक से पूछा, " उसका तो जो होना था, सो तो हुआ, पर तुम ये तो बताओ कि घोडे को कहीं ज़्यादा लगी तो नहीं?" छाम्माक्छाल्लो का मन किया कि तपाक से पशु प्रेमी संस्थान को फोन करे और बता दे कि देखिए, कितना ख्याल है उसे घोडे का।" आपो भी लगता हो तो बताएं॥ इंसान बहुत सस्ता है, एक मांगो, कई मिल जायेंगे। पर ghoDa, पाता है कितना मंहगा है? लाखों लाख रुपये का एक मिलता है। उसे सहेजना, उसकी देख भाल कितना मुश्किल है? और ऐसे में उसे कुछ हो जाए तो ? " आदमी की चिंता वाजिब थी।
इसी बस में लगभग तिगुना किराया लगता है। स्फिर भी सुविधाजनक है। मगर इस सुविधा को भोगते हुए लोगों के उपर एक दंभ, एक अंहकार रहता है, वह देखते ही बनता है। १स्त् क्लास में भी यात्रा करते समय दिल की बेदर्दी बारे करीब से देखी और अचानक एक दिन एहसास हुआ कि छाम्माक्छाल्लो में भी उसके कीटाणु आने लगे हैं तो उसने एक झटके में १स्त् क्लास से जाना चूद दिया।
आज इसी बस में बैठी। क्योंकि देर हो रही थी। पीछे से बस कब आती, पाता नही था। सो...
मेरे बगल में एक युवक बैठा। परेशान सा। पहले तो उसने अपने बैग में से खाने का डब्बा निकाला। बिचारे को इतनी भी फुरसत नही मिल पईई थी कि घर में चार कौर पेट में कुछ दल्ला ले। औरतों के साथ तियो यह महत मामूली, रोजाना का किसा सा है। खैर! पेपर पढ़ते हुए और नसता करते हुए के बीच में एक फोन आया। उसके किसी परिचित का एक्सीडेंट हो गया था। बातचीत से लगा कि दुर्घटनाग्रस्त आदमी या तो साईस था या रेस कोर्स का जॉकी या घोडे की शौकिया सवारी करता होगा। वह घोडे से गिर पडा। काफी चोट आई थी, अंदरूनी। पता नहीं, क्या हो, ऎसी आशंका आई। अफसोस के च च च भी निकले। फ़िर तपाक से पूछा, " उसका तो जो होना था, सो तो हुआ, पर तुम ये तो बताओ कि घोडे को कहीं ज़्यादा लगी तो नहीं?" छाम्माक्छाल्लो का मन किया कि तपाक से पशु प्रेमी संस्थान को फोन करे और बता दे कि देखिए, कितना ख्याल है उसे घोडे का।" आपो भी लगता हो तो बताएं॥ इंसान बहुत सस्ता है, एक मांगो, कई मिल जायेंगे। पर ghoDa, पाता है कितना मंहगा है? लाखों लाख रुपये का एक मिलता है। उसे सहेजना, उसकी देख भाल कितना मुश्किल है? और ऐसे में उसे कुछ हो जाए तो ? " आदमी की चिंता वाजिब थी।
Friday, March 21, 2008
होली तो हो, पर ऎसी नहीं.
अभी मेरे घर के सामने होलिका- दहन की तैयारी चल रही है। मुंबई में शाम में ही होलिका दहन होता है, स्त्री -पुरूष, बच्चे सभी अग्नि कुंड की पूजा करते है, अबीर, और प्रसाद अर्पित करते हैं और कामना करते हैं कि बस ऐसे ही जीवन रंगमय बना रहे।
याद आती है अपने यहाँ की एक होली, सन् १९६७ की। मेरी बहन की शादी के बाद पहली होली थी॥ हम सभी तो बेहद छोटे थे, मगर जीजा जी शब्द की गुदगुदी से वाकिफ थे। जीजाजी आए हुए थे। हम सबकी उन्हें रंग में भिगोने, डुबोने की अपनी योजनाथी।
शाम में होलिका- दहन, जिसे सम्मत जलाना कहते हैं के लिए मोहल्ले के लडके लकडियाँ मांगने आए। दादी ने दो तीन गोड़हे (गोबर से बने लंबे आकार के उपले) दिए। लड़कों ने और माँगा। दादी ने दो-तीन और दिए। लडके 'और दो' पर अडे हुए थे, क्योंकि तब हमारे यहाँ गाय थी, और दादी उसके गोबर से उपले बनाती थीं। फ़िर से एक- दो देने के बावजूद वे नहीं माने। दादी ने अब और देने से मना कर दिया।
हमारी तरफ़ आधी रात में सम्मत जलाई जाती है। लड़कियों- स्त्रियों के लिए सम्मत जलना देखना वर्जित है। कारण? बहुत सी बातों की तरह इसका भी पता नहीं। कलकी होली की तैयारी करके और जीजाजी को कैसे तंग किया जाए, इन सबकी योजना बनाकर हम सो गए।
हमारे यहाँ काम करने चनिया दाई आती थी, मुंह अंधेरे ही। माँ ने दरवाजा खोल दिया और सो गई। पल भर भी न बीता होगा कि चनिया दाई की बडबड सुनाई दी-" आयें ये चाची, पिछुती (पिछवाडे का) दरवाजा आज बंद करना भूल गई थीं क्या?" माँ हदबदाकर उठीं - "भाई को बोला था, शायद भूल गया हो।" पर तबतक तो सुबह का उजाला भी होने लगा था और माजरा सारा साफ-साफ दिखाई देने लगा था। सम्मत जलानेवाले ने दादी के गोड़हे न देने का बदला चुकाया। पिछवाडे का दरवाजा, दोनों शौचालय के दरवाजे, गाय के घर को गिराने से बचाने के लिए टेक लगाई गई सीढ़ी, और भी जलावन के सामान, लकडी के टुकडे -सब सम्मत की भेंट चढ़ा आए थे।
होली की उमंग को तो पाला मार ही गया, सबसे अधिक शर्मिंदगी उठानी पडी माँ-बाबुजी को जीजाजी के सामने। वे क्या कहेंगे कि कैसे सब चोर हैं? उससे भी ज़्यादा, अब सुबह की दैनिक क्रिया से कैसे निवृत्त हुआ जाए? ओह! आज भी माँ-बाउजी का वो चेहरा नहीं भूलता। हम लोग तो बच्चे थे, जीजाजी भी एकदम नए दामाद थे, सो होली तो हुई, मगर जो ज़ख्म लगा, वह आज तक नहीं भरा।
याद आती है अपने यहाँ की एक होली, सन् १९६७ की। मेरी बहन की शादी के बाद पहली होली थी॥ हम सभी तो बेहद छोटे थे, मगर जीजा जी शब्द की गुदगुदी से वाकिफ थे। जीजाजी आए हुए थे। हम सबकी उन्हें रंग में भिगोने, डुबोने की अपनी योजनाथी।
शाम में होलिका- दहन, जिसे सम्मत जलाना कहते हैं के लिए मोहल्ले के लडके लकडियाँ मांगने आए। दादी ने दो तीन गोड़हे (गोबर से बने लंबे आकार के उपले) दिए। लड़कों ने और माँगा। दादी ने दो-तीन और दिए। लडके 'और दो' पर अडे हुए थे, क्योंकि तब हमारे यहाँ गाय थी, और दादी उसके गोबर से उपले बनाती थीं। फ़िर से एक- दो देने के बावजूद वे नहीं माने। दादी ने अब और देने से मना कर दिया।
हमारी तरफ़ आधी रात में सम्मत जलाई जाती है। लड़कियों- स्त्रियों के लिए सम्मत जलना देखना वर्जित है। कारण? बहुत सी बातों की तरह इसका भी पता नहीं। कलकी होली की तैयारी करके और जीजाजी को कैसे तंग किया जाए, इन सबकी योजना बनाकर हम सो गए।
हमारे यहाँ काम करने चनिया दाई आती थी, मुंह अंधेरे ही। माँ ने दरवाजा खोल दिया और सो गई। पल भर भी न बीता होगा कि चनिया दाई की बडबड सुनाई दी-" आयें ये चाची, पिछुती (पिछवाडे का) दरवाजा आज बंद करना भूल गई थीं क्या?" माँ हदबदाकर उठीं - "भाई को बोला था, शायद भूल गया हो।" पर तबतक तो सुबह का उजाला भी होने लगा था और माजरा सारा साफ-साफ दिखाई देने लगा था। सम्मत जलानेवाले ने दादी के गोड़हे न देने का बदला चुकाया। पिछवाडे का दरवाजा, दोनों शौचालय के दरवाजे, गाय के घर को गिराने से बचाने के लिए टेक लगाई गई सीढ़ी, और भी जलावन के सामान, लकडी के टुकडे -सब सम्मत की भेंट चढ़ा आए थे।
होली की उमंग को तो पाला मार ही गया, सबसे अधिक शर्मिंदगी उठानी पडी माँ-बाबुजी को जीजाजी के सामने। वे क्या कहेंगे कि कैसे सब चोर हैं? उससे भी ज़्यादा, अब सुबह की दैनिक क्रिया से कैसे निवृत्त हुआ जाए? ओह! आज भी माँ-बाउजी का वो चेहरा नहीं भूलता। हम लोग तो बच्चे थे, जीजाजी भी एकदम नए दामाद थे, सो होली तो हुई, मगर जो ज़ख्म लगा, वह आज तक नहीं भरा।
Wednesday, March 19, 2008
अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान?
आज भोपाल में हूँ। जब कभी यहं आती हूँ, अच्छा लगता है। अच्छे लोग, कला- संकृति की आब अब भी बची हुई दिखती है। कहीं भी आइये, कहीं ना कहीं, कुछ न कुछ आपकू दिख ही जायेगा। अभी यहाँ आदि रंग मेला लगा हुआ है। आदिवासियों की भूली- बिसरी प्रजातियों उनकी कला को सामने लानेका एउद्देस्ति से लगाया गया है यह मेला। वास्तव में कैसा है, यह तो देखने पर ही पाता चलेगा।
यह शहर धड़कना जानता है। मैं यहाँ की नहीं हूँ, फ़िर भी यहाँ आना अच्छा लगता है। हरी भटनागर, राजेश जोशी, कमला प्रसाद जी हैं। बारे अपनापे से मिलते हैं। सत्येन कुमार भी थे। बड़ी ही सौहार्द्र पूर्ण मुलाक़ात रही थी उनसे।
ये तो बुद्धिजीवी लोग हैं। यहाँ के लोग भी अपनी बातों में अदब का पुट भरने में पीछे नहीं रहते। बात काफी पुरानी है, शायद १५-१६ साल पुरानी। हमें भोपाल से इंदौर के लिए जाना था। हम पुराने भोपाल पहुंचे, जहाँ बड़ी मस्जिद या जमा मस्जिद के पास से टैक्सी मिलती थी, इंदौर जाने के लिए। हमने टैक्सी ली। मेरे सहयोगी ने मेराजानकारी में इजाफा करते हुए कहा कि यह यहाँ कि बड़ी मशहूर मस्जिद है। मुझे यह मस्जिद देख कर निदा फाज़ली का एक शेर याद आ गया। मैंने कहा-
"बच्चा बोला देख कर, मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान? "
टैक्सी ड्राइवर चचाजान शायद रफीक भाई थे या अशरफ भाई, (नाम याद नहीं आ रहा। बुजुर्ग। उन्होंने कहा, "मैडम, उन शायर जनाब को यह कहना चाहिए इस लाइन को तरमीम कर के-
"अल्ला तेरे एक को इतने सारे मकान?"
बात में दम था। मैंने उन्हें कहा, मैं आपकी यह तरमीम निदा साब तक ज़रूर पहुंचा दूंगी।"
और मुम्बई पहुँच कर मैंने निदा साब को फोन किया, सारा वाक़या सुनाया।
आज भी इतने सारे मन्दिर मस्जिद देखकर टैक्सी ड्राइवर चचाजान की बात याद आती है। भोपाल पहुँच कर तो याद आती ही आती है। यह भी कि हम एक दस बाई दस के कमरे के लिए तरसते हैं, और एक इस अनाम, अन्नं देह धरी के लिए इतने सारे इन्तजामात? खुदा खैर करे, ईश्वर, यदि आप कहीं हैं तो अपने साथ साथ सबका भला करे। मजाक में भी 'भाला' नहीं।
यह शहर धड़कना जानता है। मैं यहाँ की नहीं हूँ, फ़िर भी यहाँ आना अच्छा लगता है। हरी भटनागर, राजेश जोशी, कमला प्रसाद जी हैं। बारे अपनापे से मिलते हैं। सत्येन कुमार भी थे। बड़ी ही सौहार्द्र पूर्ण मुलाक़ात रही थी उनसे।
ये तो बुद्धिजीवी लोग हैं। यहाँ के लोग भी अपनी बातों में अदब का पुट भरने में पीछे नहीं रहते। बात काफी पुरानी है, शायद १५-१६ साल पुरानी। हमें भोपाल से इंदौर के लिए जाना था। हम पुराने भोपाल पहुंचे, जहाँ बड़ी मस्जिद या जमा मस्जिद के पास से टैक्सी मिलती थी, इंदौर जाने के लिए। हमने टैक्सी ली। मेरे सहयोगी ने मेराजानकारी में इजाफा करते हुए कहा कि यह यहाँ कि बड़ी मशहूर मस्जिद है। मुझे यह मस्जिद देख कर निदा फाज़ली का एक शेर याद आ गया। मैंने कहा-
"बच्चा बोला देख कर, मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान? "
टैक्सी ड्राइवर चचाजान शायद रफीक भाई थे या अशरफ भाई, (नाम याद नहीं आ रहा। बुजुर्ग। उन्होंने कहा, "मैडम, उन शायर जनाब को यह कहना चाहिए इस लाइन को तरमीम कर के-
"अल्ला तेरे एक को इतने सारे मकान?"
बात में दम था। मैंने उन्हें कहा, मैं आपकी यह तरमीम निदा साब तक ज़रूर पहुंचा दूंगी।"
और मुम्बई पहुँच कर मैंने निदा साब को फोन किया, सारा वाक़या सुनाया।
आज भी इतने सारे मन्दिर मस्जिद देखकर टैक्सी ड्राइवर चचाजान की बात याद आती है। भोपाल पहुँच कर तो याद आती ही आती है। यह भी कि हम एक दस बाई दस के कमरे के लिए तरसते हैं, और एक इस अनाम, अन्नं देह धरी के लिए इतने सारे इन्तजामात? खुदा खैर करे, ईश्वर, यदि आप कहीं हैं तो अपने साथ साथ सबका भला करे। मजाक में भी 'भाला' नहीं।
Tuesday, March 18, 2008
मुट्ठी भर खुला आसमान
शनिवार था। अचानक फ़िल्म देखने का मूड बना, बराए सुझाव अजय- रोमानियन फ़िल्म- 'फोर मंथ्स , थ्री वीक, टु डेज।' १९८७ का पीरियड। तब गर्भपात अवैध था। इसके लिए क्या-क्या दिक्कतें आती हैं। उफ़! देखने योग्य फ़िल्म। हालांकि इसे फिल्मकार ने दोस्ती की अद्भुत मिसाल का रूप दिया है। यह भी है। ज़रूर देखें।
टिकट लेने जब विंडो खोज रही थी, तब अपने आगे अपनी ही उम्र की एक महिला को भागते देखा। पाता चला, वह भी इसी फ़िल्म के लिए आई है, अखबारों में रिव्यू पढ़कर। अकेली। वह भी, मैं भी। ऐसे में दुकेले हो जाना हम दोनों को अच्छा लगा। उसने एक और मरित्थी फ़िल्म की कहानी बताई। कहानी सुनकर लगा कि यह तो नाटक का विषय लगता है। आकर पढा तो सचमुच नाटक पर आधारित फ़िल्म। अश्विनी भावेकर अच्छी और संवेदनशील कलाकार है। हिन्दी में उसका उपयोग सही तरीके से नही हो सका।
मुझे उस महिला कि एक बात अच्छी लगी- "अब हमें संग साथ की कामना छोड़ देनी चाहिए। अकेले निकालो, एन्जॉय करो। '
सचमुच, महिलाएं अभी तक संग साथ की ही कामना में रह जाती हैं और अपने हिस्से के आसमान का छोटा सा टुकडा जो होता है, उसे भी खो बैठती हैं। शुक्रिया स्मृति, इस बात की स्मृति के लिए!
टिकट लेने जब विंडो खोज रही थी, तब अपने आगे अपनी ही उम्र की एक महिला को भागते देखा। पाता चला, वह भी इसी फ़िल्म के लिए आई है, अखबारों में रिव्यू पढ़कर। अकेली। वह भी, मैं भी। ऐसे में दुकेले हो जाना हम दोनों को अच्छा लगा। उसने एक और मरित्थी फ़िल्म की कहानी बताई। कहानी सुनकर लगा कि यह तो नाटक का विषय लगता है। आकर पढा तो सचमुच नाटक पर आधारित फ़िल्म। अश्विनी भावेकर अच्छी और संवेदनशील कलाकार है। हिन्दी में उसका उपयोग सही तरीके से नही हो सका।
मुझे उस महिला कि एक बात अच्छी लगी- "अब हमें संग साथ की कामना छोड़ देनी चाहिए। अकेले निकालो, एन्जॉय करो। '
सचमुच, महिलाएं अभी तक संग साथ की ही कामना में रह जाती हैं और अपने हिस्से के आसमान का छोटा सा टुकडा जो होता है, उसे भी खो बैठती हैं। शुक्रिया स्मृति, इस बात की स्मृति के लिए!
Sunday, March 16, 2008
इस जिजीविषा को सलाम!
एक समय था, जब साठ की उम्र तक पहुँचने पर इंसान बूढ़ा मान लिया जाता था। शुक्र है लोगों की सोच का, अब इसमें तब्दीली आई है, आ रही है। अब हमारे सामने aपाने ही आस-पास के ७०-८० साल व इससे ज़्यादा की उम्र के लोग हैं, जो न केवल दिल से जवान हैं, बल्कि अपने को इस कदर सक्रीय बनाए रहते हैं, जैसे उम्र का कोई मसला है ही नहीं। वर्ल्ड आइकन के रूप में देवानंद, एम् ऍफ़ हुसैन, आबिद सुरती, ऐ के हंगल, सितारा देवी, पं बिरजू महाराज, पं रवि शंकर आदि हैं, तो अपने आस-पास देखिए, आपको बहुत सारे मिल जाएंग।
बाउजी, यानी छाम्माक्छाल्लोके ससुर हैं, सुखदेव नारायण। उनका भी ब्लाग है- sukhdeosahitya.blogspot.कॉम। ८७ साल के हो गए हैं, मगर लिखने की ललक से लबरेज़ है, और इस एक प्रेरणा से वे इतने स्वत: स्फूर्त बने रहते हैं कि देख कर जी को बहुत सुकून महसूस होता है। अभी अभी उनकी एक और किताब का पटना में विमोचन हुआ। इससे मिले प्रतिसाद से खूब उत्साहित हैं। अम्मा भी लगभग ८० की हैं, मगर अभी भी घर के सारे काम कर लेती हैं, अपने समकालीनों से अलग इनकी सक्रियता, सोच जीवन को एक नया आयाम देती है।
एक और मोहतरमा हैं- शबनम जी। ७५-८० के आस-पास की। ठेठ रूढिवादी बंगाली परिवार की थीं। शादी के बाद अपने प्रयासों से उर्दू- हिन्दी सीखी, शायरी सीखी। अपने युवा संघर्षमय समय में ये शायरी उनके मानसिक, आर्थिक संबल बने। इसले अलावी स्कूल टीचर रहीं। भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखा है। अब सेवा निवृत्ति के बाद भी काम करने की ललक नहीं गई है। छाम्माक्छाल्लो से कहने लगीं कि हालांकि बच्चे सभी अपनी अपनी जगह सेटल हैं, और बहुत अच्छे से सेटल हैं, इतनकी आप भी चौंक जाएं। मगर उनका आग्रह है की अब्च्चूं के बारे में बताकर उन पर अतिरिक्त बोझ न डाला जे की बच्ची जब ऐसे हैं तो इन्हें काम करने की क्या ज़रूरत है? अति प्रसिद्ध बच्चे हों या माँ-बाप, माँ-बाप या बच्चे नहीं चाहते की उन्हें उनके रिश्तेदारों के नाम के कारण जाना जाए। इससे उनका अपना व्यक्तित्व चला जाता है। नसीरूद्दीन शाह के बेटे ने अपना एक प्रोग्राम देते हुए अपना कोई भी परिचय देने दिलाने से मना कर दिया था। अच्छा लगा था उसका यह आत्म विश्वास की टैब वह केवल नसीर और रत्ना के बेटे के रूप में ही देखा जान लगता। उसकी कला उनके व्यक्तित्व के आगे ढँक जाती। शबनम जी भी उन पर बोझ नहीं बनाना चाहतीं और काम करते रहना चाहती हैं। छाम्माक्छाल्लो आज जब लोगों को 60साल के बाद सेवा निवृत्त होते देखती हैं तो हैरत में पड़ जाती है, क्योंकि वह व्यक्ति किसी भी कोने से 60का नहीं दीखता या दिखतीं।
अपने प्रति इनके विश्वास, खान-पान पर ध्यान, कुछ करते रहने, सक्रीय बने रहने की ललक, और उम्र और उसकी सीमा को धता बताती ये शख्सियतें - वल्लाह! कौन ना कुर्बान जाए इन सब पर।
बाउजी, यानी छाम्माक्छाल्लोके ससुर हैं, सुखदेव नारायण। उनका भी ब्लाग है- sukhdeosahitya.blogspot.कॉम। ८७ साल के हो गए हैं, मगर लिखने की ललक से लबरेज़ है, और इस एक प्रेरणा से वे इतने स्वत: स्फूर्त बने रहते हैं कि देख कर जी को बहुत सुकून महसूस होता है। अभी अभी उनकी एक और किताब का पटना में विमोचन हुआ। इससे मिले प्रतिसाद से खूब उत्साहित हैं। अम्मा भी लगभग ८० की हैं, मगर अभी भी घर के सारे काम कर लेती हैं, अपने समकालीनों से अलग इनकी सक्रियता, सोच जीवन को एक नया आयाम देती है।
एक और मोहतरमा हैं- शबनम जी। ७५-८० के आस-पास की। ठेठ रूढिवादी बंगाली परिवार की थीं। शादी के बाद अपने प्रयासों से उर्दू- हिन्दी सीखी, शायरी सीखी। अपने युवा संघर्षमय समय में ये शायरी उनके मानसिक, आर्थिक संबल बने। इसले अलावी स्कूल टीचर रहीं। भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखा है। अब सेवा निवृत्ति के बाद भी काम करने की ललक नहीं गई है। छाम्माक्छाल्लो से कहने लगीं कि हालांकि बच्चे सभी अपनी अपनी जगह सेटल हैं, और बहुत अच्छे से सेटल हैं, इतनकी आप भी चौंक जाएं। मगर उनका आग्रह है की अब्च्चूं के बारे में बताकर उन पर अतिरिक्त बोझ न डाला जे की बच्ची जब ऐसे हैं तो इन्हें काम करने की क्या ज़रूरत है? अति प्रसिद्ध बच्चे हों या माँ-बाप, माँ-बाप या बच्चे नहीं चाहते की उन्हें उनके रिश्तेदारों के नाम के कारण जाना जाए। इससे उनका अपना व्यक्तित्व चला जाता है। नसीरूद्दीन शाह के बेटे ने अपना एक प्रोग्राम देते हुए अपना कोई भी परिचय देने दिलाने से मना कर दिया था। अच्छा लगा था उसका यह आत्म विश्वास की टैब वह केवल नसीर और रत्ना के बेटे के रूप में ही देखा जान लगता। उसकी कला उनके व्यक्तित्व के आगे ढँक जाती। शबनम जी भी उन पर बोझ नहीं बनाना चाहतीं और काम करते रहना चाहती हैं। छाम्माक्छाल्लो आज जब लोगों को 60साल के बाद सेवा निवृत्त होते देखती हैं तो हैरत में पड़ जाती है, क्योंकि वह व्यक्ति किसी भी कोने से 60का नहीं दीखता या दिखतीं।
अपने प्रति इनके विश्वास, खान-पान पर ध्यान, कुछ करते रहने, सक्रीय बने रहने की ललक, और उम्र और उसकी सीमा को धता बताती ये शख्सियतें - वल्लाह! कौन ना कुर्बान जाए इन सब पर।
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