तब हमारे पास फोन नहीं था,
बूथ या दफ्तर से फोन करके
तय करते थे- मिलना-जुलना
पहुंच भी जाते थे, बगैर धीरज खोए नियत जगह पर
अंगूठे को कष्ट पहुंचाए बिना.
घरवालों को फोन करना तो और भी था मंहगा
चिट्ठी ही पूरी बातचीत का इकलौता माध्यम थी
तब हमारे पास गाडी नहीं थी,
घंटों बस की लाइन में लगकर पहुंचते थे गंतव्य तक
पंद्रह मिनट की दूरी सवा घंटे में तय कर
तब गैस चूल्हा नहीं था हमारे पास
केरोसिन के बत्तीवाले स्टोव पर
हाथ से रोटियां ठोक कर पकाते-खाते
सोने के लिए तब हमारे पास होता एक कॉट, एक चादर
तौलिए को ही मोड कर तकिया बना लेते
पुरानी चादर, साडियां, दुपट्टे
दरवाज़े, खिडकियों के पर्दे बन सज जाते
क्रॉकरी भी नही थी
तीस रुपए दर्ज़नवाले कप में पीते-पिलाते थे चाय
कॉफी तो तब रईसी लगती
बाहर खाने की तो सोच भी नहीं सकते थे
न डिनर सेट, न फ्रिज़, न मिक्सी, न टीवी
बस एक रेडियो था और एक टेप रेकॉर्डर- टू इन वन
चंद कपडे थे- गिने-चुने
चप्पल तो बस एक ही- दफ्तर, बाज़ार, पार्टी सभी के लिए
कुछ भी नहीं था हमारे पास.
क्या सचमुच कुछ नहीं था हमारे पास?
ना, ग़लत कह दिया
तब नहीं थी हमारे पास सम्पन्नता
हमारे पास थी प्रसन्नता!