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Saturday, December 19, 2009

विभा रानी को प्रथम "राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान"


छम्मकछल्लो का एक प्रयास यह भी.


http://mohallalive.com/2009/12/19/vibha-rani-get-first-rajeev-saraswat-memorial-award/

http://hindi-khabar.hindyugm.com/2009/12/vibha-rani-rajiv-saraswat-smriti-samman.html

प्रथम "राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान" सुप्रसिद्ध लेखक विभा रानी को आज के आयोजित कार्यक्रम में प्रदान किया गया. राजीव सारस्वत हिन्दुस्तान पेट्रोलियम में प्रबंधक (राजभाषा) के रूप में कार्य कर रहे थे. पिछले साल यानी 2008 के 26/11 के आतंकवादी हमले के वे शिकार हो गए. हादसे के वक़्त वे ताज होटल में कंपनी की तरफ से दी गई अपनी ड्यूटी पर थे. ताज होटल, ट्राइडेंट होटल, छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, नरीमन हाउस -इन सभी पर उस रात आतंकवादियों ने कहर ढाया था, जिसकी चपेट में सैकडों लोग आ गए थे. राजीव सारस्वत भी उनमें से एक थे. राजीव न केवल एक कुशल अधिकारी थे, बल्कि एक कुशल वक्ता, चुटकीदार कवि, अच्छे मंच संचालक भी थे. हाज़िरजवाबी भी उनकी बडी तेज़ तर्रार थी. मुंबई की कई साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं से वे जुडे हुए थे और उनकी गतिविधियों में नियमित रूप से उनकी शिरकत रहती थी.

उनकी स्मृति में उनके नियोक्ता हिन्दुस्तान पेट्रोलियम ने "राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान" का गठन किया. इसके तहत हिन्दी को सृजनात्मक तरीके से आगे बढानेवाले को यह सम्मान दिए जाने की घोषणा की गई. इसी के तहत इस साल का प्रथम "राजीव सारस्वत स्मृति सम्मान" विभा रानी को 18 दिसम्बर, 2009 को आयोजित कार्यक्रम में हिन्दुस्तान पेट्रोलियम के निदेशक (मानव संसाधन) श्री वी विजियासारधि के द्वारा प्रदान किया. सम्मान के तहत शॉल व प्रमाणपत्र के अतिरिक्त 10001/- की राशि का चेक दिया गया.

विभा रानी हिन्दी व मैथिली की सुपरिचित कथाकार, नाटककार, रंगमंच की कुशल अभिनेत्री व् सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं. हिन्दी व मैथिली में अबतक उनकी बारह से भी अधिक किताबें आ चुकी हैं. दस से अधिक नाटक वे लिख चुकी हैं. 'सावधान पुरुरवा', दुलारीबाई', पोस्टर', 'कसाईबाडा', 'मि. जिन्ना', 'लाइफ इज नॉट ए ड्रीम', 'बालचन्दा' जैसे नाटकों व 'चिट्ठी', 'धधक' जैसी फिल्मों में काम कर चुकी हैं. फिल्म्स डिविजन की फिल्में 'जयशंकर प्रसाद' व 'भारतेन्दु हरिश्चन्द्र' का लेखन कर चुकी हैं. कई टीवी कार्यक्रमों के लिए वे वॉयसओवर का काम भी किया है. रेडियो की वे पुरानी आवाज़, नाटक कलाकार हैं और अभी भी रेडियो से कथाओं के माध्यम से जुडी हुई हैं. विभिन्न सामाजिक विषयों पर वे अपनी तंज शैली में छम्मकछल्लोकहिस ब्लॉग लिखती हैं. 'छुटपन की कविताएं' तथा 'बस यूं ही नहीं' उनके अन्य ब्लॉग हैं. इनके अलावा विभा 'नो योरसेल्फ बेटर', सेल्फ एक्सप्लोरेशन', टाइम मैनेजमेंट', गिल्ट मैनेजमेंट' जैसे बिहेवियरल प्रशिक्षण कार्यक्रमों का संचालन करती हैं और मुख्य धारा के बच्चों के लिए थिएटर वर्कशॉप आदि का भी आयोजन करती हैं.

सामाजिक गतिविधियों में भी विभा की सक्रिय सहभागिता रही है. उनके सामाजिक योगदान में सबसे प्रमुख है- वंचित वर्ग के बच्चों को शैक्षणिक सहायता उपलब्ध कराना, वृद्धाश्रमों के लिए कार्यक्रम आयोजित करना और उनसे भी महत्वपूर्ण है, मुंबई और पुणे की जेलों के बन्दियों और महिला बन्दियों के बच्चों के साथ कला, थिएटर, साहित्य आदि के माध्यम से उनके मध्य सार्थक हस्तक्षेप करना. वर्तमान में "निर्मल आनंद सेतु' कार्यक्रम के माधय्म से वे लगातार बन्दियों के साथ संवाद कर रही हैं ताकि उनके जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आए. सम्मान ग्रहण करते समय विभा ने सम्मान के प्रति अपना आभार व्यक्त किया उअर कहा कि सम्मानस्वरूप मिली राशि का उपयोग समाज के विभिन्न वंचित वर्ग के लिए आयोजित कार्यक्रमों में किया जाएगा.

Thursday, December 4, 2008

काश की तुम मेरी सेवा में आ गए होते.

१९ नवबर, २००८ की शाम, एक संदेश मेरे मोबाइल पर ब्लिंक हुआ, २४ को आपकी सेवा में नहीं आ सकूंगा। यह संदेश राजीव सारस्वत का था, जिसे मैंने अपनी २४ से होनेवाली कार्यशाला में सत्र लेने के लिए बुलाया था। उसने कहा था की शायद संसदीय समिति के निरीक्षण कार्य के लिए उसे कह दिया जाए। ऎसी हालत में वह नहीं आ सकेगा। उसे संसदीय समिति के निरीक्षण कार्य के लिए ड्यूटी मिल गई थी, इसलिए उसने माफी माग ली।

२६ नवम्बर से मुंबई में आतंकवाद का जो नंगा नाच खेला गया, उसने राजीव को भी अपनी चपेट में ले लिया। होटल ताज में उसकी ड्यूटी थी। उस दिन उसे भी एक गोली लगी। दूसरे दिन यानी २७ तक उसका अपने घर व् दोस्तों के साथ संपर्क बना रहा। फ़िर वह टूट गया और ऐसा टूटा की बस टूटा ही रह गया। अन्यों की तरह वह भी इस आतंकवाद की भेंट चढ़ गया। प्रिंट व् मीडिया में तरह-तरह की खबरें छपती रहीं, पर अंत में सभी एक बात पर एकमत थे की इन सबके पीछे का सच यह है की राजीव अब हमारे बीच नहीं है।

मेरे जानिब से केवल एक राजीव नहीं गया, बल्कि सय्कारों राजीव चले गए। कोई पूछे उनके घर के लोगों से उनकी वेदना। हमारे पास न तो शब्द हैं, न आंसू। क्या कहें और कितना कहें? क्या बहायें और कितना बहायें? लोग सरकार से इन खूनों का हिसाब मांग रहे हेम? मगर कोई क्या कहे? लोग अपनी संवेदना में मोमबत्ती जलाकर प्रार्थना कर रहे हैं। काश की ईश्वर कहीं हो और वह इन सबकी प्रार्थना सुन लेता। लोगों को तो अपने -अपने परिजनों की लाशें भी इतनी क्षत -विक्षतsथिति में मिलीं की वे कह बैठें की दुश्मनों के साथ भी ऐसा न हो। राजीव का शव भी इस बुरी तरह से जला हुआ मिला की लोग उसके बदले उसके ताबूत के ही दर्शन कर सके। आतंक से बड़ा आतंक तो अब यह है की हमारी जान बचाने के लिए हमारे पास कोई नहीं है। कोई सुरक्षा नहीं, कोई चौकसी नहीं, अब आप अपनी तक़दीर के हवाले से ज़िंदा हैं तो हैं। तक़दीर के ही हवाले से जिसदिन चले जायेंगे, चले जायेंगे, बाक़ी अन्य सभी हादसों की तरह इस हादसे पर भी आंसू बहा कर, दिल को तसल्ली देकर रह जायेंगे। हम आम जन की कौन सुनेगा? राजीव से तो यही कहा जा सकता है की काश, उस दिन २४ को तुम मेरी सेवा में आ ही गए होते तो आज तुम हमारे बीच होते। हम -तुम पहले की ही तरह अपने विषय पर बात करते हुए आपस में हँसी-मज़ाक भी कर रहे होते। लेकिन अब ऐसा कुछ भी नहीं है। यह केवल मेरे साथ नहीं, बल्कि हम जैसे कईयों के साथ है, जो अपने-अपने हित-मित्र-नातों को खो चुके हैं। आज सभी के मन में यही एक सवाल है की कब हम इन सबसे निजात पायेंगे? आपके पास कोई ठोस जवाब हो तो हमें भी बताएं, वरना सभी को माकूल जवाब देने में सक्षम मैं आज यहाँ पर ख़ुद को अक्षम पा रही हूँ।