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Friday, March 24, 2017

आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है-“अनारकली ऑफ आरा”।

       मैं यहाँ अविनाश दास निर्देशित और स्वरा भास्कर सहित सभी नए-पुराने कलाकारों द्वारा पर्दे पर अभिनीत और पर्दे के पीछे से अभिनीत फिल्म “अनारकली ऑफ आरा” पर अपनी बात रखने जा रही हूँ। इसे फिल्म की समीक्षा के रूप में न लिया जाए, क्योंकि मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ। लेकिन, फिल्म हमारे जीवन में नस की तरह काम करती है। फिल्में हमें जीवन का नया राग, रंग और संचेतना देती है। मैं फिल्मों की इसतरह मुरीद हूँ कि हर फिल्म में अपने लायक के कलाकार को अपने में गढ़ लेती हूँ और उसकी कहानी के साथ अपने आपको देखने-खोजने और बुनने लगती हूँ। 
      बचपन में दुर्गा पूजा के अवसर पर हमारे शहर में रात भर खेले जानेवाले नाटकों में मुजफ्फरपुर, बनारस और कभी-कभी कोलकाता से बाई जी मंगाई जाती थीं- नाटक के दृश्यों के बीच में नाचने के लिए। यह दृश्यों के लिए आवश्यक नहीं होता था, दर्शकों को नाच के लोभ की शहद में लपेटे रखने के उद्देश्य से इसे रखा जाता था। पूरे समय यह चर्चा का विषय रहता था कि इस साल कहाँ से बाई आनेवाली हैं? कौन उनसे साटे का लेनदेन करता था, कौन उन्हें लेने जाता था, कौन उनकी इन तीनों दिन देखरेख करता था, हमें नहीं पता। लड़कियों को यह सब जानने-समझने का अधिकार कहाँ? हमें तो सातवीं-आठवीं कक्षा के बाद दर्शक दीर्घा में बैठने का भी मौका नहीं मिला। दरअसल, दर्शक दीर्घा में महिलाओं के बैठने के लिए जगह बनाई तो जाती थी, मगर उसमें केवल दूर-दराज से आई गाँव की बूढ़ी महिलाएं ही बैठती थीं। बुड्ढों से हम सुरक्षित रहें या नहीं, लेकिन ये बूढ़ियाँ तब सुरक्षित मानी जाती थीं। उनके साथ की आई बहू-बेटियाँ हमारे साथ नाटक देखती थीं- घरों की छटों से। शहरी बहुएँ और बेटियाँ तो उधर पाँव रखने की सोच भी नहीं सकती थीं। और अपने घर की बेटियाँ हमेशा रक्षणीया होती हैं। सो, हम सबके लिए, पंडाल के आसपास बने घरों की छतें ही नसीब थीं, जिसपर खड़े होकर रात भर या अपनी खड़े होने की शक्ति के मुताबिक नाटक देखा जाता था। शायद ही कोई स्त्री रात भर नाटक देख पाती थीं। भोर होते ही नाटक देखकर लौटे थके-मांदे घर के महान पुरुषों के लिए उन्हें चाय-नाश्ता बनाना होता था, अष्टमी, नवमी की पूजा की तैयारी करनी होती थी और घर-द्वार, बाल-बच्चों की सँभाल तो रूटीन के मुताबिक करनी ही करनी होती थी।
      मैंने देखा था, वे बाइयाँ नाचते हुए अश्लील इशारे भी करती थीं। जो जितने ज्यादा इशारे करतीं, वे उतनी ही पोपुलर होतीं। सभी उन्हें देखने के लिए बेताब रहते। मुझे याद है, एक बाई जी ने नाचने से पहले सबको प्रणाम किया और तनिक शास्त्रीय पद्धति से नाचना चाहा कि लोगों की फब्तियाँ शुरू हो गईं- “आप यहाँ से चली जाइए, हाथ जोड़ते हैं।“
      “अनारकली ऑफ आरा” फिल्म देखने से पहले मैं इन यादों को ताज़ा करती रही। जाने कितने यूट्यूब वीडियो देखे। पॉर्न भी। और मैं हैरान कि इनकी दर्शक संख्या लाखों में है। कमबख्त हम अपने वीडियोज़ डालते हैं तो हजार पर भी संख्या नहीं पहुँचती। महेश भट्ट ने सही कहा था, “जबतक आप जख्म नहीं देखेंगे, हमें मर्डर बनाने पर मजबूर होते रहना पड़ेगा।“ ऐसा भी नहीं है कि इन वीडियोज़ की क्वालिटी बहुत अच्छी हो। लेकिन, इन लड़कियों को देखने और छूने की लालसा इतनी बलवती है कि सभी अपना मान-सम्मान भी भूल जाते हैं।
      सवाल यह है कि आप अपना मान-सम्मान भूल जाएँ तो क्या ये लड़कियां भी भूल जाएँ? मान लिया जाए कि इन लड़कियों की कोई इज्ज़त नहीं? वे चूंकि सभी के सामने उत्तेजक नाच नाचती हैं तो वे सभी के लिए सहज उपलब्ध हैं? जिस देह और देह की आजादी का प्रेत हमारे तथाकथित सभ्य समाज की स्त्रियॉं को सताता रहता है, उसकी दीवार इन लड़कियों के सामने ढही होने के बाद भी ऐसा क्या है जो उन्हें उद्वेलित करता है? ....वह है, उनका अपना मान-सम्मान, जिसके लिए मैं अक्सर कहा करती हूँ कि इज्ज़त तो एक भिखारी और वेश्या की भी होती है।
      आप मानें या न मानें, लेकिन यह सच है कि स्त्रियाँ कभी भी केवल देह के वशीभूत होकर कहीं नहीं जाती। अनारकली भी रंगीला से एक भाव के साथ ही बंधी है। स्त्री अपनी देह का सौदा करते हुए भी उसमें भाव खोजती रहती है और लोलुप आँखों और लार छुलाती देह हर तबके और वर्ग की स्त्री के मन में लिजलिजापन भरता रहा है। ऐसे में अनारकली क्या सिर्फ इस बिना पर समझौता कर ले कि वह रसीले, रँगीले गाने गाती और उनपर कामुक नृत्य करती है?
      यहाँ सही कहा जा सकता है कि स्त्री मन को कोई नहीं समझ पाता। उसके लिए स्त्री का मन बनकर उसमें घुसना पड़ता है, प्याज के छिलके की तरह उसे परत दर परत खोलना पड़ता है, तब शायद एकाध प्याजी ललछौंह आपको मिले।
      बाकी इस फिल्म को आप ठेठ बिहारी माहौल, गंध, गीत, रस, रास, साज, आवाज के लिए भी पसंद करेंगे। बिहारी बोल और तों, बिहारी मुहावरे और संदर्भ आपको गुदगुदाएंगे और आपको बिहार को समझने का मौका देंगे। आरा के लिए मशहूर उक्ति है, जो इस फिल्म में भी है कि- “आरा जिला घर बा, कौना बात के डर बा?” और उसी तरह यह उक्ति भी बिहार के लिए बड़ी जबर्दस्त है-“एक बिहारी, सब पर भारी।“
और यह फिल्म तो बिहारियों का गढ़ है। यहाँ तक कि ठेठ राजस्थानी लेखक और कलाकार रामकुमार सिंह को भी इसने बिहारी बना दिया, इसके गीत लिखवाकर और इसमें अभिनय करवाकर।
      रूपा चौरसिया का कॉस्ट्यूम कौतुक भरता है और पूरी फिल्म को सम्मोहन की गिरफ्त में ले लेता है। कास्टिंग कमाल की है, यहाँ तक कि घर की मालकिन और अनवर का बाप भी ऐसे मुफीद हैं कि आप उसमें बंधे रह जाते हैं। अलबता मकान-मालकिन की भूमिका में मैं खुद को खोजती और देखती रही एक कलाकार होने के नाते और अंतिम अभियान गीत की गायिका के रूप में भी- एक लोक प्रस्तोता होने के नाते।  
      यहाँ मैं फिल्म की नायिका स्वरा भास्कर के लिए कुछ नहीं लिखने जा रही, क्योंकि मुझे पता है, हर कोई उनके उम्दातं काम की तारीफ करेगा। मैं तो बस उन्हे इस साल के राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता के रूप में देख रही हूँ। मेरे यह कामना पूरी हो।
      आइये, अन्य चरित्रों पर तनिक बात करें। हीरामन का चरित्र सही में तीसरी कसम के हीरामन की याद दिला देता है- भोला और अपनी अनारककली के प्रति आदर और श्रद्धा से भरा हुआ। उसका शुभचिंतक। रंगीला और अनारकली के रूप में पंकज त्रिपाठी और स्वरा भास्कर की केमिस्ट्री तो गज़ब ढा ही रही है, बुलबुल पांडे और वीसी साब के रूप में विजय कुमार और पंकज मिश्रा भी एक-दूसरे को कॉम्प्लिमेंट करते नजर आते हैं। फिल्म की सबसे अच्छी बात यह भी होती है कि वह अपने सभी कलाकारों को कितना स्पेस देती है और इस फिल्म ने सभी कलाकारों को अपने हिस्से का करने का पूरा स्पेस दिया है। सभी चरित्र अपना ध्यान खींचते हैं। वे आपके चेहरे पर मुस्कान भी लाते हैं, आपको रुलाते भी हैं और आपमें वह भाव भरते हैं कि बस, हो गई जुल्म की इंतहाँ कि “हर ज़ोर जुल्म के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है!”
      स्त्रियॉं का देह के प्रति का यह संघर्ष मिथकीय काल से चला आ रहा है और चलता रहेगा अनंत अनंत काल तक, क्योंकि जबतक स्त्रियॉं के प्रति हम अपना रवैया नहीं बदलेंगे, तबतक स्त्रियॉं की देह से परे जाकर कुछ भी सोचा नहीं जा सकता। घुटन के इसी गैस चेम्बर में से हर उस अनारकली की चीख एक ब्रह्म नाद की तरह निकलेगी, जो अपनी देह को भोग की वस्तु माने जाने से इंकार करती है और अपने अस्तित्व के लिए सचेत है।
      यह फिल्म सभी को देखनी चाहिए। 18 की उम्र से लेकर हर आयु-वर्ग के लड़के- लड़कियों, स्त्री-पुरुषों को। केवल देखनी ही नहीं चाहिए, देखकर समझनी भी चाहिए और उसपर अमल भी करना चाहिए। “अनारकली ऑफ आरा” की पूरी टीम शत प्रतिशत बधाई की पात्र है। इस फिल्म के साथ तो ऐसा है कि अगर कोई मुझे दस बार भी कहे तो मैं देखने के लिए तैयार हूँ और यह भी आश्वस्त हूँ कि जितनी बार इसे देखूँगी, उतनी बार इसकी नई- नई परतें मुझे मिलेंगी। वैसे दो बार तो देख ही चुकी हूँ। आप सब भी देखकर आइये। और आगे जितनी बार भी मन करे, देखिये, कि कैसे एक फिल्म किसी मोनोटोनी को तोड़कर अपना एक नया इतिहास रचती है। “अनारकली ऑफ आरा” आज के लिए नहीं, कल के क्लासिक के लिए बनी आज की फिल्म है।  एक बात और, सफलता जब आती है तो सबसे पहले पर्दे के पीछे की औरत को ही बहाकर ले जाती है, जो जाने कितने कष्टों को सहकर सबका साथ देती रहती है। अविनाश की सफलता के पीछे खामोश भाव से लगी उनकी पत्नी स्वर्णकान्ता (मुक्ता) के योगदान को भी कतई नहीं भूला जाना चाहिए। #### 

Saturday, January 30, 2010

थिएटर की भूमिका

आज दिनांक 30 जनवरी, 2010 के "हिदुस्तान" पटना में छपा आलेख.

Thursday, December 3, 2009

यू पी के दो भैये से परेशान-ये पूरा हिन्दुस्तान!

परम आदरणीय महोदय साहेब जी लिब्रहान, क्यों हो रहे हैं आप हलकान? जीवन के सत्रह साल का कर दिया नुकसान. सत्रह साल में तो बच्चा जवान हो जाता है, जवान बूढा हो जाता है बूढा स्वर्ग की सीढियां नाप जाता है. सोचिए साहेब जी कि सत्रह साल और उससे भी अधिक समय से, कहें तो सदियों से जिसके लिए अपनी जान देते आए हैं, वे आखिर हैं कौन? यू पी के दो भैया ही ना, जिन्हें जब तब हकाल देने, जान से मार डालने, भीतर घुसने ना देने की बात कही जाती रही है. अब आप सभी ही बताएं कि ये दो भैये कोई आज के हैं क्या कि आपके कहने से वे सुधर जायेंगे और आप जैसा कहेंगे, वैसा वे कर देंगे? अरे, ये बडे चालाक, बडे जुगाडू और बडे मौका परस्त थे. तभी तो वानर सेना भी बना ली और एक भाई को दूसरे के खिलाफ भडका भी दिया. इनकी जडे बहुत गहरे तक धंसी हुई हैं, त्रेता से लेकार द्वापर तक. बात बडी अजीब सी है और नहीं भी. यह आज की बात नहीं भी है, और है भी. कहते हैं ना कि मानो तो देव नहीं तो पत्थर. यह भी कि इस शीर्षक का बीज मेरे एक मित्र ने छम्मक्छल्लो के मन में बो दिया. अब बो दिया तो वह अंकुराएगा ही.

छम्मक्छल्लो ने देखा कि त्रेता का एक भैया बडो बडों की खाट खडी कर गया. सबसे पहले अपने बाप की खाट श्मशान में पहुंचा दी. मां की आज्ञा मान कर. वह भी क्या तो सौतेली मां. फिर छोटे भाई को भिडा दिया, जा भैया, एक रूपसी अपने रूप पर अभिमान ना करे और हम सबका पुरुषत्व बचा रहे, उसकी कुछ तज़बीज़ कर आ. लोग आज कहते हैं कि औरतों पर अत्याचार हो रहे हैं. और देखिए विडम्बना कि इसके लिए उन्हें जो स्थल मिला, नाक कटने के बाद वह स्थान कहलाया -नासिक. जी हां, अंगूर की इस नगरी नासिक में कुम्भ का मेला लगता है और गोदावरी नदी के तट पर राम का अखाडा है, जहां शाही स्नान होता है. वहां सीता गुफा है. कहते हैं कि असली सीता को राम ने अग्नि के हवाले कर दिया था. बहन प्रेमी भाई ने तो बस उसकी छाया का अपहरण किया था. अग्नि परीक्षा के समय अग्नि ने असली सीता को लौटाया था- क्लोनिंग उस ज़माने में भी थी और डबल रोल भी. वहां एक कालाराम का भी मन्दिर है, जिसमें राम सहित सीता, लक्ष्मण सभी की मूर्तियां काले पत्थर की हैं और गोराराम का भी है. सोच लीजिए कि वहां मूर्तियों का रंग क्या होगा?

यू पी का यह भैया इतने पर ही नही रुका. अपनी नगरी, अपना राज्य छोदकर वह दूसरे राज्य में पहुंच गय था. ऐसा तो नहीं था कि यू पी में जंगल ही नहीं था. परंतु नहीं नहीं, भूल हो गई. देशनिकाला में तो अपने राज्य के जंगल भी शामिल रहते हैं. लिहाज़ा, वह तो नासिक की पंचवटी में था अपनी घरवाली के साथ. आज भी वे पांच वट्वृक्ष हैं, जिनके कारण उस जगह का नाम पडा- पंचवटी, जहां नाक कटी बहन के अपमान का बदला लेने भाई पहुंच गया. मामा मायावी था और लोग झूठ ना बुलवाए, अपनी इस मुंबई नगरी को भी मायानगरी ही तो कहा जाता है. कहते हैं कि मामा इसी मायानगरी का था. सीता यहां से हर ली गई. किसी दूसरे देश से किसी की घरवाल्ई चली जाए और वह कुछ ना करे, ऐसा होता है क्या?

बात यहीं नहीं रुकी. किशोरावस्था में ही एक मुनि उनको बिहार के बक्सर ले गए उधार मांगकर ताकि राक्षसी ताडका से उनकी रक्षा की जा सके. सोचिए, कितनी बलशाली होती थीं तब बिहार की महिलाएं कि एक ओर ताडका बन कर मिथकीय दुनिया के सबसे बलशाली मुनि की नाक में दम कर रखा था तो दूसरी ओर फूल से भी कोमल सिया सुकुमारी के भीतर भी इतनी ताक़त कि वह शिव का धनुष खिसका दे. यू पी का यह भैया वहां भी नैन सों नैन नाहीं मिलाओ गाने से बाज नहीं आया. यकीन ना हो तो रामचरित मानस पढ लीजिए, राम सीता के बाग में मिलने की चर्चा, फिर इसके बाद सीता का देवी पार्वती से इसी भैया को पति के रूप में पाने की प्रार्थना और देवी का आशीष कि "सुनु सिय सत्य असीस हमारी, पूजही मनकामना तुम्हारी." तो यू पी के इस भैया ने खुद तो धनुष तोड कर लडकी जीत ही ली, साथ साथ अपने और तीनों भाइयों के लिए भी घरवाली का इंतज़ाम कर लिया. एक ही मंडप पर चार विवाह, राजकुमार हो कर भी इतना खर्चा बचा लेने की सोची. इतनी किफायत आज के लोग सोचें और करें तो?

माता की बात मानकर जंगल चले गए और वहां जो कुछ किया, आपको पता ही है. वानर सेना भी खडी कर ली, भील भीलनी को भी अपने बस में कर लिया, नाक कटी के दूसरे भाई को अपने कॉंफिडेंस में लेकर बडे भाई की म्रृत्यु का राज़ जान लिया और चाचा, बेटे सबको मारकर अपना असर मनवा लिया. और तो और, उसकी विधवा भाभी का भी उसके साथ ब्याह करवा दिया. इतना ही नहीं, अपने छोटे भाई को मरणासन्न दुश्मन से सीख लेने के लिए भी भेज दिया तकि बाद में दुनिया उनके विचार पर अश अश कर उठे.

प्रजा के ताने पर घरवाली को घर से बाहर निकाल दिया. सौतेले भाई से इतना प्रेम किया के एक को साथ रखा तो दूसरे को अपनी खडाऊं दे दी. राज करते रहे. घरवाली को घर से निकाल देने के बाद उसकी मूर्ति बिठा कर यज्ञ किया, बेटों को राजगद्दी सौंप दी और यह सब करने के बाद अंतर्ध्यान हो गए. काश कि ऐसा अंतर्ध्यान होते कि किसी को याद नहीं आते. आते भी तो गुप्त प्रेम की तरह लोगों के मन में ही रहते. मगर अंतर्ध्यान उस समय हुए और अभी तक लोगों को पानी पिला रहे हैं, एक दूसरे को असली नेता की तरह भिडवा रहे हैं. लोग आज कह रहे हैं कि यू पी के भैया ने कहर मचा रखा है, मगर देखिए कि इसने तो त्रेता से ही गदर मचा रखा है.

अब दूसरे भैया! जन्म से पहले ही ऐसी आकाशवाणी करवा दी कि मा-बाप जेल की चक्की पीसने लगे. खुद भी जेल में जन्म लिया. दूसरे के घर पले बढे, मगर प्रेम और ऐसी राजनीति ऐसी रची कि भारत को महाभारत में बदल दिया. हमारे देश में कानून है कि एक हिन्दू आदमी एक पत्नी के रहते दूसरा ब्याह नहीं कर सकता और उसी के भगवान कहे जानेवाले यू पी के इस भैया एक दो क्या कहें, आठ रानी और साठ हज़ार पटरानी के मालिक बन बैठे. इतने पर भी मन रसिया, मन बसिया कहलाने से बाज़ नहीं आए तो एक अदद प्रेमिका भी कर ली. फिर भी चैन नहीं मिला तो महारास रचा रचा कर सारी ब्याही, अनब्याही, बाल बच्चेवाली गोपिकाओं को अपने पास बुलाने लगे. राज्य बनाया तो अपना देश गांव छोडकर दूसरे के यहां बना लिया. जान के लाले पडे तो समुन्दर के भीतर घर बना लिया. कहीं जेल का तो यह सब असर नहीं था? यू पी के एक भैया ने महाराष्ट्र में बहन की नाक काट ली तो यू पी के दूसरे भैया ने पडोस के गुजरात मे अपना दाखिल कबज़ा कर लिया.

और तो और, नेपाल में जनमे सिद्धार्थ को भी कहीं और ज्ञान नहीं मिला और वह युवा राजकुमार जब "गया गया तो ऐसा गया कि गया ही रह गया" और गया को उसने बोधगया बना दिया. यूपी के भैया को भी बिहार या कह लें कि मिथिला की ही छोरी मिली और नेपाल के इस राजकुमार को भी ग्यान बिहार की बाला के हाथों की खीर खा कर ही मिली. ज्ञान के इस केन्द्र की सत्ता को देखने समझने की ज़रूरत बहुत बढ गई है भैया! राजकुमार सिद्धार्थ के ज्ञान की गंगा मैदानी भारत में सबसे ज़्यादा फैली तो अपने बाबा साहेब की छांव तले.

अब जब ये सभी लोग त्रेता, द्वापर से ही रार मचाए हुए हैं और बिहार में ही सुन्दरता के साथ साथ ज्ञान को भी केन्द्र मान बैठे और अपना दबदबा यूपी से लेकर हर ओर जमा लिया, इतना कि उसके नाम पर बडे से बडे स्मारक ढाह दिए जाते हैं, उनके नाम पर बडी से बडी कमिटी बन जाती है, उनके नाम पर पता नहीं कितनी गोटियां कहां, कहां और कैसे कैसे जमा ली जाती हैं. लोगों का पूरा का पूरा कैरियर, नाम-धाम, काम सब कुछ ही यू पी के इन दो भैयाओं पर बस गया हुआ है- देश से विदेश तक. तो प्रेम से गाइए, हरे रामा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा हरे रामा! रामा रामा, हरे कृष्णा, हरे कृष्णा हरे रामा!

Tuesday, July 29, 2008

आबाहु सब मिली कर रोबहू बिहारी भाई!

दो माह पहले मैं मुंबई से दिल्ली जा रही थी राजधानी से। यह वह समय था जब राजस्थान गुर्जर आन्दोलन से जल रहा था । उस लाइन की सभी ट्रेनें या तो रद्द थीं, या रूट बदलकर जा रही थीं। एक बुजुर्ग मराठी सज्जन भी दिल्ली जा रहे थे। कुछ विशुद्ध बिहारी, जो इस व्यवस्था में भी लालू की कमी निकाल रहे थे, उन्हें कोस रहे थे, जैसे गुर्जर आन्दोलन का सारा श्रेय उन्हें ही जाता हो। उनका टिकट वेटिंग पर था। राजधानी में वेटिंग पर कोई यात्रा नहीं कर सकता, मगर समय की नजाकत को देखते हुए इसकी इजाज़त दी गई थी। पहले तो वे सज्जन टीटी से बर्थ को लेकर खूब लड़े, फ़िर उन्हें दिल्ली में पहुंचकर उसे देख लेने की धमकी दी गई। बाद में बर्थ मिल जाने पर उन्हें अपने जीवन का ज्यों नया "बर्थ" मिल गया। अब वे पैर फैलाकर आराम से पसरकर लगे बिहार और बिहारियोम को कोसने। उन मराठी सज्जन ने कहा कि "मैंने तो बिहार की काफी तारीफ़ सुनी है।" बिहारी सज्जन ने तुनकते हुए कहा, "आपसे किस (बेवकूफ) ने कह दिया।" फ़िर वे बोले, "मैं लालू के इलाके का हूँ। और मैं जानता हूँ कि लालू ने किस कदर बिहार को मटियामेट कर दिया। " बुजुर्ग ने कहा कि उनके कारण तो रेल के किराए में भी कटौती आई है, गरीब रथ जैसी ट्रेने खुली हैं, रेलवे प्रौफिट में हैं। "बिहारी सज्जन गीता का ज्ञान दे रहे कृष्ण की तरह मुस्काए और उसके बाद लालू क्या हैं, कैसे हैं, यह सब लेकर उनका ज्ञान वर्धन कराने लगे। इन सबका लब्बो- लुबाब यह कि आपने अगर बिहार के बारे मैं कुछ अच्छा सुन भी लिया है तो आप या बिहार इस काबिल नहीं। बुजुर्ग ने बताया कि मेरा बेटा जिस इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ता है, वहाँ बिहारी बच्ची भी हैं। मेरा बेटा उनसे सुअकर मुझे बता रहा था। सुनकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, पर अब आप कह रहे हैं की ऐसा कुछ भी नहीं है।

बिचारे वे बिहारी छात्र , जो बिहार की छवि अपने तरीके से सही रूप में दिखाना चाहते थे, उनकी कम अकली पर आप भी रोइए। क्यों वे बिहार को बाद से साद मुं पहुंचाना चाह रहे हैं? एक गाना हैं ना की 'कोई दुश्मन घाव लगाए तो मीत जिया बहलाए, मनमीत जो घाव लगाए, उसे कौन बचाए।'

बिहारी ग्रुप के पुष्पक पुष्प का आक्रोश, दुःख मीडिया के प्रति है। भाई मेरे, हम सभी मीडिया हैं, अपने अपने स्टार पर। किसी की भी छवि को संवारने या बिगाड़ने का काम और दायित्व हमारा भी होता है। जबतक सभी बिहारी इस बात को नहीं समझेंगे, अपने बिहारी और भारतीय होने का गौरव अपने भीतर नहीं भरेंगे, तबतक सभी बिहारी इस तरह के भेद-भाव का शिकार होते ही रहेंगे। पहले तो अपने लोगों को यह कहना - समझना सिखाएं कि बिहार का मतलब केवल लालू नहीं है