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Sunday, March 8, 2015

'रूम थिएटर' के तहत अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस- नौरंगी नटनी-आज शाम 7 बजे


आइये, मनाते हैं 'रूम थिएटर' के तहत अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस- नौरंगी नटनी के साथ। आज शाम 7 बजे- कम्यूनिटी सेंटर, सेक्टर 3, वाशी पुलिस स्टेशन के पास। आयोजक- नवी मुंबई म्यूजिक एंड ड्रामा सर्कल। शुक्रिया ग्रुप और Vivek Bhagat

इस नाटक पर दर्शकों और सुधिजनों के विचार!

आपका प्ले बहुत बढ़िया लगा, इतनी बारीकी और खूबियों से नटनी और राजा को अलग से देख पा रहे थे आप में, बहुत वर्सेटाईल! कमाल! कभी फुर्सत से बैठेंगे।– मनीषा कुलश्रेष्ठ  

adbhud!koi shabd hi nahin mil raha...... bemisaal abhinay aapka.......uspar aapka diya hua prasad....maza aa gaya.- मृदुला प्रधान
baap re.ettek neh appan gamak lok e de sakai chai kono aur nai.Vibha rani didi hammar.adbhut programme.a geet sab dil k bhitar samagel..bahut badhiya.nagarjun,gorakh Pandey..ahhhha...- रूपा सिन्ह


विभा जी, आपके अभिनय में बाकई बहुत सी,बहुत ही बारीक़-बारीक खूबियाँ हैं ;वो,क्या खूब थी , नौरंगी नटनी की भाव भंगिमाएं, और भिन्न -भिन्न पात्रों की क्षण प्रति क्षण बदलती मुख मुत्राएँ फिर चाहें राजा हो या राजा का भेजा गया संदेश वाहक के बीच नटनी के मध्य सम्बाद …,कमाल देखने का यह है कि मात्र एक ओढ़नी और एक कपड़े की कमर बन्ध को साथ में लेकर आपने तमाम पात्रों को अपने आप में उतार दिया बहुत खूब -बहुत खूब … ! विभा जी आपके सन्निकट बिताया गया क्षणिक वक्त स्मरणीय है हम सब उन लोगों के लिए जो दिनांक २६,८,२०१३ को दिल्ली विश्व विद्यालय के प्रांगण सर शंकरलाल सभागार में आप दवरा अभिनीत नाटक "नौरंगी नटनी " के साक्षी थे,यहाँ आपको एक रोचक प्रसंग बताना चाहूंगी,सभागार में जब मैं पहुंची थी उस वक्त मात्र कुछ लोग ही थे मेरे अगली बाली पंक्ति में एक सुश्री बैठी थी,मेरे बैठने के कुछ देर बाद उन्होंने पलट कर देखा और पूछने लगी मैं कहाँ से आई ?मेरा जबाव सुनकर उन्हें हैरानी हुई, उसके कुछ देर बाद ,कुछ और सोचते हुए पुन:उनका प्रश्न था क्या आप यह भाषा समझतीं हैं मेरा जबाव इस बार वही था … ; कला और कलाकार किसी भाषा,देश, जाति की सीमाओं में बंधा नहीं होता जैसाकि आपने अपना अनुभव बांटते हुए कहा था,बहुत ही सुंदर विचारों की आप मालिक हैं,मुझे याद है ,आखिरी क्षणों में मंच पर हम बहुत से लोग आ गये थे,आप पसीने में …;और आपको जोरों की प्यास लगी थी हम में से किसी ने अपने पास का पानी … बावजूद इसके आपमें उत्साह और आंतरिक उर्जा देखने लायक थी,और क्या कहूँ मैंने आप द्वारा भेंट " जो मंच की प्रस्तुती में प्रार्थना के साथ आपने अपने जादुई हाथों से हममें से,कुछ एक को प्रसाद के तौर पे सफेद - सफेद मीठे -मीठे गोल-गोल " को सहेज कर रख छोड़े हैं ,उन्हें देखिएगा ,जो फोटू आपके फेसबुक पर डाले हैं ! आपकी पूरी टीम को नौरंगी नटनी की सफलतम प्रस्तुती के लिए बधाई सहित धन्यवाद ! विभा जी,अगर आप की और आपके अभिनय की बात करें, मुझे सस्पष्ट दर्शयाभाव याद हैं एक पात्र शायद वह राजा का स्वभाव था जिसमें आपने क्या खूब अदा से मूछों पर ताव दिया था वह गजब का भाव -अभिनय था,एक जगह जब नौरंगी नटनी जहाँ अपने एक मात्र शिशु पुत्र को मालिश कर रही होती है,उस द्रश्य में आपके चेहरे पर क्या गजब की मंमता और करुणा का मिला-जुला स्वरूप था वो द्रश्य देखने और दिल से महसूस करने जैसा था,हाँ याद आया नाटक के लगभग अंतिम पढ़ाव पर नौरंगी नटनी का पति जब उसे पहाड़ की ऊंचाई से नीचे उतर आने का आग्रह करता है वह द्रश्य भी यादगार द्रश्य था,कमाल तो इस बात का था मंच पर कोई भी नहीं शिवाय एक मात्र विभा रानी के और हलचल,गहमा गहमी इतनी कि मानों साद्रश्य नौरंगी राजा का पूरा दरबार सजा हो दूसरी तरफ नौरंगी नटनी अपने मामूली से झोपड़े में स्वाभिमान के दम पर एक ताकतवर राजा का सामना कर अपने -आप को कही कमजोर नहीं पड़ने देती,यहाँ एक ध्यान देने की यह है , नौरंगी नटनी के मुख्य पात्र, नटनी के माध्यम से,आपने अपने अभिनय के द्वारा एक नारी शक्ति की ताकत की सफलतम पहचान कराने में एक तरह से समस्त नारी समाज का प्रतिनिधित्व किया है ,निश्चित ही आपने अपने अभिनय की बारीकियों से, यहाँ मौजूद तमाम दर्शक जनों को मन्त्र मुग्ध कर दिया,ऐसा आपने स्वयं भी महसूस किया होगा,कितनी ही बार दर्शकों की तालियाँ इस बात की गवाही दे रहीं थी ,यकीनन आप अपने विषय में सिद्धहस्त,पारंगत और निपुण है,विभा जी यहाँ दिल्ली का अनुभव कैसा रहा जरुर बताएं,यदि आपके स्वागत-सत्कार में कोई कोताही रह गयी हो वो भी जरुर बताइयेगा,आखिर पता कैसे चलेगा कि हम दिल्ली बालों की मेजबानी का तौर-तरीका कैसा है,कहते हैं ना कि निंदक नियरे राखिये …;विभा जी भूल-चूक मांफ,शुभकामनाओ सहित धन्यवाद ! विभा जी,यह जो भी कुछ लिखा वह सब आपकी एक तरह से sprit थी मैंने तो बस अपनी भाषा में शब्द दे दिए !- सीमा सिंह 



Saturday, February 21, 2015

Naurangi Natni – A solo musical play by Vibha Rani- Ashutosh Singh

आशुतोष सिंह युवा संगीतकार हैं। भोजपुरी फिल्म "देसवा" में संगीत देने के बाद "कुदेसन" पर बनी फिल्म "वुमेन फ़्रौम द ईस्ट" के गीत लिखे हैं। फिलहाल एक मैथिली फिल्म का संगीत कर रहे हैं। इसके अलावा आशुतोष बच्चों के संगीत के लिए काम कर रहे हैं। इनकी योजना बच्चों के गीतों का अलबम बनाने की है। "नौरंगी नटनी" नाटक देखकर इन्होंने अपने विचार यहाँ लिखे हैं, आप सबके सामने प्रस्तुत हैं।   


(NATNI - A Gypsy woman who earns her living doing acrobatic shows on the roads)
 

Maithili – that’s the language my mother speaks. It’s the language our next film is in. Despite having the language as my “Mother’s tongue”, I never had the opportunity to witness any theater or movie in Maithili.
 

Vibha jee is stubbornly persuasive, in her gentle consistent way. In our several fleeting interactions, she never failed to remind that I should come and watch her play NAURANGI NATNI at Kala Ghoda Festival. 

Natni, the street performer is very pretty, talented and famous – with a huge following. Naurangi Raja - the pompous king hears about the Natni and wishes to see her act. His Ministers warn him not to indulge in cheap lowly people. But King is curious to witness the bewitching act which has mesmerized his people.

The Thanedaar goes to convey the kings message to Natni and is unsettled by her beauty. Natni is a chaste lady, dedicated to her man and infant child. Thanedaar assures her the King is benevolent and a visit to him will yield profitable results for her. Natni agrees to meet Naurangi. 

Naurangi asks her to dance on swords and broken glasses. Natni completes the feat. Naurangi is not impressed. He then tells her to walk a rope tied across three mountains to the dome of his palace – with her child tied to her back. If she manages, the King would give half of his kingdom to the Natni’s Son. The feat is scary and risky. But the reward is too big. Natni, is hopeful that her son will become king. And she takes up the challenge. What happens next? Do catch the play at its next show.

Vibha jee can’t sing. Surely not the way professional or trained singers do. But her singing keeps you glued. Because she sings like a mother does to her child. There is a narrative, a tale which weaves pictures with words. The magic world is created just due to sincerity of the narrator. 

Vibha jee can’t dance. That she acknowledged post the show that whatever good happened, the credit goes to the Dance Director and whatever did not, was her doing. But her dancing works. Her movements are basic and to the point. And yes, graceful. 

At times, I felt Vibha jee did not even act. She lived the character instead. My personal favourite was the expression of hope from the Natni when she thinks her child will be a king. That entire sequence, I observed, moved the audience most. Probably because she is a mother herself, her playing one came naturally. There were difficult sequences when she played two characters interacting with each other. She performed change overs with ease. 

If there were fleeting moments when the act did seem to not fall in place, especially when it started – the initial few minutes – no one remembered that further down the line (except snooty nosed me). Also in the end, the play goes on in a socialist revolutionary tone which to me seemed unnecessary addition. 

All said and done, this was a marvellous experience savouring Naurangi Natni. And certainly would like to see more of plays from Vibha jee and her group Avitoko. 

An accomplished writer herself, I had the fortune to witness her skills when I asked her to write a song for me in Maithili. The result was overwhelming. She is one of the last of the generation which has had the opportunity to experience uncontaminated rural life as well as seamlessly adapted to urban values of today. I convey to her my best wishes for many such super quality work. Congratulations to her entire team.
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Sunday, February 15, 2015

विभा के अभिनव अभिनय से सजी अद्भुत प्रस्तुति "नौरंगी नटनी"-विवेक मिश्र


 11 फरवरी, 2015 को मुंबई के कालाघोड़ा आर्ट फेस्टिवल में मैथिली/हिन्दी एकल फोक नाटक "नौरंगी नटनी" का मंचन हुआ। ठसाठस भरे नैशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट के सभागार में इस नाटक ने धूम मचा दी। दैनिक "दबंग दुनिया" अखबार की रिपोर्ट। साथ में, हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक विवेक मिश्र के इस नाटक पर विचार। ..... नौटंकी को अपने यहाँ बुलाने के लिए संपर्क करें- 09820619161/ gonujha.jha@gmail.com पर।
इस नाटक को आप यूट्यूब पर भी देख सकते हैं। लिंक है- https://www.youtube.com/watch?v=XvsD194tqrQ

कई बार कुछ अवसरों पर आप कला में कुछ शब्दों के सहारे उतरते तो हैं, पर जब उसमें डूबकर उबरते हैं तो आपके पास अपने अनुभव को बयां करने के लिए शब्द नहीं जुटते। विस्मय या आश्चर्य जैसे शब्द छोटे जान पड़ते हैं। ऐसा ही कुछ अनुभव था जब मैथिली  व भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर के सर शंकर लाल सभागार में 26 जुलाई, 2013 को मुंबई से आईं हिन्दी और मैथिली लेखन व रंगकर्म को समर्पित नाट्यकर्मी विभा रानी  द्वारा अभिनीत  एकल नाटक "नौरंगी नटनी’ की प्रस्तुति देखने का अवसर मिला। विभा ने  "नौरंगी नटनी" के तमाम अंतर्विरोधी चरित्रों को  अपने अभिनय से जीवित ही नहीं किया, बल्कि दर्शकों को उनके साथ जोड़कर उन्हें नटनी के संघर्ष में और उसके माध्यम से एक दलित-आदिवासी स्त्री की व्यवस्था के ख़िलाफ़ उसके विद्रोह में सहभागी बना दिया। शायद ही कोई हो, जो उस प्रस्तुति को भूल सके।

“नौरंगी नटनी” की कहानी मूलत: हिमाचल, उत्तराखण्ड और राजस्थान में प्रचलित एक लोक कथा का मिलाजुला रूप है, जिसे वरिष्ठ कथाकार संजीव ने अपने उपन्यास ‘सर्कस’ में एक दलित स्त्री के, एक मां की आंतरिक शक्ति के, भविष्य की एक संभावना के प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है। उपन्यास में वर्णित डेढ पन्ने के इसी अंश को विभा ने एक सम्पूर्ण नाटक का स्वरूप दिया.
नाटक दरअसल राजसत्ता के छल-कपट, लालच और अंधाभिमान की कथा है, जिसमें एक धूर्त राजा अपनी कला में निपुण नटनी के शोषण की कोशिश करता है. और जब वह अपने स्वाभिमान से नहीं डिगती तो अपमान से तिलमिलाया हुआ राजा उसे एक असंभव कार्य देकर छल से उसे एक सुनहरे भविष्य के लालच से बांध देता है. राजा उसे अपने बेटे को पीठ पर बांधकर एक रस्सी पर चलते हुए तीन पहाड़ पार करने का लालच यह कहकर देता है कि ऐसा करने पर वह अपना आधा राज्य नटनी के बेटे को दे देगा. जीवन के प्रति नटनी की अथाह जिजीविषा तथा अपने बालक के सुन्दर भविष्य की चाहत उसे वह चुनौती स्वीकारने के लिए बल देती है। वह अपने बच्चे के साथ-साथ अपने समाज को गरीबी, अशिक्षा, अपमान से मुक्त कराने और उन्हें एक सम्माननीय जीवन देने के लिए अपने जीवन को दांव पर लगाने को तैयार हो जाती है। पूरा राज्य इस अनोखे करतब को देखने के लिए एकत्र है. बेटे को पीठ पर बांधकर एक रस्सी पर चलते हुए नटनी अपनी मंजिल की ओर बढने लगती है. लेकिन, उसे सफलता से आगे बढते देख राजा अब परेशान होता है. आवेश में बोले गए एक बोल के पीछे अपना आधा राज-पाट गंवाने को वह तैयार नहीं होता. लिहाज़ा, नटनी के आगे बढने से परेशान और अपने ही वादे से मुकरता राजा नटनी द्वारा तीसरा पहाड पार करते न करते उसकी रस्सी काट देता है. बेटे सहित नटनी मौत के मुंह में जा समाती है. मगर, राजा के इस अनैतिक कार्य को वहां उपस्थित जनता –जनार्दन सह नहीं पाती. भयंकर जन-विद्रोह होता है, जिसका सामना करने में असमर्थ राजा वहां से भागता है. परंतु, अंत में वह पकड लिया जाता है. जनता अपना बदला लेती है. अपने ही जन से पराजित राजा अन्त में मारा जाता है।
एकल नाटको में लम्बे समय से नए-नए प्रयोग करती आ रही विभा रानी ने इसी कहानी को आधार बनाकर इसकी एकल नाट्य प्रस्तुति “नौरंगी नटनी” नाम से की और संघर्ष की इस लोक गाथा को अपनी सशक्त अभिव्यक्ति से एक बार पुन: जीवित कर दिया।
विभा रानी नाटक में पल में चरित्र नटनी का चरित्र धरतीं, जिसकी वेश -भूषा, श्रंगार, आभूषण यहाँ तक चलने की विशेष शैली होती, तो दूसरे ही पल में एक अभिमानी राजा का चरित्र धारण करतीं, जो  बड़े ही सधे हुए और अहंकारी भाव से मंच पर प्रकट होता. विभा अपने अभिनय से राजा के चरित्र में पुरुषवादी मांसल लोलुपता और मन की गहरी मक्कारी जैसे गुणों को बड़ी सहजता से उभारती हैं। जब वह आधा राज्य न देने का फैसला करते हुए अनैतिक तरीके से नटनी की हत्या करता है, वह है- तांडव की मुद्रा पर नागार्जुन की कविता के प्रयोग के साथ नव रस के रौद्र रस को बडी ही सघनता से प्रस्तुत करना! यह दृश्य एक स्त्री कलाकार के द्वारा अभिनीत किया जाना सचमुच एक बड़ी चुनौती जान पड़ती है. राजा और नटनी के परस्पर संवाद के समय दोनों चरित्रों के अनुसार तेज़ी से बदलती भाव भंगिमाएं, एक चरित्र से दूसरे में प्रवेश इतना त्वरित व सहज कि दर्शक देखते रह जाते। राजा और नटनी के इन दो प्रमुख चरित्रों के अलावा नाटक में आए मंत्री, नटी, चोबदार, थानेदार आदि के किरदारों को भी विभा बखूबी निभा जाती हैं।  थानेदार के कॉमिकल स्वरूप को विभा न केवल सम्वाद, बल्कि पूरी भाव –भंगिमा के साथ इतने मनोरंजक तरीके से निभाती हैं कि दर्शक मुंह पर आई मुस्कान को रोक नहीं पाते.           
       नाटक में कथ्य को कहने के लिए सम्वाद के साथ-साथ कविताओं और लोकगीतों के प्रयोग से एक अलग ही प्रभाव पैदा हुआ। साथ ही भाषा के प्रयोग भी अद्भुत थे, जिसमें व्यवस्था और क्रूर राजा के संवाद हिन्दी में तथा नटनी और जनसामान्य के संवाद मैथिली में थे. इससे नाटक का परिवेश क्षेत्र विशेष से निकल कर राष्ट्रव्यापी हो जाता है, साथ ही गैर मैथिलभाषी दर्शकों के लिए भी सहज ही ग्राह्य बन गया। जन-विद्रोह को दिखाने के लिए गायन और नाटक में लोक स्वरूप का अच्छा इस्तेमाल किया गया, जिसमें नागार्जुन और गोरख पांडे की कविताओं के प्रयोग से नाटक समाजिक सरोकारों से जुड़कर नए अर्थ और ऊंचाई प्राप्त करता है। नाटक में आए लोकगीतों के अलावा अन्य गीत विभा ने खुद ही लिखे और गाए हैं| नाटक के मुख्य चरित्रों के अलावा कुछ साधारण चरित्रों की बात करना भी यहाँ इसलिए जरूरी लगता है, क्योंकि कम नाटकीयता वाले चरित्रों को एक एकल नृत्य नाटिका में निभाना एक अलग ही चुनौती होती है। यहाँ मैं राजा का संदेश लेकर आए थानेदार की बात कर रहा हूँ जो नटनी के दरवाजे पर पहुँचकर जिस तरह सुरती मलते हुए नटनी को राजा का संदेश सुनाता है, वहाँ लगता है कि विभा मंच पर अपने अभिनय में स्त्री-पुरुष की सीमा से मुक्त हो सिर्फ़ एक कलाकार ही रह जाती हैं। एकल नाटक में लगातार मंच पर उपस्थित इकलौते कलाकार पर ही सैकड़ों आँखें लगी रहती हैं. कलाकार कैसे उन आँखों के सामने एक चरित्र से दूसरे में खुद बार-बार बदलता रहता है, यह किसी जादू जैसा लगता है. और कहना न होगा कि विभा इस कला की जादूगर हैं। नाटक के अन्त  की ओर जाते घटना क्रम में राजा की शर्त के मुताबिक़ नटनी को अपनी दिलेरी और हिम्मत से एक -एक कर तीनों पहाड़ चढते देख घबडाया हुआ राजा जिस बेचैनी से नटनी को पहाड़ से नीचे उतर आने का आग्रह करता है, वहाँ भी विभा अपने अभिनय के चरम पर खड़ी दिखाई देती हैं।                               विभा के अभिनय की कई बारीकियाँ इस एकल प्रस्तुति में नज़र आती हैं। कहना होगा कि प्रस्तुति का असली कमाल तो यह था कि मात्र एक ओढ़नी और एक कमरबन्ध तथा निरंतर माइम के सहारे उन्होंने तमाम पात्रों और घटनाक्रमों को मंच पर उतार दिया और नटनी की लगातार बदलती भाव भंगिमाएं और भिन्न -भिन्न पात्रों की क्षण प्रति क्षण बदलती मुख- मुद्राओं ने, मंच पर बिना किसी साज-सज्जा के अप्रतिमता से भर दिया.
कलाकार की कलाकारी धरी रह जाए, अगर उसे अच्छा निर्देशक ना मिले. नाटक के निर्देशक राजेन्द्र जोशी नाटक की प्रकाश व्यवस्था भी देख रहे थे. आम तौर पर इस तरह के नाटक के लिए चालीस से भी अधिक लाइट्स की जरुरत पडती है. लेकिन राजेन्द्र जी की मास्टरी कम से कम लाइटों के सहारे अतुलनीय प्रकाश सन्योजन है। लोक नाटकों में संगीत की बहुत अहम भूमिका रहती है. प्रियदर्शन पाठक ने फोक के तत्व को पहचान कर बेहद प्रभावी संगीत दिया, जिसने नाटक में एक ही कलाकार और उसके द्वारा निभाए जा रहे विभान रूपों को दर्शकों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. संगीत संचालन प्रेम शुक्ला का था, जिन्होने अपने संगीत संचालन में अपने लम्बे अनुभव का कुशल परिचय दिया। अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित माला डे बांठिया के कॉस्ट्यूम डिजाइन ने पूरी प्रस्तुति को विश्वस्नीय और वास्तविक बनाया।
कुल मिलाकर “नौरंगी नटनी” को देखना एक विरल अनुभव के विशाल संसार से गुजरने जैसा रहा. ####