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छम्मकछल्लो की दुनिया में आप भी आइए.

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Thursday, June 19, 2014

चूहे सत्‍तर न पहली हज, भज गोविंदा, भज रे भज!

छम्मकछल्लो की बात! भाई, अपन शाकाहारी हैं, सिर्फ भोजन से! मन में मांस और मांसलता घूमती रहती है। यह मांसलता देह से भी जाहिर होती है। क्‍योंकि देह में ही मन है। बिना देह के भगवगीता भी आत्‍मा की कोई व्‍याख्‍या नहीं कर पाती। और केवल आत्‍मा को देखने के लिए बिना देह का होना माने अपुन तो खल्‍लास! फिर काहे का मन, काहे की आत्‍मा! धत् तेरे की!
      छम्मकछल्लो और उसका समाज भ्रमित, दिग्‍भ्रमित, मनभ्रमित, देहभ्रमित! एक आम भारतीय मध्‍यवर्ग की ऊहापोह से लबरेज! आखिर हम आते भी तो इसी वर्ग से हैं! उच्‍च वर्ग तो अपने शीन-काफ-लाम-बाम में मस्‍त-व्‍यस्‍त रहता है। वह शान से –‘द ग्रेट इंडियन मिडल क्‍लास भी लिखता है और इरोटिका भी क्राम फिक्‍शन भी और पल्‍प फिक्‍शन भी। हर लेखन में उसका बाजार है, उसकी मान है, प्रतिष्‍ठा है। वह तमाम फेस्टिवलों, आयोजनों में बुलाया जाता है, वहाँ अपनी बात कहकर, दूसरों की सुनकर मृद्ध होता है। वहां यह अवधारणा नहीं है कि अपनी बात कह दी और दूसरे की बात आने पर उठाकर चाय पीने चल दिये। वहाँ यह कहकर नहीं दुरदुराया जाता कि छि:! महिला होकर इरोटिका! औरत होकर क्राइम और खून-खराबा वाला लेखन! राम-राम! हरे-हरे:!
      लेकिन छम्मकछल्लो के समाज को यह सब गंदा और अश्लील लगता है। उसे सबकुछ पर्दे के पीछे करना अच्छा लगता है, जैसे कुछ भले बाप अपने बेटों को सीख देते हैं- “प्यार –व्यार ठीक है। दसियों से कर लो। खेलने-खाने की उम्र है! लेकिन, शादी तो वहीं होगी, जहां हम चाहेंगे!” छम्मकछल्लो के लोग भी कहते हैं, रात में जितना खेलना-कूदना है, खेल-कूद लो। रात इसीलिए तो बनाई गई है। लेकिन, इसे लेखन में मत लाओ। लाए भी तो लेखक लाए- लेखिका तो हरगिज नही! जघन्य पाप है यह!
      स्त्री-विमर्श के हंता, भजमंता दोनों परेशान हैं- छम्मकछल्लो और उस जैसी अन्य लेखिकाओं द्वारा तथाकथित इरोटिका लिखे जाने से। सभी को साहित्य और संस्कृति का हनन लग रहा है। लेखक जब लिखता है, संस्कृति का रक्षक होता है। छम्मकछल्लो को याद आती है, बहुत पहले की एक कहानी। उसे कहानी के लेखक या शीर्षक याद नहीं। लेकिन, कहानी का लब्बोलुआब यह था कि एक माँ अपनी कुछेक माह की बच्ची को उसके पिता के पास छोड़कर बाजार गई है। बच्ची ने डाइपर गीली कर दी है। अब सारी कहानी उसी के पीछे है कि बाप कैसे अपनी बच्ची का डाइपर बदले! बदलते समय बच्ची नंगी हो जाएगी। वह उसके नंगे जिस्म को कैसे छू पाएगा? छूते समय वह खुद को कैसे संतुलित रख पाएगा? उसके नंगेपन को देखकर वह कैसे खुद को जज़्ब कर पाएगा?
      सच कहते हैं, छम्मकछल्लो का माथा घूम गया। उस लेखक और उसके माध्यम से उस पात्र के प्रति मन घृणा से गिनगिना गया। चंद महीने की अपनी ही बेटी के प्रति अगर किसी बाप के मन में ऐसे विचार उमड़े तो ऐसे बाप को तो वहीं समाज और घर निकाला दे दिया जाना चाहिए। ऐसे-ऐसे महान पुरुष हों तो इस भारतीय संस्कृति और साहित्य का तो ऊपरवाला ही मालिक है। लेकिन, उससे भी महान बात तो यह हुई कि अन्य लेखक और समीक्षक भाइयों ने उसे घोर ही नहीं, घनघोर यथार्थवादी लेखन करार दिया।
      छम्मकछल्लो के मन में आया कि पूछे, “भाई, ऐसे मे तो औरत हर समय काम- दग्ध होती रहेगी। बेटे को जन्म देने से लेकर कम से कम 5-6 साल तक तो वह उसे नहलाती –धुलाती है ही, दिन भर में कई-कई बार उसकी नैप्पी बदलती है। बिचारी औरत! अब अगर वह उसी लेखक की तरह धर्म संकट में पड़ी तो सबसे पहले हमारे यही लेखक-समीक्षक उसमें माँ का महान रूप खोजने लग जाएंगे और नारी या उस महिला पात्र की खील-बखिया उधेड़ देंगे। साथ ही, उस लेखिका के खिलाफ भारतीय संस्कृति के क्षरण का इलज़ाम लगाकर उसपर केस-मुकदमा भी ठोंक दें तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी।

      हाय रे छम्मकछल्लो! आज भी औरत की सबसे बड़ी पहरेदारी उसकी देह को लेकर है। औरत देह से शुद्ध तो सबकुछ शुद्ध। याद है अपर्णा सेन की फिल्म “परोमा” या दीपा मेहता की “फायर”? देह के खुलते ही परोमा को घर में सबसे नफरत भरी दृष्टि मिलने लगती है तो फायर में सास की सेवा कर रही शबाना आजमी पर सास थूक देती है। ध्यान दें, दोनों ही चरित्र अपने कर्तव्य-पालन में कहीं से चूकी नहीं हैं। परोमा बनी राखी भी घर के सारे काम पूर्ववत करती रहती है और शबाना आजमी भी सास की सेवा। लेकिन, अपनी देह और उसकी आज़ादी पर ध्यान रखते ही उसके ऊपर से लोगों के भाव बदल जाते हैं। क्या पुरुषों के साथ ऐसा संभव है? यदि हाँ, तो ऐसी कहानी लिखने या ऐसी सोच रखनेवालों के प्रति समाज क्यों नहीं उठता? महिलाओं को देह और सोच की आजादी क्यों नहीं मिल रही? देह पर लिखनेवालियों के प्रति छम्मकछल्लो का लेखन –समाज इतना कठोर और क्रूर क्यों है? छम्मकछल्लो को जवाब नहीं मिल रहा। आपके पास है तो दीजिये, ज़रा! ### 

Saturday, October 24, 2009

देख भाई देख, ताल ठोंक के देख!

पिछले दिनों मोहल्ला लाइव पर रवीश कुमार ने दो तसवीरें भेजी थीं जिनमें माँ बहन की गाली देते हुए लोगों से उस स्थान पर लघुशंका न कराने के लिए कहा गया था। छम्मक्छल्लो के लिए भी यह एक अनोखी बात थी। उस तस्वीर और उस पर आधारित लेख पर यह प्रतिलेख। मोहल्ला लाइव पर भी यह है। लिंक है- http://mohallalive.com/2009/10/24/vibha-rani-react-on-ravish-mobile-photo/ पढ़ें और अपनी राय दें।

हा हा हा हा! छम्मक्छल्लो की हंसी रुक नहीं रही. वह दाद पर दाद दे रही है. वाह रवीश जी वाह और वाह अविनाश जी वाह! और वाह वाह इस लघुशंका निषेध के लेखक जी के लिए भी. मान लीजिए इन्हें भी लेखक. इतने अभिनव विचार तो किसी बडे व महान लेखक के पास भी नहीं होंगे कि वह इतने मर्दाना अंदाज़ में देह की प्राकृतिक ज़रूरत से फारिग होने पर किसी को लानत मलामत भेजे. जिन साहबानों ने लिखा होगा, वे वाकई ओरिजिनल राइटिंग और थॉट के लिए पुरस्कार के पात्र हैं. यह भी बेखटके और बेखौफ कहा जा सकता है कि इतनी उच्च और विरल लेखनी किसी साहबान की ही होगी, किसी साहिबा की नहीं.
देखिए, आप सब नाहक माथापच्ची कर रहे हैं. छम्मक्छल्लो ने पहले भी लिखा था कि गाली देना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसमें मां बहन का इस्तेमाल हमारा आपद धर्म. इससे आप हमें बेदखल नहीं कर सकते. दूसरे हमारे भीति भाव को तो तुलसीदास जी भी अपने समय में अनुभव कर गए थे, इसीलिए लिख भी गये कि ‘बिन भय होंहि न प्रीति’ तो, जबतक आप किसी बात का भय नहीं दिखाएंगे, लोग आपकी बात नहीं मानेंगे. गांधी जी के सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए किसी से अनुरोध वाली भाषा में कहेंगे कि भाई साहब, यहां पर अपनी शंका का समाधान मत करें तो वह पलट कर आपसे ही कह बैठेगा कि “क्यों? यह ज़मीन क्या तेरे बाप की है?” फिर आप क्या कर लेंगे?
यह हमारा देश है और हमें हर तरह की अभिव्यक्ति की आज़ादी मिली हुई है, सो हम अपनी आज़ादी का प्रदर्शन कर रहे हैं. छम्मकछल्लो जब छोटी थी तो देखती थी कि शहर के कुछ लडके और मर्द ऐसे होते थे, जिन्हें किसी लडकी या औरत को देखते ही अपनी मर्दानगी को आज़ादी देने की ऐसी सख्त ज़रूरत आन पडती थी कि देह को वस्त्र से आज़ाद किए बगैर उनकी आत्मा को चैन नही आता था. ऐसी आज़ादी का प्रदर्शन महिलाओं और स्त्रियों के सामने ही किया जाता है और वे सब अपनी इस आज़ादी का भरपूर इस्तेमाल बेखटके और निस्संकोच करते थे. अब जब आप ऐसी वैसी ज़बान में लिखेंगे तो हो सकता है, लोग डर जाएं या तनिक शर्मा ही जाएं. वो कहते हैं ना कि नंगे से तो ख़ुदा भी डरता है.
डरने को तो लोग भगवान से भी डरते हैं और नहीं भी डरते. अब बेचारे भगवान को भी ऐसे सार्वजनिक जगह पर अपनी अपनी छवियों की प्रदर्शनी करनी होती है ताकि लोग उन जगहों पर थूके नहीं, अपनी लघु या दीर्घ शंकाओं का समाधान ना करें. असली सर्व धर्म सम भाव यहीं पर दिखता है. असली सर्व धर्म सम डर भी. एक धर्म के भगवान को लगाओगे तो दूसरे धर्मवाले उसपर अपनी शारीरिक क्षमता की मिसाल छोड देंगे. सो वहां राम भी हैं, वाहे गुरु भी, सांईबाबा भी हैं, यीशू मसीह भी, काबा भी है और रजनीश भी.
नियम कानून की बात ना करें. उसे तोडने में हमसे सिद्धहस्त और कौन हो सकता है? नियम हमारे यहां बनाए ही इसीलिए जाते हैं कि उसे तत्क्षण कैसे तोड दिया जाए? अब गाली देना सभ्य समाज की निशानी नहीं मानी जाती है. तो हमें आप बताइये कि हम सभ्य हैं क्या? अगर हम सभ्य ही हुए रहते तो गाली को भूल ना चुके होते? सभ्य ही होते तो राह चलती लडकी, महिला को उठा कर उसके साथ रेप करने से बाज़ ना आते? सभ्य ही होते तो दिन दहाडे किसी का खून होते देख उसके रक्षार्थ उठते नहीं? सभ्य ही होते तो किसी भी औरत को दिन दहाडे नग्न करके घुमाने की घटना पर चुल्लू भर पानी में डूब ना जाते? सभ्य ही होते तो धर्म, जाति, वर्ण आदि के नाम पर चल रहे खूंरेजी खेल से बाज़ ना आते? काहे को सभ्य भई? और किसलिए हों? हमारे देश के संविधान में कहीं यह लिखा हुआ है कि हमें सभ्य होना ही है?
और छम्मकछल्लो को तो और भी खुशी हो रही है. कम से कम इस प्रसंग में देश की आधी आबादी को तो मुक्ति मिल गई. भई, यह आधी आबादी मज़ाल है जो बीच सडक पर दिन दहाडे अपनी नैसर्गिक ज़रूरत पूरी करने के लिए बैठ जाएं? उनकी ही तरह उनकी अनिवार्य प्राकृतिक ज़रूरतें भी देह के किसी कोने में सिमटती, घुटती कई कई बीमारियों तक को जन्म दे देती हैं. वे तो एक गुपचुप सा कोना तलाशती हैं, फुसफुसाकर अपनी ज़रूरत का बयां करती हैं. निपट आने पर कुछ क्षण नज़रें नहीं उठातीं.
छम्मकछल्लो 20 साल पहले दिल्ली में थी. तब की नौकरी में उसे तमाम सरकारी दफ्तरों, उपक्रमों व बैंकों में सम्पर्क कार्य करना होता था. वह नई थी, इसलिए उसकी एक दोस्त उसे अपने साथ जगह जगह ले जा रही थी. तब नेहरु प्लेस भी नया ही था. उन दोनों को घूमते घूमते सुबह से दोपहर हो गई. कहीं किसी जगह प्रसाधन का कोई बोर्ड नहीं दिखा. उन दोनों का बुरा हाल, ज़रूरत से निपटने के लिए भी और शर्म से भी कि कैसे किसी आदमी से पूछें (कोई औरत नज़र नहीं आ रही थी). अंत में उसकी दोस्त ने एक आदमी से अंग्रेजी में पूछा (अंग्रेजी में भदेसपन थोडा कम आता है ना). उस सज्जन ने कहा कि उनके दफ्तर में अलग से महिलाओं के लिए कोई प्रसाधन नहीं है. अंत में वे दोनों उसी प्रसाधन के इस्तेमाल के लिए मज़बूर हुईं और जब बाहर निकलीं तब सर ऐसे झुके हुए थे कि उन सज्जन का चेहरा देखे बगैर ही उन्हें धन्यवाद करके भाग लीं. रवीश जी ने जो तस्वीरें भेजीं हैं, उसमें क्रिया भी पुल्लिंग है. इसलिए कम से कम छम्मकछल्लो को तो सुकून मिला कि यह उन जैसों के लिए नहीं है. हां, अब गाली में यह आधी आबादी है तो इसके लिए क्या