http://www.janatantra.com/news/2010/05/19/a-comment-on-hinduism-of-hindus/#comments
छम्मकछल्लो की समझ में नहीं आता कि वह अपने ही धर्म के भाई लोगों को क्या कहे? भाई लोग कहते हैं कि वे सच्चे हिंदू हैं, नारे भी देते हैं कि “गर्व से कहो, हम हिंदू हैं” और अपने इसी गौरवांवित धर्म की ऐसी की तैसी कर देते हैं।
हिंदू धर्म कहता है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते…” और हिंदू भाई लोग अपने ही इस मंत्र के विरुद्ध चले जाते हैं। धर्मकहता है, ‘कर्म किये जाओ, फल की चिंता मत करो’ और मानने की बात पर हिंदू भाई लोग अपने जन्म पर आधारित धर्म और जाति की बात करने लगते हैं। यह इन पढे-लिखे, उच्च विचार वाले हिंदुओं से कैसे कहा जाए कि हिंदू होना अपने कर्म के ऊपर नहीं है। जिस तरह से अपने मां बाप को चुनना किसी के बस में नहीं है, उसी तरह किसी धर्म विशेष में जन्म लेना भी। हमने-आपने जिस मां-बाप के यहां जन्म ले लिया, ले लिया, इसी तरह जिस धर्म या देश के परिवार में पैदा हो गए, हो गए। उस लिहाज़ से छम्मकछल्लो भी एक हिंदू घर में पैदा हो गई, इसलिए वह भी हिंदू हो गई। और छम्मकछल्लो को अपने हिंदू होने पर गर्व है, जब वह अपने ही धार्मिक ग्रंथों में इतनी इतनी प्रगतिशील बातें पाती हैं।
लेकिन, हिंदू भाई लोग धर्म की बात आने पर राधा-कृष्ण को पूजेंगे और अपने बच्चों के प्रेम की बात आने पर उसे धमकी देंगे और निरुपमा पाठक की तरह उसे जान से भी मार देंगे।
देखिए न, सभी धर्म-परायण हिंदू भाई लोग अपने यहां की स्त्रियों से साल में एक दिन हरतालिका व्रत करने की बात करते हैं। जो इस व्रत को जानते हैं, उन्हें पता है कि हिमराज ने जब अपने पुत्री पार्वती का ब्याह विष्णु के साथ तय कर दिया तो शिव को चाहनेवाली पार्वती तुरंत घर छोडकर चली जाती है। देवी-देवताओं की उम्र शायद हज़ारों-लाखों साल की होती है, इसलिए पार्वती हज़ारों–हज़ारो साल तपस्या करके शिव को प्राप्त करती है- पति रूप में। छम्मकछल्लो अपनी मां से पूछती थी कि अगर आज कोई लडकी ऐसे अपने पति या प्यार को पाने के लिए घर छोडकर चली जाए तो? मां तो मुस्कुरा कर रह जाती थी, मगर आज छम्मकछल्लो के सामने जवाब के रूप में है- निरुपमा पाठक जैसी कई-कई लडकियां। छम्मकछल्लो ने भी अपने शिव को पाने के लिए क्या-क्या नहीं झेला. शुक्र था कि वह निरुपमा बनने से बच गई.
आज लडकियां बिन ब्याहे मां बन जाए तो भूचाल आ जाता है। मगर हिंदू धर्मवाले जानते हैं कुंती को, वेदव्यास की माता सत्यवती को। सत्यवती ने बाद में अपनी ही बहुओं को वेदव्यास के पास भेजा, संतान प्राप्ति के लिए। बहुओं से बात नहीं बनने पर दासी को भेज दिया। बहुओं ने धृतराष्ट्र और पांडु दिए तो दासी ने विदुर। अब कोई बताए कि जाति या पद से ओछा होने से क्या संतान निर्बुद्धि पैदा होता है, क्या विदुर बेवकूफ थे? लोग कहते हैं दूसरी जाति में ब्याह करने पर संतान वर्ण संकर होता है। इस वर्ण संकर के भी बडे लफडे हैं भाई। इस पर फिर कभी।
पांडु-पत्नी कुंती कुंवारी मां बनी और ब्याह के बाद भी अन्य पुरुषों के संसर्ग से संतान पैदा किए। यही नहीं, मन में कहीं कोई चोर बैठा होगा, इसलिए अपनी सौत माद्री को भी दूसरे पुरुषों के संसर्ग से संतान उत्पन्न करवाए और अपनी बहू द्रौपदी को भी अपने पांच बेटों में बांट दिया। द्रौपदी आजन्म कृष्ण को अपना सखा मानती रही। आज कोई ब्याहता किसी अन्य पुरुष के लिए ऐसा सोचे तो उसका अपना ही पति उसे सबसे पहले दुश्चरित्र ठहराएगा।
श्री राम रावण के मरने के बाद मंदोदरी का ब्याह विभीषण से और बाली के मरने के बाद उसकी पत्नी तारा का ब्याह उसके देवर सुग्रीव से करवा देते हैं और भाई लोग कहते हैं कि अपने हिन्दू धर्म में विधवा ब्याह वर्जित है। इंद्र द्वारा गौतम पत्नी अहिल्या से व्यभिचार करने के बाद श्रीराम अहिल्या को व्यभिचारिणी और दुश्चरित्रता के आरोप से मुक्त कराते हैं। यहां किसी की हिम्मत नहीं कि वह ऐसा कर ले? उल्टा उस लडकी को माल समझ कर उसे भद्दे प्रस्ताव देंगे. हिन्दू धर्म के किसी भी बडे चरित्र ने याद नहीं कि कभी ऐसा किया हो.
इन सबसे यह तो पता चलता है कि समाज जिसे स्वीकार कर ले, उसपर कोई आंच नहीं उठाता। आज के हिंदू दावा तो करते हैं बडे हिंदू होने का, मगर कैसा दावा और किसका दावा यार! सच्चे हिंदू हो तो अपनी ही परम्परा का पालन करो ना। अपनी बेटियों को कुंती, अहिल्या, द्रौपदी, तारा, मंदोदरी जैसी पन्चकन्या या पार्वती जैसी प्रेम की पक्की होने तो दो। बिना ब्याह के भी वेदव्यास जैसा तपस्वी पैदा तो करने दो। अगर नहीं तो अपने हिंदूपने पर गर्व करना छोड दो। अपने इस तथाकथित हिंदुत्व को भी छोड दो। सनातन धर्म क्या कहता है, क्या पता। परंतु हिंदू ग्रंथ तो ये सब कहते ही हैं ना। अब या तो इन धर्म ग्रंथों को मिटा दो या अपनी विचारधारा में भर आए कूडे-कर्कट को साफ करके उसे स्वच्छ-शुद्ध कर लो। शास्त्रों में कुछ और, और अपनी करनी-कथनी में कुछ और! महान हिंदू धर्म यह तो कतई नहीं कहता। हिंदू धर्म की बातों को ही गलत ठहरानेवाले और उसी हिंदू धर्म पर गर्व से सर को हिमालय से भी अधिक ऊंचा करनेवाले हे तथाकथित हिंदुओ! तुम्हारी जय (?) हो!
Tensions in life leap our peace. Chhammakchhallo gives a comic relief through its satire, stories, poems and other relevance. Leave your pain somewhere aside and be happy with me, via chhammakchhallokahis.
Friday, May 21, 2010
Tuesday, May 18, 2010
एयर होस्टेस कितना बतियाती हैं?
छम्मकछल्लो देश की तरक्की से बहुत खुश है. उस दिन उसने अखबार में पढा कि भारत की तरक्की देखकर ओबामा के पसीने छूटे. छम्मकछल्लो के भी पसीने छूट जाते हैं, अपने देश की तरक्की देख कर. अमेरिका कह्ता है कि भारत दूसरी विश्व शक्ति बनने जा रहा है. अमेरिका जो कहता है, सही कहता है. उससे इंकार करने की ज़ुर्रत हममें नहीं है.
छम्मकछल्लो की भी यह ज़ुर्रत नहीं है कि वह किसी भी बात से इंकार करे. तब तो और भी नहीं, जब मामला किसी लडकी, उसके रूप-रंग, उसकी प्रतिभा (?), उसकी काबिलियत से जुडा हो. विमान सेवा भी एक सेवा है. इसे सुंदर बनाए रखने के लिए सुंदर-सुंदर विमान परिचारिकाएं होती हैं. सुंदर तो कुछ भी हो, किसी भी जगह या क्षेत्र में हो, मन को भाती है. ऐसे में हर क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं का सुंदर होना लाजिमी हो जाना चाहिये, चाहे वह नर्स हो, डॉक्टर हो, वैज्ञानिक हो, इंजीनियर हो. सुंदर तो घर की बहुओं का होना भी लाजिमी है. आखिर अगली संतति सुंदर होनी चाहिये कि नहीं?
छम्मकछल्लो के मूढ मगज़ में नहीं आता कि एयर होस्टेस के लिए तथाकथित सुंदर होना लाजिमी क्यों है? क्या एयरलाइंस उसकी सुंदरता के बल पर चलते हैं? क्या कम सुंदर लडकियों द्वारा दी जानेवाली सेवाएं कुरूप या कम असरकारी होती हैं? एयर होस्टेस का काम आखिर अपने अतिथियों (किंगफिशर एयरलाइन को धन्यवाद कि उसके द्वारा ‘अतिथि’ के प्रयोग के कारण अब सभी एयलाइनों के पैसेंजर, यानी यात्री लोग अतिथि रूप में बदल गए.) को उडान के दौरान आवश्यक सेवाएं देना होता है. और यह सेवा कोई दुर्वासा भाव से न तो करवाता है और ना कोई रम्भा या मेनका भाव से करती है. मगर लोग अपनी मानसिकता ही बदल दे तो कोई क्या करे? पता नहीं राजा राम के समय के पुष्पक विमान की क्या स्थिति थी? सुंदरता के इसी दुराग्रह के कारण छम्मकछल्लो भी एयर होस्टेस बनते- बनते रह गई. उसकी इस इच्छा पर सभी ने छूटते ही कहा था कि “शक्ल देखी है अपनी?”
शकल के साथ साथ अकल भी देख लेने की बात कही गई. और अकल तो अपने देश में उसी के पास होती है, जिसके पास अंग्रेजी की ताक़त होती है. अंग्रेज गए तो शासन की ताक़त ले गए. मगर भाषा की ताक़त यहीं छोड गए. वे जानते थे कि किसी को मन से गुलाम बना कर रखना है तो उसकी ज़बान में घुस जाओ. देश छोड दिया, राजनीतिक ताक़त छोड दी, मगर हमारे मन में बसे रहे- प्रीतम आन बसो मेरे मन में. इतने कि देश के आज़ाद होने के बाद भी हम यह नहीं मानते कि हमारे देश की अपनी एक भाषा है, या हो सकती है. लोग अपने ही देश की भाषाओं पर आपसी लडाई करते हैं, अंग्रेजी के खिलाफ नहीं बोलते. बोलें भी कैसे? आखिर वह अतिथिकी भाषा है और अपने देश में “अतिथिदेवो भव:” होता है. देश गुलाम था तो लोग आज़ादी की बात हिंदी में करते थे. देश अब आज़ाद है तो लोग अपनी बात अंग्रेजी में कहते हैं. देश जब आज़ाद हुआ, तब महात्मा गांधी ने पहला संदेश यह दिया कि बता दो दुनिया को कि गांधी अंग्रेजी भूल गया. कुछ साल पहले देश के एक भूतपूर्व गृह मंत्री ने कह दिया कि अंग्रेजी इस देश से जानेवाली नहीं. लोगों को अंग्रेजी सीखनी चाहिये. जान लें कि भारत सरकार की राजभाषा नीति गृह मंत्रालय के अधीन ही आती है.
हाल में एक खबर आई कि देश में एक लडकी, कहा गया कि वह अनुसूचित जाति से थी, ने अपने कैरियर के रूप में एयर होस्टेस के पेशे को अपनाना चाहा. उसने इसका प्रशिक्षण देनेवाली अकादमी में नाम भी लिखा लिया. प्रशिक्षण पूरा भी हो गया. मगर नौकरी की बात आने पर कहा गया कि ना जी, उसका ‘फिजिकल अपीयरेंस’ एयर होस्टेस के लायक नहीं था और दूसरे यह कि उसकी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी. खुशी की बात तो यह है कि ऐसा एयरलाइन के साथ साथ देश की व्यवस्था भी कह गई. अंग्रेजी में भसपन नहीं है ना. हो भी तो हमें पता नहीं. वरना सीधे सीधे कहो ना कि छोकरी बदसूरत है.
छम्मकछल्लो जानती है कि हम अपनी पुरानी परम्परा से बहुत प्यार करते हैं. सौंदर्य प्रेम और अंग्रेजी प्रेम उसी परम्परा में आता है. अब वह क्या करे कि उस लडकी पर ख्याल सवाल बन जाता है कि अगर रूप और अंग्रेजी इस नौकरी के लिए इतना ही महत्वपूर्ण है तो उस अकादमी ने उसे अपने यहां प्रशिक्षण देने के लिए भर्ती ही क्यों किया? उसे क्यों नहीं बताया कि बच्ची, तू मन से अच्छी हो सकती है, दिमाग से तेज भी हो सकती है, मगर तेरा रूप रंग इस पेशे के माकूल नहीं है. अकादमी ने अपने प्रशिक्षण के दौरान उसे इतनी अंग्रेजी की ट्रेनिंग क्यों नहीं दी कि वह सामान्य बातचीत अंग्रेजी में कर सकती? क्या यह कहा जा सकता है कि तब अकादमी का शुद्ध उद्देश्य पैसा कमाना होगा? आखिर क्यों रूप और भाषा से मिसफिट एक लडकी को उसमें भर्ती किया गया?
अब जब नौकरी देने की बात आई तब उसके रूप और भाषा का हवाला देते हुए उसे नौकरी नहीं दी गई? क्या एयर होस्टेसों को विमान में भाषण देना होता है? विमान प्रचालन और तकनीकी जानकारी के लिए उसे जो बोलना होता है, वह लिखा होता है, जिसे वह पढ कर सुनाती है. बाकी समय बमुश्किल वह अपने अतिथियों से 4-5 लाइनें बोलती हैं? तो क्या नौकरी देनेवाली एयर लाइन उसे इतने का भी आत्मविश्वास नहीं दे सकता था? लोग कहते हैं कि “संगत से गुन आत है, संगत से गुन जात.” अंग्रेजी की चाशनी में पगी दूसरी एयर होस्टेसों के साथ रह कर वह इतनी अंग्रेजी तो सीख ही लेती. मगर नहीं. इतनी मेहनत कौन करे? इतना परेशान होकर अकादमी या एयर लाइन चलाने के लिए हम थोडे ना बैठे हैं और ना ही समाज सेवा करने के लिए.
अब एक अधिनियम यह पास हो ही जाना चाहिये कि इस देश में जिसे अपनी प्रतिष्ठा से रहना हो, उसे अंग्रेजी हर हाल में आनी चाहिये. लडकियो! तुम्हारे लिए इसके साथ साथ तुम्हारा सुंदर होना भी अनिवार्य है. अगर तुम सुंदर नहीं हो तो तुम्हारा जीना बेकार है. मन से अच्छी हो तो हो, मन दिखता थोडे ना है. हम तन देखते हैं, उसे देखने, छूने, भोगने की लालसा रखते हैं. इसलिए या तो सुंदर बनकर जनमो, या फिर जनमो ही मत. जनम भी गई तो मर जाने के लिए तुम आज़ाद हो. अपनी आज़ादी का प्रयोग करो इस देश की बदसूरत लडकियो!
छम्मकछल्लो की भी यह ज़ुर्रत नहीं है कि वह किसी भी बात से इंकार करे. तब तो और भी नहीं, जब मामला किसी लडकी, उसके रूप-रंग, उसकी प्रतिभा (?), उसकी काबिलियत से जुडा हो. विमान सेवा भी एक सेवा है. इसे सुंदर बनाए रखने के लिए सुंदर-सुंदर विमान परिचारिकाएं होती हैं. सुंदर तो कुछ भी हो, किसी भी जगह या क्षेत्र में हो, मन को भाती है. ऐसे में हर क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं का सुंदर होना लाजिमी हो जाना चाहिये, चाहे वह नर्स हो, डॉक्टर हो, वैज्ञानिक हो, इंजीनियर हो. सुंदर तो घर की बहुओं का होना भी लाजिमी है. आखिर अगली संतति सुंदर होनी चाहिये कि नहीं?
छम्मकछल्लो के मूढ मगज़ में नहीं आता कि एयर होस्टेस के लिए तथाकथित सुंदर होना लाजिमी क्यों है? क्या एयरलाइंस उसकी सुंदरता के बल पर चलते हैं? क्या कम सुंदर लडकियों द्वारा दी जानेवाली सेवाएं कुरूप या कम असरकारी होती हैं? एयर होस्टेस का काम आखिर अपने अतिथियों (किंगफिशर एयरलाइन को धन्यवाद कि उसके द्वारा ‘अतिथि’ के प्रयोग के कारण अब सभी एयलाइनों के पैसेंजर, यानी यात्री लोग अतिथि रूप में बदल गए.) को उडान के दौरान आवश्यक सेवाएं देना होता है. और यह सेवा कोई दुर्वासा भाव से न तो करवाता है और ना कोई रम्भा या मेनका भाव से करती है. मगर लोग अपनी मानसिकता ही बदल दे तो कोई क्या करे? पता नहीं राजा राम के समय के पुष्पक विमान की क्या स्थिति थी? सुंदरता के इसी दुराग्रह के कारण छम्मकछल्लो भी एयर होस्टेस बनते- बनते रह गई. उसकी इस इच्छा पर सभी ने छूटते ही कहा था कि “शक्ल देखी है अपनी?”
शकल के साथ साथ अकल भी देख लेने की बात कही गई. और अकल तो अपने देश में उसी के पास होती है, जिसके पास अंग्रेजी की ताक़त होती है. अंग्रेज गए तो शासन की ताक़त ले गए. मगर भाषा की ताक़त यहीं छोड गए. वे जानते थे कि किसी को मन से गुलाम बना कर रखना है तो उसकी ज़बान में घुस जाओ. देश छोड दिया, राजनीतिक ताक़त छोड दी, मगर हमारे मन में बसे रहे- प्रीतम आन बसो मेरे मन में. इतने कि देश के आज़ाद होने के बाद भी हम यह नहीं मानते कि हमारे देश की अपनी एक भाषा है, या हो सकती है. लोग अपने ही देश की भाषाओं पर आपसी लडाई करते हैं, अंग्रेजी के खिलाफ नहीं बोलते. बोलें भी कैसे? आखिर वह अतिथिकी भाषा है और अपने देश में “अतिथिदेवो भव:” होता है. देश गुलाम था तो लोग आज़ादी की बात हिंदी में करते थे. देश अब आज़ाद है तो लोग अपनी बात अंग्रेजी में कहते हैं. देश जब आज़ाद हुआ, तब महात्मा गांधी ने पहला संदेश यह दिया कि बता दो दुनिया को कि गांधी अंग्रेजी भूल गया. कुछ साल पहले देश के एक भूतपूर्व गृह मंत्री ने कह दिया कि अंग्रेजी इस देश से जानेवाली नहीं. लोगों को अंग्रेजी सीखनी चाहिये. जान लें कि भारत सरकार की राजभाषा नीति गृह मंत्रालय के अधीन ही आती है.
हाल में एक खबर आई कि देश में एक लडकी, कहा गया कि वह अनुसूचित जाति से थी, ने अपने कैरियर के रूप में एयर होस्टेस के पेशे को अपनाना चाहा. उसने इसका प्रशिक्षण देनेवाली अकादमी में नाम भी लिखा लिया. प्रशिक्षण पूरा भी हो गया. मगर नौकरी की बात आने पर कहा गया कि ना जी, उसका ‘फिजिकल अपीयरेंस’ एयर होस्टेस के लायक नहीं था और दूसरे यह कि उसकी अंग्रेजी अच्छी नहीं थी. खुशी की बात तो यह है कि ऐसा एयरलाइन के साथ साथ देश की व्यवस्था भी कह गई. अंग्रेजी में भसपन नहीं है ना. हो भी तो हमें पता नहीं. वरना सीधे सीधे कहो ना कि छोकरी बदसूरत है.
छम्मकछल्लो जानती है कि हम अपनी पुरानी परम्परा से बहुत प्यार करते हैं. सौंदर्य प्रेम और अंग्रेजी प्रेम उसी परम्परा में आता है. अब वह क्या करे कि उस लडकी पर ख्याल सवाल बन जाता है कि अगर रूप और अंग्रेजी इस नौकरी के लिए इतना ही महत्वपूर्ण है तो उस अकादमी ने उसे अपने यहां प्रशिक्षण देने के लिए भर्ती ही क्यों किया? उसे क्यों नहीं बताया कि बच्ची, तू मन से अच्छी हो सकती है, दिमाग से तेज भी हो सकती है, मगर तेरा रूप रंग इस पेशे के माकूल नहीं है. अकादमी ने अपने प्रशिक्षण के दौरान उसे इतनी अंग्रेजी की ट्रेनिंग क्यों नहीं दी कि वह सामान्य बातचीत अंग्रेजी में कर सकती? क्या यह कहा जा सकता है कि तब अकादमी का शुद्ध उद्देश्य पैसा कमाना होगा? आखिर क्यों रूप और भाषा से मिसफिट एक लडकी को उसमें भर्ती किया गया?
अब जब नौकरी देने की बात आई तब उसके रूप और भाषा का हवाला देते हुए उसे नौकरी नहीं दी गई? क्या एयर होस्टेसों को विमान में भाषण देना होता है? विमान प्रचालन और तकनीकी जानकारी के लिए उसे जो बोलना होता है, वह लिखा होता है, जिसे वह पढ कर सुनाती है. बाकी समय बमुश्किल वह अपने अतिथियों से 4-5 लाइनें बोलती हैं? तो क्या नौकरी देनेवाली एयर लाइन उसे इतने का भी आत्मविश्वास नहीं दे सकता था? लोग कहते हैं कि “संगत से गुन आत है, संगत से गुन जात.” अंग्रेजी की चाशनी में पगी दूसरी एयर होस्टेसों के साथ रह कर वह इतनी अंग्रेजी तो सीख ही लेती. मगर नहीं. इतनी मेहनत कौन करे? इतना परेशान होकर अकादमी या एयर लाइन चलाने के लिए हम थोडे ना बैठे हैं और ना ही समाज सेवा करने के लिए.
अब एक अधिनियम यह पास हो ही जाना चाहिये कि इस देश में जिसे अपनी प्रतिष्ठा से रहना हो, उसे अंग्रेजी हर हाल में आनी चाहिये. लडकियो! तुम्हारे लिए इसके साथ साथ तुम्हारा सुंदर होना भी अनिवार्य है. अगर तुम सुंदर नहीं हो तो तुम्हारा जीना बेकार है. मन से अच्छी हो तो हो, मन दिखता थोडे ना है. हम तन देखते हैं, उसे देखने, छूने, भोगने की लालसा रखते हैं. इसलिए या तो सुंदर बनकर जनमो, या फिर जनमो ही मत. जनम भी गई तो मर जाने के लिए तुम आज़ाद हो. अपनी आज़ादी का प्रयोग करो इस देश की बदसूरत लडकियो!
Wednesday, April 28, 2010
मुंबई ब्लॉगर्स मीट- बोलती तस्वीरें! भूल सुधार! माफी-माफी!बार-बार माफी!
भूल, भूल, बहुत बडी भूल! माफी, माफी, सबसे माफी! न कोई इरादा, न कोई मंशा, मगर भूल मंशे के साथ तो नहीं की जाती. छम्मकछल्लो की उतावली अपने पहले ब्लॉगर्स मीट की चन्द तस्वीरें ब्लॉग पर डालने की. आधी रात में उसे समय मिला, आधी रात में उसने डाल दी. एक तस्वीर में घुघुती जी की साइड प्रोफाइलवाली तस्वीर चली गई. छम्मकछल्लो ने उन्हें कहा था कि वह उनकी तस्वीर हर्गिज़ नहीं डालेगी, अगर वे नहीं चाहती. किसी के निजी जीवन की बातों की मर्यादा तो निभाई ही जानी चाहिये. मगर यह तस्वीर चली गई और यार लोगों को जैसे एक छुपा खज़ाना मिल गया. बच्चों से किलक उठे कि भई हां जी, हमने घुघुती जी आपको देख लिया. तस्वीर की जगह भी बता दी. छम्मकछल्लो शाम में ही ब्लॉग से मुखातिब हो पाती है. लेकिन शाम में घर जाने के रास्ते पर थीं कि एक भाई का फोन आ गया. छम्मकछल्लो ने कहा कि वह घर जा कर सबसे पहला काम यही करेगी. कि तभी एक दूसरे शुभचिंतक का आ गया. छम्मकछल्लो के कहने के बावज़ूद वे पांच मिनट तक अपनी अमृतवाणी से छम्मकछल्लो को आप्यायित करते रहे. फिर फोन रखा और फिर तुरंत फोन किया. नसीहत दी, फिर फोन धर्मपत्नी को पकडा दिया. आखिर उन्हें भी तो अपनी मर्यादा निभानी थी. पति और पत्नी दो अर्धांग मिलकर पूर्णांग बनते हैं, इसलिए दोनों की लानत-मलामत से छम्मकछल्लो कबीर के अनह्द नाद की तरह ऊपर से नीचे तक सराबोर हो गई. अभी वह ब्लॉग को एडिट कर रही है. घुघुती जी वाली तस्वीर निकाल दी है. अब छम्मकछल्लो अपने पूरे होशो-हवास के साथ पत्नी जी के आदेशों का पालन करते हुए यह माफीनामा लिख रही है. जान लीजिए कि उसका मकसद घुघुती जी को तस्वीर के माध्यम से जग जाहिर नहीं करना था. करना ही होता तो सामने के प्रोफाइलवाली कई तस्वीरें उसके पास हैं, वही लगा देती. लेकिन इतनी मर्यादा का तो उसे भी पता है. पर नहीं जी. शायद अपनी दुनिया में ऐसा नहीं होता. कहावत है- "छमा बडेन को चाहिये, छोटन को अपराध!" तो आप सब ब्लॉगर सुधिजन, इस नाचीज़ छम्मकछल्लो को मा कर दीजिये. क्षमा! क्षमा!! क्षमा!!!भई, क्या हुआ, गर छम्मकछल्लो तनिक सुस्त है और झट से पोस्ट नहीं डाली. कहावत है ना कि देर आयद दुरुस्त आयद! शायद दिल बहल्लने को ग़ालिब ये ख़्याल अच्छा है. जब बात अपने से ना बने तो च्चा घालिब पर छोड दो. तो साहबानो, ये कोई पहला मीट नहीं था, गोय छम्मकछल्लो अलबता इस मुगालते में थी. हां, वह अपने जीवन के पहले ब्लॉगर्स मीट में थी. सारी बात रश्मि रविजा ने अपने ब्लॉग rashmiravija.blogspot.com पर लिखना ही दिया है. मैं उससे बेहतर तो लिखना नहीं पाऊंगी. बस, कुछ तस्वीरमय रिपोर्ट है. वो कहते हैं ना- "बोलती तस्वीरें. सबसे युवा ब्लॉगर कोशी भी थीं. दरअसल वह अपने स्कूल की यादें ताज़ा करने आई ठीक और अपनी हथेलियां फैला कर बता रही ठीक कि इस पोज़ में वह पिटाई खाने के लिए तैयार रहती थी. इस मीट की एक ज़द्दोज़हद यह भी रही कि घुघुती बासुती जी को कैसे कैमरे से अलग भी रखा जाए और उनकी तस्वीर न दिखाई जाए. और सबसे बडी बात यह कि जिस कारक के कारण इस मीट की व्यवस्था की गई थी, उसका ज़िक्र ही नहीं हुआ. और जब हुआ तो इतने चलताऊ तरीके से कि उसे आधे लोग रजिस्टर कर पाए, आधे नहीं. कारक नहीं बताएगी छम्मक्छल्लो. कभी-कभी कुछ बातों का छुपा रहना भी आनन्ददाई होता है. हूं...........! समझे?



Sunday, April 25, 2010
अब बेटियां बोझ नहीं!
छछम्मक्छल्लो को अभी तक याद है, वह उनकी दूसरी बेटी थी, जिसके जनम के समय वह वहां थी. पहली संतान भी बेटी थी. अभी भी कई घरों में दो बेटियां स्वीकार कर ली जाती थीं. वहां भी स्वीकार ली गईं कि साल भर बाद फिर से उनके मां बनने की खबर आई. समझ में आ गया कि इस तीसरी संतान का मकसद क्या है? मगर ऊपरवाले के मकसद को भला कौन पहचान पाया है? पता नहीं क्यों, ऐसेमाता-पिता के प्रति छम्मकछल्लो एक कटुता से भर जाती है और कह बैठती है कि तीसरी संतान भी बेटी ही हो! आखिर ऐसा क्या है जो बेटियां नहीं कर सकतीं. मगर लगा कि हां, बेटियां बेटों की तरह मां-बाप को एक निश्चिंतता नहीं दे सकतीं कि ऐ मेरे माता-पिता, हमारी तरफ से तुम बेफिक्र रहो. मुझे कभी कोई ताने नहीं देगा, कभी कोई राह चलते नहीं छेडेगा, कभी मेरे दहेज के लिए नहीं सोचना होगा, कभी मेरे कहीं आने-जाने से तुम्हें चिंतित नहीं होना पडेगा, कभी कुल का नाम रोशन करनेवाले के बारे में नहीं सोचना होगा, कभी मुखांगि देने वाला कौन होगा, इसके बारे में नहीं सोचना होगा, कभी रात आंखों में नहीं काटनी होगी कि इन बेटियों का पार घाट कैसे लगेगा?
छम्मकछल्लो क्या करे! यहां तीसरी संतान भी बेटी का ही रूप धरकर आ गई. पता नहीं, फिर क्या हुआ? अगर यह सुना कि तीनों अच्छे से पढ-लिख रही हैं. अभी दो की शादी भी हो गई. तीसरी पत्रकार है. कमाती है. कमाती पहले की दोनों भी थीं. मगर शादी के बाद छूट गया. बेटियां यह नहीं कह सकतीं कि मैया री, मुझसे पर तेरा हक तो मेरे ब्याह के बाद भी रहेगा. मैं पहले जैसी ही कम करती रहूंगी, उतनी ही आज़ाद भाव से विचरती रहूंगी.
पिता रिटायर हो गए. सभी जमा-पूंजी दोनों के ब्याह में खर्च हो गए. पेंशन मात्र हज़ार बारह सुअ की है. डेढ हज़ार तो मां के इलाज़ में ही खर्च हो जाते हैं. अब तीसरी ने कमान संभाली है. हर महीने निष्ठा पूर्वक घर पैसे भेजती है. मां का सीना गर्व से चौडा है. कहती है-" पहले बहुत लगता था कि तीन-तीन बेटियां हैं. अब नहीं लगता. अब तो मेरी ये तीनों ही मेरे आंख, नाक और काँच हैं. अभी तो यह छुटकी अहमारा खाना खर्चा चला रही है. तो अब बेटी और बेटे का क्या फर्क़!
मां की आंखों में झिलमिलाता गर्व छम्मकछल्लो को सुकून दे जाता है. फिर चिंता की एक रेख भी छोड जाता है. अभी ना! शादी के बाद? समाज अभी भी कहां यह अधिकार देता है कि शादी के बाद भी लडकियां अपने मां-बाप का ख्याल रख सकें. छम्मकछल्लो की मां भी कमाती थीं. उसके नाना मास्टर थे. तब मास्टरों के कमाई की आज के लोग सोच भी नहीं सकते थे. नाना को पेंशन नहीं मिलती थी. मामा पैसे नहीं भेजते थे. मां हर महीने मात्र 75 रुपए भेजती थी. इसके लिए भी हर माह वह इतना विरोध झेलती कि उस 75 रुपए के लिए उन्हें शायद 75 बार आंसू बहाने पडते थे. वह एक ही बात कहती कि क्या बेटी का अपने मां-बाप के लिए इतना भी कर सकने का अधिकार नहीं.
आज उनकी आंखों में तीन तीन बेटियों की मां होने का गर्व है और छम्मकछल्लो उस गर्व की ली हवा में बांसुरी की तरह बजना चाहती है. बस, भविष्य भी उन्हें यह गौरव देता रहे. आपके पास भी ऐसी बेटियां होंगी, उनकी ऐसी ही कहानियां होंगी. बांटिए ना उन्हें हम सबके साथ कि बेटियों के मा_बाप होने के गौरव से आकाश पट जाए, धरती हरी-भरी हो जाए, हवा में सुरीली खनक भर जाए! आखिए धान का बीज़ हैं बेटिया! सुनहली, खनकती, झनकती, फलसिद्धा बेटियां!
छम्मकछल्लो क्या करे! यहां तीसरी संतान भी बेटी का ही रूप धरकर आ गई. पता नहीं, फिर क्या हुआ? अगर यह सुना कि तीनों अच्छे से पढ-लिख रही हैं. अभी दो की शादी भी हो गई. तीसरी पत्रकार है. कमाती है. कमाती पहले की दोनों भी थीं. मगर शादी के बाद छूट गया. बेटियां यह नहीं कह सकतीं कि मैया री, मुझसे पर तेरा हक तो मेरे ब्याह के बाद भी रहेगा. मैं पहले जैसी ही कम करती रहूंगी, उतनी ही आज़ाद भाव से विचरती रहूंगी.
पिता रिटायर हो गए. सभी जमा-पूंजी दोनों के ब्याह में खर्च हो गए. पेंशन मात्र हज़ार बारह सुअ की है. डेढ हज़ार तो मां के इलाज़ में ही खर्च हो जाते हैं. अब तीसरी ने कमान संभाली है. हर महीने निष्ठा पूर्वक घर पैसे भेजती है. मां का सीना गर्व से चौडा है. कहती है-" पहले बहुत लगता था कि तीन-तीन बेटियां हैं. अब नहीं लगता. अब तो मेरी ये तीनों ही मेरे आंख, नाक और काँच हैं. अभी तो यह छुटकी अहमारा खाना खर्चा चला रही है. तो अब बेटी और बेटे का क्या फर्क़!
मां की आंखों में झिलमिलाता गर्व छम्मकछल्लो को सुकून दे जाता है. फिर चिंता की एक रेख भी छोड जाता है. अभी ना! शादी के बाद? समाज अभी भी कहां यह अधिकार देता है कि शादी के बाद भी लडकियां अपने मां-बाप का ख्याल रख सकें. छम्मकछल्लो की मां भी कमाती थीं. उसके नाना मास्टर थे. तब मास्टरों के कमाई की आज के लोग सोच भी नहीं सकते थे. नाना को पेंशन नहीं मिलती थी. मामा पैसे नहीं भेजते थे. मां हर महीने मात्र 75 रुपए भेजती थी. इसके लिए भी हर माह वह इतना विरोध झेलती कि उस 75 रुपए के लिए उन्हें शायद 75 बार आंसू बहाने पडते थे. वह एक ही बात कहती कि क्या बेटी का अपने मां-बाप के लिए इतना भी कर सकने का अधिकार नहीं.
आज उनकी आंखों में तीन तीन बेटियों की मां होने का गर्व है और छम्मकछल्लो उस गर्व की ली हवा में बांसुरी की तरह बजना चाहती है. बस, भविष्य भी उन्हें यह गौरव देता रहे. आपके पास भी ऐसी बेटियां होंगी, उनकी ऐसी ही कहानियां होंगी. बांटिए ना उन्हें हम सबके साथ कि बेटियों के मा_बाप होने के गौरव से आकाश पट जाए, धरती हरी-भरी हो जाए, हवा में सुरीली खनक भर जाए! आखिए धान का बीज़ हैं बेटिया! सुनहली, खनकती, झनकती, फलसिद्धा बेटियां!
Saturday, April 24, 2010
सरकारी अधिकारी के ताब? बाप रे बाप!
सरकारी नौकरी के बडे नखरे हैं भाई! छम्मक्छल्लो भी कभी सरकारी नौकरी में थी. मगर तब वह छोटी थी, उसे समझ में नही आते थे ये नखरे या उसे करना नहीं आता था. यह अनभिज्ञता अभी तक बरकरार है. ख़ुदा करम करें कि यह बनी रहे.
छम्मक्छल्लो अभी भोपाल गई थी. वहां उसकी पहचान के एक कहानीकार हैं. नाम है, इनाम है, इकराम है, सभी बडे साहित्यकार उन्हें जानते हैं, पहचानते हैं, मानते हैं, इसलिए बड़ी भी हैं. सभी बडी पत्रिकाओं में छपते हैं, सभी बड़े प्रकाशक उन्हें छापते हैं. देश से विदेश तक सभी उन्हें पुरस्कारों से नवाज़ते हैं. तो यह छम्मक्छल्लो का सौभाग्य ही था कि ऐसे लोग उसे ना केवल सम्मान देते थे, बल्कि उसे बहन भी कहकर बुलाते थे. छम्मक्छल्लो की आदत का क्या कहिये कि किसी ने किसी को बहन बोल दिया तो बस जी, उसमें और अपने सगे भाई में वह कोई फर्क़ ही नहीं कर पाती. इस चक्कर में वह कैयों से धोखा भी खा चुकी है, एकदम फिल्मी स्टाइल में. एक भाई ने एक लडकी को न केवल बडी दीदी कहा, बल्कि छम्मकछल्लो के सामने सालो-साल उससे राखी बन्वाता रहा. छम्मक्छल्लो उनके इस भाई-बहन के प्यार पर बलिहारी जाती रही कि अचानक उसने सुना कि वे दोनों शादी करने जा रहे हैं. जी, पुरानी बात है, मगर आज का यथार्थ यह है कि वे अब पति-पत्नी हैं. ऐसे बहुत से हादसे हुए हैं उसके साथ.
यह भी एक हादसा ही था. छम्मक्छल्लो हाल ही में भोपाल गई ठीक अपने इसी ब्लॉग के लिए यूएनएफपीए-लाडली मीडिया अवार्ड लेने के लिए. हमेशा की तरह उसने लपक कर अपने उस लेखक भाई को फोन किया, उत्साह से अपने आने का कारण बताया, आने का अनुरोध किया. तो जी, स्वर में ऐसा ठंढापन कि जाने किस कम्बख्त ने फोन कर लिया. आने की बात पर कहने लगे कि "अब मैं ऐसा-वैसा तो हूं नहीं कि जो जहां भी कहे, बुलाए, मैं सडक छाप कवियों की तरह मुंह बाए चला जाऊं." छम्मक्छल्लो की समझ में नहीं आया कि वह इस बात पर क्या प्रतिक्रिया दे? आखिर यह एक सम्माननीय कार्यक्रम था और मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री इस पुरस्कार को देने आनेवाले थे.
लेकिन तभी छम्मक्छल्लो के ध्यान में यह बात आई कि अब उस पर सरकारी अधिकारी के रुतबे का तमगा लग चुका है. यह तमगा अपना मन, मिजाज़, बोली, भाव सब बदल देता है. अगर आप भी इस श्रेणी में हैं तो बधाई आपको. कभी याद कीजिए कि क्या आपके इस व्यवहार से कभी किसी का जी दुखा है? अगर अभी तक इस साए से बचे रहे हैं तो भगवान ही मालिक है आपका. लोग तो कहेंगे ही कि देखी लो जी, अफसर भी बन गए और गऊ के गऊ ही बने रहे.
छम्मक्छल्लो अभी भोपाल गई थी. वहां उसकी पहचान के एक कहानीकार हैं. नाम है, इनाम है, इकराम है, सभी बडे साहित्यकार उन्हें जानते हैं, पहचानते हैं, मानते हैं, इसलिए बड़ी भी हैं. सभी बडी पत्रिकाओं में छपते हैं, सभी बड़े प्रकाशक उन्हें छापते हैं. देश से विदेश तक सभी उन्हें पुरस्कारों से नवाज़ते हैं. तो यह छम्मक्छल्लो का सौभाग्य ही था कि ऐसे लोग उसे ना केवल सम्मान देते थे, बल्कि उसे बहन भी कहकर बुलाते थे. छम्मक्छल्लो की आदत का क्या कहिये कि किसी ने किसी को बहन बोल दिया तो बस जी, उसमें और अपने सगे भाई में वह कोई फर्क़ ही नहीं कर पाती. इस चक्कर में वह कैयों से धोखा भी खा चुकी है, एकदम फिल्मी स्टाइल में. एक भाई ने एक लडकी को न केवल बडी दीदी कहा, बल्कि छम्मकछल्लो के सामने सालो-साल उससे राखी बन्वाता रहा. छम्मक्छल्लो उनके इस भाई-बहन के प्यार पर बलिहारी जाती रही कि अचानक उसने सुना कि वे दोनों शादी करने जा रहे हैं. जी, पुरानी बात है, मगर आज का यथार्थ यह है कि वे अब पति-पत्नी हैं. ऐसे बहुत से हादसे हुए हैं उसके साथ.
यह भी एक हादसा ही था. छम्मक्छल्लो हाल ही में भोपाल गई ठीक अपने इसी ब्लॉग के लिए यूएनएफपीए-लाडली मीडिया अवार्ड लेने के लिए. हमेशा की तरह उसने लपक कर अपने उस लेखक भाई को फोन किया, उत्साह से अपने आने का कारण बताया, आने का अनुरोध किया. तो जी, स्वर में ऐसा ठंढापन कि जाने किस कम्बख्त ने फोन कर लिया. आने की बात पर कहने लगे कि "अब मैं ऐसा-वैसा तो हूं नहीं कि जो जहां भी कहे, बुलाए, मैं सडक छाप कवियों की तरह मुंह बाए चला जाऊं." छम्मक्छल्लो की समझ में नहीं आया कि वह इस बात पर क्या प्रतिक्रिया दे? आखिर यह एक सम्माननीय कार्यक्रम था और मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री इस पुरस्कार को देने आनेवाले थे.
लेकिन तभी छम्मक्छल्लो के ध्यान में यह बात आई कि अब उस पर सरकारी अधिकारी के रुतबे का तमगा लग चुका है. यह तमगा अपना मन, मिजाज़, बोली, भाव सब बदल देता है. अगर आप भी इस श्रेणी में हैं तो बधाई आपको. कभी याद कीजिए कि क्या आपके इस व्यवहार से कभी किसी का जी दुखा है? अगर अभी तक इस साए से बचे रहे हैं तो भगवान ही मालिक है आपका. लोग तो कहेंगे ही कि देखी लो जी, अफसर भी बन गए और गऊ के गऊ ही बने रहे.
Friday, April 23, 2010
सरकारी अफसर हैं तो क्या हुआ?
सरकार भी न! अजीबोगरीब कायदे-कानून बनाती रह्ती है. एक नियम बना कर पाबंदी लगा दी कि सरकारी नौकरियों में अधिकतम दो बच्चों को ही जन्म दिया जा सकता है. पाबंदी इस अर्थ में कि इन नौकरियों को करनेवाले कर्मचारियों को सरकार की ओर से दी जानेवाली सुविधाएं केवल दो बच्चों तक ही सीमित रहेंगी. मगर हमारे लोग बडे उदारमना हैं. वे दो संतान से खुश नहीं होते. सात-आठ भाई-बहनोंवाले देश के लोगों से आप दो की संख्या पर ही खुश होने को कहते हैं? जैसे सात-आठ रोटियां खानेवाले से आप दो रोटियों में ही संतुष्ट हो लेने को कहें. लेकिन लोग सरकार की बात मानते हैं. आखिर नौकरी का सवाल है. इसलिए दो पर खुश रहने की कोशिश करते हैं, अगर वे दोनों अगर बेटे हों. मगर ईश्वर की नाराज़गी से अगर दोनों संतानें बेटियां हो गईं, तब तो मरने के किनारे तक भी आपका निस्तार नहीं, कुछ इस लोकगीत की तरह कि “ऐ बांझिन, तेरी तो मौत में भी मुक्ति नहीं”. दो बेटियों की मां होना बांझ से कमतर नहीं.
तब लोग सरकार को और उनके नियम, कायदे, कानून को भी धता बताने से बाज नहीं आते. बेटे की इस चाहत के पीछे शिक्षित- अशिक्षित का कोई भेद-भाव नहीं. छम्मकछल्लो का मन प्रसन्न हुआ कि चलो, इसमें तो कम से कम पढे-अनपढ का कोई भेद-भाव नहीं. आखिर कुल का नाम सभी को रोशन करना है. सभी को अपना अंतिम संस्कार अपने बेटे से करवाना होता है.
छम्मकछल्लो एक बहुत बडे अधिकारी के पास बैठी हुई थी. बडे अधिकारी अपने एक अपेक्षाकृत कम उम्र के अधिकारी से मिल रहे थे. स्नेहवश पूछ लिया कि “कितने बाल-बच्चे हैं?” उसने जवाब दिया कि “दो बेटियां हैं.” देश में मुफ्त के सलाहकार भरे पडे हैं. सो इन्होंने तपाक से सलाह दे डाली कि “भाई, दो बेटियां हैं. समाज, घर सभी ताने दे-देकर मार देंगे. एक बेटा पैदा कर लो. यू आर स्टिल यंग. डोंट लूज अपोर्चुनिटी.” वह बिचारा कहने लगा कि “हमारे घर में ऐसा कोई भेद-भाव नहीं है.” तो वे तपाक से कहने लगे कि “अरे, नहीं है तो क्या हुआ? गांव-घर तो जाते होगे ना! वहां तो लोग सुनाते ही होंगे ना. और तुम्हें क्या! तुम तो आदमी हो. सुनाते तो होंगे तुम्हारी पत्नी को. सोचो, बेचारे कैसे यह सब सहती होगी? और इतना कमाते हो. सपोज कि तीसरी अगर फिर से बेटी ही हो गई तो पाल लेना. इतने तो पैसे मिलते हैं.”
आप अगर बेटियों के समर्थक हैं तो सर धुनते रहिए. छम्मकछल्लो भी बेटे के ना होने का अफसोस आजतक सुनती है, जब गांव घर जाती है. लेकिन अगर लोग यह कहें कि कौआ कान लेकर उडा जा रहा है तो कौए के पीछे भागें कि अपने कान देखें? भई, ऐसी क्या खराबी है बेटी में? आपके ही जिगर का तो अंश है वह भी? उसके हाथ का खाते-पीते हैं कि नहीं? तो उसके नाम से कुल खानदान चल गया या उसने हमें मुखाग्नि दे दी, तो कौन सा ज़ुल्म हो गया? हर बात के लिए सरकार को कोसनेवाले हम क्या कभी अपने-आपको कोसने की ज़हमत उठाएंगे? सरकार तो नियम-क़ायदे-क़ानून ही बना सकती है. लेकिन उसे मानेंगे तो हम ही ना! यह प्रजातांत्रिक देश है तो हम सभी अपने अपने स्तर पर सरकार और व्यवस्था हुए कि नहीं? अगर नहीं तो कीजिए तीसरी-चौथी संतान पैदा. कहनेवाले तो इसके लिए भी दलील दे ही देते हैं कि “भई, यही संतान तो अपनी है, बाकी दोनों तो सरकारी हैं.” छम्मकछल्लो के कई सहकर्मी यही दलील दे-देकर तीसरी संतान पैदा कर चुके हैं. संयोग से उनकी वह तीसरी संतान बेटा हुई. बेटी होती तो शायद चौथी की भी सोच लेते. और मन में कोई मलाल मत लाइए. जी हां, ये इस देश के पढे-लिखे लोगों के विचार और कार्य हैं. सरकार अगर इससे दुखी होकर पढने-लिखने की योजना पर कुठाराघात करने लगे तो? तो फिर ये पढे-लिखे ही सरकार की लानत-मलामत उठाने से बाज़ ना आएंगे. आखिर क्या करे सरकार?
तब लोग सरकार को और उनके नियम, कायदे, कानून को भी धता बताने से बाज नहीं आते. बेटे की इस चाहत के पीछे शिक्षित- अशिक्षित का कोई भेद-भाव नहीं. छम्मकछल्लो का मन प्रसन्न हुआ कि चलो, इसमें तो कम से कम पढे-अनपढ का कोई भेद-भाव नहीं. आखिर कुल का नाम सभी को रोशन करना है. सभी को अपना अंतिम संस्कार अपने बेटे से करवाना होता है.
छम्मकछल्लो एक बहुत बडे अधिकारी के पास बैठी हुई थी. बडे अधिकारी अपने एक अपेक्षाकृत कम उम्र के अधिकारी से मिल रहे थे. स्नेहवश पूछ लिया कि “कितने बाल-बच्चे हैं?” उसने जवाब दिया कि “दो बेटियां हैं.” देश में मुफ्त के सलाहकार भरे पडे हैं. सो इन्होंने तपाक से सलाह दे डाली कि “भाई, दो बेटियां हैं. समाज, घर सभी ताने दे-देकर मार देंगे. एक बेटा पैदा कर लो. यू आर स्टिल यंग. डोंट लूज अपोर्चुनिटी.” वह बिचारा कहने लगा कि “हमारे घर में ऐसा कोई भेद-भाव नहीं है.” तो वे तपाक से कहने लगे कि “अरे, नहीं है तो क्या हुआ? गांव-घर तो जाते होगे ना! वहां तो लोग सुनाते ही होंगे ना. और तुम्हें क्या! तुम तो आदमी हो. सुनाते तो होंगे तुम्हारी पत्नी को. सोचो, बेचारे कैसे यह सब सहती होगी? और इतना कमाते हो. सपोज कि तीसरी अगर फिर से बेटी ही हो गई तो पाल लेना. इतने तो पैसे मिलते हैं.”
आप अगर बेटियों के समर्थक हैं तो सर धुनते रहिए. छम्मकछल्लो भी बेटे के ना होने का अफसोस आजतक सुनती है, जब गांव घर जाती है. लेकिन अगर लोग यह कहें कि कौआ कान लेकर उडा जा रहा है तो कौए के पीछे भागें कि अपने कान देखें? भई, ऐसी क्या खराबी है बेटी में? आपके ही जिगर का तो अंश है वह भी? उसके हाथ का खाते-पीते हैं कि नहीं? तो उसके नाम से कुल खानदान चल गया या उसने हमें मुखाग्नि दे दी, तो कौन सा ज़ुल्म हो गया? हर बात के लिए सरकार को कोसनेवाले हम क्या कभी अपने-आपको कोसने की ज़हमत उठाएंगे? सरकार तो नियम-क़ायदे-क़ानून ही बना सकती है. लेकिन उसे मानेंगे तो हम ही ना! यह प्रजातांत्रिक देश है तो हम सभी अपने अपने स्तर पर सरकार और व्यवस्था हुए कि नहीं? अगर नहीं तो कीजिए तीसरी-चौथी संतान पैदा. कहनेवाले तो इसके लिए भी दलील दे ही देते हैं कि “भई, यही संतान तो अपनी है, बाकी दोनों तो सरकारी हैं.” छम्मकछल्लो के कई सहकर्मी यही दलील दे-देकर तीसरी संतान पैदा कर चुके हैं. संयोग से उनकी वह तीसरी संतान बेटा हुई. बेटी होती तो शायद चौथी की भी सोच लेते. और मन में कोई मलाल मत लाइए. जी हां, ये इस देश के पढे-लिखे लोगों के विचार और कार्य हैं. सरकार अगर इससे दुखी होकर पढने-लिखने की योजना पर कुठाराघात करने लगे तो? तो फिर ये पढे-लिखे ही सरकार की लानत-मलामत उठाने से बाज़ ना आएंगे. आखिर क्या करे सरकार?
Wednesday, April 21, 2010
मि जिन्ना : मंच पर एक राजनीतिक त्रासदी
http://mohallalive.com/2010/04/21/a-criticism-on-mr-zinna/
इतिहास से उठाकर जिन्ना को देखिए – एक बाप के रूप में, एक पति के रूप में, एक भाई के रूप में और इन सबसे ऊपर एक व्यक्ति के रूप में। व्यक्ति की अपनी अभिलाषा जब लोकहित को लांघ जती है, तब जिन्ना जैसे व्यक्तित्व का उदय होता है और तब देश को, उपनिवेश को, विश्व को विभाजन, दंगे, हत्या, लूटपाट जैसी मानव निर्मित त्रासदी से गुजरना पड़ता है। हिंदुस्तान-पाकिस्तान आज जिन्ना जैसे लोगों की जिद का नतीजा है और आज पूरा विश्व इसकी त्रासदी को झेलने को मजबूर है।
एक ही व्यक्ति पर पूरे हालात का ठीकरा फोड़नेवाली मानसिकता में इस पर भी गौर किये जाने की जरूरत है कि क्यों एक व्यक्ति अपनी उदारता और तरक्कीपसंद बातें छोड़ कर इतना कट्टर हो जाता है कि उसके आगे कोई राह ही नहीं बच पाती है। सामने बन रही तस्वीर के पीछे हालात और लोगों के कौन कौन से रंग भरे जा रहे हैं, इन पर अब नये सिरे से विचार किये जाने की जरूरत है।
शायद इन्हीं सबको ध्यान में रखकर डॉ नरेंद्र मोहन ने “मि जिन्ना” नाटक लिखा। इसमें जिन्ना की जिद के साथ साथ उसके व्यक्तित्व के अलग और अनछुए पहलुओं को देखने की कोशिश की गयी है। बताया गया है कि कांग्रेस के हठ ने किस तरह से गांधी को भी अलग-थलग कर दिया। नागपुर अधिवेशन में मिले अपमान की आग में जलते हुए जिन्ना जिद्दी बने तो उस जिद की ज्वाला में तत्कालीन दूसरे नेताओं ने आग में घी का काम किया और वे सब भी अपनी अपनी महत्वाकांक्षा की आग में जलते हुए देश को ही सांप्रदायिकता और अब कभी न खत्म होनेवाली नफरत की आग में झोंक दिया।
“मि जिन्ना” का मंचन दिल्ली के अस्मिता थिएटर द्वारा किया जानेवाला था, मगर ऐन वक्त पर इस पर बैन लग गया। नाटक चर्चित हो गया। बैन के ये अपने फायदे हैं। अभिव्यक्ति के खतरों पर फिर से बहसें शुरू हुईं और उसके बाद सब कुछ शांत पड़ गया। मगर 2007 में हिंदी थिएटर के सुप्रसिद्ध निर्देशक आरएस विकल ने इस नाटक में सम्भावित तमाम खतरों को जानते हुए भी इसके मंचन की सोची और “विराट कलोद्भव” के बैनर से इसे मुंबई में मंचित किया। तीन-चार प्रायोगिक मंचन के बाद फरवरी, 2008 में मुंबई के कालाघोड़ा फेस्टिवल में इस नाटक की शानदार प्रस्तुति हुई। इसके बाद एकाध और प्रस्तुति के बाद अभी विगत 4 अप्रैल, 2010 को इंदौर के सामाजिक मंच “सूत्रधार” के सौजन्य से यहां के माई मंगेशकर हॉल में ‘मि जिन्ना’ के दो शो हुए।
हम आपको बता दें कि मि जिन्ना न तो राजनैतिक नाटक है, न ऐतिहासिक। यह उस व्यक्ति के मनोविज्ञान को गहराई से समझने का प्रयास है, जिसने अपने वक्त में इस भारतीय महाद्वीप को हिला कर रख दिया था। जिन्ना न तो नायक थे और न ही खलनायक, बल्कि वे ऐसी शख्सीयत थे, जो अपने ही विचारों के शिकार बनते चले गये।
अपने प्रायोगिक मंचन के लिए प्रसिद्ध आरएस विकल ने तरह तरह के बिंब के जरिये इस नाटक को अदभुत रूप देने का सफल प्रयास किया। बिना किसी विशेष मंचीय तामझाम, वेश-भूषा और संगीत के यह नाटक अपने बिंबों के माध्यम से अपनी बात कहने में सफल रहा। 110 मिनट के नाटक में उन सभी पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गयी, जिसके कारण विभाजन और फिर दंगे हुए। नाटक का जोर सेट अप और गेट अप पर बिल्कुल ही नहीं था, यह कहना गलत होगा। दरअसल एक नये प्रयोग के कारण नाटक को ऐसा फॉर्म दिया गया था, जिसमें कलाकार का काम, उसके संवाद, उसकी पोशाक, उसके हाव-भाव एक डिजाइन के रूप में सामने आएं और अपनी बात असरदायक तरीके से कह जाएं।
इसका एक प्रमुख निर्देशकीय कथ्य यह भी रहा कि हम कैसे एक व्यक्ति को अपना सब कुछ मानकर उसके हाथों में अपने जीवन की बागडोर थमा देते हैं और उसके हाथ की कठपुतली बनने को विवश हो जाते हैं। मूर्तिपूजा का यह रूप आज तो और भी भयंकर रूप में चल पड़ा है। नायक, महानायक का चोला पहिना देनेवाला समाज खुद ही यह नहीं समझ पाता है कि कैसे अब इस मकड़जाल से बाहर आया जाए। नाटक में छतरी का अनूठा प्रयोग किया गया। गांधी को सफेद और फातिमा को हरी और जमशेद को लाल छतरी देकर उसे नये प्रतीक में बांधने की कोशिश की गयी।
बावजूद इसके, इस नाटक की अपनी सीमाएं रहीं, जो इसकी लेखकीय सीमाओं के साथ जुड़ता है। इतिहास गांध, जिन्ना, नेहरु, पटेल और जिन्ना की बेटी दीना को भी जानता है, इसलिए उनके चरित्रों को समझने में उन्हें आसानी हुई। मगर नाटक के दो प्रमुख किरदार – जिन्ना की बहन फातिमा और जिन्ना के दोस्त जमशेद के साथ दर्शक संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं। बहुत कम लोगों को शायद मालूम हो कि फातिमा की अपनी ख्वाहिश एक इस्लामिक स्टेट बनाने की रही और इसके लिए उसने जिन्ना का इस्तेमाल किया। यहां तक कि उसके लिए उसने जमशेद का भी त्याग कर दिया। मगर नाटक में फातिमा को एक नाराज, गुस्सैल, तुनकमिजाज, ईर्ष्यालु, कुटनी महिला के इतने नकारात्मक किरदार में दिखाया गया है कि बालाजी के सीरियल्स याद आने लगते हैं। लगता ही नहीं कि वह महिला इतनी कंपोज्ड रही होगी कि उसने एक देश के भीतर एक दूसरा देश बनवा दिया। वह भी एक कौम विशेष की खातिर। चूंकि इतिहास में भी फातिमा पर बहुत अधिक नहीं मिलता, नाटक में उसके स्वरूप का कुछ खुलासा ही नहीं हो पाता। जमशेद, जिससे फातिमा प्रेम करती है, उसके प्रति भी वह सहज नहीं है और केवल उसके बल पर आगे बढ़ने के ख्वाब देखती है। उससे पेंटिंग के मार्फत की जानेवाली और की जा सकनेवाली कमाई की बात पूछती है। सवाल यह है कि अगर उसका चरित्र इतना नकारात्मक है, तो उसे इस नाटक में जगह देने की जरूरत ही क्यों है, जबकि यह भी खुलासा नहीं हो पाता है कि वह पाकिस्तान बनवाने के लिए कितनी मरी जा रही थी?
यही स्थिति जमशेद के साथ है। जिन्ना का वह जिगरी दोस्त, जिसके लिए जिन्ना पाकिस्तान बन जाने के बाद आर्ट, कल्चर सेंटर खुलवा देने की बात करता है, दर्शकों के साथ एक अभिनेता के रूप में तो पहचान लिया जाता है, मगर जमशेद के रूप में अपना संवाद स्थापित नहीं करवा पाता। नतीजन, दर्शक जमशेद या फातिमा के चरित्र को याद ही नहीं रख पाते। यह ऐतिहासिक रचनाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, जिनमें दर्शक या पाठक परिचित चेहरे ही पहचान पाते हैं।
फिर भी यह नाटक दर्शकों में एक उत्सुकता पैदा करता है और उस समय के भारतीय नेताओं को कठघरे में ला खड़ा करता है। अब वह वक्त आ गया है, जब इतिहास के इन भयंकरतम भूलों को लोग फिर से देखें, समझें और अपने पूर्वग्रह से मुक्त हो कर नये सिरे से इस पर चर्चा करें और धर्म और मजहब, जात-पात से ऊपर उठकर प्रेम और सौहार्द्र की बोली भाषा समझे।
नाटक का जो डिजाइन था, उसमें इसके सभी पात्र एक सम भाव से, पूरे समन्वय के साथ इस नाटक के साथ जुटे रहे। अपने किरदार की वजह से जिन्ना के रूप में हर्ष प्रसाद, गांधी के रूप में सतीश ठाकुर और दीना के रूप में श्रुति वैद्य दर्शकों का ध्यान खींच सके। सबसे अधिक सराहना मिली बदरु का चरित्र निभा रहे सुबोध श्रीवास्तव को, जो एक आम आदमी के रूप में इस तरह की तमाम ज्यादतियों का शिकार होता है।
इतिहास से उठाकर जिन्ना को देखिए – एक बाप के रूप में, एक पति के रूप में, एक भाई के रूप में और इन सबसे ऊपर एक व्यक्ति के रूप में। व्यक्ति की अपनी अभिलाषा जब लोकहित को लांघ जती है, तब जिन्ना जैसे व्यक्तित्व का उदय होता है और तब देश को, उपनिवेश को, विश्व को विभाजन, दंगे, हत्या, लूटपाट जैसी मानव निर्मित त्रासदी से गुजरना पड़ता है। हिंदुस्तान-पाकिस्तान आज जिन्ना जैसे लोगों की जिद का नतीजा है और आज पूरा विश्व इसकी त्रासदी को झेलने को मजबूर है।
एक ही व्यक्ति पर पूरे हालात का ठीकरा फोड़नेवाली मानसिकता में इस पर भी गौर किये जाने की जरूरत है कि क्यों एक व्यक्ति अपनी उदारता और तरक्कीपसंद बातें छोड़ कर इतना कट्टर हो जाता है कि उसके आगे कोई राह ही नहीं बच पाती है। सामने बन रही तस्वीर के पीछे हालात और लोगों के कौन कौन से रंग भरे जा रहे हैं, इन पर अब नये सिरे से विचार किये जाने की जरूरत है।
शायद इन्हीं सबको ध्यान में रखकर डॉ नरेंद्र मोहन ने “मि जिन्ना” नाटक लिखा। इसमें जिन्ना की जिद के साथ साथ उसके व्यक्तित्व के अलग और अनछुए पहलुओं को देखने की कोशिश की गयी है। बताया गया है कि कांग्रेस के हठ ने किस तरह से गांधी को भी अलग-थलग कर दिया। नागपुर अधिवेशन में मिले अपमान की आग में जलते हुए जिन्ना जिद्दी बने तो उस जिद की ज्वाला में तत्कालीन दूसरे नेताओं ने आग में घी का काम किया और वे सब भी अपनी अपनी महत्वाकांक्षा की आग में जलते हुए देश को ही सांप्रदायिकता और अब कभी न खत्म होनेवाली नफरत की आग में झोंक दिया।
“मि जिन्ना” का मंचन दिल्ली के अस्मिता थिएटर द्वारा किया जानेवाला था, मगर ऐन वक्त पर इस पर बैन लग गया। नाटक चर्चित हो गया। बैन के ये अपने फायदे हैं। अभिव्यक्ति के खतरों पर फिर से बहसें शुरू हुईं और उसके बाद सब कुछ शांत पड़ गया। मगर 2007 में हिंदी थिएटर के सुप्रसिद्ध निर्देशक आरएस विकल ने इस नाटक में सम्भावित तमाम खतरों को जानते हुए भी इसके मंचन की सोची और “विराट कलोद्भव” के बैनर से इसे मुंबई में मंचित किया। तीन-चार प्रायोगिक मंचन के बाद फरवरी, 2008 में मुंबई के कालाघोड़ा फेस्टिवल में इस नाटक की शानदार प्रस्तुति हुई। इसके बाद एकाध और प्रस्तुति के बाद अभी विगत 4 अप्रैल, 2010 को इंदौर के सामाजिक मंच “सूत्रधार” के सौजन्य से यहां के माई मंगेशकर हॉल में ‘मि जिन्ना’ के दो शो हुए।
हम आपको बता दें कि मि जिन्ना न तो राजनैतिक नाटक है, न ऐतिहासिक। यह उस व्यक्ति के मनोविज्ञान को गहराई से समझने का प्रयास है, जिसने अपने वक्त में इस भारतीय महाद्वीप को हिला कर रख दिया था। जिन्ना न तो नायक थे और न ही खलनायक, बल्कि वे ऐसी शख्सीयत थे, जो अपने ही विचारों के शिकार बनते चले गये।
अपने प्रायोगिक मंचन के लिए प्रसिद्ध आरएस विकल ने तरह तरह के बिंब के जरिये इस नाटक को अदभुत रूप देने का सफल प्रयास किया। बिना किसी विशेष मंचीय तामझाम, वेश-भूषा और संगीत के यह नाटक अपने बिंबों के माध्यम से अपनी बात कहने में सफल रहा। 110 मिनट के नाटक में उन सभी पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की गयी, जिसके कारण विभाजन और फिर दंगे हुए। नाटक का जोर सेट अप और गेट अप पर बिल्कुल ही नहीं था, यह कहना गलत होगा। दरअसल एक नये प्रयोग के कारण नाटक को ऐसा फॉर्म दिया गया था, जिसमें कलाकार का काम, उसके संवाद, उसकी पोशाक, उसके हाव-भाव एक डिजाइन के रूप में सामने आएं और अपनी बात असरदायक तरीके से कह जाएं।
इसका एक प्रमुख निर्देशकीय कथ्य यह भी रहा कि हम कैसे एक व्यक्ति को अपना सब कुछ मानकर उसके हाथों में अपने जीवन की बागडोर थमा देते हैं और उसके हाथ की कठपुतली बनने को विवश हो जाते हैं। मूर्तिपूजा का यह रूप आज तो और भी भयंकर रूप में चल पड़ा है। नायक, महानायक का चोला पहिना देनेवाला समाज खुद ही यह नहीं समझ पाता है कि कैसे अब इस मकड़जाल से बाहर आया जाए। नाटक में छतरी का अनूठा प्रयोग किया गया। गांधी को सफेद और फातिमा को हरी और जमशेद को लाल छतरी देकर उसे नये प्रतीक में बांधने की कोशिश की गयी।
बावजूद इसके, इस नाटक की अपनी सीमाएं रहीं, जो इसकी लेखकीय सीमाओं के साथ जुड़ता है। इतिहास गांध, जिन्ना, नेहरु, पटेल और जिन्ना की बेटी दीना को भी जानता है, इसलिए उनके चरित्रों को समझने में उन्हें आसानी हुई। मगर नाटक के दो प्रमुख किरदार – जिन्ना की बहन फातिमा और जिन्ना के दोस्त जमशेद के साथ दर्शक संबंध स्थापित नहीं कर पाते हैं। बहुत कम लोगों को शायद मालूम हो कि फातिमा की अपनी ख्वाहिश एक इस्लामिक स्टेट बनाने की रही और इसके लिए उसने जिन्ना का इस्तेमाल किया। यहां तक कि उसके लिए उसने जमशेद का भी त्याग कर दिया। मगर नाटक में फातिमा को एक नाराज, गुस्सैल, तुनकमिजाज, ईर्ष्यालु, कुटनी महिला के इतने नकारात्मक किरदार में दिखाया गया है कि बालाजी के सीरियल्स याद आने लगते हैं। लगता ही नहीं कि वह महिला इतनी कंपोज्ड रही होगी कि उसने एक देश के भीतर एक दूसरा देश बनवा दिया। वह भी एक कौम विशेष की खातिर। चूंकि इतिहास में भी फातिमा पर बहुत अधिक नहीं मिलता, नाटक में उसके स्वरूप का कुछ खुलासा ही नहीं हो पाता। जमशेद, जिससे फातिमा प्रेम करती है, उसके प्रति भी वह सहज नहीं है और केवल उसके बल पर आगे बढ़ने के ख्वाब देखती है। उससे पेंटिंग के मार्फत की जानेवाली और की जा सकनेवाली कमाई की बात पूछती है। सवाल यह है कि अगर उसका चरित्र इतना नकारात्मक है, तो उसे इस नाटक में जगह देने की जरूरत ही क्यों है, जबकि यह भी खुलासा नहीं हो पाता है कि वह पाकिस्तान बनवाने के लिए कितनी मरी जा रही थी?
यही स्थिति जमशेद के साथ है। जिन्ना का वह जिगरी दोस्त, जिसके लिए जिन्ना पाकिस्तान बन जाने के बाद आर्ट, कल्चर सेंटर खुलवा देने की बात करता है, दर्शकों के साथ एक अभिनेता के रूप में तो पहचान लिया जाता है, मगर जमशेद के रूप में अपना संवाद स्थापित नहीं करवा पाता। नतीजन, दर्शक जमशेद या फातिमा के चरित्र को याद ही नहीं रख पाते। यह ऐतिहासिक रचनाओं की अपनी सीमाएं होती हैं, जिनमें दर्शक या पाठक परिचित चेहरे ही पहचान पाते हैं।
फिर भी यह नाटक दर्शकों में एक उत्सुकता पैदा करता है और उस समय के भारतीय नेताओं को कठघरे में ला खड़ा करता है। अब वह वक्त आ गया है, जब इतिहास के इन भयंकरतम भूलों को लोग फिर से देखें, समझें और अपने पूर्वग्रह से मुक्त हो कर नये सिरे से इस पर चर्चा करें और धर्म और मजहब, जात-पात से ऊपर उठकर प्रेम और सौहार्द्र की बोली भाषा समझे।
नाटक का जो डिजाइन था, उसमें इसके सभी पात्र एक सम भाव से, पूरे समन्वय के साथ इस नाटक के साथ जुटे रहे। अपने किरदार की वजह से जिन्ना के रूप में हर्ष प्रसाद, गांधी के रूप में सतीश ठाकुर और दीना के रूप में श्रुति वैद्य दर्शकों का ध्यान खींच सके। सबसे अधिक सराहना मिली बदरु का चरित्र निभा रहे सुबोध श्रीवास्तव को, जो एक आम आदमी के रूप में इस तरह की तमाम ज्यादतियों का शिकार होता है।
Subscribe to:
Posts (Atom)