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Tuesday, October 20, 2009

टैगोर, नारी मन और असम का संगम- नाटक 'मध्यबर्तिनी' में

http://mohallalive.com/2009/10/19/nehru-centre-theatre-festival-last-day-last-play/#comments
रवींद्रनाथ टैगोर की नारी प्रधान कहानी हो तो दिल अपने आप भर आता है। और उस पर जब असम के लोक रंग का बाना हो, तो उसका असर दुगना होते देर नहीं लगती। नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल के आखिरी दिन दोपहर दो बजे मराठी नाटक “टेंग्शेच्या स्व्पनात ट्रेन” था और शाम सात बाजे असम के सीगल ग्रुप का नाटक “मध्यबर्तिनी”। असम के नाटक की खासियत है उसका लोकरंग तत्व। “मध्यबर्तिनी” भी इसका अपवाद नहीं था। अपनी बीमारी से त्रस्त और पति को दिन रात अपनी सेवा में लगा देख आत्मग्लानि से भरी निस्संतान हरासुंदरी अपने विवाह के सत्ताइस साल बाद अपने पति निबारन का विवाह शैलबाला नामक युवती से करा देती है, ताकि पति के जीवन में कुछ तो सुख आये। साथ ही सूना घर-आंगन बच्चे की किलकारी से गूंजे। इतना बड़ा त्याग किसी स्त्री से ही संभव है और किसी स्त्री से ही संभव है कि उस त्याग का प्रतिदान वह उसके सर्वस्व को अपने बस में करके ले ले। नयी पत्नी के प्रेम में आसक्त निबारन के संकट के समय नयी, गर्भवती पत्नी उसके संकट को कम नहीं करती, बल्कि गहने के बदले अपनी जान देकर उसका संकट और घर के अवसाद को और भी बढ़ा ही देती है।

नाटक के स्क्रिप्ट पर बात करते हुए हरासुंदरी की भूमिक निभा रही और ग्रुप की महत्वपूर्ण सदस्या भागीरथी बताती हैं कि मूल कथा में कोई भी फेरबदल नहीं किया गया है, लेकिन इसे पूरी तरह से असम के परिप्रेक्ष्य में रखा गया है। इसलिए यहां आप असम का संगीत, असम का लोक रंग पाएंगे। यहां तक कि इसमें सर्कस शैली का भी इस्तेमाल किया गया है और इसके लिए सर्कस खेलनेवाले धूलिया को भी इस नाटक में लाया गया है।

नाटक की प्रयोगधर्मिता अपने चरम पर थी। मन की उलझन और जीवन की आसक्ति में मन का जीवन जाल में फंसने के प्रतीक के रूप में जाल का इतना सुंदर प्रयोग हुआ है कि बस, मुंह से वाह निकल जाए। अब तक नाटक में इतना लंबा प्रणय दृश्य मैंने नहीं देखा था। लेकिन उस प्रणय दृश्य की कलात्मकता देखिए कि आप उसे किसी प्रेम कविता की तरह महसूस करते हैं। आप खुद भी उस प्रणय काव्य का एक भाग बन कर रह जाना चाहेंगे। इतनी सुंदर और अश्लीलता से कोसों दूर प्रेम की विकलता, विह्वलता का ऐसा बांसुरीमय तान कि देह का रेशा-रेशा इस तान में पूरे-पूरे उतर जाने को चाहे। और यह प्रणय दृश्य सवा घंटे के नाटक में दो बार आता है और दोनों ही बार कलात्मकता के शिखर पर। चार स्त्रियां, जिन्हें आप पुतलियां भी कह सकते हैं या जिन्हें आप पात्र के रूप में देख सकते हैं और चार धूलिया नाटक को सूत्रधार और नटी के रूप में कथा को आगे तो बढ़ाते हैं, मगर पारंपरिक सूत्रधार या नटी नहीं रहते।

नाटक के विजुअल्स को असम का लोक नृत्य बहुत बढ़ाता है। भाव से अपने को अभिव्यक्त करना इस नाटक की भी खासियत रही है। मक्खन बिलोती हरासुंदरी मन को मथ रही होती है। हरासुंदरी के रूप में भागीरथी ने अपनी छाप छोड़ी है। असम का अकलुष सौंदर्य आप इस नाटक में देख सकते हैं। बेदाग पवित्र सौंदर्य जैसे छन-छन कर आ रहा था। संगीत में स्थानीय पुट था और वह संगीत इतना मनोरम था कि आप मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। गुनाकर देवगोस्वामी की कोरियोग्राफी मन:रंजक थी। सबसे अच्छा लग रहा था महिलाओं का पारंपरिक परिधान – मेखला चादर।

नाटक के निर्देशक बहरुल इस्लाम भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 1990 के स्नातक हैं। असमी में इन्होंने चार नाटक लिखे हैं और थिएटर पर एक किताब आयी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा स्थापित “मनोहर सिंह स्मृति अवार्ड 2005″ के ये विजेता रहे हैं। इस फेस्टिवल में उनकी अनुपस्थिति खटकी, मगर इनके निर्देशन ने वह कमी पूरी कर दी।

मुख्य पात्र हरासुंदरी के रूप में भागीरथी भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ही पास आउट और बहरुल इस्लाम की जीवन संगिनी हैं। मूलत: कर्णाटक की भागीरथी अभी असमी में नाटक कर रही हैं और हिंदी भी बड़े आत्मविश्वास के साथ बोल लेती हैं। मगर स्टेज उदघोषणा के रूप में जिस भी भाषा का इस्तेमाल किया जाए, उसकी शुद्धता पर ध्यान देना ज़रूरी होता है, क्योंकि औपचारिक भाषा में अशुद्धता खटकती है और अकारण ही लोगों को हंसने का मौका देती है।
नाटक चूंकि असमी में था और असमी भाषा में स का प्रयोग नहीं होता, इसलिए हरासुंदरी “हॉराहुंदरी” और शैलबाला “हॉल्लबाला” हो गयी थीं। कुछ देर तो पात्रों के नाम के साथ तालमेल बिठाने में ही लग गया। असमी पर बांग्ला का प्रभाव है, इसलिए अगर असमी से परिचिति न होने पर भी अगर आप बांग्ला जानते हैं तो भाषागत आनंद ले पाते हैं, जैसे मैंने लिया।

यह नाटक हिंदी और असमी दोनों ही भाषा में खेला जाता है। भागीरथी बताती हैं कि हिंदी में खेलते समय हमें अधिक रिहर्सल की ज़रूरत होती है। इस नाटक को देखना थिएटर में गीत, नृत्य, भाव, शैली, मंच सज्जा, नये नये प्रयोग इन सबके साथ एक सुखद अनुभव से जुड़ने जैसा है।

(पुनश्‍च : दोपहर दो बजे हुए मराठी नाटक में जिस कदर भीड़ थी, उसे देखते हुए लगा था कि इस असमी नाटक में और वह भी अंतिम दिन लोगों का सैलाब रहेगा। मगर अफ़सोस कि इस नाटक में दर्शकों की संख्या और भी नगण्य थी। हिंदी नाटकों की तुलना में इन भाषाई नाटकों (मराठी के अलावा) को मिले लगभग शून्य दर्शक कहीं यह तो नहीं कह रहे कि हम अब प्रयोग के लिए तैयार नहीं? बस आएंगे, नाटक देखेंगे, नाटक में काम कर रहे सेलेब्रेटी के दर्शन करेंगे, थोड़ा हंसेंगे और चल देंगे। अगर ऐसा है, तो थिएटर के लिए यह एक बड़े खतरे की ओर इशारा करता है। उम्मीद थी कि नाटक के अंत में नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल के समापन का बीज वक्तव्य यहां के अधिकारियों द्वारा दिया जाएगा, मगर वह नहीं दिया गया। शायद न्यून दर्शक इसके मूल में रहे हों। लेकिन अगर नाटक न्यूनतम संख्या के दर्शकों के लिए हो सकता है तो वक्तव्य भी हो सकता था। आखिर, सौ ही सही, दर्शक तो थे ही न!)

Monday, October 19, 2009

टेंग्चे के सपनों में मुंबई की लोकल की नाट्य त्रासदी

http://mohallalive.com/2009/10/19/tengshe-chya-swapnat-train-in-nehru-theatre-festival/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल का पांचवां मराठी नाटक था – समन्‍वय, पुणे का “टेंग्शेच्या स्वप्नात ट्रेन” यानी टेंचे के स्वप्‍न में ट्रेन, ट्रेन मुंबईकर के बदन में धड़कन की तरह समायी हुई है। यह ट्रेन जीवन है, धड़कन है, समय है, समय के साथ भागती दौडती ज़‍िंदगी है, ज़‍िंदगी के आगे निकल गया समय है, समय के आगे निकल गया जीवन है। मतलब जिस भी रूप में आप चाहें, ट्रेन को अपने साथ जोड़ सकते हैं। कालांतर में व्यक्ति और ट्रेन एक दूसरे के साथ गड्ड मड्ड हो जाते हैं।
एक मोटरमैन का बेटा सिद्धिविनायक टेंग्चे अपने आसपास ट्रेन का ही माहौल पाता है। इसी ट्रेन में नौकरी पाकर उसका पिता उसका भरण-पोषण करता है और इसी ट्रेन से किसी दूसरे मोटरमैन द्वारा कुछ बच्चों के कुचल जाने का गुस्सा उसके पिता को अपनी जान दे कर झेलनी होती है। ट्रेन के सभी हादसे अब टेंग्चे के सपनों का हिस्सा बन गये हैं। आप इन हादसों के साथ खुद को पा सकते हैं, चाहे वह चलती ट्रेन मे किसी लड़की का बलात्कार हो या छीनाझपटी या धर्म के नाम पर एक विशेष वर्ग की जामाझाड़ नंगातलाशी।
यह नाटक हमारी मध्यवर्गीय या कह लें के हमारे संभ्रांत वर्ग की कलई खोलता है, जहां हम बदलाव तो चाहते हैं, मगर उस बदलाव का कारक, कारण या उसका हिस्सा बनना नहीं चाहते। बुद्धिजीवी वर्ग में यह खोखलापन कुछ और भी ज़्यादा है। टेंग्चे लेखक है और वह यह ज़ोर दे कर कहता है कि वह लेखक है, इसलिए वह केवल लेखन करेगा, क्रांति नहीं। और जब वह अपने ही धर्म और समाज के अपने ही लोगों के आतंक का खुद भुक्तभोगी बनता है, तब वहां से पलायन कर जाता है। यह एक आम मध्यवर्गीय या संभ्रांत वर्ग का चरित्र है।
शशांक शेंडे का निर्देशन कसा हुआ है। पात्र के ऊपर पात्र और चरित्र के ऊपर चरित्रों का गुंफन स्वप्न की जटिलता को दर्शाता है – साथ ही स्वप्‍न में डूबे व्यक्ति को कितना लाचार और पंगु बना देता है, यह भी बताता है। प्रकाश व्यवस्था बहुत अच्छी है। सिर्फ एक रोशनी की लकीर के सहारे ट्रेन की पटरी, तेज भागती ट्रेन की आवाज़, ट्रेन के हेडलाइट्स की पास आती रोशनी और तखत के बीच में बैठी तीनों बहनें ये बता देते हैं कि यहां आत्महत्या होने जा रही है। यह आपको जड़ बना देने के लिए काफी है। इसी तरह से तखत पर ही बैठे लोगों के ट्रेन में बैठने का आभास दे कर आत्महत्या से लेकर धार्मिक अंधत्व को बड़ी कुशलता से बुना गया है। मन के अंतर्द्वद्व और बेचैनी को प्रकाश के जरिये ही पूरी की पूरी ट्रेन और उसके कंपार्टमेंट के सहारे दिखाना और उसके साथ-साथ दर्शक के मन में भी वह अंतर्द्वद्व और बेचैनी पैदा करना एक कुशल निर्देशन की मांग करता है। बीच-बीच में चुटीले संवाद और हालात हास्य बिखेरने का काम करते रहे।
संगीत पक्ष भी नाटक को पूरा पूरा सपोर्ट करता है। मन की वेदना, बेचैनी, उलझन को आप महसूस कर सकते हैं। समन्वय पुणे का एक ऐसा ग्रुप है, जिसे 1992 में सत्यदेव दुबे के वर्कशॉप से निकले कुछ उत्साहियों ने मिल कर शुरू किया था। एकांकी प्रतियोगिताओं के आयोजन से अपनी गतिविधियां शुरू करके यह शीघ्र ही अपने नाटक में लग गया और थिएटर के अनुरूप ही निहायत प्रतिकूल परिस्थिति में अपनी रंगयात्रा शुरू करके जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है।
“टेंग्शेच्या स्वप्नात ट्रेन” के नाट्य लेखक जयंत पवार मराठी के बहुप्रसिद्ध नाट्य लेखक, साहित्यकार व नाट्य समीक्षक हैं। अपनी रचनाओं में वे सामाजिक परिप्रेक्ष्य नये तरीके से ले कर आते हैं। भूमंडलीकरण, बदलते पारिवारिक सिस्टम व जीवन शैली आदि के कारण आदमी से छूट गये अपने ही आदमी की बड़ी सघन जांच करते हैं। “अधांतर”, “माझा घर”, “काय डेंजर वारा सुटले” आदि उनके कुछ बहुचर्चित नाटक हैं। “टेंग्शेच्या स्वप्नात ट्रेन” भी सामाजिक उथल-पुथल के नये आयाम खोलता है। रंगमंच से प्रेम रखनेवालों को यदि मराठी न आती हो तो भी नाट्य अनुभव के लिए मराठी नाटक ज़रूर देखने जाना चाहिए।
(पुनश्‍च : दोपहर दो बजे का शो और नेहरु सेंटर का खचाखच भरा हॉल इस बात का संकेत था कि मराठीभाषी अभी भी नाटक के प्रति कितने गंभीर हैं। दर्शकगण में अधेड़, वृद्ध से लेकर आज के युवा तक थे, जिन्हें एक दिन पहले ही “हम कहें आप सुनें” में कोसा गया था। नाटक को जल्‍दी ख़त्म होना था। हुआ। इतने दिनों में लगातार मुझे देखनेवाले नेहरु सेंटर के कर्मियों ने मुझसे हंसते हुए पूछा – “आता तीन तास काय करायचे?” अब ये तीन घंटे आप क्या करेंगी? क्योंकि अगला शो शाम सात बजे था। हमने अगले शो की तैयारी देखी और बहुत कुछ और भी, जिसकी चर्चा फिर कभी।)

Sunday, October 11, 2009

"किरात पर्व"- बांग्ला नाटक की इतनी लचर प्रस्तुति?

http://mohallalive।com/2009/10/11/nehru-centre-theatre-festival-7th-day/

http://reporterspage.com/miscellaneous/23-24

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में 1970 में उत्पल दत्त द्वारा स्थापित पीपल्स लिटिल थिएटर (पीएलटी) ने उन्हीं का लिखा नाटक "किरात पर्व" प्रस्तुत किया. उत्पल दत्त इसके पहले लिटल थिएटर ग्रुप (एलटीजी) की स्थापना कर चुके थे. पीपल्स लिटिल थिएटर अबतक 60-61 नाटक प्रस्तुत कर चुका है. यह ग्रुप बांग्ला के शम्भू मित्र के "बहुरूपी", अजितेश बनर्जी के "नन्दीकार" या बादल सरकार के थिएटर से अलग है. इसके अपने आदर्श हैं.
बंगाल कला, संस्कृति की धरती है और यहां के बच्चे बच्चे में इसके प्रति रुझान देखी जा सकती है. बांग्ला थिएटर भारत मे एक समृद्ध थिएटर के रूप में माना जाता है और हिन्दी थिएटर की परिपक्वता, मानसिकता, निरवहन आदि की बात आने पर बांग्ला और मराठी थिएटर से उसकी तुलना कर के हिन्दी की अपरिपक्वता की बात की जाती है. इस नाटक को देखते हुए इस पर अब बहस की जा सकती है, मगर यहां नहीं.
कथावस्तु के मूल में कह लें कि शासक और शोषित की चली आ रही और कभी भी खत्म ना होनेवाली परम्परा है. आर्य और अनार्य, ब्राह्मण और शूद्र और आर्यों द्वारा अनार्यों पर अपना जवबरन अधिकार मगर उनके प्रति उतनी ही घृणा, जो आज के ब्राहमणवाद के बहुत करीब है. जिन अनार्यों, किरात, निषाद, राक्षस आदि से शरीर के छू जाने पर भी उन्हें तत्काल मृत्युदंड दे देना बदन पर पडी धूल झाड देने के समान है, युद्ध के समय उन्हीं लोगों के युवाओं को मरने के लिए भेज देना आम बात है. युद्ध में मारे गए पांच पुत्रों की मां का प्रश्न बहुत सहज है, जिसका उत्तर आज तक कोई नहीं दे सका है कि "जीवन तो ले लेते हो, जीवन क्या वापस ला कर दे सकते हो?" वेद पाठ करनेवाले शूद्रों को जीवित जला देना शास्त्र सम्मत मान लिया जाता है. महाभारत काल की कथा के माध्यम से इनके प्रति भेदभाव और ब्राहमणवाद, क्षत्रियवाद या यों कह लें कि सुविधाभोगी समाज में सुविधाभोगियों द्वारा सभी कायदे कानून अपने हिसाब से बना लेना और उस पर चलना यह सत्ताधारियों या तथाकथित बडे लोगों का सबसे मनोरंजक शगल है.
यह प्रश्न सहज ही उठता है कि आखिर क्या बात है कि पौराणिक आख्यानों का बार बार हम मँचन करते हैं, इसके उत्तर में कहा जा सकता है, उनमें से अज के लिए कुछ सटीकता की खोज. यह नाटक भी इसी की एक खोज है. मैने यह नाटक पढा नही है, मगर महाभारत की प्रस्तुति और आर्य अनार्य की चर्चा के बाद अचानक हिटलर का प्रसंग ले आना और फिर महाभारत प्रसँग ला कर नाटक खत्म करना एकाएक नाटक की तन्द्रा में बडा भरी झोल पैदा करता है. हो सकता है कि हिटलर के समय में भी वही शुद्धतावादी रक्त का आग्रह था, इसलिए इसे यहां डाला गया हो, मगर यह आग्रह तो अभी भी अपने समाज में ही है. आज भी शूद्रों पर ताने कसना, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की मेधा पर सन्देह करना आम बात है. अगर अपने ही देश की इस तरह की घटनाओं को लेकर इसे जोडा जाता तो यह अधिक सटीक बन पडता. महाभारत के आख्यान की तरह ही यदि कोई ग्रीक, जर्मन पौराणिक आख्यान जोड जाता तब भी आख्यानों की सटीकता के साथ उसके सन्दर्भ को देखा जा सकता था. मगर हिटलर प्रसंग तो एक ऐतिहासिक प्रसंग है. उससे इस पूरे नाटक में एक अजीब सा घालमेल पैदा हो गया.
नाटक बहुत ही धीमी गति में था. कलाकारों में ऊर्जा (एनर्जी) का भयंकर अभाव दिखा. शायद ऐसा लगभग सभी कलाकरों के उम्रदराज होने की वज़ह से भी हो सकता है. सम्वाद की बहुलता तो हिन्दी नाटकों को भी मात कर रही थी. कृष्ण की हंसी कंस की हंसी जैसी थी और अर्जुन अपने मद में चूर दिखे. सबसे अधिक कोफ्त पैदा कर रही थी शबरी की भूमिका में रीता चक्रवर्ती. नाटक से पूरी तरह असम्पृक्त सारे समय अपने कपडे ठीक करने में लगी रही. सम्वाद बोलने के समय बस बोल दिया और छुट्टी.
वेश भूषा ठीक थी, मगर अस्त्र-शस्त्र को देख कर हंसी आ जाए ऐसे, जैसे रामलीला हो रही हो. शूद्र संत पालुका पर फेंके जा रहे थर्मोकोल के पत्थर करुणा के बदले हास्य उत्पन्न कर रहे थे. इतने पुराने नाट्य ग्रुप से ऐसी प्रस्तुति की उम्मीद नहीं थी. (पुन: इस नाटक की दर्शकता का हाल भी दो दिन पहले खेले गए मलयालम नाटक जैसा ही था. सभागार के कर्मियों ने ही हंसते हुए कह दिया कि आप कहीं भी बैठ सकती हैं. सभागार के बाहर लगनेवाली क्यू का कहीं नामो-निशान नहीं था. खुद नेहरु सेंटर के अधिकारीगण मध्यांतर के बाद नहीं दिखे. अकादमी ऑफ आर्ट के छात्र भीड दिखाने में ज़रा कामियाब रहे, क्योंकि उन्हें इस फेस्टिवल पर प्रोजेक्ट करना है. अधिकांश दर्शक बांग्लाभाषी थे. मध्यांतर के बाद उनमें से भी कई चले गए. पत्रकार दीर्घा लगभग खाली था. एक युवा मराठी दर्शक ने कहा कि ये लोग इतना क्यों बोलते हैं? मेरे पास इसका जवाब नहीं था, इसलिए मैं भी गोल गोल मुंह बनाकर रह गई. निर्देशक असित बासु ने बातचीत करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. धन्यवाद उनके एक कलाकार प्रताप घोष का, जिन्होंने बात की, जानकारियां दीं और बहुत मुद्दे की बात यह कही कि हमलोग थिएटर से पैसे लेते नहीं, बल्कि ज़रूरत पडने पर देते ही हैं और यह भी कि हम थिएटर से पैसे नहीं, बस केवल नाम् और यश चाहते हैं.)

Saturday, October 10, 2009

राजा होना सुखी होने का मार्ग नहीं है, कदापि! - चाणक्य

http://www.hindimedia.in/index.php?option=com_content&task=view&id=8414&Itemid=202
http://reporterspage.com/miscellaneous/23-23
http://mohallalive.com/2009/10/10/nehru-centre-theatre-festival-6th-day/

नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल की अगली प्रस्तुति थी मनोज जोशी कृत नाटक- चाणक्य. नीति और राजनीति के बात आने पर कौटिल्य चाणक्य का नाम ना आये, यह असम्भव है. राजनीति और छल प्रपंच राजनीत का अभिन्न हिस्सा है. यह राजनीति जब व्यक्ति से उठकर समाज की ओर जाती है तो यह हितकारी होती है. इसी हित की साधना में, आर्यावर्त को एक सूत्र में पिरोने का सपना देखा था चाणक्य ने. चाणक्य के चरित्र का तेज, तप, उसकी निष्ठा, उसकी ज़िद, उसकी लगन, उसका आत्माभिमान एक बारगी ऋषि विश्वामित्र की याद दिलाता है. ज़ाहिर है कि ऐसे चरित्र, जिसमें परस्पर विवाद हो, लोगों को लुभाता है और अपने अपने क्षेत्र में उस पर काम करने के लिए उकसाता है.
चाणक्य भी एक ऐसा ही चरित्र है, जिसपर मशहूर अभिनेता मनोज जोशी ने नाटक की विधा में काम किया है. इससे पहले हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक मुद्राराक्षस ने चाणक्य पर लिखा था. जयशँकर प्रसाद के चन्द्रगुप्त नाटक में चाणक्य के चरित्र को उकेरा गया है. डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी अपना सुप्रसिद्ध टीवी सीरियल "चाणक्य" बना ही चुके हैं. इस बीच एक और नाटक आया "चाणक्य शास्त्र" जिसमें राजेन्द्र गुप्ता ने चाणक्य की भूमिका निभाई है.
जो बडा अभिनेता होता है, या जिसका प्रोडक्शन होता है, वह सामान्यत: केन्द्रीय चरित्र निभाता है. डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी ने भी स्वयं चाणक्य की भूमिका निभाई थी. लिहाज़ा मनोज जोशी ने भी अपने इस नाटक में चाणक्य का केन्द्रीय चरित्र निभाया है. पीरियड ड्रामा करते समय काल, पात्र, वेशभूषा, भाषा आदि का बडा ध्यान रखना होता है. इस नाटक में भी इसे निभाने की पूरी कोशिश की गई है. पीरियड ड्रामा में एक और बन्धन होता है, पात्रों की बहुतायत. चाणक्य में भी है. लेकिन नाटक में एक पात्र से कई- कई चरित्र करवा लेने की भी सुविधा रहती है, जिसका लाभ इस नाटक में भी लिया गया है. संगीत कई जगह सीरियल "चाणक्य" की याद दिलाता रहा. यह भी एक तरीके से अच्छा था, क्योंकि डॉ. द्विवेदी पात्र, पीरियड और उसके डिटेल्स आदि में बडी गहराई तक जाते हैं. उनके हाथों निकली चीज़ों में प्रामाणिकता अधिक रहती है. इस लिहाज़ से इस नाटक के संगीत और वातावरण में एक प्रामाणिकता और भी जुड जाती है.
मुद्राराक्षस ने अपने नाटक में महामात्य राक्षस की महिमा का गुणगान किया है और यह बताया है कि महामात्य राक्षस के सहयोग के बिना मगध कितना अधूरा है. इस नाटक में भी महामात्य राक्षस को महिमामंडित किया गया है. चाणक्य का सच और हमारे आज के सच में अभी भी कोई अंतर नही आया है. जगह जगह पर चाणक्य के सम्वाद इस स्थिति को उजागर कर रहे थे. राजा होना सुखी होने क मार्ग नहीं है, कदापि." यही स्थिति आज भी है, जहां हर कोई सत्ता में आना इसलिए चाहता है ताकि वह उसका उपभोग कर सके.
इस नाटक में मनोज जोशी ने एक बहुत ही अच्छी बात की और वह यह कि उन्होंने भाषा के साथ कोई समझौता नहीं किया है. लोग समझ सकें, इसलिए आज की चलताऊ हिन्दी देने का प्रयास उन्होंने कतई नहीं किया है, जो इस पीरियड ड्रामा की बहुत बडी विशेषता है. भाषा की कठिनता के कारण डॉ. द्विवेदी की भी बडी आलोचना हुई थी, मगर बाद में लोग उनके वातायन को समझने लगे थे. यहां भी लोग समझ रहे थे और समझ कर तालियां बजा रहे थे. इसलिए यह तो अब लोग ना कहें कि हिन्दी बडी कठिन है.
परंतु, भाषा पर जितना काम करना चाहिए था, वह नहीं हुआ है. स्क्रिप्ट पर मराठी गुजराती वाक्य-विन्यास का इतना अधिक प्रभाव है कि वह हिन्दी के प्रवाह को तोडता है. औरस संतान को "अनौरस", सन्धि-विच्छेद को सन्धि-रोह", विस्मृत को विस्मरित, निर्बुद्धिपन या बुद्धिहीनता को निर्बुद्धिपन, विनती को विनंति, दुन्दुभी को तुतुम्भी आदि कहना रस भंग करता था. कुछ और बानगी- "कृष्ण के पास समय, सैन्य्, शक्ति अमर्याद (असीमित के अर्थ में) थे. "नाशवंत मानव के प्रति", "आपका वैधव्य का सम्मान कीजिए. आप अपना मस्तक ढंक लीजिए.". "राजदंड का स्वीकार कीजिए". "मैं मेरे प्रतिशोध का उपाय कर लूंगा.". "स्वार्थ ही राजाओं का चालकमान था." मनोज जोशी जी से विनम्र आग्रह कि वे हिन्दी के किसी अच्छे जानकार से स्क्रिप्ट को दिखवा लें. उनसे यह भी आग्रह कि हिन्दी बुलवाते समय पात्रों के उच्चारण पर ध्यान दें. रीती, नीती, पाटलीपुत्र, चाणक्या तो सामांन्य बाते हैं. उच्चारण की मराठी, गुजराती परुषता और हर अक्षर पर बल दे कर बोलना नाटक के आनन्द में व्यवधान उत्पन्न करता है. फिल्म और टीवीवाले तो इन सब पर ध्यान नहीं ही देते, किंतु नाटककार को तो इस पर ध्यान देना होगा, क्योंकि नाटक इस सबसे अलग विधा है और यह दर्शकों के साथ उसी समय अपना सम्बन्ध बना लेता है.
(पुन: नाटक देखने के लिए पूरा हॉल भरा हुआ था. यह सुखद था, मगर यह मलयाली नाटक के निर्देशक सुवीरन की इस बात की पुष्टि भी कर रहा था कि अब वहां भी लोग मोहनलाल जैसे अभिनेताओं को लेने की कोशिश कर रहे हैं. नाटक का ग्लैमर की चपेट में आ जाना शुद्ध थिएटर को नुक्सान तो कर ही रहा है, गुमनाम, मगर प्रतिभावान कलाकरों की जगह को भी घेरे जा रहा है. इसका एक उदाहरण तो यही था कि थिएटर की भाषा में किए गए मलयाली नाटक को देखने के लिए हॉल लगभग खाली था. इस नाटक को प्रायोजक भी मिले हुए थे. कितना सुखद हो कि ऐसे प्रायोजक छोटे छोटे ग्रुपों को भी मिले. उन्हें इसकी अधिक आवश्यकता है.)