आज "औरत होने की सज़ा पर अरविंद जैन की ये लाइनें देखीं, इसमें लक्ष्मी जी ने भी अपनी लाइन जोड दी हैं. अरविंद जी जाने माने एडवोकेट हैं और बहुत सही कानूनी सलाह देते हैं. बहुत कम लोग हैं इस तरह के प्रोफेशन में, जो हिंदी में भी उतनी ही सम्वेदनशीलता से सामने आते हैं. उनकी अनुमति से उनकी ये लाइनें दे रही हूं. ये लाइनें यहीं पर नहीं रुकेंगी. आप सब भी अपनी लाइनें यहां दे सकते हैं.
कभी धरती कभी आसमान सी होती है बेटियाँ
कभी नामी, कभी सुनामी सी होती हैं बेटियाँ
देती है जन्म धरती आसमाँ के नाम को,
फिर भी फकत बेनामी सी होती है बेटियाँ
(साभार लक्ष्मी जी)
कोख से कब्र तक, खामोश ओ तन्हा सफ़र
कभी फ़र्ज़ सी कभी क़र्ज़ सी होती हैं बेटियाँ
समय की रेत पर, ता-उम्र नंगे पाँव चलती
कभी धूप सी कभी छाँव सी होती हैं बेटियाँ
कभी नामी, कभी सुनामी सी होती हैं बेटियाँ
देती है जन्म धरती आसमाँ के नाम को,
फिर भी फकत बेनामी सी होती है बेटियाँ
(साभार लक्ष्मी जी)
कोख से कब्र तक, खामोश ओ तन्हा सफ़र
कभी फ़र्ज़ सी कभी क़र्ज़ सी होती हैं बेटियाँ
समय की रेत पर, ता-उम्र नंगे पाँव चलती
कभी धूप सी कभी छाँव सी होती हैं बेटियाँ
जब कभी माँ-बाप रोते हैं अकेले में
कभी सीता, कभी गीता सी होती हैं बेटियाँ
कभी सीता, कभी गीता सी होती हैं बेटियाँ
अपने हक ओ इन्साफ की लड़ाई में
कभी अम्बा, कभी चंबा सी होती हैं बेटियाँ
कभी अम्बा, कभी चंबा सी होती हैं बेटियाँ
अरविंद जैन.